July 25, 2012

फूड प्रोसेसिंगः भोजन के पोषक तत्व कहां गुम हो जाते हैं?

-भारत डोगरा
भारतीयों का औसत भोजन मुख्य तौर पर अनाज पर ही आश्रित होता है व प्रोसेसिंग के गलत तरीकों से जो पोषण तत्व खो जाते हैं उनकी पूर्ति अन्य तरह के भोजन से नहीं हो सकती है। इस वजह से निर्धन लोगों को इसका अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
कुपोषण की समस्या एक बहुआयामी समस्या है जिसके अनेक कारण हैं। इनमें से एक महत्त्वपूर्ण मगर अनदेखा कारण है प्रमुख खाद्यों के प्रसंस्करण या प्रोसेसिंग के अनुचित तौर तरीके।
हमारे देश में चावल निश्चय ही सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न है व दुर्भाग्य से चावल की अधिक पालिशिंग द्वारा पोषक तत्वों का सबसे अधिक ह्रास किया जा रहा है। इस विषय पर एक विशेषज्ञ एल. रामचंद्रन ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक खाद्य नियोजन- कुछ महत्त्वपूर्ण पक्ष में लिखा है कि केवल मात्रात्मक स्तर पर देखें तो साधारण मिलिंग व पालिशिंग में मात्रात्मक हानि 8 से 16 प्रतिशत होती है, मगर अत्यधिक पालिशिंग की जाए तो यह हानि 27 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
इसी प्रकार आधुनिक रोलर मिलों में गेंहू के पोषक तत्वों में बहुत क्षति होती है। इन मिलों में अनाज के दाने को कई चरणों में तोडऩे की विधि अपनाते हुए उसके बाहरी हिस्से को आटा पीसते समय अलग कर दिया जाता है।
रामचंद्रन के अनुसार अनाजों के इस तरह के प्रोसेसिंग से मात्रात्मक स्तर पर प्रतिवर्ष मनुष्यों के खाने योग्य 80 लाख टन अनाज का नुकसान होता है। पर गुणात्मक स्तर पर जो नुकसान होता है वह  भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अनाज के जो हिस्से छीले- फैंके जाते हैं वे उन्हीं पोषक तत्वों में समृद्ध है जिनकी कमी औसत भारतीय के भोजन में विशेष तौर पर पाई जाती है।
भारत जैसे निर्धन देश के लिए पोषण तत्वों का यह विनाश निश्चय ही चिंता का विषय है। रामचंद्रन के शब्दों में भारतीयों का औसत भोजन मुख्य तौर पर अनाज पर ही आश्रित होता है व प्रोसेसिंग के गलत तरीकों से जो पोषण तत्व खो जाते हैं उनकी पूर्ति अन्य तरह के भोजन से नहीं हो सकती है। इस वजह से निर्धन लोगों को इसका अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
पोषक तत्वों की हानि का एक अन्य बहुत बड़ा स्रोत खाद्य तेलों का हाइड्रोजनीकरण है। पहले तेल को रासायनिक प्रक्रिया द्वारा गंधमुक्त व रंगहीन किया जाता है। फिर इसका हाईड्रोजनेशन किया जाता है। हाईड्रोजनेशन की प्रक्रिया में असंतृप्त वसा संतृप्त वसा में तब्दील हो जाते हैं। अधिक मात्रा में लिए जाने पर संतृप्त वसा स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हो सकती है। दूसरी ओर, असंतृप्त वसा, विशेषकर कुछ किस्म की बहु- असंतृप्त वसा, पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है व अनेक रोगों, व्याधियों से रक्षा करने में सहायक हैं। एक ओर वनस्पति घी हमें आवश्यक पोषण से वंचित रखता है, वहीं दूसरी ओर हम पर गैर- जरूरी व नुकसानदायक पदार्थों का बोझ डालता है।
इसके अलावा भारतीय भोजन में बहुत से नए- नए खाद्य पदार्थ जुड़ रहे हैं जिनमें दिखावट ज्यादा है पोषण कम। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के इन नए उत्पादों का चलन पहले अधिक आय के परिवारों में ही होता है, पर विज्ञापनों के जोर पर इसे अच्छी सुखद जीवनशैली से इतना जोड़ दिया जाता है कि देखा- देखी कम आय के लोग भी इन्हें अपनाने का प्रयास करते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें जरूरी खर्चों में कटौती क्यों न करनी पड़े। अपेक्षाकृत अधिक कीमत पर कम या नहीं के बराबर पोषक तत्व देना इन खाद्य पदार्थों की विशेषता है। इन्हें अधिक खाने से, विशेषकर बच्चों में, कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इन खाद्य पदार्थों में तरह-  तरह के नमकीन, शीतल पेय, बढ़- चढ़ कर अपने गुणों का दावा करने वाली तथाकथित एनर्जी ड्रिंक, शक्ति पेय, व बेबी फूड आदि शामिल हैं।
पोषण विशेषज्ञ एलन बैरी ने कुछ वर्ष भारत में काम करने के बाद लिखा है कि विज्ञापनों के द्वारा निम्न आय के लोगों के मन में भी इन खाद्य पदार्थों के काल्पनिक गुणों की बात बिठा दी जाती है, विशेषकर बच्चों को इनसे मिलने वाले लाभ के बारे में। वास्तव में इनसे अधिक खर्च पर कम पोषण मिलता है। अत: इन नए खाद्य पदार्थों पर खर्च करने में इन लोगों की पोषण स्थिति बिगड़ रही है क्योंकि वास्तव में आवश्यक भोजन (दाल-  रोटी- सब्जी) के लिए पैसे कम बचते हैं।
ब्राजील में एक अध्ययन में डा. एनी डायस ने देखा कि बच्चों में कुपोषण है पर इस हालत में भी लोग कोका कोला, पेप्सी व फैन्टा पर खर्च करते हैं। ब्राजील में बिकने वाले फेन्टा आरेंज में संतरे का रस बिलकुल नहीं होता पर यह बहुत बिकता है। ब्राजील में विटामिन सी की कमी का कुपोषण है पर यहां संतरे अमरीका आदि विकसित देशों को निर्यात कर दिए जाते हैं।
एक स्तर पर इस पोषण विनाश को रोकने के लिए सीधे सरल उपाय सुझाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए रबर रोलर शेलर चावल मिलों में धान से चावल अलग करने व उसे पालिश करने की प्रक्रियाएं अलग- अलग होती हैं। अत: हम बिना पालिश किया चावल प्राप्त कर सकते हैं। ब्रेड व बिस्कुट निर्माताओं को मैदे के स्थान पर पूरे गेहूं का आटा इस्तेमाल करने के लिए कहा जा सकता है। शीतल पेय की दुनिया में कोला व लिम्का आदि की जगह साफ-  स्वच्छ ढंग से नींबू- पानी, गन्ने के रस, फलों के रस की बिक्री की व्यवस्था हो सकती है। तेल के हाईड्रोजनेशन, वनस्पति घी के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। गुड़ साफ पैकेटों में उपलब्ध कराया जा सकता है ताकि चीनी का उपयोग कम किया जा सके। प्रसंस्कृत खाद्यों में खतरनाक रसायनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
इस तरह के समाधान- सलाह पहले भी कई बार दिए गए हैं पर कोई असरदार कार्यवाही नहीं हुई है। क्यों? अनाज के अपव्ययी व हानिकारक प्रसंस्करण पर बहुत शोध करने के बाद एल. रामचंद्रन ने इस विषय पर अपनी राय जाहिर की है कि इस गलत रास्ते से यह उद्योग हटता क्यों नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस प्रवृत्ति के विरुद्ध अब तक के प्रयास सफल नहीं होने का कारण निहित स्वार्थों का जबर्दस्त दबाव व पहुंच है।
एक ओर वे उद्योग हैं जो परिष्कृत आटे या मैदे का उत्पादन व उपयोग करते हैं व दूसरी ओर मुर्गीपालन, डेयरी, मांस आदि के उद्योग हैं जो गेहूं व चावल के पौष्टिक अवशेष मुर्गियों व पशुओं को खिलाने के लिए सस्ते में प्राप्त कर लेते हैं। अनाज को ज्यादा से ज्यादा परिष्कृत कर उद्योग तिहरा लाभ उठा रहा है। वे परिष्कृत करने के लिए पैसा लेते हैं, पालिशिंग आदि को बेचकर पैसा कमाते हैं व इस तरह एक बार पोषण गुण कम करने के बाद फिर कृत्रिम रूप से विटामिन, खनिज आदि मिलाने के लिए भी पैसे लेते हैं।
कुछ इसी तरह का विश्लेषण कालिन टज ने अपनी पुस्तक द फैमीन बिजनेस में इस संदर्भ में किया है कि पश्चिमी देशों में उद्योगपति अधिक पौष्टिक गेहूं के आटे की ब्राउन ब्रेड के स्थान पर कम पौष्टिक मैदे की सफेद ब्रेड बेचना क्यों पसंद करते हैं। उनके लिए आटे की ब्रेड की अपेक्षा मैदे की ब्रेड बेचना अधिक मुनाफे का काम है। आटे की ब्रेड में कम प्रसंस्करण होता है अत: उसके लिए अधिक दाम लेना कठिन है। साथ ही इसे कम मात्रा में खाने से ही पेट भरता है, अत: ब्रेड की कुल बिक्री पर भी शायद प्रतिकूल असर पड़े। मैदे की ब्रेड बनाने पर बहुत से अवशेष पशु आहार के रूप में बिकते हैं यह लाभ भी आटा ब्रेड बनाने से नहीं मिलेगा। उद्योगपति अपने उद्योग में ऐसा बदलाव क्यों करे जिसमें उन्हें पहले की अपेक्षा मुनाफा कम होने की संभावना है। स्पष्ट है उद्योगपतियों के अनुसार कम पौष्टिक ब्रेड का उत्पादन बेहतर है क्योंकि अधिक पोषण वाली ब्रेड के उत्पादन से उनका मुनाफा कम होने का डर है। यही वजह है कि कई बार मैदे वाली ब्रेड में ब्राउन रंग का उपयोग कर इसे पूरे आटे की ब्रेड के रूप में बेच दिया जाता है।
अत: इस समय एक ऐसे सशक्त उपभोक्ता आंदोलन की व स्वास्थ्यवर्धक भोजन आंदोलन की आवश्यकता है जो जनसाधारण को वर्तमान खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की संरचना व इसके तौर तरीके के कारण हो रहे पोषण के अपव्यय व विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के विषय में शिक्षित कर सके। जन शिक्षण अभियान के आधार पर ही सरकार पर दबाव डाला जा सकता है। यह भी आवश्यक है कि इस आंदोलन से जुड़े लोगों व संस्थाओं द्वारा इस तरह के छोटे- छोटे विकेंद्रित प्रयास किए जाएं कि अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर ही सही बिना पालिश किया चावल, आटे की ब्रेड व बिस्कुट, साफ सुथरा गुड़, स्वास्थ्यवद्र्धक शीतल पेय वगैरह लोगों तक पहुंचने लगें।
 
(स्रोत फीचर्स)

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