- डॉ. कनक लता मिश्रा
निःशब्द हूँ,
नहीं बटोर पाऊँ
वो विस्तृत, वृहद्, सुखद एहसास शब्दों में
नहीं गूथ पाऊँ उन्हें वर्णों की माला में
कोई प्रतिशब्द भी नहीं जो बयाँ कर सके
वो प्रथम स्पर्श
वो पुलकित, आह्लादित क्षण
एक स्वप्न
जो प्रत्यक्ष है
वास्तविक रूप धारण किए हुए है
एक अनुभूति
जो सर्वविदित है
सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है
पर मेरे लिए?
बिल्कुल नया
किन शब्दों में व्यक्त करूँ
उन आत्म विभोर भावों को
जो उमड़ पड़े
उस कृति को देखकर
अद्भुत शोभा युक्त
शाख पर फूटती नवकोपलों के समान कोमल
अनछुई- सी कृति
मेरी ही देह का एक अंश
जो परत दर परत निर्मित हुई
मेरी ही कोख में
किस तरह शब्दों में समाहित करूँ
उस मनःस्थिति को
जिसमें मैं, हूँ गौरान्वित
महसूस कर रही, हूँ सृजन का गौरव
अति साधारण, हूँ
पर महसूस कर पा रही, हूँ
सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने का गौरव
अनुभवविहीन हो रहे हैं शब्द मेरे
उन भावों को व्यक्त करने में
जिनमें मैं विशिष्ट, हूँ
सर्वोपरि, हूँ
उस नन्हे- से जीव की आँखों में
उसकी जरूरतों में
कहाँ से लाऊँ शब्दों में वो सामर्थ्य
जो परिमाण कर सके उस प्रचंड शक्ति को
जो मुझमें कभी थी ही नहीं
जाने कहाँ से आ गई
जिससे मैं बनी
ढाल
कवच
अपने उस नन्हे- से अंश के
दुखों की
आघातों की
सम्पूर्ण जीवन की......
■

No comments:
Post a Comment