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Feb 1, 2026

कविताः बीते हुए बसंत की याद में

    - सांत्वना श्रीकान्त

निर्जन वन की तरह ही

मेरी पीठ पर दहकते पलाश के फूल

आती है इनसे पकी हुई फ़सल की गंध

आलिंगन की आँच बिखेरता

अस्त हो रहा सूर्य

सुहागन के आलते जैसा पावन है

तुम्हारा हर एक स्पर्श।

पलाश जो तुम्हारे चुम्बन से

होठों की गोलाई के सहारे

मेरी पीठ पर उग आया है

बड़ी ही शीघ्रता से झरेंगे इसके फूल

लेकिन अगले बसंत के इंतजार में

यह खड़ा रहेगा मौन!

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