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Apr 1, 2026

आलेखः नए युवा और बदलती कैरियर संभावनाएँ

  - संध्‍या राजपुरोहित

आज का समय अवसरों, संभावनाओं और प्रतिस्पर्धा का समय है। बदलती तकनीक, वैश्वीकरण और नई आर्थिक संरचनाओं ने करियर के पारंपरिक ढाँचे को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। एक समय था जब डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी को ही सफलता का पर्याय माना जाता था; लेकिन आज डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया, डिजाइन, खेल, उद्यमिता और अनेक कौशल आधारित क्षेत्रों में भी उज्ज्वल भविष्य के द्वार खुले हैं। यह विविधता जहाँ एक ओर युवाओं को नए अवसर प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर उनके सामने सही चुनाव की चुनौती भी खड़ी करती है।

भारत का वर्तमान जनसांख्यिकीय परिदृश्य इस चर्चा को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ युवा कार्यबल में प्रवेश करते हैं। यह स्थिति भारत को एक बड़ी संभावित शक्ति प्रदान करती है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। किन्तु यदि इस युवा शक्ति को उचित दिशा, कौशल और अवसर नहीं मिले, तो यही संभावना एक चुनौती में परिवर्तित हो सकती है।

यही वह बिंदु है जहाँ कैरियर चयन और कौशल विकास के बीच का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। विभिन्न रिपोर्ट्स यह संकेत करती हैं कि देश में रोजगार की समस्या से अधिक “रोजगार योग्य कौशल” की कमी एक बड़ी चुनौती है। आज भी लगभग आधे युवा ऐसे हैं जो उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप पूरी तरह तैयार नहीं हैं। कई अध्ययन बताते हैं कि केवल लगभग 50 प्रतिशत ग्रेजुएट ही वास्तव में जॉब-रेडी माने जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए आवश्यक व्यावहारिक दक्षताओं से वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करती है। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी बेरोजगारी के आंकड़ों में बड़ी हिस्सेदारी शिक्षित युवाओं की ही दिखाई देती है। लगभग 65 से 67 प्रतिशत बेरोजगार युवाओं का ग्रेजुएट होना इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि केवल डिग्री हासिल करना सफलता की गारंटी नहीं है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अभी भी अधिकतर सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित है, जबकि उद्योग और समाज को व्यवहारिक कौशल, नवाचार और समस्या समाधान की क्षमता रखने वाले युवाओं की आवश्यकता है।

कौशल अंतर या “स्किल गैप” भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। देश में औपचारिक रूप से प्रशिक्षित युवाओं का प्रतिशत अभी भी बहुत कम है, जो लगभग 4 से 5 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। वहीं, नई तकनीकी क्षेत्रों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और डिजिटल तकनीक में कुशल युवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उस अनुपात में प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध नहीं है। यह अंतर युवाओं के लिए अवसर भी है और चुनौती भी, क्योंकि जो इस दिशा में स्वयं को तैयार करेगा, वही भविष्य में आगे बढ़ेगा।

इसके साथ ही रोजगार की गुणवत्ता भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभर रही है। बड़ी संख्या में युवा अपनी योग्यता से कम स्तर के कार्य करने के लिए मजबूर हैं, जिससे उनमें असंतोष और अस्थिरता की भावना बढ़ती है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी प्रभाव डालती है।

इन सभी तथ्यों और आंकड़ों के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विद्यार्थी अपने कैरियर का चुनाव किस प्रकार करें। इसका उत्तर आत्म पहचान में निहित है। प्रत्येक विद्यार्थी की अपनी रुचियाँ, क्षमताएँ और सपने होते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप क्षेत्र का चयन करता है, तो वह उसमें अधिक समय तक टिकता है, बेहतर प्रदर्शन करता है और अंततः संतुष्टि भी प्राप्त करता है। इसके विपरीत, यदि कैरियर का चुनाव केवल सामाजिक दबाव, तुलना या अधूरी जानकारी के आधार पर किया जाता है, तो वह आगे चलकर असंतोष का कारण बनता है।

सही निर्णय के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी अपने भीतर झांकें, अपनी रुचियों और क्षमताओं को समझें और विभिन्न कैरियर विकल्पों के बारे में ठोस जानकारी प्राप्त करें। आज सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन सही और प्रामाणिक जानकारी का चयन करना भी उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही शिक्षकों, अभिभावकों और कैरियर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेना निर्णय को अधिक सुदृढ़ बनाता है।

इस प्रक्रिया में परिवार और विद्यालय की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर अपने सपनों का बोझ न डालें, बल्कि उनकी रुचियों और क्षमताओं को समझते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। वहीं शिक्षकों का दायित्व केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विद्यार्थियों के मार्गदर्शक बनकर उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए तैयार करते हैं। एक सकारात्मक और सहयोगात्मक वातावरण बच्चों में आत्मविश्वास विकसित करता है और उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आज का समय निरंतर सीखने का समय है। कैरियर अब एक स्थिर विकल्प नहीं, बल्कि एक गतिशील यात्रा बन चुका है, जिसमें समय-समय पर नए कौशल सीखना, स्वयं को अपडेट करना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलना आवश्यक है। यही लचीलापन और सीखने की प्रवृत्ति व्यक्ति को दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जाती है।

अंततः यह स्पष्ट है कि कैरियर का सही चुनाव केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया तभी सफल हो सकती है जब उसमें आत्मविश्वास, सही जानकारी, कौशल विकास और स्पष्ट लक्ष्य का समन्वय हो। आज के विद्यार्थी यदि इन आधारों को समझकर अपने कैरियर की दिशा तय करते हैं, तो वे न केवल अपने लिए एक सफल भविष्य का निर्माण करेंगे, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

याद रखना होगा कि कैरियर का चुनाव भीड़ का अनुसरण नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझते हुए अपनी राह बनाने की प्रक्रिया है। सही कैरियर वही है, जहाँ रुचि, क्षमता और लक्ष्य एक साथ मिलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं।

 लेखक के बारे में-  सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षा कें क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में मध्‍यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में जीवन कौशल शिक्षा से जुडी है।  डेढ़ दशक से अधिक समय तक स्‍कूली शिक्षा से सम्‍बद्ध रही है। ■

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