मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 1, 2026

उदंती.com, फरवरी - 2026

वर्ष- 18, अंक - 7

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी... - डॉ. रत्ना वर्मा

ललित निबंधः वसंत...वसंत...कहाँ हो तुम... - डॉ. महेश परिमल

आलेखः छाप तिलक सब छीनी... - डॉ. सुशीला ओझा 

लघु लेखः प्यार एक दिन के उत्सव का नाम नहीं - डॉ. योगिता जोशी

दोहेः ऋतु वासंती - कमल कपूर

संस्मरणः प्रेमिल पिंकी - निर्देश निधि

प्रेरकः पिंजरे का संगीत और पहाड़ की गूँज - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

कुंडलिया छंदः प्रहरी रक्षक देश के - परमजीत कौर ‘रीत’

प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं? - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कविताः आँखों में खिलते बसंत के फूल - अंजू निगम

शख्सियतः पर्यावरणविद वैज्ञानिक माधव गाडगिल - संकेत राउत

कविताः बीते हुए बसंत की याद में - सांत्वना श्रीकान्त

कविता: ढाई आखर - विजय जोशी

आलेखः प्रभावशाली बनना है तो दूसरों को महत्त्व दीजिए - सीताराम गुप्ता

यादेंः मुझसे ईश्वर ने  बुलवाया - राजनन्दिनी राजपूत

लघुकथाः ख़ुदा ख़ैर करे - छवि निगम   

बाल डायरी के अंशः सुबह हंस रही थी - डॉ. पद्मजा शर्मा

लघुकथाः उन सुनहरे दिनों की तरह - सन्तोष सुपेकर

कहानीः कद्रदान - गंभीर सिंह पालनी

व्यंग्यः नेताओं का शृंगार हैं चमचे - रेखा शाह आरबी

किताबेंः इतिहास के हाशिये से उठती एक चेतना - डॉ. पूनम चौधरी 

कविताः कविता करने के लिए... -  डॉ. रमाकांत गुप्‍ता

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

महाराष्ट्र के लातूर ज़िले में हाल ही में संपन्न हुई एक शादी ने समाज को ठहरकर सोचने का अवसर दिया है। यह अवसर किसी भव्य आयोजन या असाधारण खर्च के कारण नहीं, बल्कि सादगी और सामाजिक चेतना के कारण सामने आया है ।

परभणी निवासी इंजीनियर शेखर माधव शेजुल और ऋतुजा शिंदे ने अपने विवाह को सादगी और अर्थपूर्ण मूल्यों के साथ सम्पन्न कर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। केवल 25 करीबी परिजनों की उपस्थिति में, बिना किसी तामझाम के, उनका यह विवाह एक मंदिर में सम्पन्न हुआ।

दरअसल इस विवाह की चर्चा हम सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि यह सादगी से सम्पन्न हुआ है, बल्कि इसलिए कर रहे हैं; क्योंकि इस शादी में खर्च होने वाले दस लाख रुपये उन्होंने अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय में आधुनिक कंप्यूटर कक्ष की स्थापना के लिए दे दिए, ताकि ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जा सके। 

एक सार्थक और सराहनीय कदम इन्होंने उठाया है, तो उल्लेखनीय तो है ही, क्योंकि देखा तो यही जाता है कि इन दिनों वे शादियाँ ही मीडिया में अधिक चर्चा का विषय बनती हैं, जो भव्य और खर्चीली होती हैं, जबकि यहाँ तो शादी में खर्च होने वाली राशि को भी उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उपयोगी बना दिया। 

इन दिनों देखा यही जा रहा है कि आज के समय में शादियाँ धीरे-धीरे संस्कार से अधिक प्रदर्शन का रूप लेती जा रही हैं और वे पवित्र संस्कार जैसे- हल्दी, मेहंदी, सप्तपदी जो सब घरेलू आँगनों में लोकगीतों और ढोलक- मंजीरे के साथ पारिवारिक सहभागिता के साथ संपन्न होती थीं, वे अब इवेंट मैनेजमेंट के माध्यम से भव्य रिसॉर्ट्स और डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में आयोजित की जाती हैं तथा बाज़ार और दिखावे का माध्यम बनकर महँगे और भव्य आयोजनों में बदल गई हैं। 

इस बदलाव को बढ़ावा देने में उन शादियों की भी बड़ी भूमिका है, जहाँ पैसे का मोल गौण हो जाता है - चाहे वह उद्योग जगत के बड़े नाम हों या फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध। जब इस प्रकार होने वाली करोड़ों की शादियाँ सार्वजनिक रूप से भव्यता के साथ प्रस्तुत की जाती हैं, तो समाज के एक वर्ग भी उसी होड़ में शामिल हो जाता है। परिणाम यह होता है कि अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके वे भी अपनी शादियों को दिखावे की शादी में बदल देते हैं। यहाँ तक कि अब तो देखा- देखी पैसे के बल पर फ़िल्मी सितारों  और नामी- गिरामी गायकों और कलाकारों को शादी में आमंत्रित करने लगे हैं। 

शादियों के इस भव्य माहैल में शेखर माधव और ऋतुजा शिंदे की यह शादी कोई आंदोलन नहीं है; लेकिन सादगी से की गई उनकी शादी और उस पैसे का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका सहयोग यह अवश्य बताती है कि खुशी पैसे खर्च करने से नहीं, सोच से बनती है। और जब सोच बदलती है, तो एक शादी केवल रस्म नहीं रहती - वह समाज के लिए दिशा संकेत भी बन जाती है।

 बस दुख तब होता है जब ऐसे नेक उदाहरण से बहुत कम लोग सीख लेते हैं। ऐसे नेक कदम की सराहना तो हर कोई करता है; पर अमल करना नहीं चाहते। यह सवाल अक्सर अभिभावकों के सामने रखा भी जाता है कि इतनी फिज़ूलखर्ची क्यों - तो वे यह कहते हुए सामने वाले का मुँह बंद कर देते हैं कि मेरा इकलौता बेटा या बेटी है और शादी कौन रोज- रोज होती है, एक बार खुशियाँ मना लेने दो। या फिर यह भी कि बच्चे चाहते हैं कि उनकी शादी यादगार बने या सब उनकी भव्य शादी को याद रखें। आज के डिजीटल युग में युवाओं की सोच भी बदलती दिखाई देती है – वे अपनी काबिलियत पर धन अर्जित कर रहे हैं तो उन्हें खर्च भी उसी अंदाज में करने की इच्छा रखते हैं। 

समाज में अक्सर ऐसी फ़िज़ूलखर्च के विरुद्ध बातें तो होती हैं, कई सामाजिक आयोजनों में प्री- वेडिंग जैसे समारोह पर रोक लगाने की बात भी हुई है; पर एक दो उदाहरण को छोड़ व्यवहार में बदलाव कम ही दिखाई पड़ता है। कारण यही है कि आज दिखावे को सामाजिक सम्मान से जोड़ कर देखा जाने लगा है।  

आज ज़रूरत इस बात की है कि माधव शेजुल और ऋतुजा ने जिस सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व का रास्ता चुनते हुए विवाह किया है, उनके इन प्रयासों की सामाजिक मंचों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए। उन्हें केवल सराहना ही नहीं, सम्मान भी मिलना चाहिए। आज का सोशल मीडिया यदि चाहे तो दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाय ऐसे सकारात्मक उदाहरणों को व्यापक रूप से समाज तक पहुँचा सकता है। सही उदाहरणों को साझा करना, उन्हें चर्चा का विषय बनाना और उनसे प्रेरणा लेना - यही डिजिटल युग की वास्तविक शक्ति और सकारात्मक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव बन सकती है। 

तो आइए हम और आप मिलकर इस नींव को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाएँ और विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भव्यता और दिखावे की संस्कृति से दूर रखते हुए इस पवित्र रिश्ते को समाज के उत्थान से जोड़ते हुए कुछ नेक काम भी करते जाएँ। 

ललित निबंधः वसंत...वसंत...कहाँ हो तुम...

 - डॉ. महेश परिमल

अभी तो पूरे देश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। लगता है इस बार वसंत जल्‍दी आ गया। बस कुछ ही दिनों की बात है, जब हमें लगेगा कि हवाओं में एक अजीब सी मादकता है। मन में उमंगें कुलाँचे मार रही है। कुछ नया करने की इच्‍छा हो रही है। तब समझो, हमारे द्वार पर वसंत ने दस्‍तक दे दी है। इसे ही दूसरे रूप में हम कह सकते हैं कि अभी-अभी ठंड ने गर्मी का चुम्बन लिया है.. समझ लो बस वसंत आने वाला है।

 पर वसंत है कहाँ? वह तो खो गया है, सीमेंट और कांक्रीट के जंगल में। अब प्रकृति के रंग भी बदलने लगे हैं। लोग तो और भी तेज़ी से बदलने लगे हैं। अब तो उन्हें वसंत के आगमन का नहीं, बल्कि ‘वेलेंटाइन डे’ का इंतजार रहता है। उन्हें तो पता ही नहीं चलता कि वसंत कब आया और कब गया। उनके लिए तो वसंत आज भी खोया हुआ है। कहाँ खो गया है वसंत? क्या सचमुच खो गया है, तो हम क्यों उसके खोने पर आँसू बहा रहे हैं, क्या उसे ढूँढ़ने नहीं जा सकते। क्या पता हमें वह मिल ही जाए? न भी मिले, तो क्या, कुछ देर तक प्रकृति के साथ रह लेंगे, उसे भी निहार लेंगे, अब वक्त ही कहाँ मिलता है, प्रकृति के संग रहने का। तो चलते हैं, वसंत को तलाशने। सबसे पहले तो यह जान लें कि हमें किसकी तलाश है? ‘मोस्ट वांटेड’ चेहरे भी आजकल अच्छे से याद रखने पड़ते हैं। तो फिर यह तो हमारा प्यारा वसंत है, जो इसके पहले हर साल हमारे शहर ही नहीं, हमारे देश में आता था। इस बार समझ नहीं आता कि अभी तक क्यों नहीं आया, ये वसंत। आपने कभी देखा है हमारे वसंत को? आपको भी याद नहीं। अब कैसे करें उसकी पहचान। कोई बताए भला, कैसा होता है, यह वसंत? क्या मिट्टी की गाड़ी की नायिका वसंतसेना की तरह प्राचीन नायिका है या आज की बिपाशा बसु या मल्लिका शेरावत की तरह है। कोई बता दे भला। चलो उन बुज़ुर्ग से पूछते हैं, शायद वे बता पाएँ। अरे.. यह तो कहते हैं कि मेरे जीवन का वसंत तो तब ही चला गया, जब उसे उसके बेटों ने धक्के देकर घर से निकाल दिया। ये क्या बताएँगे, इनके जीवन का वसंत तो चला गया। चलो उस वसंत भाई से पूछते हैं, आखिर कुछ सोच-समझकर ही रखा होगा माता-पिता ने उनका नाम। लो ये भी गए काम से, ये तो घड़ीसाज वसंत भाई निकले, जो कहते हैं कि जब से इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ बाज़ार में आई हैं, इनका तो वसंत ही चला गया। अब क्या करें। चलो इस वसंत विहार सोसायटी में चलते हैं, यहाँ तो मिलना ही चाहिए हमारे वसंत को। कांक्रीट के इस जंगल के कोलाहल में बदबूदार गटर, धुआँ-धूल और कचरों का ढेर है, यहाँ कहाँ मिलेगा हमारा वसंत। यहाँ तो केवल शोर है, बस शोर। भागो यहाँ से.. ये आ रहीं हैं वासंती- ये जरूर बताएगी वसंत के बारे में। लो इनकी भी शिकायत है कि जब से लोगों के घरों में कपड़े धोने की मशीन और वैक्यूम क्लीनर आ गया है, हमारा तो वसंत चला ही गया। अब कहाँ मिलेगा हमें हमारा वसंत? चलो हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. प्रेम त्रिपाठी से पूछते हैं, वे तो उसका हुलिया बता ही देंगे। लो ये तो शुरू हो गए, वह भ्रमर का गुंजन, वह कोयल की कूक, वह शरीर की सुडौलता, वह कमर का कसाव, वह विरही प्रियतम और उन्माद में डूबी प्रेयसी, वह घटादार वृक्ष और महकते फूलों के गुच्छे, वह बहते झरने और गीत गाती लहरें, वह छलकते रंग और आनंद का मौसम, बस मन मयूर हो उठता है और मैं झूमने लगता हूँ।

हो गई ना दुविधा। इन्होंने तो हमारे वसंत का ऐसा वर्णन किया कि हम यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि वसंत को किस रूप में देखें? सब गड्ड-मड्ड कर दिया त्रिपाठी सर ने। चलो अँगरेज़ी साहित्य के लेक्चरर यजदानी सर से पूछते हैं, शायद उनका वसंत हमारे वसंत से मेल खाता हो? अरे ये सर तो उसे ‘स्प्रिंग सीजन’ बता रहे हैं। कहाँ मिलेगा यह ‘स्प्रिंग सीजन’? थक गए भाई, थोड़ी चाय पी लें, तब आगे बढ़ें। अरे इस होटल के ‘मीनू’ में किसी ‘स्प्रिंग रोल्स’ का ज़िक्र है, शायद उसी में हमें दिख जाए वसंत। गए काम से! ये तो नूडल्स हैं। क्या इसे ही कहते हैं वसंत?

अब तो हार गए,  इस वसंत महाशय को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते। न जाने कहाँ, किस रूप में होगा ये वसंत। हम तो नई पीढ़ी के हैं, हमें तो मालूम ही नहीं है, कैसा होता है यह वसंत। वसंत को पद्माकर ने देखा है और केशवदास ने भी। कैसे दिख गया इन्हें बगरो वसंत? कहाँ देख लिया इन्होंने इस वसंत महाशय को? अब नहीं रहा जाता हमसे, हम तो थक गए। ये तो नहीं मिले, अलबत्ता पाँव की जकड़न जरूर वसंत की परिभाषा बता देगी। अचानक भीतर से आवाज़ आई, लगा कहीं दूर से कोई कह रहा है..

कौन कहता है कि वसंत खो गया है, मेरे साथ आओ, तुम्हें तरह-तरह के वसंत से परिचय कराता हूँ। ये देखो कॉलेज कैम्पस। यहाँ जुगनुओं की तरह यौवन का मेला लगा है। मैं पूछता हूँ- क्या ये सभी प्रकृति के पुष्प नहीं हैं? इन्हें भी वसंत के मस्त झोकों ने अभी-अभी आकर छुआ है। यौवन का वसंत। इसकी छुअन मात्र से इनके चेहरे पर निखार आ गया है। देख रहे हो इनकी अदाएँ, ये शोखी, ये चंचलता? वसंत केवल पहाड़ों, झरनों और बागों में ही आता है, ऐसा किसने कहा? कभी भरी दोपहरी में किसी फिल्म का शो खत्म होने पर सिनेमाघर के आसपास का नजारा देखा है? वहाँ तो वसंत होता ही है, स्नेक्स खाते हुए, भुट्टे खाते हुए, चाट खाते हुए, पेस्ट्री खाते हुए। मालूम है, नहीं भाया वसंत का यह रूप आपको। तो चलो, स्कूल की छुट्टी होने वाली है, वहाँ दिखाता हूँ आपको वसंत, देखोगे तो दंग रह जाओगे, वसंत का यह रूप देखकर। वो देखो.. छुट्टी की घंटी बजी और टूट पड़ा सब्र का बाँध। कैसा भागा आ रहा है यह मासूम और अल्हड़ बचपन। पीठ पर बस्ता लिये ये बच्चे जब सड़क पर चलते हैं, तब पूरी की पूरी सड़क एक बगीचा नजर आती है और हर बच्चा एक फूल। क्या इन फूलों पर नहीं दिखता आपको वसंत?

कभी किसी ग्रीटिंग कार्ड की दुकान पर खड़े होकर देखा है, इठलाती युवतियाँ हमेशा सुंदर फूलों, बाग-बगीचों और हरियाली वाले कार्ड ही पसंद करती हैं। ऐसा नहीं लगता है कि इनके भीतर भी कोई वसंत है, जो इस पसंद के रूप में बाहर आ रहा है। ऐश्वर्यशाली लोगों के घरों में तो वाल पेंटिंग के रूप में हरियाला वसंत पूरी मादकता के साथ लहकता रहता है। ये सारे तथ्य बताते हैं कि वसंत है, यहीं कहीं है, हमारे भीतर है, हम सबके भीतर है, बस ज़रा-सा दुबक गया है और हमारी आँखों से ओझल हो गया है। अगर हम अपने भीतर इस वसंत को ढूँढ़े, तो उसे देखते ही आप अनायास ही कह उठेंगे- हाँ यही है वसंत, जिसे मैं और आप न जाने कब से ढूँढ़ रहे थे। वसंत जीवन का संगीत है, ताज़गी की चहक और सौंदर्य की खनक है, परिवर्तन की पुकार और रंग उल्लास का साक्षात्कार है। जहाँ कहीं ऐसी अनुभूति होती है, वसंत वहीं है। वसंत कहीं नहीं खोया है। मेरे और आपके अंदर समाया वसंत अभी भी अपना उजाला, ताज़गी, सौंदर्य पूरी ऊर्जा के साथ चारों ओर फैला रहा है। बस खो गई है वसंत को परखने वाली हमारी नज़र। अब तो मिल गया ना हमारे ही भीतर हमारा वसंत। तो विचारों को भी यहीं मिलता है बस अंत। ■

आलेखः छाप तिलक सब छीनी...

 - डॉ. सुशीला ओझा 

आकाश की अनंतता, सागर की विशालता अलौकिक है। आकाश में तारे टिमटिमाते हैं, सागर की गोद में अथाह रत्न भरे हैं। विचित्र है आकाश और पाताल का मर्म.. जब कोई इसमें उतरने की कोशिश करता है, साधना, आराधना, उपासना की सीढ़ियों से नीचे उतरता है तो कितना उज्ज्वल, भव्य, दिव्य तीर्थस्थल को पाता है। और मन....मन तो मंदिर हो जाता है- 

"छाप तिलक सब छिन जाता है।" किनारे पायदान की तरह होते हैं। भावनाओं, इच्छाओं की धूल, छाप, तिलक पायदान में सिमट जाते हैं। नवकंजलोचन की पंखुड़ियों में नील नलिन प्रतिष्ठित हो जाता है। नील सरोवर में नील नलिन की पंखुड़ियाँ खुलती हैं। और एक महारास की रचना होती है, एक अवर्णनीय रूप। नील नलिन का अद्भुत रूप सौन्दर्य, सागर में शेष-शय्या पर लेटे उस सुनील वर्ण से जब आँखें लग जाती हैं, तो "छाप तिलक सब छिनी"- पता नहीं वह बाहरी आवरण कहाँ खो जाता है! उसका खोना ही समर्पण है, विराटता का अमूल्य धरोहर है। ये नवकंज पंखुड़ियाँ भी बड़ी विचित्र हैं! कैसे इन पंखुड़ियों में विराट को समेट लेती हैं! प्रवेश द्वार पर लिखा है- जप, माला, छापा, तिलक- सब का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। केवल उत्कृष्ट भावनाओं के पुष्प, ‌अगुरु, चंदन, मन के फूल ही डलिया में रखना है। जब नवकंज पंखुड़ियों पर नील नलिन विकसित होता है तो विष्णु के नाभि केन्द्र में रहता है। ब्रह्मा की सृष्टि वहीं से आरंभ होती है। यह नीरज नमित भाव से वंदना करता है। मृणालिनी विनम्रता से झुककर अर्घ्य निवेदित करती है। नयनों की कोठरी में नील नलिन से मिलना मन-ही-मन भावनाओं की सोलह हजार, एक सौ आठ ऋचाएँ- सब में विष्णु भाव की आभा झलकती है। राधा भाव उसमें निमग्न है। राधा पद्मा है, पद्मासना है, कमलासना है, लक्ष्मी स्वरूपा है, शक्ति स्वरूपा है, प्रकाशिनी है, आह्लादिनी है। लहरों के किनारों को स्पर्श करता वह रूप..अहा! काजल लगे किनारों पर चिपका वह अभूतपूर्व सौन्दर्य! सखि! रख लो ये अपनी छाप तिलक। मैं रीझ गई। इसके नयन द्वार तक ही इसकी आवश्यकता थी। नील सागर की गहराई में तो अनंत रत्न हैं। मैं समेट रही हूँ, अँजुरी भर रही हूँ, छलक रहा है रत्न। मैंने सोचा उसे कोमल, मनोरम, मखमली तिजोरी में रख दूँ। तिजोरी में विशालता है, गहराई है, सब कुछ रखने की क्षमता है। अरे सखि! उस सुनील वर्ण का बिम्ब फल जैसे होठों की लालिमा, उस पर बाँसुरी का अनुपम स्वर! राधा का प्रज्वलित सौंदर्य, बिजली-सी चमक, उस गौरवर्ण की गरिमा में धुल जाती है और आँखों की सारी कालिमा भी। और तुम तो ठहरे छलिया! नटवर नागर! मेरे मन को, अपने नृत्य में पाँव की घुँघरु बना देते हो। हृदय की तिजोरी के द्वार पर तुम्हारी मूर्ति है। नील रंग, पीताम्बर लपेटे हुए, लाल होठों पर वह हरी बाँसुरी, वह पोंगी बाँसुरी- केवल उनके स्पर्श की प्रतीक्षा में तिरछे नैन करके लेटी हुई रहती है। 

वह छलिया भी कितना नृत्य शिरोमणि है! सर्वदा नृत्य मुद्रा में रहता है। देखो ना सखि! कदंब के नीचे, काली धवरी गईयों पर त्रिभंगी मुद्रा में खड़ा है। अपने तो नीला है, पयस्विनी धार को कैसे पी रहा है! गजब का जादू है आँखों में! सम्मोहन शक्ति है। ये बाँसुरी, ये गइयाँ, ये मोर पंख, ये घुंघराली अलकें, ये त्रिभंगी मुद्रा- इसके समक्ष तिलक, छाप सब व्यर्थ है। उसकी विशालता के समक्ष मैंने फेंक दिया सखि! उन सारे बाह्यावरणों को। उन अँखियों के जादू में समर्पित कर दिया स्वयं के जीवन को। समर्पण और अधिकार का सामंजस्य ही तुम्हारा नीलत्व है। बाँसुरी को छूते हो तो मैं तुम्हारी रागिनी बन जाती हूँ। गइयों के गले की घंटियों में मैं ही हूँ। हे सुनील! तुम्हारी गहराई में मैं डूबती हूँ तो राधा बनकर निकलती हूँ। मीरा श्याम रंग में ऐसी डूबती है कि विष भी अमृत में परिवर्तित हो जाता है। ये तुम्हारी कैसी लीला है! तुम लीलामय हो! तुम्हारे स्वर में कितनी ऊँचाई है, कितनी गहराई है! तुम्हारे इस रूप ऐश्वर्य में कितनी अलौकिक क्षमता है जो मेरे लिए महौषधि है। छोड़ो इन बातों में कौन उलझे? मैं तो उलझ गई हूँ श्याम तुम्हारे नयनों में -

"कैसे मैं निकलूँ स्याम तेरे नयनों से,

मैं तो उलझ गई इन कटीली डारों में 

एक तो तुम्हारे सुनील वर्ण, उस पर काले मेघ-सी काजल,

बिजली-सी चमके पीत पट, बिम्ब फल पर बाँसुरिया

मैं तो उलझ गई तमाल बिरिछवा

छाप तिलक सब छिनी रे तोसे नैना मिलाई के!"

नहीं चाहिए मुझे छाप, तिलक.. मैं शाश्वतता के रंग में रंग गई हूँ-

"श्याम की छाप बसी हिय द्वारे, पीत झंगुलिया नयन बीच चमके, 

दसन चमके बिजुरिया, राधा श्याम संग मिल गई।"

"ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।" 

सखि! यह कौन सा श्याम रसायन है जिसमें डूबकर ही तीर्थत्व की प्राप्ति होती है!

अमीर खुसरो ने भी इस अद्भुत रूप का दर्शन किया है। उनकी आँखों में वह माधुर्य, लावण्य- निधि समाहित हो गई है। पूर्ण समर्पित होकर ही तो छाप तिलक को देह के पायदान पर छोड़ दिया है। कितनी अगाध भक्ति है! कितना समर्पण भाव है! उस श्याम रसायन में! रागात्मक चेतना शब्दों के प्याले से छलकते हैं और आँखें कैनवास बन जाती हैं। उसमें श्याम की मूर्ति ‌उत्कीर्ण होने लगती है इसलिए तो छाप, तिलक को दरवाजे पर फेंकने को विवश हो जाते हैं - "छाप तिलक सब छिनी रे, तोसे नयना मिलाई के।"

रसखान भी तो उलझते जा रहे हैं इस रूप माधुर्य पर। वे तो ब्रज भूमि पर स्वयं को समर्पित कर देते हैं। अधिकार और समर्पण का अनूठा संगम -

"मानुष हौं तो वही रसखान< बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" मनुष्य, पशु किसी भी रूप में वे ब्रज में ही जन्म लेना चाहते हैं। ‌उनको समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सी अलौकिक छवि है जिससे देवता भी पार नहीं पाते और वह अहीर की छोरियों के बीच नाचता रहता है -

"ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरी छाछ पर नाच 

नचावत।" 

‌जिसको अनादि, अनंत, अछेद, अभेद कहा जाता है उसे माटी से कितना प्रेम है। वे दामोदर तो माटी खाकर ऊखली में बँधने को भी कितने आतुर हो जाते हैं।■

सम्पर्कः पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, माहेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार 

लघु लेखः प्यार एक दिन के उत्सव का नाम नहीं

 - डॉ. योगिता जोशी

प्रेम और उसकी प्रासंगिकता सिर्फ एक विशेष दिन पर ही सीमित नहीं हो सकती। यह जीवन का एक अदृश्य रंग है, जो समय के साथ बढ़ता है और हमारी दिनचर्या को अपनी भावनाओं से भर देता है। प्रेम एक दिन की विशेषता नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है, जिसमें साझा किए जाने वाले क्षण हमें आनंद और संतुष्टि में डालते हैं। प्रेम का अर्थ सिर्फ रोमांटिक रिलेशनशिप में ही नहीं होता, बल्कि यह दो लोगों के बीच संबंधों के विभिन्न पहलुओं को समाहित करने का एक व्यापक शब्द है। यह दोस्ती, परिवार और समाज में भी मौजूद हो सकता है। प्रेम एक अनुभव है जो हमें आत्मा के सबसे गहरे कोनों में ले जाता है और हमें अपने चारों ओर के लोगों के प्रति सहानुभूति और समर्पण की भावना देता है। वेलेंटाइन डे एक मौका है, जब हम अपने प्रियजनों के साथ अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं, लेकिन यह केवल एक दिन नहीं, बल्कि हमें हर दिन अपने आस-पास के लोगों के साथ संबंध बनाए रखने का मौका देने का प्रेरणा स्रोत बन सकता है। प्रेम की प्रासंगिकता बनी रहे, इस के लिए सतत प्रयासशील रहना चाहिए, ताकि हम समृद्धि, समर्थन, और समर्पण से भरे रहें।

प्रेम को एक दिन में सीमित नहीं किया जा सकता है। वेलेंटाइन डे के माध्यम से अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सुखद और मनोहर तो होता है; लेकिन यह सिर्फ एक दिन के लिए ही सीमित नहीं रहता। प्रेम का अर्थ है, समर्पण, समझदारी, और साझा करना, जो दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपनी विशेषता बनता है। प्रेम एक गहरा और स्थायी बंधन है जो अधिकांश समय धीरे-धीरे बनता है। यह वेलेंटाइन डे का मोहताज नहीं, इसके बाहर भी अपनी मिठास बनाए रखता है।

प्रेम और प्रेम की प्रासंगिकता एक बहुमूल्य और समृद्धि से भरपूर भावना है, जो सिर्फ एक विशेष दिन के लिए नहीं हो सकती। जब कही प्रेम होता है तो उसमें न उम्र की सीमा होती है और न दूरियाँ मायने रखती हैं। प्रेम का अर्थ समर्पण, समर्थन, और साझा जीवन है। यह सिर्फ एक ही दिन में नहीं, बल्कि हर दिन, हर क्षण में महसूस किया जा सकता है। प्रेम की प्रासंगिकता व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर हर क्षण में मौजूद हो सकती है, जो व्यक्ति को अपने साथी के साथ मजबूत और सुरक्षित महसूस कराती है। अच्छे संबंध और प्रेम न केवल एक दिन, बल्कि पूरे जीवन के लिए होते हैं, जो साझा जीवन, समर्थन, और समर्पण की ऊँचाइयों तक जा सकते हैं। इसलिए, व्यक्ति को हमेशा चाहिए कि वह अपने प्रेम को सदैव महसूस करे, न कि किसी एक दिन के माध्यम से। सच्चा प्रेम कालजयी होता है। ■

सम्पर्कः 16-Hanuman Nagar, Dadi ka phatak , Benad road, Jhotwara. Jaipur-302012, Jaipur-  Rajasthan., Mobile: 8112215802


दोहेः ऋतु वासंती

  - कमल कपूर

पीत पाग जब पहनके, आए संत बसंत ।

धरा कहे कर जोड़के, आओ रति के कंत ।।

 

सौरभ की गगरी उठा, भर आँचल में फूल।

मधु-ऋतु जब पैदल चली, उड़ी बसंती धूल।।

 

मधुबन में है आ खड़ी, मधुर बसंत-बहार।

घूँघट के पट खोलके, कलियाँ रहीं निहार।।

 

बारिश और बसंत का, बड़ा अनोखा मेल।

बगिया के हर फूल से, खेले बरखा खेल।।

 

वासंती ऋतु ने किया, आज अनोखा काम।

सारा गुलशन लिख दिया, अलि तितली के नाम।।

 

आते ही ऋतुराज के, धरा बदलती रूप।

बरसाते रविराज भी, चटक बसंती धूप।।

 

पर्णहीन हर पेड़ पे, उगती मीठी आस।

हरित पात लाकर खड़ा, फिर से यह मधुमास ।। 

 

आते ही ऋतुराज के, हुलस उठे सब बाग।

कोयल बुलबुल गा रहीं, मधुर मिलन के राग।।

 

वसन वसंती धारके, आए जब ऋतु-भूप।

धरती ने धारण किया, नूतन एक स्वरूप।।

 

आते ही मधुमास के, खुले भाव के बंध।

कलमकार लिखने लगे, कविता और निबंध।।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।

जब भारत के पटल ने, लिखा 'निराला' नाम।।

 

पाँचवीं तिथि बसंत की, मौसम था खुशहाल ।

'महा निराला' रूप में, मिला धरा को लाल ।।

 

थाती मधुर बसंत की, बचपन वाला गाँव।

हरे चने के खेत सब, अमलतास की छाँव।।

 

माँ रंगती थी चुन्नियाँ, घोल बसंती रंग।

बढ़ जाती थी चौगुनी, जी की मदिर उमंग।

 

माँ के चौके में पका, सर्वोत्तम पकवान।

पीले चावल गुड़- पगे, ऋतु बसंत की शान।

 

कली-कली इतरा रही, छूकर मुखर बयार।

ओढ़ बसंती ओढ़नी, इठलाए ज्यों नार।।

 

धरती-अंबर में घुला, शोख बसंती रंग।

मधुराज यहाँ रँग रहे, खुद को इनके संग।।

 

सरसों के खलिहान में, आया धीर बसंत ।

पीले चोले पहनके, घूम रहे ज्यों संत ।।

 

अभिनंदन मधुमास का, करें रेशमी पेड़।

छू फूलों की डालियाँ, हवा रही है छेड़।।

 

रंग-गगरिया थामके, आ पहुँचे ऋतुराज ।

कलियाँ सज़दे कर रहीं, हवा छेड़ती साज।।


संस्मरणः प्रेमिल पिंकी

 - निर्देश निधि

उन दिनों मेरा भतीजा गुड्डू, यानी  विजय सिंह अपने छोटे बेटे अक्षय के साथ नैनीताल में रहता था। उसका घर सैकड़ों बरस पूर्व कभी अंग्रेजों का अपने ऐश- ओ- आराम के लिए बनवाया हुआ घर है, जो एकबारगी देखने पर घने जंगल या बीहड़ में बना दिखाई देता है, दिखाई क्या देता है, है ही जंगल में। वह  न जाने कितने बरसों से बुला रहा था मुझे नैनीताल के सुरम्य वातावरण का आनंद लेने के लिए। पर हर बार कोई न कोई विवशता आ घेरती और मेरा वहाँ जाना रह जाता। उस बार छुट्टियों में उसकी पत्नी उषा भी देहरादून से आई हुई थी उसने भी आग्रह किया मुझे वहाँ जाकर कुछ दिनों रहने का, अतः उस बार मेरा जाना किसी तरह संभव हो गया।

पहाड़ पर जाकर भी सुबह देर तक सोते रहने के कोई मायने नहीं थे। वहाँ के स्थायी निवासियों के लिए तो वहाँ का हर सौन्दर्य रोज़मर्रा  की सामान्य सी बात थी अतः सुबह - सुबह उन्हें उठाकर परेशान ही करना था और कुछ नहीं। इसलिए वहाँ पहुँचकर एक दिन का आराम कर मैं सुबह - सुबह  उठकर पहाड़ों का सौन्दर्य निहारने अकेली ही चल पड़ी। पर थोड़ी दूर चलने के बाद मुझे आभास हुआ कि मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ हल्के पीले से रंग की एक सारमेयी यानी कुत्ती भी चल रही थी। हालाँकि उससे परिचय नहीं था मेरा पर उसका साथ आना मुझे सुखद लगा। मैं तेज़ चलती, वह भी तेज़ चलती, मैं धीरे चलती वह भी धीरे चलती, मैं रुकती तो वह भी रुक जाती, बार – बार ऐसा करके यह निश्चित कर रही थी कि वह मेरे साथ ही चल रही थी या नहीं। मैं पेड़ - पौधे देखने लगती तो वह खड़ी होकर इधर - उधर देख रही होती जैसे कह रही हो इन्हें आप देखो मेरे तो ये सब देखे हुए हैं। जब मैं पुनः चलती तो वह फिर मेरे साथ - साथ चल पड़ती।

शैशववस्था लिये सुबह की धूप में उसके हल्के पीले रेशमी रोएँ सोने की तरह चमक उठे। वह मुझे बेहद प्यारी लगी, उसपर बहुत लाड़ आ रहा था पर मेरे पास उसे खाने को देने के लिए कुछ नहीं था , सुबह - सुबह न पैसे ही थे, न कोई दुकान जिससे खरीदकर कोई बिस्कुट का पैकेट वगैरह उसे दिया जा सकता। परंतु वह खाने - पीने के  इस लालच से दूर मेरे साथ ऐसे चलती आ रही थी, जैसे वह मेरी गंभीर अभिभावक हो। मैं पहाड़ी चिड़ियों का मधुर कलरव सुनने, पहाड़ की चोटी में से फव्वारे सा रंग छिटकाता हुआ सा उगता लाल - लाल सूरज और उसपर पसर आया बदली का झीना सा आँचल देखने, आसमान का अद्भुत रूप निहारने, पहाड़ों पर उनके विघटन के विरुद्ध, उनकी रक्षा में मुस्तैद खड़े घने पेड़ों पर पड़ती नरमी लिये सूरज की किरणें देखने में देर तक मग्न रही। इतनी देर वह भी बिना विचलित - बेचैन हुए, चुपचाप मेरे साथ ही खड़ी रही। अपनी दृष्टि भर या क्षमता के अनुसार पहाड़ी सौन्दर्य को खुद में समेटकर जब मैं घर की ओर लौटने लगी तो वह भी मेरे साथ लौट आई। और गुड्डू के घर के आगे खुले वरांडे के दरवाजे पर आकर चुपचाप खड़ी हो गई। जैसे गुड्डू से कह रही हो कि, देखो मालिक मैं तुम्हारी बुआ जी को घुमा - फिरा कर सुरक्षित वापस ले आई हूँ और वह आकर वरांडे में  बैठ गई चुपचाप। । तब मुझे पता चला कि यह गुड्डू की परिचिता है। पर उसे सुबह - सुबह भ्रमण पर मेरे साथ जाने की ज़िम्मेदारी का अहसास कैसे हुआ यह आश्चर्य की बात थी। 

उन दिनों गुड्डू की पत्नी उषा भी नैनीताल में मेहमान की तरह ही आती थी। उनके बड़े बेटे अभय की शिक्षा देहरादून में हो रही थी; क्योंकि उसने नैनीताल आने के लिए साफ इंकार कर दिया और मैं तो थी ही सप्ताह भर की मेहमान । अतः मुझसे और उषा से उस सारमेयी ने कुछ नहीं माँगा; पर गुड्डू बिस्तर से उठा, तो वह भी उठकर खड़ी हो गई। और उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हल्की- सी आवाज़ में ‘कूँ’ की, वह भी बस एक बार। गुड्डू जैसे उसकी उस ‘कूँ’ का अर्थ जानता था। वह उठकर सबसे पहले रसोई में ही गया और एक गिलास में दूध लाकर उसकी बरामदे में रखी  कटोरी में डाल दिया। वह उसे पीकर एक दो बार गुड्डू के चारों तरफ चक्कर लगाकर घूमने चली गई। नाश्ते के समय वह फिर लौटी और आकर चुप चाप बैठ गई।

उषा मेरे लिए स्वादिष्ट  व्यंजन बना रही थी, मुझसे भी पहले गुड्डू उसे चखा रहा था। गुड्डू के भीतर यों भी संसार के हर प्राणी के लिए अथाह प्रेम भरा है, फिर वह तो स्वयं भी गुड्डू को बहुत प्रेम करती थी, तो उसका प्रत्युत्तर गुड्डू न देता, यह तो संभव ही न था। नाश्ता करके मैं कुमायूँ विश्वविद्यालय के पुस्तकालय जाने लगी, वह तब भी मेरे साथ गई और तीन घंटे बाद जब मैं वापस लौटी, तब भी मैंने उसे पुस्तकालय के बाहर बैठे पाया। वह फिर घर तक मेरे साथ आई। आकर फिर उसने उषा का दिया खाना खाया और घूमने चली गई। खाने - पीने  व मेरे साथ घूमने का यह उपक्रम उसका रोज़ ही चलता रहा। विशेष बात यह थी कि अगर मैं बाकी घरवालों के साथ जाती, तो वह मेरे साथ नहीं आती। अगर मैं अकेली कहीं जा रही होती, तो वह मेरे पीछे - पीछे लग जाती मेरे मार्ग दर्शक की तरह। जैसे उसे पता था कि मैं उसके शहर में एकदम नई थी और मेरे साथ चलना उसकी ज़िम्मेदारी थी। आखिर मैं उसके मालिक की बुआ जो थी। 

गुड्डू उस सारमेयी को प्रेम तो बहुत करता, हर चीज अपने साथ खिलाता- पिलाता भी पर उसे कोई नाम न देकर, पुकारता उसे कुत्ती ही। इस पर मैं और उषा बहुत हँसते। आखिर हमने उसे अकस्मात ही जिह्वा पर आ गया एक नाम दे दिया, ‘पिंकी’। आश्चर्य हुआ कि पहली बार ही पिंकी नाम से पुकारने पर वह ऐसे दौड़ी चली आई, जैसे इस नाम को वह जन्म से सुनती आ रही हो। अब वह मेरे साथ घूमने जाती तो, मैं उसे पिंकी ही पुकारती और वह अपने पुकारे जाने पर प्रत्युत्तर में तुरंत मेरी तरफ देखती और अपनी थोड़ी लंबी- सी, सुनहरी पूँछ हिला देती, और अपने नरम गुलाबी कान भी हिलाती ।

मेरा प्रवास नैनीताल में एक सप्ताह का रहा। मेरा घूमने जाने का क्रम सप्ताह भर लगभग चला ही पर अंतिम दिन पिंकी मेरा साथ देने के लिए नहीं आई, न गुड्डू के लाड़ प्यार से खिलाए गए व्यंजनों को खाने ही वह आई। सुबह जब मैं घूमकर लौटी, तो मैंने गुड्डू से कहा, गुड्डू आज तो पिंकी मेरे साथ घूमने गई ही नहीं। गुड्डू ने लापरवाही से कहा- कहीं चली गई होगी घूमने- घामने। आ जाएगी थोड़ी देर में, पर वह नहीं आई। मेरा पुत्र वरुण और पुत्रवधू शिल्पा मुझे साथ ले जाने आ चुके थे। उसी रात को मेरी वापसी थी। पूरा दिन पिंकी के आने की उत्सुकता- भरी प्रतीक्षा रही। उस दिन उसके सिवा और कोई बात ही न हुई घर में, ज़ोर - ज़ोर से पुकारा भी, पर वह नहीं आई। घर का काम काज निपटाकर जब मैं और उषा बाहर आए, तो पड़ोसन ने बताया कि रात बाघ आया था। कुत्ते बहुत बुरी तरह भौंके थे और थोड़ी देर बाद शांत हो गए। सब कुत्ते मौजूद थे एक पिंकी को छोड़कर। मैं उस रात ही लौट आई नैनीताल से। पर क्या पिंकी के बिना शर्त वाले अनकहे प्रेम को, उसके जिम्मेदारी भरे सानिध्य को, उसकी भूरी आँखों से छलक़ते अपनेपन को  कभी भुला पाऊँगी मैं...■

प्रेरकः पिंजरे का संगीत और पहाड़ की गूँज

  - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल 

एक राज्य में एक बहुत ही कुशल बाँसुरी वादक रहता था। उसके पास दो शिष्य थे— आर्यन और कबीर।

एक दिन गुरुजी ने दोनों को अलग-अलग काम सौंपे। उन्होंने आर्यन को राजमहल के एक भव्य कमरे में भेजा, जहाँ सोने का एक पिंजरा था। उस पिंजरे में एक दुर्लभ पक्षी था। आर्यन का काम था उस पक्षी को समय पर सबसे उत्तम फल खिलाना, रेशम के बिछौने पर सुलाना और उसे जंगली जानवरों से बचाकर सुरक्षित रखना।

दूसरी ओर, गुरुजी ने कबीर को अपने साथ एक ऊँचे और पथरीले पहाड़ पर चलने को कहा। वहाँ पहुँचकर गुरुजी ने एक जंगली पक्षी की ओर इशारा किया,  जो तेज़ हवाओं के बीच एक पेड़ की टहनी पर बैठा था।

एक महीने बाद, गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और पूछा, "तुमने क्या सीखा?"

आर्यन ने गर्व से कहा: "गुरुजी, राजमहल का वह पक्षी सबसे सुखी है। उसे न भोजन की चिंता है, न शिकारियों का डर। वह दिन भर बस आराम करता है। उसे वह सब प्राप्त है,  जो एक जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए चाहिए।"

गुरुजी मुस्कुराए और फिर कबीर की ओर देखा।

कबीर धीमे स्वर में बोला: "गुरुजी, मैंने उस पहाड़ी पक्षी को देखा। उसे भोजन के लिए मीलों उड़ना पड़ता है। कभी बारिश में भीगता है, तो कभी बाज से अपनी जान बचाता है। लेकिन, जब वह सूरज ढलते समय अपनी पूरी ताकत से चहकता है, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज होती है। वहीं जब मैं आर्यन के साथ उस महल वाले पक्षी को देखने गया, तो वह सोने के पिंजरे में बैठा सिर्फ फड़फड़ा रहा था। उसके पास सब कुछ था, पर उसकी आँखों में चमक नहीं थी।"

गुरुजी ने दोनों को पास बिठाया और कहा: "जीवन में दो तरह की शांति होती है। एक वह, जो 'दबाव और सुरक्षा' से आती है- जैसे महल का वह पक्षी। वहाँ तुम्हारी ज़रूरतें तो पूरी होंगी, लेकिन तुम्हारी आत्मा मर जाएगी।

दूसरी शांति वह है, जो 'चुनौतियों और स्वतंत्रता' से आती है। पहाड़ का वह पक्षी जोखिम उठाता है, लेकिन वह अपनी पूरी क्षमता से आकाश को नापता है। असली खुशी सुरक्षा में नहीं, बल्कि स्वयं को खोजने के संघर्ष में है।"

शिष्यों को समझ आ गया कि केवल पेट भरना और सुरक्षित रहना 'जीना' नहीं है। असल में खुश वही है, जिसके पास अपनी उड़ान के लिए खुला आसमान है। ■

मोबाइल- 7838090732

कुंडलिया छंदः प्रहरी रक्षक देश के

 - परमजीत कौर ‘रीत’

1.

सीमा पर तैनात वे, सजग रहें दिन रैन ।

प्रहरी रक्षक देश के, छीनें अरि का चैन ।।

छीनें अरि का चैन, चनें नाकों चबवाते ।

हिमगिरि रेगिस्थान, धूल ही उसे चटाते ।

नहीं दिखाते पीठ, संकटों से घबराकर ।

'रीत' नमन हर बार, डटे हैं जो सीमा पर ।।

2

धीरे-धीरे धीर धर, बनता है विश्वास ।

अनजाने अपने बनें, रिश्ते जुड़ते पास ।।

रिश्ते जुड़ते पास, खजाना बढ़ता जाता ।

शुभचिंतक यदि साथ,दु:ख फिर नहीं सताता ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, मित्र यदि सच्चे हीरे ।

बन जाये अनमोल, मुद्रिका जीवन धीरे ।।

3.

धरती से बस वृक्ष तक, जिसका है आवास ।

एक मयूरी कब कहे, सारा नभ हो पास ।।

सारा नभ हो पास, नहीं की इच्छा मन में ।

छोटी भले उड़ान, बड़ी खुशियाँ जीवन में ।

पंखों से ले रंग, सँवारा आँगन करती ।

मुट्ठी- सा आकाश, और थोड़ी ले धरती ।।

4

करना है संघर्ष बस, कहती करतल रेख ।

चिंता से कब बदलते, किस्मत के आलेख ।।

किस्मत के आलेख, नहीं जब वश में अपने ।

मिला लेखनी कर्म, रंग भरने को सपने ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, जगत वैतरणी तरना ।

जीवन का संघर्ष, सभी को पड़ता करना ।।

5.

संघर्षों की धुंध से, फ़ीकी पड़े न आब ।

बैठ शूल की नोक पर, कहता यही गुलाब ।।

क़हता यही गुलाब, इत्र से रोज़ महककर ।

भले धूप या छाँव, सभी से मिलो चहककर ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, कथा लाखों वर्षों की ।

जिजीविषा से हार, हुई नित संघर्षों की ।।


प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं?

सुनकर क्या करते हैं?

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

“क्या आप अपने पौधों को संगीत सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं, जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भाँप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं। 

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियाँ  पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियाँ, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति और हॉरमोन नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जाँचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएँ , पौधे अच्छे से लहलहाएँ गे। (स्रोत फीचर्स) ■

कविताः आँखों में खिलते बसंत के फूल

  - अंजू निगम

कुछ आँखों में 

कभी शाम नहीं उतरती

और कुछ आँखों से

हमेशा रात लिपटी रहती है

सुनो न ऐ जिन्दगी 

तुमने क्यों भर दिया

कुछ आँखों में आषाढ़ का महीना 

या क्यों नहीं टूटती

कुछ आँखों से पूस की रात 

मैं तुमसे बात करूँगी ज़िन्दगी

जब कभी मिलूँगी किसी नुक्कड़ पर

अच्छा लगेगा जब देखूँगी

इन आँखों में 

खिलते बसंत के फूलों को।


शख्सियतः पर्यावरणविद वैज्ञानिक माधव गाडगिल

 - संकेत राउत

भारत के अग्रणी पर्यावरणविद डॉ. माधव गाडगिल का हाल ही में निधन हो गया। माधव गाडगिल के जाने से हमने एक ऐसा विचारक, लेखक और योद्धा खो दिया जो पर्यावरण संरक्षण और उस पर निर्भर जनजीवन, दोनों के बीच संतुलित समन्वय का पक्षधर था। वे उन दुर्लभ पर्यावरणविदों में से थे, जो प्रकृति के साथ-साथ आम इंसान से भी उतना ही प्रेम करते थे। प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के सरल और व्यवहारिक उपाय सुझाकर लोगों का जीवन स्तर कैसे सुधारा जा सकता है, इस दिशा में उनकी जागरूकता और प्रयास उल्लेखनीय रहे हैं। 

आज जब पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं, माधव गाडगिल को खोना एक बहुत बड़ी क्षति है।

प्रकृति प्रेम का पहला पाठ

माधवराव प्रख्यात नियोजन विशेषज्ञ धनंजयराव गाडगिल के पुत्र थे। उन्हें प्रकृति प्रेम के शुरुआती पाठ अपने पिता से ही मिले। धनंजयराव को पक्षी निरीक्षण (bird watching) का शौक था और वे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालीम अली के मित्र थे। बर्ड वॉचिंग के दौरान माधव गाडगिल अपने पिता के साथ जंगलों और घाटियों की सैर किया करते थे। इसी घुमक्कड़ प्रवृत्ति ने उनके मन में प्रकृति प्रेम के बीज बोए और उन्होंने जंगलों में घूमकर अध्ययन करने वाला जीवविज्ञानी बनने का निर्णय लिया।

प्रयोगशाला के बाहर भी

माधव गाडगिल की उच्च शिक्षा हारवर्ड विश्वविद्यालय में हुई। भारत लौटने के बाद, दिसंबर 1971 में उन्होंने ‘देवराइयों' (sacred groves) का अध्ययन करना शुरू किया। देवराई वन के वे हिस्से या प्राकृतिक वनस्पतियों के वे क्षेत्र होते हैं, जिन्हें स्थानीय या अन्य समुदायों द्वारा किसी देवी-देवता या आध्यात्मिक शक्ति को समर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के कारण इन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप (जैसे पेड़ काटना, शिकार करना या खेती करना) पूरी तरह वर्जित होता है। इस तरह देवराई में प्रकृति को पनपने का मौका बनता है।

चूंकि माधव गाडगिल को जंगलों में भटकने का शौक था, इसलिए उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देवराइयों में जाकर उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया। एक वैज्ञानिक के रूप में वे कभी भी केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने प्रकृति की खुली प्रयोगशाला में दुनिया भर की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर किसी से खुलकर संवाद किया और उनकी परंपराओं व पर्यावरण के प्रति उनके ज्ञान को समझा। यही कारण है कि समाज और गाडगिल को अलग करना असंभव है। डॉ. जयराम रमेश द्वारा उन्हें लोगों का ‘वैज्ञानिक' (People’s Scientist) कहना अत्यंत सटीक जान पड़ता है। 

लेखन और सामाजिक जागरूकता

देवराइयों के अध्ययन पर आधारित माधव गाडगिल का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जो आम जनता के लिए उनका पहला लेख था। यहीं से उनकी निरंतर लेखन यात्रा शुरू हुई। विभिन्न समाचार पत्रों, साप्ताहिकों और पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए। कठिन वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने वाले माधव गाडगिल ने अपनी लेखनी से सामाजिक चेतना भी जाग्रत की। प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा के साथ उनकी पुस्तक This Fissured Land का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है और कई विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता है। Ecology and Equity, उत्क्रांति - एक महानाट्य, निसर्गाने दिला आनंदकंद, जीवन की बहार और बच्चों के लिए लिखी गई गोडतोंड्या मुचकुंद उनकी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। सह्याचला आणि मी: एक प्रेम कहाणी उनकी आत्मकथा है। 

माधव गाडगिल ने कई सरकारी समितियों में काम किया। 1975 से 1980 के बीच वे कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य थे। उन्होंने प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। पश्चिमी घाट, जहाँ  उनका बचपन गुज़रा था, उसके सतत विकास कार्यक्रम में गाडगिल जी का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने स्थानीय लोगों और शासकों का ध्यान वहाँ  के महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर आकर्षित किया। आगे चलकर उनकी ‘वेस्टर्न घाट इकॉलॉजिकल एक्सपर्ट पैनल' (WGEEP) की रिपोर्ट बहुत चर्चित रही। हालांकि, स्थानीय लोगों की इच्छाओं और अपेक्षाओं को जानकर तैयार की गई इस रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर

जैव विविधता अधिनियम का मसौदा तैयार करने वाली समिति में रहते हुए, माधव गाडगिल ने ‘पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर' (PBR) बनाने का विचार रखा, जिसे बाद में कानून में शामिल किया गया। यह रजिस्टर स्थानीय लोगों के लिए अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण का एक महत्वपूर्ण कानूनी साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि यह ज्ञान या इन संसाधनों के आर्थिक लाभ स्थानीय जनता तक पहुँचें और साथ ही वे संसाधन अक्षुण्ण भी बने रहें। कुदरती संसाधन पर लोगों के स्वामित्व को वे असली लोकतंत्र का रूप मानते थे।

पर्यावरण बनाम विकास

माधव गाडगिल की कार्यशैली सीधे लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने की थी। वे वैज्ञानिक तथ्यों को प्रत्यक्ष अनुभव से जोड़ते थे और बिना किसी संकोच के वास्तविकता को सामने रखते थे। चाहे वह वन्यजीव संरक्षण में पश्चिमी देशों का पाखंड हो, या सरकारी संस्थाओं, एनजीओ और वन विभाग की कार्यप्रणाली, वे निर्भीक होकर आलोचना करते थे।

भारत में शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच की बढ़ती खाई को उन्होंने नज़रंदाज़ नहीं किया। इसे उदाहरण के ज़रिए समझना हो तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बात हो सकती है। शहर में प्रदूषण मुक्त इलेक्ट्रिक कारों के लिए जो कोयला जलाकर बिजली बनाई जाती है, उसका कष्ट ताप बिजली घरों के पास रहने वाले ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। और यदि उन्हें कोयला खदानों के कारण विस्थापित होना पड़े तो उन्हें ‘इकॉलॉजिकल रिफ्यूजी' (पारिस्थितिक शरणार्थी) कहा जाता है। प्रदूषण मुक्त शहर के लिए यह बड़ी कीमत ग्रामीण लोग चुकाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शहर के लोग इस तरफ ध्यान नहीं देते। माधव गाडगिल जी ऐसे कई विस्थापित समूहों से वाकिफ थे और उनके हक में लिखते थे।

जब तेंदुए जंगल छोड़कर गाँवों में घुसने लगते हैं, तब इसका दोष ग्रामीणों पर यह कहकर मढ़ा जा सकता है कि वे खेती के लिए जंगल काटते हैं। उसी समय, शहरी लोगों को सुख-सुविधाएँ  प्रदान करने के लिए होने वाले वन्य संसाधनों के विनाश के बारे में शहरी लोग खुद अनभिज्ञ रहते हैं। जिन लोगों ने तेंदुए के हमले में अपने परिवार के किसी सदस्य को खो दिया है या जिनके खेतों का नुकसान हुआ है, वे लोग जब तेंदुए को मारने की माँग करते हैं, तब इस हमले की आँच से दूर रहने वाले लोग उन्हें ‘पर्यावरण द्रोही' करार देते हैं। और इसी आधार पर, माधव गाडगिल के इस बयान पर भी आपत्ति जताई जा सकती है कि ‘तेंदुओं का शिकार करना चाहिए’।

लेकिन सही परिस्थिति में माधव जी ने पर्यावरण के मुद्दे पर लोगों के साथ खड़ा रहना पसंद किया। उनका यह विश्वास था कि लोग अक्सर प्रकृति बचाने के पक्ष मे होते हैं। वे ‘पर्यावरण बनाम विकास' के विरोधाभास को भी भ्रामक मानते थे। उनका विश्वास था कि विज्ञान का सहारा लेकर, प्रकृति के अनुरूप और लोगों के सहयोग से ही वास्तविक विकास संभव है।

सम्मान और विरासत

वर्ष 2015 में उन्हें प्रकृति संरक्षण और मानवीय विकास के समन्वय के लिए ‘टायलर पुरस्कार' प्रदान किया गया। उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें पर्यावरण क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान ‘चैंपियंस ऑफ दी अर्थ' से नवाज़ा। वे सच में पर्यावरण क्षेत्र के चैंपियन थे। माधव गाडगिल का कार्य पर्यावरण शोधकर्ताओं, कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए हमेशा प्रेरणादायी रहेगा। (स्रोत फीचर्स) ■

कविताः बीते हुए बसंत की याद में

    - सांत्वना श्रीकान्त

निर्जन वन की तरह ही

मेरी पीठ पर दहकते पलाश के फूल

आती है इनसे पकी हुई फ़सल की गंध

आलिंगन की आँच बिखेरता

अस्त हो रहा सूर्य

सुहागन के आलते जैसा पावन है

तुम्हारा हर एक स्पर्श।

पलाश जो तुम्हारे चुम्बन से

होठों की गोलाई के सहारे

मेरी पीठ पर उग आया है

बड़ी ही शीघ्रता से झरेंगे इसके फूल

लेकिन अगले बसंत के इंतजार में

यह खड़ा रहेगा मौन!

कविता : ढाई आखर

- विजय जोशी  (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल)

उस दिन

दस्तक पर

जब दरवाजा खोला

एक संभ्रांत सुशील

माणिक मोती से जड़ी

सोने के फ्रेम में मढ़ी

एक रुआबदार पर रुखी

ऊपर से सुखी

पर शायद अंदर से दुखी

सेंट से महकती

अंतस में भटकती

एक भव्य महिला को पाया

मैंने अपना सिर खुजलाया

अभिवादन के लिये

जब उठा हाथ

वो मुस्कुराई मेरे साथ

और बोली

अरे तुमने मुझे नहीं पहचाना

भूल गए गुजरा जमाना

मैं तुम्हारी वही सहपाठी मित्र

याद करो मेरा चित्र

जो स्कूल में साथ पढ़ी थी

जीवन की सीढ़ी

कभी हमने साथ चढ़ी थी


मैं अचकचा गया

कहाँ  वह पावन तरुणाई

और कहाँ  यह वैभव की परछाई

तुम हंसती थीं तो

उस निष्पाप हँसी में

उल्लास के फूल झरते थे

जिसमें हम सब साथी

निर्मल मन से बहते थे

तुम्हारे तेवर जाने माने थे

इसलिए सब तुम्हारे दीवाने थे


पर अब 

तुम वैसी कहाँ  रहीं

वह सुदर्शनी काया

विशाल व्यक्तित्व में बदल गई

सूती फ्रॉक कीमती साड़ी में ढल गई

टूटी साइकिल मँहगी कार हो गई

और तुम्हें देखकर

जिंदगी खुद हैरान रह गई

तुमने जो सोचा वह सब पाया

तुम्हारी रग रग में बसी है माया


तुम बोलीं

मत भूलो पुराना कुछ भी

समय बीता पर अंतर घट रिता

मैं अब भी रखती हूँ तुम्हारी चाहत

केवल तुमसे मिलेगी मुझको राहत


मैंने कहा-

पुराना सब अब इतिहास है

टूटे तार पुनः जोड़ना

जीवन का उपहास है

ईश्वर ने हमें विवेक दिया

बदले में कुछ नहीं लिया

सिर्फ इसलिए कि

हम सत्य का मार्ग चुन सकें

उसी पर चलकर

जीवन के सपने बुन सकें

पर तुमने सुख सुविधा को चुना

आत्मा की आवाज को नहीं सुना

कहा भी गया है

कठिन होना जितना आसान है

सरल होना उतना ही कठिन

इसीलिए हम ज़मीर को मारकर भी 

आसान मार्ग चुनते हैं

और लोग हम से सुख कम

दुख अधिक पाते हैं


इसलिए

अब तुन्हें अफ़सोस क्यों है

वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर

सब कुछ ज्यों का त्यों है

तुमने प्यार के मायने नहीं जाने

अपने कभी नहीं पहचाने

पहले ही आधे अक्षर में अटक

अधूरी रह गईं

ढाई आखर का प्यार तो

एक फूल है

जिसकी पँखुरी झर भी जाए

तो खुश्बू बनी रहती है

मन में आनंद की नदी सदा बहती है


तुम इसे व्याख्यान मत समझना

मेरी बात को रात में गुनना

आज मैं अपने परिवेश, परिवार

समाज और घर-बार

सबसे बेहद सुखी और संतुष्ट हूँ

उम्र के इस वानप्रस्थी दौर में

मोह छोड़ने की कोशिश में व्यस्त हूँ

मुझे किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं

जीवन मेरे लिए आनंद है बवाल नहीं


इसलिए मुझे

अपने में व्यस्त रहने दो

मन ने जो जो सोचा है

वह सब करने दो

और अंत में बस इतना कि

रहना चाहता हूँ आन से

और जाना चाहता हूँ

पूरे इत्मीनान से

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,

 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com


आलेखः प्रभावशाली बनना है तो दूसरों को महत्त्व दीजिए

 - सीताराम गुप्ता

    हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी के विषय में कहा जाता है कि देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इस लिपि की अनेक विशेषताएँ हैं। इसकी एक विशेषता है संयुक्त वर्णों अथवा व्यंजनों का होना जैसे श्र, प्र, क्र, ग्र, द्र, म्र आदि। जब दो व्यंजन मिलाकर लिखे जाते हैं, तो उनमें भी एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है। संयुक्त व्यंजनों में पहला वर्ण आकार में प्रायः पूर्ववत अर्थात् अपरिवर्तित रहता है लेकिन उसमें जुड़ने वाला वर्ण आकार में बहुत छोटा हो जाता है। मज़े की बात ये है कि जो वर्ण पूरा नज़र आता है वो आधा अथवा हलंत होता है और जो छोटा नज़र आता है, वह पूरा, सस्वर अथवा स्वरसहित होता है। ऐसे वर्ण जो किसी वर्ण के नीचे के भाग अथवा पैर की तरफ़ लगाए जाते हैं पदेन वर्ण कहलाते हैं। स्थान पैरों में लेकिन रुतबा अथवा प्रभाव पैरों वाले से अधिक। उपर्युक्त स्थिति वर्णों अथवा व्यंजनों पर ही लागू नहीं होती; अपितु हम सब पर भी लागू होती है। जब हम किसी के पैरों के पास बैठ जाते हैं तो कुछ अधिक बड़े हो जाते हैं।

     सुनने में यह अविश्वसनीय अथवा विचित्र लग सकता है लेकिन ये सच है क्योंकि पैरों के पास बैठना साधना अथवा तपस्या जैसा होता है जो बहुत बड़ी बात है। किसी के पैरों के पास बैठने के लिए व्यक्ति को झुकना पड़ता है। झुकना अथवा किसी के पैरों के पास बैठना सरल नहीं होता; क्योंकि ये केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं अपितु मनुष्य के जीवन की एक अत्यंत विकसित अवस्था होती है। इसके लिए व्यक्तित्व में तरलता अनिवार्य है। केवल शरीर में ही लोच नहीं होनी चाहिए अपितु विचारों में भी लचीलापन व सकारात्मकता होनी चाहिए। जब तक हम क्षुद्रता का त्याग करके स्वयं में दूसरों को महत्त्व देने की योग्यता अथवा क्षमता विकसित नहीं कर लेते तब तक हम दूसरों को महत्त्व नहीं दे सकते। दूसरों के सामने छोटा बनकर उन्हें महत्त्व देने का अर्थ है कि हम उन्हें अपने अनुकूल बना रहे हैं। जब तक कोई व्यक्ति हमारे अनुकूल नहीं होता उसके साथ अच्छे संबंध बनाना भी संभव नहीं होता। इस प्रकार से दूसरों को महत्त्व देने का अर्थ है अच्छे संबंधों का विकास। और संबंध अच्छे हों तो छोटे-बड़े का भेद भी समाप्त हो जाता है।

     जब तक हममें किसी भी दृष्टि से बड़े होने का दंभ बना रहता है, हम किसी के पैरों के पास नहीं बैठ सकते अतः बड़े नहीं हो सकते। जब हम किसी के सामने झुक जाते हैं तो हम छोटे नज़र आने लगते हैं लेकिन वास्तव में झुकने अथवा छोटा होने पर ही हम बड़े हो जाते है। बड़े होने की इस प्रक्रिया में हम स्वतः अहंकार से मुक्त हो जाते हैं। अहंकार के साथ-साथ दूसरे विकार भी तिरोहित हो जाते हैं। जब हम किसी के साथ जुड़ते हैं अथवा साथ रहते हैं या उनके साथ मिलकर काम करते हैं तब हमें उनके सामने स्वयं को बड़ा न मानकर उन्हें अधिक महत्त्व देना चाहिए। इससे हमारा महत्त्व अथवा बड़प्पन कम नहीं होगा अपितु हम जिनके साथ जुड़े हैं वे भी न केवल सहजता से हमारे साथ जुड़ जाएँगे अपितु उनका पूरा सहयोग भी हमें मिलना प्रारंभ हो जाएगा। जब हम किसी के सामने छोटे होकर उसको महत्त्व देंगे तो हम छोटे होकर भी महत्त्वपूर्ण ही नहीं अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित भी हो जाएँगे। आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक उन्नति के लिए भी यह अनिवार्य है।

     गुरु नानक देव जी ने कहा है - नानक नन्हे ही रहो जैसे नन्ही दूब, बड़े बड़े बह जात हैं दूब ख़ूब की ख़ूब। गुरु नानक देव जी का कहना है कि यदि दूब जैसे नन्हे बने रहोगे तो तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा। दूब एक प्रकार की घास होती है जिसकी कई विशेषताएँ होती हैं। दूब नन्ही अथवा छोटी होती है। साथ ही वह कोमल भी बहुत होती है। जब हम उसके ऊपर चलते हैं तो वह चुपचाप दब जाती है और उसके ऊपर से पैर हटते ही वह पुनः उठ खड़ी होती है। आँधी-तूफ़ान, बाढ़ अथवा तेज़ बारिश में बड़े-बड़े पेड़ उखड़कर नष्ट हो जाते हैं लेकिन नन्ही कोमल दूब का कुछ नहीं बिगड़ता। अपने लघु आकार व कोमल स्वभाव के कारण ही दूब कभी नष्ट नहीं होती। दूब इतनी नन्ही होती है कि कोई उससे ईर्ष्या-द्वेष नहीं करता। जब हम दूब की तरह हो जाएँगे तो हमसे भी कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखेगा जिससे हमारे हर प्रकार के विकास का मार्ग निर्बाध बना रहेगा।

      दूब का रंग भी आकर्षक व ताज़गी प्रदान करने वाला होता है। वह आँखों में चुभता नहीं है। दूब को देखकर ही आँखें तृप्त हो जाती हैं। दूब के ऊपर ही नहीं उसके आसपास चलने वालों को भी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। ये सब लघुता की विशेषताएँ हैं। दूब इतनी नन्ही होती है कि दूसरों को उसके सामने कुछ बड़ा होने का एहसास बना रहता है। यदि हमारे लघु बने रहने से किसी को बड़ा अथवा महत्त्वपूर्ण बने रहने की ख़ुशी मिल जाती है अथवा हमारे सान्निध्य में कोई महत्त्वपूर्ण अनुभव करता है तो हमारे लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है! यदि बड़ा होना है तो आकार को नहीं आचरण को महत्त्व देना होगा। हमारे आचरण का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है हमारी वाणी अतः हमारी वाणी में भी लघुता होनी चाहिए अर्थात् हमें विनम्र होना चाहिए। हम विनम्र बने रहते हैं तो हम न केवल नष्ट नहीं होते अपितु सीखते भी हैं।

     विनम्र हुए बिना कोई कुछ नहीं सीख सकता। कम से कम उदात्त जीवन मूल्य तो नहीं सीख सकता। विनम्रता के अभाव में जीवन जीने की कला नहीं सीखी जा सकती। जिसमें विनम्रता नहीं होती उसे कोई सही व्यक्ति अपने पास नहीं बिठाता। कोई ऐसे व्यक्ति को नहीं सिखाता। जो सिखाने वाले को जितना अधिक मान देता है, जितना उसके सामने विनम्र होकर बैठता है, उतना ही अधिक सीखता है। उर्दू शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी ने कहा है - हरीमे-हुस्ने-मानी है ‘जिगर’ काशाना-ए-‘असग़र’, जो बैठो  बाअदब होकर  तो उठो बाख़बर होकर। जब तक हममें बाअदब अर्थात् विनम्र व शिष्ट होकर गुरु के चरणों में बैठने की योग्यता उत्पन्न नहीं होती, हम बाख़बर अर्थात् अभिज्ञ व ज्ञानवान नहीं हो सकते। नवाज़ देवबंदी ने भी कहा है - जूते सीधे कर दिए थे एक दिन उस्ताद के, उसका बदला ये मिला तक़दीर सीधी हो गई। जिसने उस्ताद के जूते सीधे करने व उनके क़दमों में जगह बना लेने की क़ाबिलियत हासिल कर ली उसकी तक़दीर अथवा ज़िंदगी का सँवरना या सफलता मिलना अत्यंत सरल हो जाता है।■

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली- 110034, मो. 9555622323, Email :srgupta54@yahoo.co.in


यादेंः मुझसे ईश्वर ने बुलवाया

 - राजनन्दिनी राजपूत

"उस समय एक अलग ही शक्ति साथ देती है सब हो जाता है ", मैंने उससे कहा।

वह बहुत घबराई हुई थी।

'क्या प्रसव- वेदना का दर्द वह सह पाएगी?'

'कैसे होता है यह सब कुछ?'

हमने तो कभी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर भी बात नहीं की थी।

एक वर्ष ही हुआ था उसकी शादी को।

मुझसे उम्र में बड़ी - मेरी बहन।

वह तो प्रणय को भी स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं समझती थी, यह तो पुरुष की माँग है, पूरी करनी ही पड़ती है।

मैं उस से कभी कह नहीं पाई, यह स्त्री का भी सुख है, यह साझेदारी का सुख है।

उस दिन जब अस्पताल से कॉल आया। मैं सुबह पाँच बजे वहाँ पहुँची, उसे देखा, उसके भय को देखा और मिलकर लौट आई कि प्रसव में अभी समय है।

'वह समय का प्रसव होता है', किन्तु इतना दूर हम कहाँ सोचते हैं।

जब दिन में कॉल आया, हम अस्पताल पहुँचे , मेरे कदम जब उसके पास पहुँचे, मेरा हृदय काँप उठा, कम्बल उस पर गोलाकार तरीके से लिपटा था, वह सीधी लेटी हुई थी।

मैं डर गई - ये क्या हुआ। मेरा गला रुँध गया , मेरी बहन...ये किस स्थिति में?

मुझे अपनी सबसे बड़ी बहन याद आ गई, जिसे हमने एक सड़क हादसे में खो दिया था।

उसने मुझसे कुछ कहा और जवाब में मेरी आवाज रूँध गई।

यह पहली बार था जब अपनी बहन को पीड़ा में देखकर मैं पीड़ा से भर उठी।

मेरी आवाज के भारीपन को वह समझ गई, उस दिन मुझे हमारे रिश्ते की आत्मीयता महसूस हुई। उसके चंद शब्दों ने मुझे राहत दी और मेरी एक बात पर वह पुराने दिनों की तरह हँस पड़ी ।

उसकी हँसी ने जैसे मुझे निश्चित कर दिया हो, मैंने कहा , "बच्चे की अँगुलियाँ बिलकुल तुम्हारी अँगुलियों जैसी है।"

मेरे मुँह से यह सुनकर वह खुश हो गई।

मैं घर आ गई थी और उससे अगले दिन कॉल पर बात हुई- 

"सच में , कोई और ही शक्ति काम करती है उस समय, वरना डॉक्टर- वॉक्टर , लोग- वोग कुछ नहीं होते", उसने कहा।

मैं एक क्षण ठहर गई । आखिर मेरा कहा एक वाक्य उसे इतनी हिम्मत/आश्वासन दे गया, जैसे वह वाक्य मुझसे ईश्वर ने  बुलवाया हो।

हम घर आ गए ।

और कुछ समय बाद वहीं शाश्वत (सत्य) बातें सुनने को मिलीं-" काम करती, तो नॉर्मल डिलीवरी होती।"

"आजकल सिजेरियन ठीक है, दर्द नहीं होता।’’

" कब तक लेटेगी, अब तो काम पर लगे। "

इसी तरह की तमाम बातों के बीच मुझे उसकी वे बातें याद आती रहीं, जो उस समय वह बता रही थी और मैंने डरते हुए उससे कहा था, "मुझे मत  बताओ दीदी, मैं डर जाऊँगी।"■

लघुकथाः ख़ुदा ख़ैर करे

  - छवि निगम  

“इस बार कत्तई छोड़ दूँगी। ना ना। तुममे कोई रोकियो न बिल्कुल। पानी सर के ऊपर हो राअ बतो” अंदर आँगन से चाची की सुबकियों में डूबती-उतराती दिल दहलाती आवाज़ आयी, तो बाहर खटिया पर अधलेटे चाचा चौंककर उठ बैठे- ‘ये क्या कह रही थीं.. क्या करने जा रही थीं उनकी शरीकेहयात? किसे छोड़ देंगी.. क्या उन्हें?’

उनकी साठ साला डेढ़ पसली काया में फँसा सौ ग्राम का दिल धाड़-धाड़ करने लगा। फ़ोन पर पकड़ ढीली होकर छूटी, तो स्क्रीन पर इठलाती हूरें औंधे मुँह खटिया पर गिर पड़ीं। उन्हें नज़रंदाज़ करते लड़खड़ाते हुए चाचा अंदर को चल दिए। पर आँगन में चच्ची की सखियों का जमावड़ा देख वो सकुचाकर  ज़रा आड़ में खड़े हो गये, और अपनी मिजमिजाती आँखें और कान उधर ही टिका दिए।

वहीं, जहाँ चाची की मानमनौव्वल जोरों-शोरों पर थी, ”जाये दो भौजी, लो पान संग गुस्सा चबाय के थूक डालो।”

दूसरी बोली, “ए जिज्जी, तोहर हिरदय तो वइसे भी विसाल बा, जाए दो ना।” किसी और ने सुर में सुर मिलाया, “और क्या। इत्ती भी बड़ी बात नहीं, जो नाराज़ हो रही।”

चाचा को चैन की साँस आने वाली ही थी कि दोबारा अटक गई। समझाने वाली इन बातों ने चाची के गुस्से में बर्फ़ नहीं, घी का काम किया था। वो दहाड़ पड़ीं, “काहे, बड़ी बात ना है ये ? सारे रिस्ते-नाते अक्केले हमीं निबाहते चले जाएँ? न रात को रात समझें, न दिन को दिन। जरूरत पड़ने पर एक पैर से खड़े रहें हम, और जब हमारी बारी आये तो ऊ हमाये पर घमंड झाड़ें..हैं ?”

चाचा के भीतर हौला उठने लगा, जिसे चाची की ललकार छिन्न भिन्न करती चली गई,  “सांती ना, औकात दिखाए का बखत है अब.. जानी तुम लोग ?”

बाहर गिरते-गिरते बचे चाचा। एक पल में पूरी ज़िंदगी जैसे आँखों के आगे घूम गई। सारी खताओं, मनमर्जियों, उनकी भूलों ने पल भर में उन्हें दिन में तारे दिखा दिए। उनकी धुकधुकी बढ़ गई, हाथ- पैर काँपने लगे। उधर फ़ोन को हवा में लहराती चाची विस्फोट कर रही थीं,  “काहे हमीदन, तुम्हारे करेले के हलुए को लाइक किये थे न हम, और शीला तुम्हारे चैनल को हमही सस्क्रैब अउर शेयर किये थे न जिसमें तुम रुमाल से कुर्ता बनाने की तरकीब बतायी थी ? और रजिया, तुमाए कित्ते फालोअर बढ़ाये हम.. और अनीता, स्टेला तुम..तुम…" कहते उनका गला रुँध गया, “का सिला दीं तुम सब? घण्टा भर हो गया हमें अपनी फोटू डाले…पर तुम लोग झाँके तक नहीं। दुसमन कहीं की। अब छोड़ ही देंगे ये सोसल- वोसल सब..कहे देते हैं।”

सब सखियाँ भूल-सुधार में जुटीं, और चाचा मुस्कुराते हुए वापस अपने खटिया रूपी सिंहासन पर चढ़े, और एक बार फ़िर फ़ोन में डूब गए। तभी चाची की सस्पेंसफुल आवाज़ आई, “अर्रे ई का..जे तुम्हारे चच्चा…इस लालमुँही पर लाल दिल कइसे चेंप दिए, हैं ?”

बाल डायरी के अंशः सुबह हंस रही थी

- डॉ. पद्मजा शर्मा 

 (गौरा का जन्म 11 फरवरी 2021) 

 गौरा और बॉल 

दो साल की गौरा बॉल से खेलती है । हाथ से तो बहुत छोटी थी तब फेंकती थी ।आजकल तो पैरों से मारती है । कहती है -किक मार रही हूँ । आ रही है बॉल, नानी पकड़ना । पापा आप भी किक  मारना । मम्मा कहाँ जा रहे हो आओ ना । मेरे साथ खेलो । मामा नीचे आओ वरना मैं आ रही हूँ आपके पास  । पीयूष का कमरा ऊपर है । पीयूष उसकी आवाज सुनकर नीचे आ जाता है। फिर फिसलपट्टी पर बने गोल घेरे से बॉल निकालती है। कभी सबको बगीचे में ले जाती है । फिर खेलती रहती है। वहाँ कभी बिल्ली आजाती है कभी कोई चिड़िया उड़ जाती है। कभी कबूतर छज्जे पर से  टुकुर -टुकुर देखता रहता है। 

०००

10/12/2022

किचन ,नाना और गौरा 

अभी रात के 12 बजे हैं। नाना के पास सोई है। सोते समय नाना चाहिए। उसे गोद चाहिए। मैं और मनु गोद में लेने को थोड़ा मना करते हैं; मगर नाना ले लेते हैं। कहीं जरा -सी चोट लग जाती है, तो नाना से पट्टी बँधवाती है। फूँक मारने को कहती है। उसे लगता है कि ये डॉक्टर हैं , तो मेरा दर्द जल्दी चला जाएगा। क्या यह सच है? गौरा समझदार बहुत है। हो सकता है ऐसा सोचती हो। 

 नाना उसे किचन में ले जाते हैं। वह जाती ही उनके साथ ही है किचन में। क्योंकि वे ही उसे शहद चटाते हैं। कभी रेवड़ी देते हैं। कभी मिठाई खिलाते हैं। हम लोग तो मना कर देते हैं कि डाक्टर ने मना किया है मगर नाना खिला देते हैं। नाना से इसीलिए विशेष प्रेम है गौरा को।

०००

10/12/2022

हर काम आपी -आपी

हर काम आपी -आपी करना है। खिलौना गोद में उठाना है आपी -आपी। रोटी खानी है आपी -आपी। दूध पीना है आपी -आपी। पानी पीना है आपी -आपी। सीढ़ियाँ उतरना है आपी -आपी ।रिक्शा में बैठना है आपी -आपी। सड़क पार करना है आपी- आपी। नहाना है आपी -आपी । कपड़े पहनना है आपी -आपी। तेल लगाना है आपी- आपी। सब काम आपी -आपी करना है गौरा को। सड़क पार आपी -आपी कैसे कर सकती है। अंगुली पकड़ो तो छुड़ाकर भागती है। अपने काम तो आपी- आपी करती है आपके काम भी करती है। आपको दवा लेनी है गौरा मुँह में रखेगी। आपको खाना खाना है गौरा खिलाएगी। भले नीचे गिरे। मगर उसकी सहायता नहीं लोगे तो नाराज हो जाएगी। फिर उसे संभालना मुश्किल है।

०००

10/01/2023

'डाक्टर बनूँगी'- गौरा कहती है 

गौरा के नाना डॉक्टर हैं। वे जब मरीज देखते हैं गौरा भी कई बार उनके पास बैठ जाती है। कहती है –नाना, मैं भी पेशेंट देखूँगी। पेशेंट से सवाल करती है -आपका नाम क्या है? क्या हुआ? क्यों आए हो? हम वहाँ से गौरा को हटाने की कोशिश करते हैं, तो रोना शुरू कर देती है। मुझे नाना के पास रहना है। मुझे पेशेंट देखने हैं। आज मैंने यूंही पूछ लिया –गौरा, बड़े होकर क्या बनना है? एकदम से बोली -डाक्टर। हैं !हम सब बैठे थे। अचरज हुआ इसे ये बातें किसने बताई। मैंने कहा -इलाज करेगी पेशेंट का? बोली -इलाज कहाँ है? हम सब हँसे। थोड़ी देर बाद फिर बोली -नानी इलाज कहाँ है ? फिर खिड़की के पर्दे की तरफ इशारा करते हुए पूछा -वहाँ है? मैंने कहा इलाज नाना के पास है। नाना अस्पताल गए हैं। तब चुप हुई।

०००

11/01/2023 

 नानी गुड है

गौरा आज किताब ले आई। कहने लगी -नानी पढ़ाओ। उसमें तितली और फूल की चित्र सहित कहानी है। गौरा पूछती है -यह क्या है ? मैं कहती हूँ -तितली। नानी यह  क्या हैं? तितली के पंख। नानी यह क्या हैं? रंग। नानी तितली उड़ेगी कब? बस अभी। नानी तितली नहीं उड़ी। हाँ बेटा, अभी उड़ेगी। नानी यह क्या है? फूल। सुंदर है फूल। मैं पूछती हूँ -पतासी को दे दूँ ? वह कहती है -नहीं, अपने पास रखो। फिर खुद कहती है – नानी, फूल रेखा जी को दे दूँ ? मैं कहती हूँ -नहीं, मुझे दो। मैं उसकी किताब के फूल को तोड़ने की एक्टिंग करती हूँ। वह नाराजगी जताती है- नानी, आपने फूल तोड़ा। आपको नहीं दूँगी। आपने तोड़ा। इसे दर्द हुआ। नानी फूल मत तोड़ना। मैं कहती हूँ -ठीक गौरा, नहीं तोडूँगी। नानी गुड है। नानी प्रिटी है। नानी अच्छी है। (पुस्तक- बाल डायरी  'सुबह हँस रही थी' के कुछ अंश) ■

सम्पर्कः 15 - बी, पंचवटी कॉलोनी, सेनापति भवन के पास, रातानाडा, जोधपुर (राज.) 342011, ई मेल- padmjasharma@gmail.com , मो. 9414721619   


लघुकथाः उन सुनहरे दिनों की तरह

 - सन्तोष सुपेकर

“चलो, ओके मुकेश भैया” -चाय की दुकान के मालिक कमलेश सेठ का स्वर उसे बहुत पीड़ा दे गया, “पहुँचो कहीं और। कोई और काम देख लेना अब। ओके?”

  “जी सेठ जी, राम राम।”

आज  रोड के उस पार की विशाल  बहुमंज़िला इमारत,  जिसमें अनेक दफ्तर, दुकानें थीं, गिरा दी गई  थीं और  इसी  कारण  बन्द हो गई उसकी चाय की दुकान भी, जहाँ वह  पिछले चार सालों से  नौकर था और दिन भर चाय के गिलास भर- भरकर, ग्लास स्टैंड में रखकर, सामने की  इस बड़ी इमारत में चक्कर लगाता रहता था।

  और इतने वर्षों में चाय के भरे अधभरे गिलासों वाला स्टैंड ले- लेकर  कई– कई बार इस व्यस्त रोड को पार करना, इमारत की चारों मंज़िलें  बार- बार चढ़ना उतरना उसे कभी भारी नहीं पड़ा।

“और आज सब खत्म हो गया!” ख्यालों से निकलकर  खाली हाथ  वह बाहर आया और रोड क्रॉस करने लगा ।

“अरे?  ये क्या?” रोड उसे आज पहली बार बहुत ज्यादा व्यस्त लग रहा था और चाहते हुए भी वह रोड पार नहीं कर पा रहा था। ” कोई जुलूस– उलूस निकला है क्या  इधर से?” सोचता हुआ वह बार- बार  रोड के बीच जाने लगता और बार- बार घबराकर  पीछे हट जाता ।

ऐसा करते हुए काफी देर हो गई  थी उसे और अब तो आते जाते लोग  भी उसे  मूर्ख समझ घूरने लगे थे ।

  “ये क्या हो रहा है आज? क्या किया जाए अब? ” परेशान- सा वह सोच ही रहा था कि तभी कुछ सूझा उसे, और उसने गर्दन हिलाई, “ओह हाँ, ये ठीक रहेगा!” फिर  उसने अपने सीधे हाथ को  नब्बे डिग्री मोड़ा और महसूस किया कि उसके हाथ में ग्लास स्टैंड है, जिसमें  कुछ भरे, कुछ खाली चाय के गिलास  रखे है। हाथ पर  कुछ  वजन- सा महसूस होते ही  एकाएक उसे, व्यस्त  सड़क खाली- सी दिखाई देने लगी और फिर हाथ मोड़कर , बड़े आराम से वह  सड़क पार कर गया... , पिछले सुनहरे दिनों की तरह।■

सम्पर्कः  31, सुदामा नगर, आगर रोड़, उज्जैन, मो. 942481609

कहानीः कद्रदान

 - गंभीर सिंह पालनी

नौकरीपेशा लोग सेवानिवृत्त होने पर अपनी जिंदगी की नई पारी की शुरुआत करते हैं। मैं भी ऐसे लोगों में से एक हूँ। 

 अपने अनुभवों के आधार पर मैं यह बात कह सकता हूँ कि नौकरी के दौरान हमें बहुत से लोग मिलते हैं; उनसे हमारे संबंध भी बनते; हैं लेकिन हमें तब बड़ा ताज्जुब होता है जब हम ये पाते हैं कि इनमें से बहुत सारे संबंध तो हमारे सेवानिवृत्त होते ही बिखर जाते हैं। इनसे इतर कुछ ही संबंध ऐसे होते हैं, जो बाद में भी बचे रहते हैं।

 सेवानिवृत्त होने के बाद नए संबंध बनाने को लेकर मेरे मन में अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहता। अब मैं बहुत सँभलकर ही इस मामले में कोई नया कदम उठाता हूँ । 

मैं अपने जीवन में कुछ ऐसे अनुभवों से गुजरा,  जिनसे सीख पाकर, अपने सेवानिवृत्त होने से थोड़ा पहले से ही संबंधों को लेकर बहुत ज्यादा सँभलकर चलने लगा था; विशेष कर श्याम दास जी के साथ जुड़े प्रसंग के बाद। 

यह उन दिनों की बात है जब मैं बैंक की भीमताल स्थित शाखा में प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। मेरी कार सर्विस के लिए रुद्रपुर गई हुई थी। उसे लेने के लिए मुझे रुद्रपुर जाना था। भीमताल से रुद्रपुर के लिए सीधी सवारी नहीं मिलती। वहाँ तक जाने के लिए, रास्ते में पड़ने वाले हल्द्वानी शहर तक की कोई सवारी पकड़नी होती है । 

 उस दिन बैंक का कार्य-दिवस बीत जाने के बाद मैं बैंक के सामने से गुजर कर हल्द्वानी की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे खड़ा होकर,  किसी सवारी की प्रतीक्षा कर रहा था। 

मुझे गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी थी; इसलिए काफी देर तक किसी सवारी की प्रतीक्षा करने के बाद जब मुझे लाल रंग की एक प्राइवेट कार आती हुई दिखलाई पड़ी, तो मेरे मन में यह विचार आया कि क्यों न इससे लिफ्ट माँगने की कोशिश करके देखूँ। हो सकता है कि कोई सहृदय व्यक्ति हल्द्वानी तक जा रहा हो और मुझे बैठा ले।  मैंने लिफ्ट माँगने के लिए हाथ का इशारा किया।

  मुझे बड़ा अच्छा लगा कि उक्त कार मेरे पास पहुँचकर रुक भी गई। कार के रुकते ही मैं कार ड्राइव कर रहे सज्जन के पास गया और उनसे अनुरोध किया , “ सर,  क्या मुझे हल्द्वानी तक लिफ्ट देंगे?”

 उत्तर मिला, “ साठ रुपये लगेंगे।”

  उसके मुँह से ऐसा सुनकर मैंने अनुमान लगाया कि यह व्यक्ति कार का स्वामी नहीं; बल्कि कोई ड्राइवर है। तभी मैंने गौर किया कि उस ड्राइवर के बगल वाली सीट पर अपने ही बैंक की भवाली शाखा के प्रबंधक श्री श्याम दास जी बैठे हुए हैं। 

 उन्हें देखते ही मेरे मुँह से एकाएक निकल पड़ा – “श्याम सुंदर दास जी, नमस्कार! लगता है कि आप भी हल्द्वानी जा रहे हैं।” 

 “जी, हाँ।….आप भी बैठिये।”--- श्याम सुन्दर दास जी ने कहा। मुझे लगा कि यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सफर में साथ के लिए अपने ही बैंक में मेरे समकक्ष पद पर ही कार्यरत दास जी अनायास ही मुझे मिल गए हैं। अब तो इनके साथ बातचीत करते हुए सफर अच्छा कट जाएगा।

  मैं कार के पीछे वाला दरवाजा खोलकर सीट पर बैठ गया। देखा, दो सवारियाँ और भी बैठी थीं। 

 मेरे कार के भीतर बैठते ही श्याम सुन्दर दास जी ने कहना शुरू किया, “...और भाई साहब, कैसे हैं आप!....आपकी कहानियों का नया संग्रह कब तक आ रहा है? एक बात बतलाऊँ,  मैं आपका जबरदस्त फैन हूँ। .... सच कहूँ ; हमारे समाज में तो लेखक की कोई कद्र ही नहीं है; लेकिन मैं तो तहेदिल से साहित्यकारों की कद्र करता हूँ। सच बात तो यह है कि मैं आपका कद्रदान हूँ।…इसलिए आप से मेरा एक बार फिर से करबद्ध निवेदन है कि जब भी आपका नया कहानी - संग्रह आएगा, अपने ऑटोग्राफ के साथ उसकी एक कॉपी मुझे जरूर दीजिएगा।…. हम लोग एक ही बैंक में काम करते हैं; इसलिए आप पर मेरा इतना हक तो बनता ही है।”  

  हल्द्वानी शहर के रोडवेज बस अड्डे के पास पहुँचकर कार रुकी, तो मैंने उतर कर ड्राइवर को साठ रुपये थमाए;  श्याम सुन्दर दास जी को नमस्कार किया और रुद्रपुर की बस पकड़ने के बस अड्डे के भीतर चला गया। 

  मैंने सोचा कि निकट भविष्य में जब भी मेरा कोई नया कहानी- संग्रह आएगा, तो उसकी एक प्रति श्याम सुन्दर जी को अवश्य भेंट करूँगा, फिर चाहे उनकी तैनाती कहीं भी हो और ढाई - तीन सौ रुपये मूल्य की वह पुस्तक उन तक कोरियर से भेजने के लिये मुझे अपनी जेब से सौ रुपये खर्च भी करने पड़ें। मेरे प्रति जो आदर- भाव उन्होंने मेरे लेखक होने के नाते प्रदर्शित किया था– उससे मेरा मन गदगद हो उठा था।

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   साहित्यिक पत्रिकाएँ तो सब लोग नहीं पढ़ते; लेकिन समय- समय पर स्थानीय समाचार- पत्रों के रविवारीय परिशिष्टों में मेरी रचनाओं के प्रकाशित होते रहने की वजह से यह बात हमारे बैंक में कार्यरत ज्यादातर व्यक्तियों की जानकारी में थी कि मैं बैंक में प्रबंधक के पद पर कार्यरत होने के साथ-साथ एक लेखक भी हूँ।

   बैंक की विभिन्न शाखाओं में कार्यरत स्टाफ में से चंद लोग ऐसे भी थे जो मेरी किसी कहानी के कहीं प्रकाशित होने के कई महीने बाद भी यदि मुझे कभी किसी ऑफिसियल मीटिंग या यूनियन मीटिंग में मिल पड़ते तो गर्मजोशी से बधाई देने के साथ- साथ उस कहानी की विषय- वस्तु को लेकर मुझ से चर्चा भी करते। उन्हीं व्यक्तियों के अगल- बगल खड़े कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो दूसरों की देखा- देखी,वमुझे बधाई दे तो देते थे लेकिन उनके मुँह से ‘बधाई’ सुनकर साफ- साफ ऐसा लगता था कि मानों यह औपचारिकता निभाना उनकी मजबूरी हो। मेरी रचनाओं के प्रकाशित होने पर अपनी पाठकीय प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करने वाले बैंक स्टाफ की संख्या कुल संख्या का मात्र पाँच प्रतिशत ही रही होगी लेकिन बाकी बचे पचानबे प्रतिशत स्टाफ के व्यवहार में इस संबंध में सदैव एक तरह का ठंडापन ही देखने को मिलता।

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   उक्त लाल कार में बैठकर भीमताल से हल्द्वानी तक की यात्रा किए हुए कई महीने बीत चुके थे लेकिन उस यात्रा की स्मृतियाँ मेरे लिये अब भी ताजा ही थीं। वह यात्रा मेरे लिए इसलिए भी अविस्मरणीय बन गयी थी; क्योंकि उसमें मुझे यह जानने को मिला था कि  जिस संस्था में मैं काम करता हूँ, उसमें श्याम सुन्दर जी जैसे मेरे कद्रदान भी हैं।

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   कुछ महीनों बाद एक दिन हल्द्वानी बस अड्डे पर एकाएक मेरी भेंट सुरेश से हुई जो कभी किसी शाखा में मेरे साथ चपरासी के पद पर कार्य कर चुका था। उसने बतलाया कि वह आजकल बैंक की भवाली शाखा में ही कैशियर के पद पर कार्यरत है। उसकी बातों से मैंने सहजता ही यह अनुमान लगा लिया कि वहाँ कार्यरत शाखा प्रबंधक श्याम सुन्दर जी से उसका कुछ मनमुटाव चल रहा है। शायद यही कारण था कि वह मुझसे कुछ राय लेने के उद्देश्य से, मुझे उनके विषय में कई बातें बता बैठा। उसने यह भी बतलाया कि श्याम जी ने हमारे बैंक द्वारा अपने स्टाफ को निजी उपयोग हेतु कार खरीदने के लिए ऋण दिए जाने की स्कीम के अंतर्गत कुछ वर्ष पूर्व एक लाल रंग की कार खरीदी है। इस कार से वे प्रतिदिन हल्द्वानी से भवाली और भवाली से हल्द्वानी आना- जाना करते हैं। कार को चलाने के लिए उन्होंने एक ड्राइवर रखा हुआ है,  जो हल्द्वानी से लाकर उन्हें सुबह बैंक में छोड़ देने के बाद, दिन भर यहाँ - वहाँ सवारियाँ ढूँढता है और कार को टैक्सी की तरह चलाता है। शाम को पैसा श्याम दास जी को दे दिया करता है। इसके अलावा श्याम सुन्दर जी ने कुछ होटल स्वामियों से भी मौखिक अनुबंध किए हुए हैं। उन होटलों में ठहरे  पर्यटकों को भी उक्त कार से भ्रमण करवाकर अच्छी- खासी कमाई की जाती है। यही नहीं, वे तो बैंक का कैश एक कस्बे से दूसरे कस्बे तक ले जाने के लिए भी अपनी उक्त निजी कार का ही इस्तेमाल करते हैं,  जबकि वैसा करना बैंक की नियमावलियों का सरासर उल्लंघन ही माना जाएगा।

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    सुरेश से श्याम सुन्दर जी के क्रिया- कलाप और कार्य- शैली के बारे में सुनकर मैं दंग रह गया कि एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत व्यक्ति भी ऐसा कर सकता है; लेकिन इस सच्चाई को जानकर मेरे मन को ज्यादा आघात पहुँचा कि  उक्त लाल कार उनकी निजी थी।

  मेरा मन कहने लगा कि उस दिन स्वयं को मेरा कद्रदान बतला रहे श्याम सुन्दर जी ने वे सारी झूठी बातें बनाने की बजाय अपने उस ड्राइवर से यह कहना चाहिए था कि ये तो हमारे स्टाफ के व्यक्ति हैं, इसलिए इनसे किराया लेने की कोई जरूरत नहीं। 

         मैंने तो हल्द्वानी तक जाने के लिए, बतौर किराये साठ रुपये किसी भी टैक्सी वाले को देने ही थे; यदि श्याम सुन्दर जी वैसा कहकर किराया लेने से मना कर भी देते तो भी मैं साठ रुपये उनके ड्राइवर को जबर्दस्ती थमा ही देता। 

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  नजर कुछ कमजोर हो जाने के कारण अब मैं लंबी दूरी की यात्राएँ  करते समय स्वयं कार ड्राइव करने से बचने लगा हूँ। 

  यह सरल- सी बात तो आप सभी आसानी से समझ सकते हैं कि कहीं जाने के लिए पूरी टैक्सी बुक करके जाना काफी महँगा पड़ता है। मेरे जैसे जरूरतमंद कई लोग रहे होंगे, उन्हीं में से कुछ जीनियस किस्म के व्यक्तियों ने कुछ वर्ष पहले इस समस्या का समाधान एक नया मोबाइल ऐप बनाकर निकाला,  जिसका उपयोग अब धड़ल्ले से किया जाने लगा है। इस ऐप से जुड़े निजी कार मालिक अपनी कार का नंबर उक्त ऐप पर शेयर कर देते हैं और यात्रा करने के इच्छुक व्यक्ति शेयर किराए के आधार पर कार - स्वामी के साथ गंतव्य तक की यात्रा का लाभ उठा सकते हैं। 

   रुद्रपुर से देहरादून जाने के लिए एक दिन  मैंने ऐसे ऐप के जरिए कार में अपनी सीट बुक की। कुछ देर बाद ही कार- स्वामी का नाम और मोबाइल नंबर मुझ तक पहुँच गया।

  कार स्वामी राहुल चौधरी को कॉल करके मैंने उनसे कहा कि क्या वे मुझे देहरादून में मेरे शिमला बाई पास स्थित आवास तक भी छोड़ देंगे,  तो उन्होंने कड़क आवाज में जवाब दिया कि मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगा। मैं कोई टैक्सी ड्राइवर नहीं हूँ कि लोगों को उनके घरों तक छोड़ता फिरूँ। …..मैं आपको देहरादून के आई.एस.बी.टी. बस अड्डे के पुल के पास उतार दूँगा; क्योंकि वहाँ पास ही में मेरा घर है । 

  मैंने सोचा कि चलो ठीक ही है;  यूँ भी तो ये बंदा कोई ज्यादा धनराशि नहीं माँग रहा है। आज के जमाने में साढ़े पाँच सौ रुपये की रकम कोई ज्यादा मायने नहीं रखती। आई.एस.बी.टी. बस अड्डे से पचास- साठ रुपये में ई-रिक्शा तय करके मैं अपने आवास पर पहुँच जाऊँगा। 

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         हमारा गाँव रुद्रपुर से हरिद्वार की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही, रुद्रपुर से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मैंने राहुल चौधरी जी को फोन करके कहा कि मैं उन्हें अपने गाँव के बाहर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित ढाबे के सामने खड़ा मिलूँगा। 

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 मेरे पास एक चौड़े मुँह वाला जूट का बैग था,  जिसमें मेरे नये कहानी- संग्रह की कई प्रतियों के अलावा और भी कई किताबें थी।

राहुल चौधरी की कार पहुँचने पर मैंने उनसे कार की डिक्की खोलने के लिए कहा,  ताकि मैं अपना बैग उसमें रख सकूँ।

 उन्होंने मेरे उक्त बैग को उठाकर कार की डिक्की में रखवाया। उसके बाद मैं आगे वाली सीट पर उनके बगल में बैठ गया। देखा कि कार में हम दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं है।

 मेरे कार के भीतर बैठते ही राहुल चौधरी जी ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या मैं कोई सेल्स- पर्सन हूँ। 

मुझे उनके द्वारा ऐसा कहा जाना अच्छा नहीं लगा। मैंने जवाब में “नहीं ” कहा और नाराजगी भरे लहजे में कहा, “आपने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं यहाँ-वहाँ सामान सप्लाई करने का काम करने वाला सेल्स - पर्सन हूँ?” 

   उत्तर मिला –“आपके बड़े से बैग में सामानों के कई पैकेट देखकर।”

यह सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा और मैंने राहुल चौधरी को अपने बारे में विस्तार से बतलाना शुरू किया कि उन्हें मेरा बैग देखकर मेरे बारे में गलतफहमी हो रही है कि मैं कोई सेल्स पर्सन हूँ,  जबकि मैं तो एक बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर बरसों तक कार्यरत रह चुका हूँ और उस पद से सेवानिवृत्ति के बाद पूरी तरह से साहित्य - सेवा में जुटा हुआ हूँ। मैं एक प्रतिष्ठित लेखक हूँ। कल ही मेरी कहानी की रिकॉर्डिंग आकाशवाणी केंद्र, देहरादून में होनी है, इसलिए आज मैं देहरादून जा रहा हूँ।….रही बात इस बैग में रखे पैकेटों की,  तो उन पैकेटों में मेरे हाल ही में प्रकाशित उस कहानी- संग्रह की कई प्रतियाँ हैं, जिसका विमोचन पिछले महीने देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में संपन्न हुआ है। उनके अलावा उक्त बैग में कुछ अन्य पुस्तकें भी हैं।

   मेरी बातें सुनकर राहुल चौधरी जी की के बोलने का लहजा बदल जाता है और उनके मुँह से यह सुनते हुए मुझे मिठास का अनुभव होता है, “ विद्यार्थी जीवन में कहानी और उपन्यास पढ़ने में मेरी भी बहुत रुचि थी। अब भी कभी- कभार पढ़ लेता हूँ ।...आप किस तरह के विषयों पर कहानियाँ लिखते हैं?...विद्यार्थी जीवन में मैं सोचा करता था कि क्या मैं कभी किसी लेखक से मिल सकूँगा। 

सच बतलाऊँ कि इस जिंदगी में आज पहली बार किसी लेखक से मिला हूँ। बहुत अच्छा लगा कि आज आप से मेरी भेंट हो गई।”

   राहुल चौधरी ऐसा कह तो रहे हैं; लेकिन मैं मन -ही- मन थोड़ा घबरा भी रहा हूँ। सोशल मीडिया से प्रायः इस तरह की जानकारी मिलती रहती है कि इस तरह किसी अनजान व्यक्ति के साथ अकेले सफर करने पर लूटपाट की घटनाएँ भी घटित हो जाती हैं। क्या पता यह व्यक्ति अपनी मीठी बातों का जाल मुझे फँसाने के लिए फेंक रहा हो। 

   इसी तरह की कई बातें सोचता हुआ मैं अपने भीतर और भी ज्यादा घबराहट महसूस करने लगता हूँ। कार एक ढाबे पर रुकती है,  तो मैं सोचता हूँ कि कुल चार-साढ़े चार घंटे के सफर में इस बंदे को भला कैसी भूख लग गई?  मैं सोच रहा हूँ कि चुपचाप अपना बैग उतार लूँ और किसी अन्य वाहन में बैठकर आगे की यात्रा शुरू करूँ। 

 तभी मैंने देखा कि ढाबे तक जाकर राहुल चौधरी तुरंत ही लौट आया है। उसने कहा- “कॉफी पीने की इच्छा थी,  पर वो तो यहाँ मिल ही नहीं रही। ….चलो छोड़ते हैं, अब देहरादून पहुँचकर ही अपने घर पर पियूँगा। 

  इसके साथ ही कार चल पड़ी।

   देहरादून पहुँचते- पहुँचते बादल घिर आए। तेज बारिश होने लगी। कार जब आई.एस.बी.टी. पुल के नीचे पहुँचती तो राहुल चौधरी ने मुझसे कहा, “एकाएक बहुत तेज बारिश होने लगी है। क्या आपको गाड़ी- वाड़ी से लेने कोई यहाँ पर आएगा?”

  मैं उन्हें जवाब दिया, “ नहीं, नहीं। मुझे लेने तो कोई नहीं आएगा; लेकिन मैं कोई ऑटो करके उससे अपने आवास पर चला जाऊँगा।”

  सहसा राहुल चौधरी के मुँह से मैंने जब यह सुना तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ, “ ऐसा करते हैं कि मैं ही आपको आपके घर तक छोड़ देता हूँ।”

 अपने आवास के गेट के सामने पहुँचने से पहले मैंने मन-ही-मन में तय कर लिया था कि इस बंदे के साथ साढ़े पाँच सौ रुपये किराया तो पहले से तय है ही, इसके अलावा यदि मैं अपने आवास तक के लिए कोई भी ऑटो करता,  तो मुझे उसे कम - से - कम डेढ़ सौ रुपये तो देने ही पड़ते। अतएव मैं कुल मिलाकर सात सौ रुपये का भुगतान इस बंदे को कर दूँगा। कुछ ना- नुकुर करेगा,  तो पचास रुपये और दे दूँगा। 

  मैं अपने आवास के सामने कार से उतरता हूँ। कार - स्वामी से पूछता हूँ – “बतलाइए कि आपको कुल कितने रुपये दे दूँ?”

 जवाब मिलता है, “ नहीं,  नहीं रुपये देने की कोई जरूरत नहीं है। आज मुझे एक लेखक के साथ सफर करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है।”   

   मैं अपने बैग में से निकालकर अपने कहानी- संग्रह की एक प्रति उन्हें भेंट करता हूँ।

         राहुल चौधरी जी कहते हैं– “ऑटोग्राफ प्लीज।”■

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