July 25, 2012

गजल: आँखें भी थक गयीं


 - डा. गीता गुप्त

वादा किया था आओगे तुम मेरे गांव में
अब धूप भी जा बैठी है देखो छांव में।

हम राह देखते रहें आँखे भी थक गयीं
बेड़ी किसी ने डाल दी लगता है पांव में।

ऐसा तो नहीं राह में ही लूट गये कहीं
रहजन खड़े हैं चारो तरफ ठांव-ठांव में।

सोचा था पांव डालके बैठेंगे झील में
सब भूल गये दुनियाँ की कांव-कांव में।

वादे किये थे कसमें भी खायी थीं इसलिए
हमने लगा दी पूरी जिंदगी ही दांव में।

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