July 25, 2012

मौसमः मानसून की कहानी

- नवनीत कुमार गुप्ता
मानसून की महत्ता को देखते हुए इसके पूर्वानुमान का महत्व बढ़ जाता है। हमारे देश की अनेक कहानी एवं दंतकथाओं में प्राचीन समय में मौसम पूर्वानुमान के लिए उपयोग किए जाने वाले तरीके मिल जाएंगे। इस समय मानसूनी वर्षा के पूर्वानुमान के लिए 16 मापदंडों वाले माडल का उपयोग किया जाता है।
मौसम की विविधता हमारे देश को विशिष्ट बनाती है। वैसे तो सर्दी, गर्मी और बारिश यहां के तीन मुख्य मौसम हैं लेकिन बारिश का महत्व विशेष ही है। बारिश में मानसून आता है जिससे गरजते बादल बरसकर भीषण गर्मी से राहत दिलाते हैं। हमारे कृषि प्रधान देश में मानसून की वर्षा देश भर में अच्छी पैदावर की नई आशा जगा देती है।
हमारे देश में ग्रीष्मकालीन मानसून का आगमन दक्षिण- पश्चिम दिशा से होता है। इसलिए यह दक्षिण- पश्चिम मानसून कहलाता है। दरअसल, मानसून शब्द का उपयोग सबसे पहले भारत में ही किया गया था। यह अरबी भाषा के मौसिम शब्द से बना है जिसका अर्थ है ऋतु। इसके नामकरण का भी रोचक किस्सा है। अरब सागर के दक्षिण- पश्चिमी भाग से मध्य एशिया की ओर जो हवाएं चलती थीं, उन्हें अरब सौदागर मौसिम कहते थे। उन्हीं हवाओं के सहारे वे अपने पालदार जहाजों में यात्रा के लिए निकलते थे। इस प्रकार वर्षा लाने वाली उन्हीं हवाओं को मानसून कहा जाने लगा।
आज हम जानते हैं कि मानसून जल- कणों से भरी वे हवाएं हैं जो गर्मियों में किसी महाद्वीप के विस्तृत भूभाग के खूब तप जाने के कारण बने कम वायुमंडलीय दाब को भरने के लिए हिंद महासागर की ओर से आती हैं। सर्दियों में देश का उत्तरी भूभाग ठंडा पड़ जाता है जबकि सागर की सतह का पानी अपेक्षाकृत गर्म रहता है। इसलिए उत्तरी भूभाग से ठंडी हवाएं समुद्र की ओर बहने लगती हैं। दक्षिण एशियाई मानसून प्रणाली भारतीय उपमहाद्वीप के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह मानसून भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में वर्षा के लिए जिम्मेदार है।
दक्षिण एशिया में मानसून प्राय: जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। देश के उत्तरी और मध्य भाग के गर्मी से तप जाने के कारण वायुमंडलीय दाब बहुत कम हो जाता है। इसलिए उस खाली स्थान को भरने के लिए हिंद महासागर से जल- कणों से भरी नम हवाएं तेजी से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बहने लगती हैं। ये हवाएं उत्तर में हिमालय की ओर खिंची चली जाती हैं। 
वहां दीवार की तरह खड़ा हिमालय उन नम हवाओं को मध्य एशिया की ओर जाने से रोक देता है जिससे वे नम हवाएं ऊपर उठती हैं। ऊपरी वायुमंडल में तापमान कम होने के कारण उनमें वर्षा की बूंदें बनने लगती हैं। और फिर, उन बूंदों से लदे बादल बरस पड़ते हैं और वर्षा की झड़ी लग जाती है। जो प्रकृति के कण- कण में नई उमंग का संचार करती है।
हमारे देश में साल भर में कुल जितनी वर्षा होती है, उसका 80 प्रतिशत से भी अधिक भाग मानसून की ही देन है। हमारे देश की अधिकांश खेती इसी वर्षा पर निर्भर करती है। धान, मक्का, कपास, मोटे अनाजों, दलहनों और तिलहनों की कई फसलें खरीफ यानि मानसून के ही मौसम में उगाई जाती हैं। इनका उत्पादन मानसून से प्रभावित होता है। अगर मानसून कमजोर हुआ तो सूखा पड़ सकता है, और यदि मानसून जम कर बरसता है तो अतिवृष्टि के कारण बाढ़ तबाही मचा देती है।
असल में मानसून का हमारे देश की अर्थव्यवस्था से सीधा सम्बंध है। सितंबर माह के आसपास मानसून तेजी से वापस लौटने लगता है। ये लौटती हुई ठंडी, सूखी हवाएं बंंगाल की खाड़ी से नमी लेकर दक्षिण भारत में बरसती हैं। इसे उत्तर- पूर्वी मानसून कहा जाता है। तमिलनाडु में साल भर जितनी वर्षा होती है, उसका 50- 60 प्रतिशत हिस्सा इसी लौटते हुए मानसून की देन होता है। दक्षिण भारत में अक्टूबर से दिसंबर का समय इसी उत्तर- पूर्वी मानसून का समय होता है। दक्षिण भारत में उस समय होने वाली बारिश काफी लाभदायक होती है।
काफी समय से मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिण पश्चिमी मानसून पर अल- निनो और ला- निना जैसी घटनाओं का भी असर पड़ता है। ऊष्णकटिबंधीय पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान बढ़ जाने की घटना को अल- निनो कहते हैं। सतह का तापमान घट जाने की घटना ला- निना कहलाती है। इन घटनाओं के साथ ऊष्णकटिबंधीय पश्चिमी प्रशांत महासागर में सतह का वायुमंडलीय दाब भी बढ़ता या घटता है जो सदर्न आसिलेशन कहलाता है। इन घटनाओं को सम्मिलित रूप से अल- निनो या ला- निना सदर्न आसिलेशन कहते हैं। अल- निनो होने पर पश्चिमी प्रशांत महासागर में वायुमंडलीय दाब बढ़ जाता है और ला- निना की स्थिति में वायुमंडलीय दाब घट जाता है। इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से भी मानसून के प्रभावित होने की संभावना व्यक्त की जाती रही है।
मानसून की महत्ता को देखते हुए इसके पूर्वानुमान का महत्व बढ़ जाता है। हमारे देश की अनेक कहानी एवं दंतकथाओं में प्राचीन समय में मौसम पूर्वानुमान के लिए उपयोग किए जाने वाले तरीके मिल जाएंगे। इस समय मानसूनी वर्षा के पूर्वानुमान के लिए 16 मापदंडों वाले माडल का उपयोग किया जाता है। सन 1988 से मानसून के दीर्घ अवधि के पूर्वानुमानों के लिए इसी माडल का उपयोग किया जा रहा है।
आजकल मौसम विभाग अनेक सुपर कंप्यूटरों की मदद से मौसम का पूर्वानुमान लगाता है। आज नए वैज्ञानिक उपकरणों और उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों तथा तस्वीरों से मौसम वैज्ञानिकों को मानसून का पूर्वानुमान लगाने में काफी मदद मिल रही है। वे कई बार लगभग सटीक पूर्वानुमान भी लगा रहे हैं लेकिन मानसून की रहस्यमय परिघटना का अभी भी पूरी तरह खुलासा नहीं हुआ है।
वैज्ञानिक विभिन्न कारकों को समझकर इसकी गुत्थी सुलझाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। असल में मानसून की परिघटना इतनी रहस्यमय है कि हर साल इसकी एकदम सटीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं हो पाता।

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