सुबह घर से निकलते समय ही तय कर लिया था कि ‘आतिथ्य भोजनालय’ में रुककर नाश्ता कर लूँगा। अमरावती से नागपुर के तीन घंटे के सफर में डेढ़ घंटे बाद पड़ने वाले आम के बगीचों के बीच बना भोजनालय अभी कुछ महीनों पहले ही खुला है। वहाँ का दही-पराठा बहुत फेमस है। भोजन भी घर जैसा स्वादिष्ट होता है। इस बार मैं भी उस भोजनालय का स्वाद लेना चाहता हूँ
ड्राइवर को ‘आतिथ्य भोजनालय’ में रुकने को कह, मैं सीट से सिर टिका, आँखें बंद कर, आज होने वाली मीटिंग के बारे में सोचने लगा। कई दिनों से कार्य की अधिकता की वजह से सो नहीं पा रहा था, इसलिए आँखें बंद करते ही नींद में चला गया। जगा तब, जब ड्राइवर ने आवाज लगाई – “साहब आतिथ्य भोजनालय” आ गया।”
चौंककर मैंने आँखें खोली– तो मैं डेढ़ घंटा सो लिया ..!
“चलो नाश्ता कर लिया जाए।” ड्राइवर से कहकर मैं कार से बाहर आ गया।
बाहर गर्म हवाएँ एक झोंके की तरह आम के पेड़ों से टकराकर बह रही हैं। मैंने घड़ी देखी, सुबह के नौ बजने वाले हैं; लेकिन लग रहा है, दोपहर हो गई हो जैसे। जुलाई की सुबह कुछ देर बाद ही अपनी नरमाहट भूलकर उमस भरी चिपचिपी हो जाती है।
भोजनालय में पहुँचकर मैंने चारों तरफ एक नजर दौड़ाई - हरी क्यारियों और घने पेड़ों के बीच बाँस की फट्टियों को कलात्मक तरीके से जोड़कर दो-तीन छोटी-छोटी गुमटियाँ बनाई गई हैं। ग्राहकों के बैठने के लिए पेड़ों के नीचे गोल टेबल और कुर्सियाँ रखी हैं, वहीं पास में रंग- बिरंगे मटके बड़े करीने से सजे हैं। अभी-अभी हुए पानी के छिड़काव से मिट्टी की सोंधी महक उठ रही है, जो मुझे पीछे किसी याद में ले जाने को मचल रही है। यूँ इस जगह पर आकर मुझे तरो-ताजा और खुश महसूस करना चाहिए; किन्तु न जाने क्यों सब कुछ सूना-सूना और उदास लग रहा है।
मेरे आते ही एक युवक फुर्ती से मेरे पास आया और बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करते हुए मुझे एक टेबल की ओर ले गया। मैं इधर-उधर देखकर एक घने पेड़ की छाँव में बैठ गया। उस टेबल से दस कदम की दूरी पर बाँस से घिरी खुली रसोई है। चूल्हे के पास साठ-पैंसठ वर्ष की एक वृद्ध महिला गुमसुम बैठी है। वह इधर की ओर देख रही है। उसके आस-पास बड़े-बड़े भगोने ढके हुए रखे हैं। चूल्हे से कुछ दूरी पर एक कुर्सी-मेज लगी है। जहाँ एक वृद्ध बैठा है।
भोजनालय में भीड़ नहीं है। बस, एक दो परिवार दिखे, जो नाश्ता कर उठने वाले थे।
मेरे बैठते ही एक लड़का मेरा टेबल साफ कर पानी का जग और मेन्यू कार्ड रख गया। फिर वह युवक, जिसने बढ़कर मेरा स्वागत किया था, आया।
“बताएँ सर, क्या लेना पसंद करेंगे? रस्सा-पोहा, बटाटा बड़ा, दही पराठा ..? जो कहें आप … भोजन करने का मन हो, तो गर्मा- गर्म झुनका- भाखर भी तैयार मिलेगी।”
“नहीं, अभी भोजन का समय नहीं है, दही-पराठा लगवा दो। उधर ड्राइवर से पूछ लो, वह जो लेना चाहे …जल्दी बन तो जाएगा न?” मैंने घड़ी देखते हुए पूछा।
“जी सर, बस दस मिनट कहकर उसने महिला को आवाज लगाई - “फटाफट दो पराठे और दही भिजवा इस टेबल पर।”
वृद्ध महिला की उदास आँखें और उदास हो गईं। वह जलती लकड़ी को चूल्हे में सरकाकर आटे की लोइयाँ बनाने लगी। कुछ दूर पर बैठे वृद्ध के चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी छा गई। मेरा मन द्रवित हुआ- इस उमर में नौकरी! मजबूरी होगी !
युवक की आवाज जारी है- जल्दी कर माँ! एक बन जाए तो थाली लगाकर दे। फिर दूसरा सेंकती रहना। फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला –“सर, एक के बाद एक गरम-गरम मिलता जाएगा आपको …चूल्हे का करारा सिका पराठा .. मजा आ जाएगा आपको।”
उस महिला के लिए युवक का ‘माँ’ संबोधन सुन मुझे अच्छा लगा। मैंने सोचा– युवक बुजुर्गों का आदर करना जानता है। मेरे पास से हटते ही उसने फिर से महिला को आवाज लगाई – “जल्दी भेज इस टेबल पर नाश्ता … अभी तक सिका नहीं ?”
महिला पराठा रखने के लिए प्लेट उठा रही थी। लड़के के बोलते ही न जाने कैसे उसके हाथ से प्लेट छूटकर गिर गई। लड़का चिल्लाया– क्या कर रही है …? सवेरे-सवेरे ही तेरे हाथ से बरतन छूट रहे हैं ? झूमते हुए काम करती है क्या, जल्दी ला।”
युवक के लिए थोड़ी देर पहले मेरे मन में उपजे विचार तिरोहित हो गए। मैं उस महिला को देखने लगा। प्लेट में दही-पराठा, अचार सजा कर महिला घुटने पर हाथ रख उठी और धीरे-धीरे चलते हुए प्लेट मेरी टेबल पर रख गई। मैं नाश्ता करने लगा। पराठा वाकई स्वादिष्ट बना है। खाते-खाते मेरी निगाहें पराठा सेंकती महिला पर ठिठकती रहीं। चूल्हे की आँच के सामने लाल हुए झुलसे चेहरे की कसक लिये महिला तल्लीनता से पराठा बेलने, सेंकने में जुटी है और एक-एक कर टेबल पर पहुँचाए भी जा रही है।
नाश्ता हो जाने के बाद जब वह प्लेट उठाने आई तब मैंने पराठे के स्वाद का बखान कर दिया। वह कुछ झेंपी, हिचकिचाई, फिर प्लेट उठाकर चली गई।
युवक बिल लेकर मेरी टेबल पर आया। आत्मविश्वास से भरी उसकी आँखें चमक रही हैं। उसने पूछा, “सर पराठा अच्छा लगा न ?”
“हाँ यार, बहुत स्वादिष्ट थे पराठे … माता जी के हाथों में जादू है … पर इस उम्र में नौकरी ..?”
“ नहीं सर, नौकरी नहीं … ये मेरी माँ हैं। और उधर जो कुर्सी पर बैठे हैं, वे पिता हैं।”
मैं अवाक्, बस “अच्छा” कह पाया। ये इसके माता पिता हैं…. फिर भी…! मेरी आवाज घुटकर रह गई।
“हाँ सर, ये दोनों घर में बैठे बोर होते रहते थे। कुछ काम धंधा नहीं था इनके पास, घर के लोग भी दिन भर वही-वही चेहरा देख देखकर बोर होते थे … बस बैठा दिया यहाँ।” कहते हुए लड़का किसी रहस्य- सा मुस्कराया, फिर आगे बोला – अब यहाँ दिनभर लोगों के बीच में मन लगा रहता है इनका। एक बाई भी है, आज छुट्टी पर है। दोनों मिलकर सम्हाल लेते हैं …आप तो देख रहे हैं, एक लड़का भी रखा है … आराम से हो जाता है सब।” युवक माँ-बाप की उम्र, थकान, निराशा को न सुनना चाहता है, न सोचना। महिला खामोश हो हमारी बातों को सुन रही है।
“ये जगह तुम्हारी है या किराये पर लिये हो?” मैंने बात बदलने की कोशिश की।
“मेरी खुद की है। बाबा (पिता) ने खरीदा था। हाइवे पर है, तो ख्याल आया कि यहाँ ढाबा शुरू कर दिया जाए, तो अच्छी कमाई होगी।”
“वो तो ठीक है, पर एक कुक रख लो यार, माता जी चूल्हे के सामने … थक जाती होंगी। अब इनके आराम के दिन हैं।” न जाने कैसे मेरे भीतर उमड़ता गुबार बाहर आ गया।
“कुक रखने के बाद तो हमारा ढाबा भी अन्य ढाबों जैसा ही हो जाएगा न सर,... अभी यहाँ घर जैसा खाना मिलता है; इसलिए लोग आते हैं। पैसा भी तो बच जाता है सर। और इनके थकान की बात तो निकाल ही दीजिए मन से। ये खेत में काम करने वाली हड्डियाँ हैं। हम लोग थक जाते हैं सर, पर ये नहीं।”
मेरी नजरें फिर से उन दोनों से जा टकराई, जो बेटे की बातों को सुनते हुए उन्हें हजम करने को मजबूर दिखीं।
बिल अदा कर मैं बाहर निकल आया । मेरी गाड़ी नागपुर की ओर आगे बढ़ रही है और मन उस ढाबे में अटक गया है। बहुत देर तक वे उदास आँखें मेरा पीछा करती रहीं। ■
सम्पर्कः कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र, ashapandey286@gmail.com



No comments:
Post a Comment