मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Apr 1, 2026

उदंती.com, अप्रैल - 2026

 वर्ष - 18, अंक -9

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, 

मन की शक्ति बढ़ाना 

और आत्मनिर्भर बनाना है।

                          - स्वामी विवेकानंद

अनकहीः आस्था, परंपरा और हमारा विश्वास  - डॉ. रत्ना वर्मा

 आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ - संध्‍या राजपुरोहित

 मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ -  अजय मोहन

 यात्रा वृतांतः उदयेश्वर नीलकण्ठ महादेव मंदिर  - डॉ. आरती स्मित

 आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें - सीताराम गुप्ता

 प्रकृतिः घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है 

 कथाः पहली बार - अर्चना राय

 तुतलाहटः भाषा का प्रथम संगीत - जयप्रकाश मानस

 कविताः निःशब्द -  डॉ. कनक लता मिश्रा

 लघुकथाः अदृश्य आघात - योगराज प्रभाकर

 कहानीः उदास आँखें - आशा पाण्डेय

 लघुकथाः मकड़ी - सुषमा गुप्ता

 संस्मरणः कमली तू आ गई... - देवी नागरानी

 व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर - गिरीश पंकज

 कविताः भूमि का शृंगार तरु है - पूर्णिमा राय

 दो नवगीतः 1. अवसादों का बंद पिटारा, 2. आकस्मिक - कुँवर सिंह

 किताबेंः ‘बिजुरी’ के बहाने हमारे समय का सामाजिक रूपक - कुँवर सिंह

कविताः पर मेरे हुए तो नहीं - सुरभि डागर

आलेखः महानदी जल-बँटवारा - छत्तीसगढ़ और ओडिशा में विवाद - प्रमोद भार्गव

शोधः प्यास लगना और बुझना 


अनकहीःआस्था, परंपरा और हमारा विश्वास

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

  भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वह हमारे घर- परिवार, समाज और पूरे देश के लोगों की दिनचर्या में रचा- बसा हुआ है। अभी- अभी हमने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण  पर्व  रंगारंग होली का त्योहार मनाने के बाद नवसत्संवर, नवरात्रि और फिर रामनवमी का त्योहार बड़े ही धूम- धाम से मनाया है। पूरा देश रंगों से सराबोर होकर श्रद्धा, भक्ति और आस्था में डूबा हुआ था; परंतु क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमने नौ दिनों तक जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा अर्चना की, देवी के लिए लाल चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर, आलता और जेवर चढ़ाकर हवन - पूजन किया और पूजा समाप्ति के बाद इनमें से बहुत कुछ पूजा सामग्री जैसे-  फूल- मालाएँ, कपड़े, प्लास्टिक, थर्माकोल, रंग- रोगन वाली मूर्तियाँ और भी बहुत सारी चढ़ावे की सामग्री नदी और तालाब में यह कहते हुए विसर्जित कर देते हैं कि यह पूजा की पवित्र सामग्री है, इसे यूँ ही कहीं भी नहीं फेंका जा सकता। 

 यहीं एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। क्या हमने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि जिन जलस्रोतों को गंगा मैया और नर्मदा मैया कहते हुए पूजते हैं, वे हमारे ही हाथों से धीरे-धीरे विषैले बनते जा रहे हैं? वे आज दुर्गंध और गंदगी के कारण उपयोग के योग्य भी नहीं बचे। आखिर यह स्थिति आई क्यों? यह सब  किसी एक व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक उपेक्षा का परिणाम है।

दरअसल समस्या आस्था में नहीं है, समस्या आस्था की हमारी समझ में है। हमारी परंपराओं में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि पूजा के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जाए; बल्कि इसके उलट भारतीय दर्शन में तो प्रकृति को देवतुल्य माना गया है- पृथ्वी माता, जल देवता, वायु देव और अग्नि देव। जब हम इन्हें देव या माता के रूप में पूजते हैं, तो इन्हें प्रदूषित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते।  

आज आवश्यकता है कि हम आस्था और अपने धार्मिक विश्वास को इस अंधविश्वास में न बदलें कि पूजन- सामग्री का जल में विसर्जन ही अनिवार्य है। इस सोच को बदलना जरूरी है। पूजा के बाद जो सामग्री प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकती है- जैसे फूल, पत्ते, लकड़ी, राख, मिट्टी के दीपक और मूर्तियाँ- उन्हें मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का सरल और सम्मानजनक तरीका है, जिससे न आस्था को ठेस पहुँचती है और न पर्यावरण को हानि होती है। और जो वस्तुएँ नष्ट नहीं होतीं- जैसे भगवान के वस्त्र, सजावटी आभूषण, मुकुट, चुनरी, कृत्रिम फूल- उन्हें नदी या तालाब में डालना किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश भर में कई सामाजिक संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन ऐसी पूजा- सामग्री को एकत्र कर उसका पुनः उपयोग या रिसाइक्लिंग कर रहे हैं। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं; बल्कि जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में भी मदद मिलती है। यह एक व्यावहारिक और सकारात्मक समाधान है, जिसमें आस्था भी सुरक्षित रहती है और पर्यावरण भी। कुछ मंदिरों में अलग- अलग डब्बे रखकर भक्तों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है, पर यह कार्य अभी इतने प्रारंभिक स्तर पर है कि इस छोटे से प्रयास मात्र से नदी तालाब को प्रदूषित होने से बचाया नहीं जा सकता। 

अतः यह विषय केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार, समाज और आम नागरिक-  सभी को इसमें अपनी - अपनी भूमिका निभानी होगी। पूजा स्थलों के पास संग्रह केंद्र, स्पष्ट दिशानिर्देश और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए और उनके पालन में भी सख्ती बरतनी चाहिए। कुछ वैसे ही सख्त नियम कि एक दिन हमारा देश भी न्यूजीलैंड की तरह उदाहरण के रूप में रेखांकित किया जा सके। ज्ञात हो कि न्यूजीलैंड में पर्यावरण को लेकर नियम और कानून इतने सख्त हैं कि वहाँ कोई व्यक्ति पानी को प्रदूषित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

सोशल मीडिया जागरूकता का अच्छा माध्यम हो सकता है; लेकिन वास्तविक बदलाव तब आएगा जब हम अपने घरों में, अपने बच्चों को छोटी उम्र से यह सीख देंगे कि पूजा का अर्थ प्रकृति को कष्ट देना नहीं; बल्कि उसका सम्मान करना है। जिस दिन यह समझ आम हो जाएगी, उस दिन नदियाँ भी स्वच्छ होंगी और हमारी आस्था भी। इसके लिए हमें आज अपने पूजा-पाठ के तरीकों में थोड़ा-सा बदलाव लाने की आवश्यकता है। भगवान को फूलों से ढकने की बजाय उनके चरणों में एक फूल चढ़ाकर भी हम अपनी आस्था व्यक्त कर सकते हैं। हवन- पूजन के बाद जली हुई राख को आपने बगीचे या गमलों में डालकर मिट्टी को और अधिक उपजाऊ बना सकते हैं। यदि प्रतिवर्ष आप अपने भगवान के वस्त्र और आभूषण बदलते हैं, तो उन्हें नदी या तालाब में विसर्जित मत कीजिए, इन सबको इकट्ठा कीजिए और उनके लिए रोजगार का माध्यम बनिए, जो इन वस्तुओं का उपयोग करके आपके लिए खूबसूरत सजावटी सामान तैयार करते हैं। 

यदि हमने अपनी आस्था में इन छोटी- छोटी कुछ बातों को जीवन में ढाल लिया, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सच्ची आस्था- तीनों सौंप सकते हैं। तो आइए, हम यह संकल्प लें कि भक्ति निभाते समय प्रकृति की रक्षा करेंगे, क्योंकि नदियाँ तभी माँ की तरह हमें स्नेह करेंगी, जब हम उन्हें साफ- सुथरा रखते हुए,  कल – कल कर बहते हुए रहने देंगे।■

आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ

  - संध्‍या राजपुरोहित

आज का समय अवसरों, संभावनाओं और प्रतिस्पर्धा का समय है। बदलती तकनीक, वैश्वीकरण और नई आर्थिक संरचनाओं ने करियर के पारंपरिक ढाँचे को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। एक समय था जब डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी को ही सफलता का पर्याय माना जाता था; लेकिन आज डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया, डिजाइन, खेल, उद्यमिता और अनेक कौशल आधारित क्षेत्रों में भी उज्ज्वल भविष्य के द्वार खुले हैं। यह विविधता जहाँ एक ओर युवाओं को नए अवसर प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर उनके सामने सही चुनाव की चुनौती भी खड़ी करती है।

भारत का वर्तमान जनसांख्यिकीय परिदृश्य इस चर्चा को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ युवा कार्यबल में प्रवेश करते हैं। यह स्थिति भारत को एक बड़ी संभावित शक्ति प्रदान करती है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। किन्तु यदि इस युवा शक्ति को उचित दिशा, कौशल और अवसर नहीं मिले, तो यही संभावना एक चुनौती में परिवर्तित हो सकती है।

यही वह बिंदु है जहाँ कैरियर चयन और कौशल विकास के बीच का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। विभिन्न रिपोर्ट्स यह संकेत करती हैं कि देश में रोजगार की समस्या से अधिक “रोजगार योग्य कौशल” की कमी एक बड़ी चुनौती है। आज भी लगभग आधे युवा ऐसे हैं जो उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप पूरी तरह तैयार नहीं हैं। कई अध्ययन बताते हैं कि केवल लगभग 50 प्रतिशत ग्रेजुएट ही वास्तव में जॉब-रेडी माने जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए आवश्यक व्यावहारिक दक्षताओं से वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करती है। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी बेरोजगारी के आंकड़ों में बड़ी हिस्सेदारी शिक्षित युवाओं की ही दिखाई देती है। लगभग 65 से 67 प्रतिशत बेरोजगार युवाओं का ग्रेजुएट होना इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि केवल डिग्री हासिल करना सफलता की गारंटी नहीं है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अभी भी अधिकतर सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित है, जबकि उद्योग और समाज को व्यवहारिक कौशल, नवाचार और समस्या समाधान की क्षमता रखने वाले युवाओं की आवश्यकता है।

कौशल अंतर या “स्किल गैप” भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। देश में औपचारिक रूप से प्रशिक्षित युवाओं का प्रतिशत अभी भी बहुत कम है, जो लगभग 4 से 5 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। वहीं, नई तकनीकी क्षेत्रों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और डिजिटल तकनीक में कुशल युवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उस अनुपात में प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध नहीं है। यह अंतर युवाओं के लिए अवसर भी है और चुनौती भी, क्योंकि जो इस दिशा में स्वयं को तैयार करेगा, वही भविष्य में आगे बढ़ेगा।

इसके साथ ही रोजगार की गुणवत्ता भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभर रही है। बड़ी संख्या में युवा अपनी योग्यता से कम स्तर के कार्य करने के लिए मजबूर हैं, जिससे उनमें असंतोष और अस्थिरता की भावना बढ़ती है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी प्रभाव डालती है।

इन सभी तथ्यों और आंकड़ों के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विद्यार्थी अपने कैरियर का चुनाव किस प्रकार करें। इसका उत्तर आत्म पहचान में निहित है। प्रत्येक विद्यार्थी की अपनी रुचियाँ, क्षमताएँ और सपने होते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप क्षेत्र का चयन करता है, तो वह उसमें अधिक समय तक टिकता है, बेहतर प्रदर्शन करता है और अंततः संतुष्टि भी प्राप्त करता है। इसके विपरीत, यदि कैरियर का चुनाव केवल सामाजिक दबाव, तुलना या अधूरी जानकारी के आधार पर किया जाता है, तो वह आगे चलकर असंतोष का कारण बनता है।

सही निर्णय के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी अपने भीतर झांकें, अपनी रुचियों और क्षमताओं को समझें और विभिन्न कैरियर विकल्पों के बारे में ठोस जानकारी प्राप्त करें। आज सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन सही और प्रामाणिक जानकारी का चयन करना भी उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही शिक्षकों, अभिभावकों और कैरियर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेना निर्णय को अधिक सुदृढ़ बनाता है।

इस प्रक्रिया में परिवार और विद्यालय की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर अपने सपनों का बोझ न डालें, बल्कि उनकी रुचियों और क्षमताओं को समझते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। वहीं शिक्षकों का दायित्व केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विद्यार्थियों के मार्गदर्शक बनकर उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए तैयार करते हैं। एक सकारात्मक और सहयोगात्मक वातावरण बच्चों में आत्मविश्वास विकसित करता है और उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आज का समय निरंतर सीखने का समय है। कैरियर अब एक स्थिर विकल्प नहीं, बल्कि एक गतिशील यात्रा बन चुका है, जिसमें समय-समय पर नए कौशल सीखना, स्वयं को अपडेट करना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलना आवश्यक है। यही लचीलापन और सीखने की प्रवृत्ति व्यक्ति को दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जाती है।

अंततः यह स्पष्ट है कि कैरियर का सही चुनाव केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया तभी सफल हो सकती है जब उसमें आत्मविश्वास, सही जानकारी, कौशल विकास और स्पष्ट लक्ष्य का समन्वय हो। आज के विद्यार्थी यदि इन आधारों को समझकर अपने कैरियर की दिशा तय करते हैं, तो वे न केवल अपने लिए एक सफल भविष्य का निर्माण करेंगे, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

याद रखना होगा कि कैरियर का चुनाव भीड़ का अनुसरण नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझते हुए अपनी राह बनाने की प्रक्रिया है। सही कैरियर वही है, जहाँ रुचि, क्षमता और लक्ष्य एक साथ मिलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं।

 लेखक के बारे में-  सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षा कें क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में मध्‍यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में जीवन कौशल शिक्षा से जुडी है।  डेढ़ दशक से अधिक समय तक स्‍कूली शिक्षा से सम्‍बद्ध रही है। ■

मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ

 -  अजय मोहन

प्रशांत और हिंद महासागर से जुड़ा है मौसम का बदलता पैटर्न

फरवरी मध्‍यम में गर्मी की दस्तक के बाद मार्च में ही हीटवेव का आना गंभीर संकेत है। इसके पीछे क्या कारण हैं, जानिए इस रिपोर्ट में जो हाल ही में वैज्ञानिकों ने तैयार की है।

भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सामान्यतः ला नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के असर को कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में सर्दियाँ  छोटी होती जा रही हैं और गर्मी पहले से कहीं जल्दी दस्तक दे रही है। और वर्तमान में चल रहे मार्च के महीना में ऐसा देखने को भी मिल रहा है। 

एक समय था जब मार्च के मध्‍य तक उत्तर भारत में लोग कम से कम हाफ स्वेटर पहन कर रहते थे। दिन में भले ही थोड़ी गर्मी हो, लेकिन रातें ठंडी रहती थीं। ओर जब बात हीट वेव की आती थी, तब मार्च में लोग केवल यह सोच कर रहत में रहते थे कि अभी मई-जून दूर है। लेकिन अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा है। 

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष भी भारत में फरवरी के पहले पखवाड़े में ही सर्दी लगभग समाप्त हो गई और कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से जल्दी गर्मी शुरू हो गई। यह बदलाव केवल तापमान का नहीं है, बल्कि इससे जल संकट, कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

फरवरी से ही बढ़ने लगी गर्मी

मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर तापमान हीटवेव की सीमा तक पहुंचने लगा।

तीन प्रमुख स्थान जहाँ हीटवेव जैसा महसूस हुआ वो हैं:

1. मुंबई : जहाँ 10 मार्च को तापमान 40°C दर्ज हुआ, जो सामान्य से 7.6°C अधिक था और इसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा गया।

2. दिल्ली-एनसीआर : यहाँ अधिकतम तापमान लगभग 35°C रहा, जो सामान्य से 5–7°C अधिक है।

3. हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र: पहाड़ होने के बावजूद यहाँ सामान्य से 5.1°C से 8°C अधिक तापमान दर्ज किया गया।

मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव वाले दिन देखने को मिल सकते हैं।

क्या होता है हीटवेव?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) हीट वेव को इस प्रकार परिभाषित करता है- जब तापमान सामान्य से काफी अधिक हो या वास्तविक तापमान एक निश्चित सीमा पार कर जाए तब उस क्षेत्र में हीट वेव घोषित की जाती है। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार तापमान का पैमाना इस प्रकार है- 

• मैदानी क्षेत्रों में: जब अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक हो

• पहाड़ी क्षेत्रों में: जब तापमान 30°C या उससे अधिक हो

• तटीय क्षेत्रों में: जब तापमान 37°C या उससे अधिक हो

यदि यह स्थिति लगातार दो दिन तक बनी रहती है और एक से अधिक मौसम केंद्रों पर दर्ज होती है, तब इसे आधिकारिक रूप से हीटवेव घोषित किया जाता है।

हीटवेव को विस्तार से समझिए इस टेबल में -

क्षेत्र आधार मानदंड हीटवेव (Heatwave) गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave)

मैदानी क्षेत्र (Plains) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 40°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 45°C सामान्य से 6.4°C से अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 47°C

पहाड़ी क्षेत्र (Hills) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 30°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक सामान्य से 6.4°C से अधिक

तटीय क्षेत्र (Coastal) जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 37°C या उससे अधिक हो सामान्य से 4.5°C या उससे अधिक-

सर्दियाँ  क्यों हो रही हैं छोटी?

रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उत्तर भारत में दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई।

• फरवरी में 81% वर्षा की कमी दर्ज की गई।

• सामान्यतः फरवरी में लगभग 22.7 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल 4.2 मिमी बारिश हुई।

इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) सामान्य से अधिक आए, लेकिन अधिकांश कमजोर रहे और पर्याप्त बारिश नहीं कर सके। कम बारिश और बादलों की कमी के कारण तापमान तेजी से बढ़ने लगा और सर्दी जल्दी समाप्त हो गई।

ला नीना भी नहीं रोक पा रहा गर्मी का बढ़ना

आमतौर पर ला नीना प्रशांत महासागर में ठंडे समुद्री तापमान से जुड़ा एक जलवायु चक्र है, जो वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025, ला नीना की स्थिति के बावजूद 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। पिछले 11 वर्षों में से सभी 11 वर्ष रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ गया है कि अब प्राकृतिक शीतलन प्रभाव भी पर्याप्त नहीं रह गया।

बढ़ती आर्द्रता और ‘वेट बल्ब तापमान’ का खतरा

तटीय क्षेत्रों में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि नमी भी तेजी से बढ़ रही है। इससे वेट बल्ब तापमान बढ़ता है। यानी वह तापमान जिसे शरीर महसूस करता है। जब नमी अधिक होती है तो शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ने के साथ-साथ अन्‍य कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी मौसम के असंतुलन का बड़ा कारण है।

• 1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान लगभग 1.2°C प्रति शताब्दी की दर से बढ़ा।

• भविष्य के मॉडल बताते हैं कि 2000 से 2100 के बीच यह वृद्धि 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक हो सकती है।

यह समुद्री गर्मी मानसून, वर्षा और चक्रवातों के पैटर्न को भी प्रभावित कर सकती है। समुद्र का तापमान जितना अधिक होगा मॉनसून में आने वाले चक्रवात उतने अधिक विनाशकारी होंगे। बीते वर्षों में बुलबुल, फानी, मोचा, सितरंग, आदि कितने भयावह थे, यह भारत व पड़ोसी देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अच्‍छी तरह जानते हैं।   

उत्तर भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

उत्तर भारत विशेषकर इंडो-गंगेटिक मैदान, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली पहले से ही गर्मी की लहरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहाँ पर मई-जून में लू चलना आम बात है। हीट-वेव के दिन बढ़ने के कारण गर्म हवाएँ और अधिक गर्म हो सकती हैं। 

इससे इन राज्यों में निम्नलिखित जोखिम बढ़ सकते हैं:

1. लंबी हीटवेव से ज्यादा समय तक गर्म हवाएँ

2. रात्रि के तापमान में वृद्धि 

3. पेट संबंधी बीमारियों का खतरा 

4. जल संकट और भूजल पर दबाव

5. गेहूं जैसी रबी फसलों पर असर

6. शहरी क्षेत्रों में हीट आइलैंड प्रभाव

7. श्रम उत्पादकता में गिरावट 

भारत में मौसम के पैटर्न के बदलने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान बढ़ने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान में परिवर्तन

1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी का परिणाम है, हालांकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न एरोसोल तथा भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC) में बदलाव इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। पिछले तीन दशकों (1986–2015) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस और सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि

वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण महाद्वीपीय हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्री जल का तापीय प्रसार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया भर में समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है। उत्तरी हिंद महासागर (NIO) में 1874 से 2004 के बीच समुद्र स्तर में वृद्धि की दर लगभग 1.06 से 1.75 मिमी प्रति वर्ष रही, जो पिछले लगभग ढाई दशकों (1993–2017) में बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष तक पहुँच गई है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात

बीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1951–2018 के बीच उत्तरी हिंद महासागर बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की कुल वार्षिक संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इसके विपरीत, मानसून के बाद के मौसम में आने वाले बहुत गंभीर चक्रवाती तूफानों (Very Severe Cyclonic Storms - VSCS) की आवृत्ति पिछले दो दशकों (2000–2018) में स्पष्ट रूप से बढ़ी है, जिसमें औसतन प्रति दशक लगभग एक अतिरिक्त घटना दर्ज की गई है।

हिमालय में परिवर्तन

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में 1951 से 2014 के बीच औसत तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के दशकों में इस क्षेत्र के कई हिस्सों में हिमपात में कमी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रवृत्ति देखी गई है। हालांकि इसके विपरीत, उच्च ऊंचाई वाले काराकोरम हिमालय में सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हिमपात हुआ है, जिसके कारण यहाँ के ग्लेशियर अन्य क्षेत्रों की तुलना में सिकुड़ने से काफी हद तक बचे हुए हैं।

भारी वर्षा और सूखा

1950 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं—यानी एक दिन में 150 मिमी से अधिक बारिश—की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, 1951 से 2015 के दौरान भारत में सूखे की घटनाओं की संख्या और उनका भौगोलिक विस्तार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

आगे क्या करना होगा?

रिपोर्ट के माध्‍यम से विशेषज्ञों ने कहा है कि बदलते मौसम से निपटने के लिए केवल चेतावनी र्याप्त नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:

• शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू करना

• जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना

• जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना

• शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र और जल निकायों का संरक्षण

कुल मिलाकर भारत में मौसम के पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सर्दियों का छोटा होना और गर्मी का जल्दी आना अब अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य बनता जा रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियाँ  नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव, जल संकट और मौसम की अनिश्चितता भारत के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है। ( indiawaterportal) ■

यात्रा वृत्तांतः उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर

 - डॉ. आरती स्मित 

यात्राएँ कहीं की हो, रोमांच पैदा करती हैं। मध्य प्रदेश कई कारणों से मेरा प्रिय स्थल रहा है, हालाँकि स्वरूप बदल रहा है, कहानियाँ बदल रही हैं, तब भी वह प्रांत आदि मानव का प्रांत होने के साथ ही अपनी स्थापत्य कलाओं, प्राचीन गुफाओं और एक बड़े हिस्से में आदिदेव महादेव की नगरियों के कारण मुझे अति प्रिय है। 

  साहित्य अकादेमी, भोपाल के आमंत्रण पर ‘गंज बसौदा’ जाने हेतु सहमति के पीछे एक बालसुलभ ललक थी- दसवीं सदी में स्थापित, शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते  उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर जाने और शिव के उस प्रतीक के दर्शन-पूजन की, जिनका अभिषेक करने प्रतिवर्ष शिवरात्रि की प्रात: रश्मियाँ धरती पर उतरती हैं। यह गल्प लग सकता है, किंतु यह सच है। इस मंदिर के इतिहास में कई गल्प भी शामिल हुए होंगे, किंतु यह उस महान कलाकार के ज्ञान का प्रत्यक्ष नमूना है। दसवीं सदी का वह शिल्पकार कितना विलक्षण रहा होगा, यह अनुमान लगाना भी कठिन जान पड़ता है।

   दिल्ली से गंज बसौदा की रेलयात्रा कुछ कष्टप्रद रही। किंतु स्थानीय संयोजक युवा कवि ध्रुव शर्मा द्वारा गंज बसौदा में की गई व्यवस्था बेहद व्यवस्थित और उत्कृष्ट थी। नीलकंठ महादेव के नाम पर ही होटल का नामकरण किया गया था—नीलकंठ। कार्यक्रम के सफल समापन के उपरांत अगले दिन ११ मार्च २०२५ को स्थानीय युवा सन्नी, उसकी बहन रोशनी, युवा कवयित्री शिखा, प्रगति एवं कार्यक्रम में शिरकत करने आए युवा साथी संदीप एवं राहुल के साथ यह यात्रा आरंभ हुई। इस प्रकार, एक से दो और दो से सात यात्री हो गए। दो स्कूटी एवं एक मोटर बाइक से बिना हेलमेट के १८ किलोमीटर की यात्रा भी रोमांचक रही। 

   गंज बसौदा यों तो विदेश निर्यात किए जाने वाले उम्दा पत्थर एवं उत्तम गुणवत्ता वाले गेहूँ के लिए प्रसिद्ध है, किंतु स्थानीय जन के बीच वहाँ के कुछ मंदिर प्रसिद्ध हैं जिनमें से एक राम मंदिर भी है। हालाँकि उस परिसर में शक्ति मंदिर भी है और गुरु गोरखनाथ के भव्य मंदिर निर्माण-कार्य चल रहा था। राम मंदिर तक की लघु यात्रा शिखा की स्कूटी से हुई थी। यहाँ से रोशनी के साथ यात्रा आगे बढ़ी। हमने स्टॉल से चेहरा और सिर ढँक रखा था। फिर भी गर्म हवा अपना प्रभाव जमाने में सफल रही। गंज बसौदा से उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर के लिए कोई सवारी गाड़ी या निजी गाड़ी आती-जाती नहीं दिखी। न बस, न ऑटो। रास्ता भी कुछ दूर के बाद शांत ही था। आसपास घर भी न के बराबर। सड़कें कहीं-कहीं बिगड़ी हालत में मिलीं। दोनों ओर खेत में लहराती सुनहरी फसल पथिकों का मन मोह लेते हैं। मंदिर के निकट पहुँचने का संकेत उसके गोपुरम से मिल जाता है जो रास्ते से दिखता है। 

   लगभग चालीस मिनट बाद हमें दूर से मार्ग की दायीं दिशा में भील राजा का कोट (क़िला) दिखने लगा जिससे राजा भोज के वंशज वीरसेन ने आक्रमण करके जीता था और उस इलाक़े पर आधिपत्य स्थापित किया था। बाद में मंदिर के पुजारी श्री महेंद्र शर्मा ने आक्रमण से लेकर उदयपुर की स्थापना एवं मंदिर निर्माण से जुड़ी लंबी कथा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए बताया, अब भी उस क़िले के भीतर के कुछ अवशेष बचे हुए हैं जिन्हें देखा जा सकता है।

      मंदिर के प्रवेश द्वार से कुछ पूर्व दोनों ओर फूल-प्रसाद की दुकानें हैं, जहाँ भक्त अपनी पसंद और इच्छानुसार फूल-प्रसाद आदि लेते हैं। प्रवेश द्वार के पास ही जल की मशीन लगी हुई है, जहाँ से शिवलिंग पर चढ़ने के लिए भी जल भर लिया जाता है। जलते तलवों की चीख सुनते हुए हम जल्दी-जल्दी मुख्य मंदिर में प्रवेश हेतु चलने लगे किंतु दृष्टि रह-रहकर परिसर में आठों कोनों में बने वेदीमंडप एवं मुख्य मंदिर के गोपुरम की शिल्पकला में अटकती रही। प्रत्येक खंभे पर बारीक नक़्क़ाशी एवं देवी-देवताओं के अलग-अलग आकार की मूर्तियाँ तराशी हुई थीं, जो एक-दूसरे से जुड़कर गोपुरम का स्वरूप धारण कर रही थीं। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा ने बताया, “प्रत्येक खंभा अलग-अलग पत्थरों पर शिल्पकला उकेरने के बाद लोहे के तार से भीतर ही भीतर परस्पर इस प्रकार जोड़ा हुआ है कि खंभा एक पत्थर से बना होने का भ्रम होता है।” मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थर की कई सीढ़ियों के ऊपर है, जहाँ मंदिर दो हिस्सों में प्रतीत होता है। खुले चबूतरे के बाद दोनों ओर के मोटे-मोटे खंभों पर नीचे से लेकर लगभग ढाई-तीन फीट तक शिलालेख हैं, वे पत्थर ही अन्य से कुछ अलग दिखते और दीवारों से मेल खाते हैं। उसके ऊपर बारीक शिल्पकला का अद्भुत नमूना, कहीं बड़ी मूर्तियाँ भी और उन मूर्तियों के किसी अंग में जाली-- उसी पत्थर से। 

    एक भी कोना खाली न दिखा जहाँ कुछ निर्मिति न हो। गर्भगृह के द्वार पर द्वारपाल बने हैं और इससे बाहरी द्वार पर यक्ष, गण आदि बने हुए हैं। एक स्थल पर विष्णु के मस्तक के स्थान पर बकरे का मस्तक, इसी प्रकार गणपति कई रूपों में दिखाई दे जाते हैं। उनकी छोटी-सी प्रतिमा में बनी सूँढ़ के भीतर गोलाई से छिद्र बना है, जिसमें धागा या पतली डोर घुस सके, इतनी जगह है। इसी प्रकार हाथी तथा अन्य कलाकृतियों में भी। चारों ओर कलाकृतियों से से घिरे खंभों और दीवारों के बीच नंदी अपना स्थान ग्रहण किए है। सीलिंग पर एक स्थान पर फूल की खिली पंखुरियों के भीतर की ओर उकेरी गई शिल्पकला को देखने के लिए मोबाइल के कैमरे को सेल्फ़ी मोड पर ले जाकर उस स्क्रीन पर देखना संभव होता है। यह तरीक़ा हमें पुजारी जी ने ही बताया। गर्भ गृह में उतरकर शिवलिंग के ऊपर चढ़े पीतल की खोल में बने भोलेनाथ की छवि भी कुछ अलग-सी है मानो पुरुष के अंतस की स्त्रैण प्रकृति का मूर्त रूप हो। प्रतिदिन उन्हीं का अभिषेक-सिंगार होता है। उस खोल के नीचे मूल शिवलिंग का एकाध इंच हिस्सा दिखाई पड़ता है। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा के कथनानुसार, शिवरात्रि के दिन प्रात:बेला में सूर्यकिरणें सीढ़ियाँ चढ़ती हुई शिवलिंग को स्पर्श कर, उसी दिशा में ऊपर दीवार तक जाती हैं। इसलिए उस खोल को केवल शिवरात्रि के दिन ही हटाया जाता है। उस दिन समस्त श्रद्धालु मूल शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं। खोल या आवरण पहनाने का कारण शिवलिंग के पत्थर को क्षय से बचाने का प्रयास मात्र है। दसवीं सदी से आज तक शिवलिंग ही नहीं, मंदिर का आंतरिक हिस्सा भी ज्यों का त्यों है। बाहरी हिस्से में गोपुरम की कुछ मूर्तियों के अंग भंग दिखाई देते हैं। इस मंदिर से जुड़ी कई विलक्षण बातों एवं कथाओं में से एक कथा यह भी है, जिसे सत्यकथा मानी जाती है। राजा भोज के वंश के राजा वीरसेन को स्वप्न में शिव मंदिर बनाने का आदेश मिला था। कथा लंबी है। जिसमें किसी कारण के तहत निश्चित समय मंदिर पूरा हो जाना था। प्रधान शिल्पकार ने एक ही रात में यह मंदिर खड़ा किया। शिल्पकारी के बाद वे पत्थर परिसर में ला-लाकर रखते थे। मंदिर जोड़ते-जोड़ते ऊपर गोपुरम तक वे गए। रात भर वे काम करते रहे, भोर होने तक वे उतर न पाए और सूर्य की किरणों के स्पर्श के साथ वे भी पत्थर के हो गए। आज भी मंदिर के शीर्ष पर पत्थर का एक आदमी उतरने की जुगत सोचता नज़र आता है। इस गोपुरम में बनी कुछ मूर्तियाँ शिल्पकार की अनूठी चिंतनदृष्टि का परिणाम कही जा सकती हैं। जैसे कि गणपति का स्त्री रूप, कहीं नर-नारी रूप में गणपति, कहीं अर्धांगेश्वर के रूप में महादेव एवं विष्णु एक साथ तो कहीं शक्ति अलग ही रूप में …. ऐसी कई विशेषताएँ जो अन्य गोपुर की कलाकृतियों से इसे भिन्न करती है। पर्यटकों द्वारा इसे स्वयं देख-समझ पाना तो कठिन होता होगा, पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा जी ने स्वयं एक-एक विशिष्ट प्रतिमा दिखलाई और उसके निर्माण के पीछे शिल्पकार की दृष्टि पर संवाद किया। 

     मंदिर की विशिष्टता के साथ ही पुजारी जी के गुणों का उल्लेख किए बिना यह वृत्तांत पूरा न होगा। उनकी उदारता से पलकें भीगने का समय तब आया जब उन्होंने आग्रह करके एक कोने में रखी अपनी चप्पल पहन लेने को कहा ताकि धूप से मेरे पैर न जलें और स्वयं नंगे पाँव धूप में चलते हुए, परिसर का एक-एक कोना दिखाते और ख़ूबी बताते चले। 

     परिसर में ही फ़र्श पर पूरे मंदिर का नक़्शा बना हुआ है जो धुँधला गया है। मंदिर का कार्य निर्विघ्न पूरा हो, इसलिए आठों दिशाओं में वेद मंडप बनाए गए जिनमें नियमपूर्वक यज्ञ होता था। प्रमुख मंडप अन्य वेदी मंडप से बड़ा और मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने है। राजा उदयसेन के नाम पर यह प्रांत उदयपुर कहलाया। जहाँ से सूर्य किरणें भूमि से मंदिर के लिए उर्ध्वमुखी होती हैं, उस स्थान से गर्भगृह का शिवलिंग (तेज़ प्रकाश से अँधेरे में देखने के कारण) नहीं दिखा किंतु जलता दीया दिखा। शिवलिंग के ठीक पीछे शक्ति की प्रतिमा स्थापित है जो कुछ अलग सी है। शक्ति की प्रतिमा ढाई-तीन सौ वर्ष मात्र पुरानी है। 

     चलते-चलते पुजारी जी ने बताया कि जब से यह मंदिर बना है, यानी दसवीं सदी से अब तक एक वंश के ही पुजारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा का दायित्व निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे। सबसे अच्छी बात लगी कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह न तो पुजारियों ने कोई वीआईपी द्वार बनाया है, न वीआईपी पंक्ति और न ही वे भक्तों को मूर्ख बनाकर लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं। कहीं दान पेटी नहीं दिखी। कुछ लोग सुकून के लिए परिसर में बैठे दिखे। न कोई रोक-टोक, न ही किसी के द्वारा कोई अभद्रता। हमने कुछ तस्वीरें लीं। तीन बज चुके। फिर हमने उस पावन भूमि को प्रणाम किया और परिसर से बाहर निकल आए। स्थानीय जन ने बताया, पुजारी जी इस तरह किसी को समय नहीं देते। आपको तो उन्होंने अपने भोजन की बेला बीतने देकर एक-एक महत्त्वपूर्ण बात बताई। इसे शिव की कृपा ही कहा जा सकता है क्योंकि हमने देखा, लोग मंदिर घुसते-निकलते या कहीं बैठकर सुस्ताते रहे और फिर परिसर से बाहर हो गए। 

     एक बार फिर स्कूटी पर आनंद भरा सफ़र शुरू हुआ। अब हृदय इत्मीनान से की गई पूजा, मंदिर के कलात्मक सौंदर्य, उसके इतिहास, संबद्ध कथाओं तथा मंदिर के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने की बातों से पूर्ण आनंद में रहा। वापसी में भील राजा के कोट (दुर्ग) ने भी आने का आमंत्रण दिया। अब भी कुछ निशानियाँ बची हैं। आदिवासी राजाओं का हर जगह परास्त होते जाने और उनके सल्ला-गंगरा को सनातन धर्म में शिवलिंग माने जाने की सोच भी एक कोने में तारी रही। ठीक चार बजे हम होटल नीलकंठ के सामने थे, जहाँ मुझे ठहराया गया था और जहाँ से कुछ घंटों में विदा होकर दिल्ली की यात्रा शुरू होनी थी। 

   दिल्ली के व्यस्त और शोरभरी दिनचर्या में जब भी उस मंदिर की शांति भीतर उमड़ती है, चेतना नीलकंठ महादेव को निकट पाती है।  ■

सम्पर्कः डी 136, द्वितीय तल, गली नम्बर 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली 110092

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आलेखः जीवन के उत्तरकाल को सहजता से जीना सीखें

 - सीताराम गुप्ता

जीवन के उत्तरकाल में व्यक्ति की मनोदशा में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। वह शेष जीवन में बहुत कुछ और बहुत अच्छा करना चाहता है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र के जन्मदिन की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ थी। पचहत्तरवीं वर्षगाँठ की पूर्वसंध्या पर उन्होंने एक संदेश भेजा - मैं कल से वाट्सएप का प्रयोग नहीं करूँगा अतः कृपया वाट्सएप पर मुझे कोई संदेश न भेजें। बहुत ज़रूरी हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं। इससे एक सप्ताह पूर्व भी उनका एक संदेश आया था कि एक सप्ताह बाद वे पचहत्तर वर्ष के हो जाएँगे और सभी लोग उनके लिए प्रार्थना करें कि वे अपना शेष जीवन सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर व्यतीत कर सकें। हमारे यहाँ जीवन को चार अवस्थाओं में विभक्त किया गया है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास। यदि हम इस दृष्टि से देखें तो पचहत्तर वर्ष की आयु के उपरांत संन्यास की अवस्था प्रारंभ हो जाती है। पारंपरिक वैदिक रीति से जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा उत्तम है लेकिन यह विचार करना भी अनिवार्य है कि आज की परिस्थितियों में यह कहाँ तक संभव अथवा उपयुक्त है?

     आज परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज की परिस्थितियों में हजारों वर्ष पूर्व की दिनचर्या अथवा जीवनचर्या का पालन करना कठिन ही नहीं असंभव है। पुरातन परंपरा के अनुसार पचहत्तर वर्ष के बाद की अवस्था संन्यास की है जिसमें घर-बार छोड़कर जंगल में जाकर जीवन व्यतीत करना होता है। क्या आज ये संभव है? यदि हम संन्यास ले लेंगे, तो कहाँ जाएँगे? जंगलों में जहाँ वन्य जीवों के लिए ही स्थान कम पड़ रहा है, वहाँ मनुष्य द्वारा जंगलों में जाकर अपना शेष जीवन व्यतीत करने की सोचना भी उचित प्रतीत नहीं होता। जो लोग एक निश्चित उद्देश्य के लिए कम आयु में ही संन्यास लेकर संन्यस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनमें से शायद ही कोई सही अर्थों में संन्यासी हो। वैसे भी संन्यस्थ जीवन का पालन तभी उचित लगता है जब उससे पूर्व का जीवन भी उसी पद्धति से अवस्थानुकूल व्यतीत किया गया हो।

     यदि जीवन के अंतिम क्षणों तक सामान्य रीति से जीवन व्यतीत हो जाए तो उसमें भी कोई दोष दिखलाई नहीं पड़ता। वास्तव में बहुत सामान्य बने रहना ही लोगों के लिए कठिन होता है क्योंकि वे निर्लिप्त, विरक्त अथवा मोह-माया से मुक्त आदि होना नहीं चाहते अपितु घर-परिवार और समाज को ऐसा कुछ दिखाना चाहते हैं जिससे उनकी समाज में एक विशेष छवि बन जाए। न शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा संभव है, न मन की इच्छाओं की। अच्छा तो यही है कि जीवन को जितना संतुलित कर सकते हैं करें, शेष सामान्य रीति से घटित होने दें। जहाँ तक सुविधाओं और तकनीक के प्रयोग का प्रश्न है इनका विवेकपूर्ण प्रयोग करने में कोई दोष नहीं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है वैसे-वैसे इन सब चीजों से हमें आसानी ही होती है। आज के व्यस्त जीवन में संचार के आधुनिक विकसित साधनों का कितना महत्त्व है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। है। आयु बढ़ने के साथ तो कई सुविधाएँ अत्यावश्यक की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैं।

     यदि वाट्सएप की ही बात करें, तो ये एक अत्यंत उपयोगी माध्यम है। यदि हम इसके द्वारा निरर्थक मेल भेजने में लगे रहते हैं, तो ये हमारा दोष है न कि वाट्सएप का। यदि हम आयु के किसी पड़ाव पर निर्णय लेते हैं कि अब हम वाट्सएप अथवा अन्य संचार सुविधाओं का उपयोग नहीं करेंगे तो इसका एक अर्थ ये भी निकलता है कि अब तक हम इनका अत्यधिक उपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे थे। वास्तव में इन सब बातों पर समय रहते विचार करना अनिवार्य होता है। हाँ, वाट्सएप, फेसबुक अथवा अन्य सुविधाएँ एक लत बन गई हैं, तो उन्हें छोड़ने का निर्णय उत्तम होगा इसमें संदेह नहीं। हमारे लिए उचित तो यही होगा कि हम ग़लत अथवा अनुपयोगी चीजों अथवा आदतों को छोड़कर अन्य उपयोगी अथवा आवश्यक चीजों को अपना भी लें। घोर व्यावसायिक वृत्ति को त्याग दें लेकिन हमारी रचनात्मकता में किसी भी कीमत पर कमी नहीं आनी चाहिए। इससे स्वयं का विकास भी होगा और समय भी अच्छा व्यतीत होगा।

     यदि हम अकेले अथवा जीवनसाथी के साथ परिवार से अलग रहते हैं तथा घर के काम में सहायता के लिए सर्वेंट अथवा मेड रखते हैं तो क्या उन्हें भी हटा देंगे? यदि हम पेंशनर हैं, तो क्या पेंशन लेना भी बंद कर देंगे? शायद ये सब संभव न हो; क्योंकि आज के युग में पैसों के बिना किसी का जीवन नहीं चल सकता। साधु-संन्यासियों का भी नहीं। फिर केवल कुछ बातों के विषय में भावनात्मक निर्णय क्यों? एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न और भी है और वह यह है कि यदि हम अपने जीवनसाथी के साथ रहते हैं, तो क्या उसको भी ऐसा करने की छूट देते हैं? प्रायः ऐसा होता है कि हम अपने जीवनसाथी अथवा परिवार को तो यथावत सब करने की छूट दे देते हैं; लेकिन स्वयं महात्मा बनने का नाटक करते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। यथार्थ से पलायन भी हमारी समस्याओं को बढ़ा देता है। वास्तविकता को स्वीकार कर लेने से बहुत- सी समस्याएँ उत्पन्न ही नहीं होतीं।

     वास्तव में जब तक जीवन है इस संसार में मोह-माया की पूर्णतः उपेक्षा संभव ही नहीं। मोह के कारण ही हम आपस में जुड़े हुए हैं। स्पष्ट है कि सेवानिवृत्ति अथवा साठ-सत्तर अथवा पचहत्तर-अस्सी वर्ष की आयु के बाद भी हमें इसी दुनिया में रहना है, तो फिर इस आकर्षक संसार से जान-बूझकर विरक्ति अथवा पलायन क्यों? ऐसा भी संभव है कि अधिक मोह-माया की मुक्ति के नाटक के कारण हम कहीं के भी न रह पाएँ। कुछ लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी होती है कि वे कोई भी सहायक आसानी से रख सकते हैं। मेरा मानना है कि यदि आपके पास पहले से कोई सहायक नहीं है और आपको कार्य करने में असुविधा होती है, तो कोई न कोई सहायक रख लीजिए। इससे न केवल आपको जीवन में सुविधा हो जाएगी; अपितु किसी ज़रूरतमंद को रोजगार भी मिल जाएगा।

     प्रायः अधिकतर लोग कुछ सकारात्मक व्यावहारिक कदम उठाने की बजाय ऊलजलूल निर्णय ले बैठते हैं। कई लोग न तो आत्म-प्रदर्शन व आत्म-प्रशंसा का लोभ छोड़ पाते हैं और न ही दूसरों के द्वारा प्रशंसा पाने का लोभ ही छोड़ पाते हैं; इसलिए वे लोग कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे वे चर्चा में बने रह सकें अथवा लोगों की प्रशंसा पा सकें बेशक उनके कार्य कितने ही अनुपयोगी अथवा अव्यावहारिक क्यों न हों। कई लोगों की आदत होती है कि भजन-कीर्तन करते हुए अथवा माला फेरते हुए भी न केवल इधर-उधर देखते रहते हैं; अपितु बच्चों को डाँटने-डपटने के साथ-साथ दूसरे लोगों को निर्देश भी देते रहते हैं। ऐसी नाटकीयता का कोई लाभ नहीं। हमें हर तरह के आडंबर व पाखंड तथा आत्म-प्रदर्शन व आत्म-श्लाघा से दूर रहने और एक व्यावहारिक व सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करना चाहिए। 

     आयु के साथ-साथ कुछ गतिविधियाँ अथवा कुछ चीजें स्वतः छूट जाती हैं। ऐसे में हमें उपयोगी वस्तुओं और सुविधाओं की बजाय निरर्थक चीजों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। कुछ लोग एक अवस्था के बाद हर काम करना छोड़ देते हैं अथवा किसी भी बात में रुचि नहीं लेते। जब तक जीवन है हमें न केवल काम करते रहना चाहिए अपितु इस सुंदर संसार की हर बात में रुचि भी बनाए रखनी चाहिए। शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए दोनों चीजें अनिवार्य हैं। वास्तव में लोग आयु के बढ़ने से बूढ़े नहीं होते अपितु इसलिए बूढ़े हो जाते हैं कि उनके पास जीवन को जीने का कोई लक्ष्य नहीं होता। जेआरडी टाटा, डॉ. मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया अथवा एमएफ हुसैन आदि महानुभावों ने लंबी आयु पाई व जीवन की अंतिम साँस तक कार्य किया और अपने अंतिम दिनों में जो कार्य किया, वह उनके पिछले कार्यों के मुकाबले में भी बहुत बेहतर था। यही वास्तविक संन्यास है; क्योंकि संन्यासी भी समाज को कुछ देने के लिए ही इस क्षेत्र में पदार्पण करते हैं। अंतिम दिनों में समाज को अपना सर्वस्व दे देने से अच्छा कुछ भी नहीं।

     सादगी से जीवन जीना अच्छी बात है; लेकिन सादगी का अर्थ अकर्मण्यता अथवा पलायन नहीं होता। सादगी से तात्पर्य कंजूसी अथवा असामान्य अवस्था में रहना भी नहीं है। अच्छे ढंग से रहने और अच्छे कपड़े पहनने में भी कोई बुराई नहीं होती। सलीके से रहना और कार्य करना न केवल व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है अपितु समाज में भी यथोचित सम्मान दिलवाता है। कई बार सादगी अथवा विशेष रीति से जीवन जीने के लिए हम परिवार के सदस्यों अथवा समाज के लिए मुसीबतें खड़ी कर देते हैं जो किसी भी तरह से ठीक नहीं कहा जा सकता। अपनी उपयोगिता कभी नष्ट नहीं होने देनी चाहिए। अधिक नाटकबाजी और अपनी अनुपयोगिता के कारण ही अधिकतर लोग संबंधों के कूड़ेदान में फेंके जाने को अभिशप्त होते हैं। सादगी व्यवहार व चरित्र में होनी चाहिए, न कि वस्त्रों में। साधारण अथवा अवसरानुकूल वस्त्रों के अभाव में एक बड़ा विद्वान् भी सभा में अपेक्षित सम्मान नहीं पाता है।

     हमें स्वयं को संकुचित दायरे में डालने की बजाय स्वयं में घर-परिवार और समाज के लिए और अधिक व्यापक दृष्टि व सहयोग की भावना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम समाज में रहते हैं, तो उससे कटकर नहीं रह सकते। घर-परिवार व समाज से जुड़े रहने के लिए भी साधनों की उपेक्षा संभव नहीं। बढ़ती आयु के साथ-साथ व्यक्ति को दूसरे लोगों के साथ और सहयोग की अपेक्षाकृत अधिक आवश्यकता होती है। यदि बड़ी आयु में हम सचमुच जीवन को अधिक सार्थक व गरिमापूर्ण बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे अधिकाधिक व्यापक बनाना चाहिए। हमारी स्वीकार्यता घटने के बजाय बढ़नी चाहिए। इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य अनुभवों की खान बन जाता है। उसके अनुभवों तथा उसकी योग्यता और क्षमता का उपयोग सीमित न रहकर, पूरे समाज के लिए होना चाहिए। संकुचित दृष्टिकोण रखने वाला अथवा एकाकी जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति परिवार, समाज अथवा राष्ट्र को शायद ही कुछ दे पाए!■

सम्पर्कः  ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


प्रकृतिः घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है

 दक्षिण-पूर्वी ब्राज़ील के जंगल में नदी का किनारा है। हल्की बयार बह रही है। इस बयार में, पेड़ की शाखों से लटकी काई-युक्त लताएँ/टहनियाँ लटकन की तरह डोल रही हैं। यदि नज़ारा आपको महज़ कुदरती सजावट लगे, तो जान लीजिए कि कुदरती शिकारियों की तरह आप भी धोखा खा गए हैं। आप यदि इस ‘सजावट’ पर ज़रा गौर फरमाएँगे, तो पाएँगे कि इन लटकनों से घोंसलों को सजाया गया है और घोंसलों में पक्षी के अंडे/चूज़े रखे हैं। निराश न हो, यह सजावट थी भी शिकारियों को चकमा देने के लिए।

बायोलॉजी लेटर्स के अध्ययन के अनुसार, ब्लू मैनाकिन (Chiroxiphia caudata) नामक चिड़िया अपने अंडों और चूज़ों की सुरक्षा के लिए घोंसलों में लंबी-लंबी लटकनें लटका देती है, ताकि टूकेन समेत अन्य शिकारियों को उनके घोंसले, घोंसले-जैसे न लगें और वे इनसे दूर ही रहें। ऐसा करने से इन शिकारियों द्वारा हमले की संभावना 10 गुना कम हो जाती है। हालाँकि बड़े शिकारी-पक्षियों के आक्रमण की संभावना तो फिर भी बनी रहती है, वे घोंसले पहचान सकते हैं। 

वैज्ञानिकों को काफी समय से यह पता था कि ब्लू मैनाकिन और अमेरिका की कई अन्य पक्षी प्रजातियाँ  घोंसलों में लटकन लटकाती हैं। उनका अनुमान था कि ऐसा शायद वे छद्मावरण देने के लिए करती होंगी। यानी ऐसा करने से घोंसले आसपास के परिवेश में घुल-मिलकर शिकारियों की नज़रों से ओझल रहते होंगे: लेकिन यह अनुमान पक्का नहीं था। एक विवाद यह था कि लटकनदार घोंसले तो ज़्यादा नुमाया हो सकते हैं और आसानी से पहचाने जा सकते हैं।

इस विवाद को सुलझाने के लिए फेडरल युनिवर्सिटी के पक्षी विज्ञानी मर्सिवल रॉबर्टो फ्रांसिस्को के दल ने ब्लू मैनाकिन द्वारा परित्यक्त घोंसलों की निगरानी करने का सोचा। जब ब्लू मैनाकिन का प्रजनन काल खत्म हो गया, तब पक्षी विज्ञानी कैसियानो मार्टिंस जंगल से 50 खाली और परित्यक्त घोंसले और उनकी काई-युक्त लटकन ले आए। प्रयोगशाला में उन्होंने प्लास्टिसिन (मॉडलिंग क्ले) से असली जैसे अंडे बनाए और हर घोंसले में ऐसे दो नकली अंडे रख दिए। फिर, अगले दो प्रजनन मौसम में इन घोंसलों को जंगल में ऐसी जगहों पर रखा, जहाँ कुदरती तौर पर काईदार लटकन बहुत कम पनपती है। शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों पर लटकन लगी रहने दी, और कुछ की लटकन हटा दी। और घोंसलों की इंफ्रारेड कैमरे से निगरानी की।

लटकन होने का फर्क साफ दिखा। लटकन-विहीन 54 घोंसलों में से ग्यारह (20 प्रतिशत) घोंसलों से अंडे चोरी हुए थे, जबकि लटकन वाले 54 घोंसलों में से सिर्फ एक  अंडा चोरी हुआ था।

अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि लटकनदार घोंसले बनाने वाले पक्षी दरअसल अपने घोंसलों को न तो छुपाने की कोशिश करते हैं, न आसपास की किसी अन्य चीज़ जैसा दिखाने की। बस कोशिश यह होती है कि घोंसलों को ऐसे आकार दें कि वे घोंसले जैसे न दिखें, ताकि शिकारियों को पता न चले। हालांकि यह तरीका स्तनधारी या उन शिकारियों के विरुद्ध काम नहीं करेगा, जो शिकार खोजने के लिए गंध का सहारा लेते हैं। 

बहरहाल, एक सवाल बना हुआ है: इन घोंसलों पर काईदार जगहों पर ज़्यादा हमले क्यों होते हैं; क्योंकि यहाँ तो घोंसले अधिक ओझल होना चाहिए। शायद टूकेन पक्षी समझ गया हो कि ब्लू मैनाकिन अपने घोंसले काईदार जगह पर बनाता है। (स्रोत फीचर्स) ■


कथाः पहली बार

  - अर्चना राय

उमड़ते-घुमड़ते बादल, मंद-मंद बहती ठंडी हवा और जंगल की हरियाली, सभी वातावरण में एक अलग ही रूमानियत पैदा कर रहे थे। जंगल के पथरीले रास्ते पर हिचकोले खाती जीप की पिछली सीट पर पत्नी के साथ बैठकर, जिंम कार्बेट की जंगल सफारी करते रोहित की खुशी का ठिकाना नहीं था। आज उसे ऐसा लग रहा था, जैसे सारा आकाश उसकी मुट्ठी में बंद होने जा रहा था। कुछ देर बाद फॉरेन डेलिकेट के साथ मीटिंग होते ही उसका ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा जो जाएगा। सोच-सोच फूला नहीं समा रहा था।

पिछले तीन साल की मेहनत और भागदौड़ का ही नतीजा था, जो उसका लक्ष्य पूरा होने की कगार पर था। 

इस पल का उसने कितनी बेसब्री से इंतजार किया, वही जानता है। अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तो जैसे उसने अपने आप को दुनिया और रिश्ते-नातों से लगभग अलग-सा ही कर लिया था। और तो और अपने आप को तक भुला बैठा था। बस खुद को पूरी तरह प्रोजेक्ट के काम में डुबा दिया था। उसके इस संघर्ष में नव-विवाहिता पत्नी रिया ने बहुत सहा था; इसलिए बस एक बार यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, फिर अपनी रिया की हर ख्वाहिश पूरी करेगा। उसे बिलकुल रानी की तरह  रखेगा। ऐसा विचार कर ही तो वह रिया को भी अपने साथ लेकर आया था। उसने सोचा था- एक तरफ फॉरेन डेलिगेट के साथ मीटिंग हो जाएगी और, रिया के साथ घूमना भी। 

रोहित अपने भविष्य के सुनहरे सपने और अतीत के विचारों में खोया था। इस तरह जंगल में घूमते तीन घंटे होने को आए थे, पर टाइगर दिखना तो दूर, उसकी आवाज़ तक सुनाई नहीं दी थी।

 रोहित के इशारे पर टाइगर देखने की एक आखिरी कोशिश करने जैसे ही ड्राइवर ने जीप आगे बढ़ाई कि, जोरदार बारिश शुरू हो गयी, और बारिश से बचने, न चाहते हुए भी उन्हें एक पेड़  के नीचे खड़े होना पड़ा। ये देख रोहित झुंझला गया "अरे यार! ये बारिश भी अभी ही होनी थी। आज का तो पूरा दिन ही खराब हो गया। इन्वेस्टर इम्पार्टेंट मीटिंग के लिए मेरा इंतजार कर रहे हैं, और मैं लेट हो रहा हूँ।" कलाई पर बँधी घड़ी पर नजर डाल वह बेचैनी से बोला।

"अरे वाह! बारिश..." रिया छोटे बच्चे की तरह बारिश देख खुशी से चहक उठी। वह तो जैसे रोहित के साथ के हर एक पल जी-भर, जी लेना चाहती थी। इसलिए शरारत करती बार-बार हथेलियों की अँजुरी में बारिश का पानी भर-भर रोहित पर उछालने लगी। 

"अरे! ये क्या कर रही हो? वैसे भी अभी तक टाइगर दिखाई नहीं दिया, ऊपर से बारिश ने आकर उसे देखने की रही सही उम्मीद भी खत्म कर दी।" रोहित बेचैनी से बोला।

"आप, एक बात बताओ? क्या जंगल में सिर्फ टाइगर ही होता है?" रिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

"और क्या? आखिर जंगल सफारी का मतलब ही टाइगर को देखना होता है। और वही नहीं दिखा, तो क्या फायदा।" अनमनाते हुए उसने कहा।

"पर मुझे तो ऐसा नहीं लगता।" रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

 "तो फिर,... मैडम आपको क्या लगता है? जरा मुझे भी बताओ।" रिया को मुस्कुराते देख उसने भी  अपने आप को संयत कर हँसकर कहा। 

"अपने आस-पास तो देखिए, क्या कुछ नहीं है यहाँ।" 'देखिए' शब्द को जोर देकर, अपनी बाहें पसार रिया गोल-गोल घूमती हुई रिया अदा से बोली।

"क्या देखूँ?" अचंभित-सा रोहित बोला।

" देखो!...ये हरे भरे पेड़ मानो मेज़बान की तरह अपनी बाहें फैलाकर, मेहमान की तरह हमारा स्वागत कर रहे हैं..."

 "अच्छा?"  सिर खुजलाते हुए रोहित रिया को देख रहा था।

 "ये फूल-पत्तियों से सजे रास्ते, मानो प्रकृति ने हमारे स्वागत में रंगोली सजाई हो, और वो देखो अपने सतरंगी पंखों को फैलाकर मस्त मलंग नाचता मोर, मानो कुशल नृत्यांगना की भाँति हमारा मनोरंजन कर रहा है।" रिया अपनी ही धुन में मग्न नाचते हुई बोले जा रही थी। और रोहित चुपचाप रिया के अल्हड़पन को प्यार से एकटक देखे जा रहा था।

"अपने पीछे उस तालाब को देखो? इसका गहरा नीला रंग... और इसमें तैरते हंसों की कतार मानो कोई महात्मा अपने इष्ट की आराधना में ध्यानमग्न हों,... और ध्यान से सुनो! ये कोयल की कूक, और पंछियों का कलरव जैसे कोई गायक अपने प्रतिद्वंदी के साथ जुगलबंदी कर रहे हों। जंगल में भागते ये हिरणों का झुड़ जैसे नृत्य कलाकार कोरस नृत्य कर रहे हैं..और..."  बोलते-बोलते रिया अचानक झेंपते हुए चुप होकर रोहित को देखने लगी।

"और? तुम चुप क्यों हो गईं। बोलो न।" रोहित ने उत्साहित होकर कहा, तो रिया दोगुने जोश से कहने लगी।

 "यह बारिश की बजती जलतरंग, जैसे कोई संगीत के सुर छेड़ रहा हो,... मिट्टी की सौंधी-सौंधी इत्र-सी खुशबू, मानो धरा ने हवा के माध्यम से आकाश के लिए प्रेम संदेश भेजा हो। और भी कितना कुछ है यहाँ देखने।" 

"अरे बुद्धू राम! ...ये सब नजर से नहीं, नजरिये से देखा जाता है।" रोहित के कुछ न बोलने पर, रिया ने उसके माथे को अपनी हथेली से हल्की-सी चपत लगाते हुए कहा और खिलखिलाकर हँस दी। उसकी हँसी और पंछियों का कलरव एक सुर हो वातावरण को आनंदित कर गए।

प्रकृति की इतनी अद्भुत परिकल्पना और उपमाएँ  सुनकर रोहित अचंभित था।

अचानक रिया, रोहित का हाथ पकड़ बारिश में खींचकर उसके दोनों हाथ फैलाकर, उसके साथ 'टाइटेनिक पोज' में खड़ी हो गई।

रोहित ने महसूस किया उसके चेहरे पर पड़ती बूँदें, तन को ही शीतल नहीं कर रहीं थीं, बल्कि उसके मन को भी हल्का कर रहीं थीं। वह काफी देर तक ऐसे ही खड़ा रहा। उसे एक विचित्र-सी आह्लादित करती अनुभूति हो रही थी, जिसे शब्दों में कहना मुश्किल था।

"सचमुच, ऐसा एहसास आज पहली बार हुआ है। इससे पहले मैंने इस तरह कभी महसूस ही नहीं किया।" कहते हुए रोहित की आवाज़ खुशी से भर्रा गई, और उसने कसकर रिया को गले से लगा लिया।

"सब कुछ बहुत सुंदर है,...और सबसे सुन्दर है- तुम्हारा दिल।" उसने रिया की आँखों में देखकर कहा और उसका माथा चूम लिया।

"प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को नष्ट करने का मुझे कोई हक नहीं।" कहकर अपने साथ लाए ब्लू प्रिंट को फाड़कर, यहाँ जंगल में होटल बनाने के अपने ड्रीम प्लान को हमेशा के लिए टाल दिया, और इन्वेस्टर्स को मीटिंग कैंसिल करने के लिए फोन करने लगा। ■

तुतलाहट: भाषा का प्रथम संगीत

- जयप्रकाश मानस

हर भाषा के आरंभ में एक अस्फुट स्वर होता है - जैसे कंठ से नहीं, आत्मा से निकलता कोई अधूरा राग। वही तुतलाहट है।

बच्चे का पहला बोलना, जीवन की पहली कविता है,  जो किसी व्याकरण में नहीं आती, लेकिन सबके भीतर छिपी होती है। शायद मनुष्य का सबसे सच्चा बोलना वही है, जिसमें सार्थकता से पहले स्नेह होता है।

बच्चे के पहले शब्द किसी पुस्तक से नहीं, जीवन से निकलते हैं। वे तुतलाहटें हैं - जैसे किसी झरने ने अभी-अभी बोलना सीखा हो। उनमें अर्थ नहीं, आकांक्षा बोलती है।

हर अधूरा शब्द एक छोटे ब्रह्मांड की तरह है, जहाँ भाषा जन्म नहीं लेती; बल्कि घटती है - धीरे-धीरे, अपने ही भीतर से उजागर होती हुई।

जब हम बच्चे के साथ तुतलाते हैं, तो उसके बोलने की नकल नहीं करते - बल्कि भाषा के जन्म में सहभागी बनते हैं। जैसे कोई कवि अपनी कविता के बनने की आहट सुनता है। वह पल शिक्षण का नहीं, 'साक्षात्कार' का होता है - जीवन के उस आरंभ का, जहाँ शब्द और मौन अब तक एक ही चीज़ हैं।

तुतलाहट भाषा से पहले का संगीत है। यह उस काल की ध्वनि है, जब शब्द अभी अर्थ नहीं बने, वे केवल धड़कन थे। बच्चे की बोली में व्याकरण नहीं, लय होती है। उसके साथ तुतलाना, उस लय में सम्मिलित होना है - बिना किसी श्रेष्ठता के भाव के। उस क्षण में संवाद नहीं, सहभागिता होती है।

संचार का सबसे सुंदर रूप वह है, जो शब्द बनने से पहले घटता है।

हर तुतलाहट एक बीज है - भविष्य की भाषा का बीज। हम जब उसे सुनते हैं, तो उसके बोलने में सहायता नहीं करते; बल्कि उसके भीतर सुनने की शक्ति को जगाते हैं; क्योंकि भाषा की जड़ बोलने में नहीं, सुनने में है। इसीलिए शायद बच्चे की हर भूल में एक नयी सृष्टि की झलक होती है।

कभी-कभी अधूरे शब्द ही सबसे पूरा अर्थ कहते हैं।

तुतलाहट मौन और भाषा के बीच की वह सीढ़ी है, जिस पर हर मनुष्य एक बार अवश्य चढ़ता है। हर गलत उच्चारण, हर हँसी, हर झिझक - उस सीढ़ी का एक पायदान है। जब हम उसके साथ तुतलाते हैं, तो सिखाते नहीं, साथ चलना सीखते हैं।

क्योंकि मनुष्य पहले साथ बोलना सीखता है, फिर अलग अलग भाषाएँ बोलने लगता है। और शायद यही तुतलाने का सबसे गहरा अर्थ है  कि भाषा का जन्म हमेशा दो आवाज़ों से होता है - एक बच्चे की, और दूसरी हमारे भीतर के बच्चे की।

जब हम किसी बच्चे के साथ तुतलाते हैं, तो हम उस आरंभ की ओर लौटते हैं, जहाँ भाषा अभी किसी राष्ट्र या धर्म की नहीं थी - बस मनुष्यता की थी। हर ‘पा-पा’, हर ‘मा-मा’ में वही आदिम संवाद छिपा है, जो पृथ्वी के पहले मनुष्य ने हवा से किया होगा।

तुतलाना, दरअसल, स्मरण का कर्म है - उस प्रथम सृजन का, जब शब्द अबोध थे, पर मनुष्य सबसे बुद्धिमान।

कविताः निःशब्द

  -  डॉ. कनक लता मिश्रा

निःशब्द हूँ,

नहीं बटोर पाऊँ 

वो विस्तृत, वृहद्,  सुखद एहसास शब्दों में

नहीं गूथ पाऊँ उन्हें वर्णों की माला में

कोई प्रतिशब्द भी नहीं जो बयाँ कर सके

वो प्रथम स्पर्श

वो पुलकित, आह्लादित क्षण

एक स्वप्न

जो प्रत्यक्ष है

वास्तविक रूप धारण किए हुए है

एक अनुभूति

जो सर्वविदित है

सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है

पर मेरे लिए?

बिल्कुल नया

किन शब्दों में व्यक्त करूँ 

उन आत्म विभोर भावों को

जो उमड़ पड़े 

उस कृति को देखकर

अद्भुत शोभा युक्त

शाख पर फूटती नवकोपलों के समान कोमल 

अनछुई- सी कृति

मेरी ही देह का एक अंश

जो परत दर परत निर्मित हुई

मेरी ही कोख में

किस तरह शब्दों में समाहित करूँ 

उस मनःस्थिति को

जिसमें मैं, हूँ गौरान्वित

महसूस कर रही, हूँ सृजन का गौरव

अति साधारण, हूँ

पर महसूस कर पा रही, हूँ

सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने का गौरव

अनुभवविहीन हो रहे हैं शब्द मेरे

उन भावों को व्यक्त करने में

जिनमें मैं विशिष्ट, हूँ

सर्वोपरि, हूँ

उस नन्हे- से जीव की आँखों में

उसकी जरूरतों में

कहाँ से लाऊँ शब्दों में वो सामर्थ्य

जो परिमाण कर सके उस प्रचंड शक्ति को

जो मुझमें कभी थी ही नहीं

जाने कहाँ से आ गई

जिससे मैं बनी

ढाल

कवच

अपने उस नन्हे- से अंश के

दुखों की

आघातों की

सम्पूर्ण जीवन की......

लघुकथाः अदृश्य आघात

  - योगराज प्रभाकर

आज वह ऑफ़िस से देर रात घर लौटी थी-थकी-हारी और चेहरे पर हताशा के भाव लिये। दरवाज़ा खुला मिला। पति भीतर बैठा था-टी.वी. की रोशनी चेहरे पर पड़ रही थी; लेकिन आँखों में कोई प्रतीक्षा नहीं थी।

“आज बहुत देर हो गई।” वह बोली।

“हूँ।” रिमोट पर उँगलियाँ चलते हुए उसने कहा।

“लिफ़्ट ख़राब थी, सीढ़ियों से आना पड़ा। बहुत थक गई हूँ… ऊपर से ये कमर दर्द।”

“थक गई हो, तो जाकर आराम करो।”

“आज दफ़्तर में बहुत कुछ हुआ। मूड बिल्कुल ऑफ़ है…”

“ज़्यादा मत सोचो।”

वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “आप एक बार पूछ तो सकते थे कि क्या हुआ?”

“तुम बताना चाहो तो बता दो… मैंने मना किया है क्या?”

वह फिर चुप हो गई। पूरा कमरा शांत हो गया- इतना कि पंखे की आवाज़ भारी लगने लगी।

“मुझे आज बहुत ज़्यादा मेंटली टॉर्चर किया गया…”

पति की नज़रें टी.वी. स्क्रीन से नहीं हटीं।

फिर वह धीरे-से बोली, “नए बॉस ने पूरी टीम के सामने मुझे जानबूझकर नीचा दिखाया।”

“अच्छा!” पति की ठंडी-सी आवाज़ आई।

“पता है, उस वक़्त मैं सिर्फ़ आपको याद कर रही थी कि घर जाकर सब कुछ बताऊँगी।”

वह पलटा नहीं। बोला, “ज़्यादा टेंशन मत लो… ये तो होता है… हर जगह।”

वह उसे देखती रही-जैसे किसी अजनबी से परिचय माँग रही हो।

“तुम्हें पता है… चोट तब नहीं लगती, जब कोई पराया कुछ कहे। चोट तब लगती है, जब कोई अपना ख़ामोश रहे।”

“तो क्या करूँ? जाकर उसका सिर फोड़ दूँ?” पति भड़का।

उसने कोई उत्तर नहीं दिया… बस अपनी नज़रों को पति के चेहरे पर गड़ा दिया। उसे यूँ एकटक ताकते हुए पति ने झुंझलाते हुए पूछा, “क्या देख रही हो?”

 “उसे देख रही हूँ, जो न दुख बाँटता है, न आक्रोश जताता है, न गले लगाता है… बस देखता है… या अनदेखा करता है।”

“पर मैंने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं।”

उसने अपने कमरे की ओर जाते हुए वाक्य फेंका, “तुमने कुछ नहीं कहा… तुम्हारी यही ‘कुछ नहीं’ तो सबसे गहरे ज़ख़्म देती है।” ■

कहानीः उदास आँखें

 - आशा पाण्डेय 

सुबह घर से निकलते समय ही तय कर लिया था कि ‘आतिथ्य भोजनालय’ में रुककर नाश्ता कर लूँगा। अमरावती से नागपुर के तीन घंटे के सफर में डेढ़ घंटे बाद पड़ने वाले आम के बगीचों के बीच बना भोजनालय अभी कुछ महीनों पहले ही खुला है। वहाँ का दही-पराठा बहुत फेमस है। भोजन भी घर जैसा स्वादिष्ट होता है। इस बार मैं भी उस भोजनालय का स्वाद लेना चाहता हूँ

     ड्राइवर को ‘आतिथ्य भोजनालय’ में रुकने को कह, मैं सीट से सिर टिका, आँखें बंद कर, आज होने वाली मीटिंग के बारे में सोचने लगा। कई दिनों से कार्य की अधिकता की वजह से सो नहीं पा रहा था, इसलिए आँखें बंद करते ही नींद में चला गया। जगा तब, जब ड्राइवर ने आवाज लगाई – “साहब आतिथ्य भोजनालय” आ गया।”

    चौंककर मैंने आँखें खोली– तो मैं डेढ़ घंटा सो लिया ..!

     “चलो नाश्ता कर लिया जाए।” ड्राइवर से कहकर मैं कार से बाहर आ गया।

  बाहर गर्म हवाएँ एक झोंके की तरह आम के पेड़ों से टकराकर बह रही हैं। मैंने घड़ी देखी, सुबह के नौ बजने वाले हैं; लेकिन लग रहा है, दोपहर हो गई हो जैसे। जुलाई की सुबह कुछ देर बाद ही अपनी नरमाहट भूलकर उमस भरी चिपचिपी हो जाती है।

       भोजनालय में पहुँचकर मैंने चारों तरफ एक नजर दौड़ाई - हरी क्यारियों और घने पेड़ों के बीच बाँस की फट्टियों को कलात्मक तरीके से जोड़कर दो-तीन छोटी-छोटी गुमटियाँ बनाई गई हैं। ग्राहकों के बैठने के लिए पेड़ों के नीचे गोल टेबल और कुर्सियाँ रखी हैं, वहीं पास में  रंग- बिरंगे मटके बड़े करीने से सजे हैं। अभी-अभी हुए पानी के छिड़काव से मिट्टी की  सोंधी महक उठ रही है, जो मुझे पीछे किसी याद में ले जाने को मचल रही है। यूँ इस जगह पर आकर मुझे तरो-ताजा और खुश महसूस करना चाहिए; किन्तु न जाने क्यों सब कुछ सूना-सूना और उदास लग रहा है।

    मेरे आते ही एक युवक फुर्ती से मेरे पास आया और बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करते हुए मुझे एक टेबल की ओर ले गया। मैं इधर-उधर देखकर एक घने पेड़ की छाँव में बैठ गया। उस टेबल से दस कदम की दूरी पर बाँस से घिरी खुली रसोई है। चूल्हे के पास साठ-पैंसठ वर्ष की एक वृद्ध महिला गुमसुम बैठी है। वह इधर की ओर देख रही है। उसके आस-पास बड़े-बड़े भगोने ढके हुए रखे हैं। चूल्हे से कुछ दूरी पर एक कुर्सी-मेज लगी है। जहाँ एक वृद्ध बैठा है।

     भोजनालय में भीड़ नहीं है। बस, एक दो परिवार दिखे, जो नाश्ता कर उठने वाले थे।

   मेरे  बैठते ही एक लड़का मेरा टेबल साफ कर पानी का जग और मेन्यू कार्ड रख गया। फिर वह युवक, जिसने बढ़कर मेरा स्वागत किया था, आया।

   “बताएँ सर, क्या लेना पसंद करेंगे? रस्सा-पोहा, बटाटा बड़ा, दही पराठा ..? जो कहें आप … भोजन करने का मन हो, तो गर्मा- गर्म  झुनका- भाखर भी तैयार मिलेगी।”

   “नहीं, अभी भोजन का समय नहीं है, दही-पराठा लगवा दो। उधर ड्राइवर से पूछ लो, वह जो लेना चाहे …जल्दी बन तो जाएगा न?” मैंने  घड़ी देखते हुए पूछा।

  “जी सर, बस दस मिनट कहकर उसने महिला को आवाज लगाई - “फटाफट दो पराठे और दही भिजवा इस टेबल पर।”

  वृद्ध महिला की उदास आँखें और उदास हो गईं। वह जलती लकड़ी को चूल्हे में सरकाकर आटे की लोइयाँ बनाने लगी। कुछ दूर पर बैठे वृद्ध के चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी छा गई। मेरा मन द्रवित हुआ- इस उमर में  नौकरी! मजबूरी होगी !

    युवक की आवाज जारी है- जल्दी कर माँ! एक बन जाए तो थाली लगाकर दे। फिर दूसरा सेंकती रहना। फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला –“सर, एक के बाद एक गरम-गरम मिलता जाएगा आपको …चूल्हे का करारा सिका पराठा .. मजा आ जाएगा आपको।”

  उस महिला के लिए युवक का ‘माँ’ संबोधन सुन मुझे अच्छा लगा। मैंने सोचा– युवक बुजुर्गों का आदर करना जानता है। मेरे पास से हटते ही उसने फिर से महिला को आवाज लगाई – “जल्दी भेज इस टेबल पर नाश्ता … अभी तक सिका नहीं ?”

महिला पराठा रखने के लिए प्लेट उठा रही थी। लड़के के बोलते ही न जाने कैसे उसके हाथ से प्लेट छूटकर गिर गई। लड़का चिल्लाया– क्या कर रही है …? सवेरे-सवेरे ही तेरे हाथ से बरतन छूट रहे हैं ? झूमते हुए काम करती है क्या, जल्दी ला।”

   युवक के लिए थोड़ी देर पहले मेरे मन में उपजे विचार तिरोहित हो गए। मैं उस महिला को देखने लगा। प्लेट में दही-पराठा, अचार सजा कर महिला घुटने पर हाथ रख उठी और धीरे-धीरे चलते हुए प्लेट मेरी टेबल पर रख गई। मैं नाश्ता करने लगा। पराठा वाकई स्वादिष्ट बना है। खाते-खाते मेरी निगाहें पराठा सेंकती महिला पर ठिठकती रहीं। चूल्हे की आँच के सामने लाल हुए झुलसे  चेहरे की कसक लिये महिला तल्लीनता से पराठा बेलने, सेंकने में जुटी है और एक-एक कर टेबल पर पहुँचाए भी जा रही है।

    नाश्ता हो जाने के बाद जब वह प्लेट उठाने आई तब मैंने पराठे के स्वाद का बखान कर दिया। वह कुछ झेंपी, हिचकिचाई, फिर प्लेट उठाकर चली गई।

  युवक बिल लेकर मेरी टेबल पर आया। आत्मविश्वास से भरी उसकी आँखें चमक रही हैं। उसने पूछा, “सर पराठा अच्छा लगा न ?”

   “हाँ यार, बहुत स्वादिष्ट थे पराठे …  माता जी के हाथों में जादू है … पर इस उम्र में नौकरी ..?”

   “ नहीं सर, नौकरी नहीं … ये मेरी माँ हैं। और उधर जो कुर्सी पर बैठे हैं, वे पिता हैं।”

    मैं अवाक्, बस “अच्छा” कह पाया। ये इसके माता पिता हैं…. फिर भी…! मेरी आवाज घुटकर रह गई।

   “हाँ सर, ये दोनों घर में बैठे बोर होते रहते थे। कुछ काम धंधा नहीं था इनके पास, घर के लोग  भी दिन भर वही-वही चेहरा देख देखकर बोर होते थे … बस बैठा दिया यहाँ।”  कहते हुए लड़का किसी रहस्य- सा मुस्कराया, फिर आगे बोला –  अब यहाँ दिनभर लोगों के बीच में मन लगा रहता है इनका। एक बाई भी है, आज छुट्टी पर है। दोनों मिलकर सम्हाल लेते हैं …आप तो देख रहे हैं, एक लड़का भी रखा है … आराम से हो जाता है सब।” युवक  माँ-बाप की उम्र, थकान, निराशा को न सुनना चाहता है, न सोचना। महिला खामोश हो हमारी बातों को सुन रही है।

  “ये जगह तुम्हारी है या किराये पर लिये हो?” मैंने बात बदलने की कोशिश की।

  “मेरी खुद की है। बाबा (पिता) ने खरीदा था। हाइवे पर है, तो ख्याल आया कि यहाँ ढाबा शुरू कर दिया जाए, तो अच्छी कमाई होगी।”

  “वो तो ठीक है, पर एक कुक रख लो यार, माता जी चूल्हे के सामने … थक जाती होंगी। अब इनके आराम के दिन हैं।” न जाने कैसे मेरे भीतर उमड़ता गुबार बाहर आ गया।

  “कुक रखने के बाद तो हमारा ढाबा भी अन्य ढाबों जैसा ही हो जाएगा न सर,... अभी यहाँ घर जैसा खाना मिलता है; इसलिए लोग आते हैं। पैसा भी तो बच जाता है सर। और इनके थकान की बात तो निकाल ही दीजिए मन से। ये खेत में काम करने वाली हड्डियाँ हैं। हम लोग थक जाते हैं सर, पर ये नहीं।”

 मेरी नजरें फिर से उन दोनों से जा टकराई, जो बेटे की बातों को सुनते हुए उन्हें हजम करने को मजबूर दिखीं।

   बिल अदा कर मैं बाहर निकल आया । मेरी गाड़ी नागपुर की ओर आगे बढ़ रही है और मन उस ढाबे में अटक गया है। बहुत देर तक वे उदास आँखें मेरा पीछा करती रहीं। ■

सम्पर्कः कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र, ashapandey286@gmail.com

लघुकथाः मकड़ी

  - डॉ. सुषमा गुप्ता

उसने अखबार से नज़र उठाई। पहले मरी हुई मकड़ी को देखा फिर मुझे। वो भी घूरकर।

 मैंने सकपकाकर सफाई दी, “मुझे हत्या नहीं करनी थी। इसकी हत्या का मेरा कोई इरादा भी नहीं था; पर मैं डरी हुई थी। यह मकड़ी मेरे बिस्तर के बहुत पास थी। मुझे मकड़ी से डर लगता है।”

“मकड़ी तुमसे ताकतवर थी?”

“अरे नहीं! कमज़ोर-सी थी। एकदम ज़रा- सी।”

मेरी इस बात पर उसने व्यंग्य- भरी मुस्कान के साथ मुझे देखते हुए कहा, “यह कितनी विरोधाभासी बात है। वह तुमसे कमज़ोर थी और तुम्हें उससे डर लग रहा था!” 

मेरी पेशानी पर कुछ बल उभर आए। मैंने ऊहापोह से कहा, “उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी…शायद…”

उसने गहरी साँस छोड़ते हुए हाथ का अखबार नीचे पटक दिया और बेहद निराश होकर कहा, “डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं।”

मेरी नज़र अख़बार की हैडलाइन पर अटक गई।

“भ्रष्टाचार के विरोध में रैली निकालते, यूनिवर्सिटी के छात्रों पर प्रशासन ने निर्ममता से लाठियाँ भाँजी।” ■

327suumi@gmail.com

संस्मरणः कमली तू आ गई...

  - देवी नागरानी

मुझसे दो दशक छोटी; पर सोच के विस्तार में उसका किरदार मुझसे दो क़दम आगे और ऊँचा।  ऐसी ही एक मानवी ने जब रिश्तों के निबाह और निर्वाह पर निकली बात पर अपने रिश्ते को लेकर आप- बीती सुनाई, तो सच मानिए, दो तीन दिन तक मैं उस मानसिकता के बाहर न आ पाई।                                                                  

उसका कथन- “मैं पाँच बजे काम से रुखसत पाकर छह-साढ़े छह के बीच जब घर पहुँचती हूँ, तो लगता है सभी मेरे इंतजार में मायूस सन्नाटों को जी रहे होते हैं: घर के दर-दरीचे, बिस्तर पर लेटे मेरे अपाहिज पिता, माँ की देखभाल करने वाली अम्मा और मेरी माँ, जिसकी आँखें निरंतर चारों ओर घूमने की आदी होकर जाने क्या कुछ ढूँढते हुए जब मुझपर आकर टिकती है तो वह कह उठती है- “आ गई कमली!” और तत्पश्चात् वह सुकून से सो जाती है।  “पर तुम्हारा नाम तो बीबा है न ?” मैंने विस्मय में पूछा                                                                            

 “हाँ मेरी माँ का नाम कमला है, और वह अपनी इस अविकसित अवस्था में मुझको कमली के नाम से पहचानती है।”

सुनकर एक अजीब- सी सिहरन शरीर में लहरा उठी, लगा कहीं दिमाग में बिजली कौंध उठी।  माँ अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते करते ममत्व को साधना की हदों तक ले जाने की अवस्था में अपने आप को इस कद्र भूल जाती है कि उसे अहसास मात्र नहीं रहता कि उसका अपना वजूद बच्चों में समावेश कर गया है।

मैं इस समय यहाँ A.I.R स्टेशन में सिन्धी रिकॉर्डिंग की इन्चार्ज मिस बीबा के केबिन में बैठी रिश्तों की उन गूढ़ रहस्यमय स्थिति के बारे में सोचती रही।  कभी लगता है हमारी सोच भी किन हदों में जकड़ी हुई है, जिसका हमें इल्म ही नहीं। विकसित- अविकसित अवस्थाओं से परे अंतःकरण में भी कई गुफाएँ हैं जो हमें हर बंधन से, हर सीमा से पार करते कराते हमें अपने आप से जोड़ती है। और इन बातों का महत्त्व सिर्फ बीबे जैसे बेटी ही समझ सकती, जिसने माता-पिता की देखरेख के लिए अब तक शादी नहीं की है।

रिश्ता वो ही निभाएगा ‘देवी’ जिसको रिश्ता समझ में आया है। 

सोच को ब्रेक देते हुए मैंने बीबा से पूछा- “इस अवस्था में माँ कितने दिन से है?”   

“कुछ एक साल के क़रीब हुआ है और उनकी यह प्रतिक्रिया- मुझे कमली कहकर पुकारना, और उस रूप में ढूँढना, सामने देखकर राहत महसूस करना, खुद मुझे हैरत में डाल देती है। उनके मनोभावों को जानते हुए जैसे ही मैं घर में पाँव रखती हूँ, उनके सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, जब तक वह अपनी आँखें घुमाते हुए मुझ पर टिकाकर यह नहीं कहती- “कमली तू आ गई!” 

कुछ पल रुककर बीबा कहने लगी- “अपने आपे- से बाहर की अवस्था और खुद से भीतर जुड़ने की अवस्था का नाम ही शायद ममता है और वह है मेरी माँ कमली।”                                    

उसके कहने और मेरे सुनने के बीच का वक़्त जैसे ठहर गया। मैं कितनी सदियाँ पीछे लाँघ आई थी यह मैंने तब जाना, जब उसकी आवाज़ ने मुझमें चेतना लौटाई :

“ मैडम जी आपकी चाय ठंडी हो रही है।”

मैं याद के भूल - भुलैया में खो जाती हूँ।  शायद वे मेरे ज़हन में अपना स्थान बना बैठी हैं।  बारी-  बारी वे इन झरोखों से सांस लेने आ जाती है।

अब तो सिर्फ यही, बाकी कुछ और याद आने पर... 

email- dnangrani@gmail.com


व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर

 - गिरीश पंकज

मूर्ख दिवस के दिन सर्वाधिक खुशी होती है नेता छदामीराम को और अपनेराम को यानी मुझको। सुबह से ही हम दोनों प्रसन्न होकर सब को चित करने में लगे रहते हैं । एक तो पहली अप्रैल और उस पर अपना जन्मदिन । लोग भी खूब मजा लेते हैं । उन्हें फोन - पर - फोन करते हैं।  वाट्सएप के जरिए संदेश देते हैं । लगभग सब यही लिखते हैं, "बधाई हो, आज आपका जन्मदिन है।"

लोगों को अनजाने में ही एक ऐसा दिन मिल गया, जिस दिन वह अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। "आज आपका दिन है", कहकर लोग यही व्यक्त करना चाहते हैं कि बनाए जाओ हमको उल्लू । हम तो मूरख है ही जनम के। आज आपका ही दिन है।

छदामीराम रोज की तरह एक अप्रैल को भी बहुत खुश रहते हैं । वह अपने भाग्य को सराहते हैं कि  धुप्पल में ही वह मनुष्य योनि में आ गए। थैंक्स गॉड!! अगर लोमड़ी का शरीर मिलता, तो जंगल में ही भटकते रहते । बचे-खुचे मांस को खाकर गुजारा करना पड़ता ; लेकिन मनुष्य-योनि में क्या आए, अब तो आनंद - ही - आनंद है। परमानन्द कहना सही होगा।

छदामीराम ने सीधे-साधे लोगों को ठगने की जो कला बाप-दादाओं से सीखी, वह निरंतर काम आ रही है । हर बार चुनाव में खड़े होते हैं और जीत जाते हैं। हाथ जोड़ना,  लोगों के पैर छूना,  पैसे बाँटना, दारू बँटवाना आदि-आदि सुकर्मों  के सहारे वह हमेशा चुनाव जीते हैं। विनम्र भाव कुछ ऐसा दिखाते हैं कि ससुरी विनम्रता भी लाज के मारे जल-जल हो जाती है। वैसे छदामीराम की विनम्रता मतदान के दिन तक ही रहती है।  उसके बाद तो वे गधे के सिर से सींग की तरह,  भ्रष्ट अफसर के जीवन से नैतिकता की तरह, गरीब के घर से खुशहाली की तरह, भुखमरे के चेहरे से लाली की तरह गायब हो जाते हैं। उसके बाद लोग बस एक ही विज्ञापन दोहराते हैं: छदामीराम को …। ढूँढते ही रह जाओगे।

मोबाइल जब भी लगाओ, वह नहीं उठाते । उनका पीए उठाएगा और अक्सर दो - तीन बातें कहेगा। जैसे, "साहब बाथरूम में है । निकलते ही बात कराता हूँ ।" या फिर कहेगा,  "कार्यक्रम में बैठे हैं। लौटके आएँगे तो बात कराता हूँ ।" कभी कहेगा,  "वो तो आराम फरमा रहे हैं ।" … कभी कहेगा, "साहब बीमार  पड़े हुए हैं।"

जब भी फोन करो, छदामीराम से बात नहीं होती।  कोई न कोई बहाना हाजिर।  जिन लोगों के नंबर फीड है, और जिनसे उनकी लेन-देन की  सेटिंग है,  उनसे तो वे लपककर बात करते हैं। घंटी बजी और जैसे ही नाम दिखा, उपायीराम, तो फौरन बात शुरू कर देते हैं,

"और सुनाओ उपायीराम, जयश्रीराम!

कैसा चल रहा है तुम्हारा काम ?

बहुत दिन से रात को

हमने  नहीं टकराया आपसे में जाम।

कब आ रहे हो प्यारे,

तुम हमारे द्वारे?"

मोबाइल में जिनके नाम सेव हैं, अकसर उनसे बढ़िया बात करते हैं;  लेकिन जिनके नाम सेव नहीं है, उनसे बात करते हुए  महोदय लगभग गुर्राते हैं । पहले तो पीए ही गुर्राता है; लेकिन जब सामने वाला अधिक गुर्राने लगता है, तो पीए मोबाइल छदामीराम को दे देता है । फिर छदमीराम गुर्राते हैं; लेकिन मूर्ख दिवस के दिन छदामीराम गुर्राना भूलकर मिमियाना शुरू कर देते हैं। जितने भी फोन आते हैं, उन सबसे बात करके 'थैंक यू …थैंक यू'  कहते हैं; क्योंकि इनकी अंतरात्मा कहती है- "बेटे, चुनाव के समय और जन्मदिन के दिन तो मनुष्य जैसा बन जाना ठीक रहता है।"

छदामीराम अपनी आत्मा का कहना अकसर मान लेते हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ काम करवाने के एवज में उनको रिश्वत की रकम भेंट करता है, तब भी छदामीराम सीधे अपनी आत्मा से ही बातचीत करते हैं।  सामने से मिल रही राशि के बारे में आत्मा  से पूछते हैं कि फलाना इतने लाख दे रहा है । क्या इस काम के एवज में इतनी रकम उचित है?

जब आत्मा कह देती है, "हाँ रे, ठीक है । ले ले", तो छदामीराम रिश्वत को बड़े ही श्रद्धा- भाव के साथ ग्रहण करते हैं।  लेकिन जब कभी अगर आत्मा ने कहा, "नहीं, यह रकम तुम्हारे स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है", तो छदामीराम साफ इनकार कर देते हैं। जब तक उन्हें मनमाफिक रकम नहीं मिल जाती, वे रिश्वत ग्रहण ही नहीं करते। पर्याप्त दहेज न मिलने के कारण उन्होंने तो पाणिग्रहण से भी इंकार कर दिया था। जीवन  में कुछ सिद्धांत तो होने ही चाहिए साहेब।  तो ऐसे हैं हमारे  छदामीराम।

मूर्ख दिवस पर उनको लख-लख बधाइयाँ।

आप तो  दे ही चुके होंगे न। उस दिन अपने पर ही एक कुण्डलिया लिख मारी। देखें,

मूर्खों के सिरमौर हम, है इसमें  ही सन्न।

लगा रहे सब चून ही, हो कर के परसन्न।

हो कर के परसन्न, समझते हम चालाकी।

कैसे निबटे कोय,  निकालें सबकी झाँकी।

कह पंकज कविराय, करना है खुद पे गौर।

कब तक आखिर हम रहें, मूर्खों के सिरमौर।

कविताः भूमि का शृंगार तरु है

  - पूर्णिमा राय

बरसों से एक निगाह

थोड़ी सी लापरवाह!

ढूँढ रही थी हमेशा

शीतल छाँव का गवाह!!


कड़ी धूप का था साया

चाहे वे तरुवर छाया!

चलते ही पगडंडी पर

स्मरण उसे था यह आया!!


ओ नन्हे ! मेरी बात ले मान

ना कर कभी तू इतना गुमान!

सूखे पेड़ को दे जा पानी

वर्ना नहीं बचे जिंदगानी!!


आज वह बूढ़ा हो गया था

यौवन नशे में खो गया था!

प्रकृति से मुँह फेरके वह तो

कंकर राह में बो गया था!!


सुप्त चेतना ने उसे जगाया

बूढ़े ने फिर जग को बताया!

पेड़ धरा की असली धरोहर

तरुवर ने ही विश्व सजाया!!


पौधों को हम पानी दें

बचपन और जवानी दें!!

भूमि का शृंगार तरु है;

मिलकर नयी रवानी दें।