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Dec 1, 2024

बालकथाः बहादुर चित्रांश

  - निधि अग्रवाल

कृतिका की अभी आँख लगी ही थी कि चित्रांश ने उसे जगाया, “मम्मी! मम्मी! वॉशरूम जाना है। मम्मी उठो!”

कृतिका छोटे बेटे रिवान के साथ पूरी रात जागी थी। रिवान अभी-अभी ही सोया था। कृतिका का उठने का बिल्कुल मन नहीं था।

“चित्रांश, बाबू आप जाओ न लाइट ऑन है वॉशरूम की!” कृतिका ने कहा।

“नहीं मम्मी! आप चलो न डर लगता है।”

“चित्रांश घर में कैसा डर? आप जाओ न।” कृतिका झुँझलाई।

“नहीं मम्मा, चलो ना बहुत तेज आई है।”

चित्रांश रुआंसा होकर बोला। कृतिका को बेमन से उठना पड़ा। चित्रांश पल भर के लिए भी अकेले नहीं बैठता था। छोटा रिवान भी कृतिका को परेशान करता है। वह बेहद थक जाती है।

कृतिका चित्रांश को हैंडवॉश ही करा रही थी कि रिवान उसे अपने पास न पाकर उठ बैठा और रोने लगा। कृतिका जल्दी-जल्दी चित्रांश को साथ ले वापस भागी। वह फिर रिवान को गोदी में लेकर सुलाने का प्रयास करने लगी। उसे चित्रांश पर गुस्सा आ रहा था। पता नहीं यह लड़का क्यों इतना डरता है। जैसे - तैसे रिवान सोया। कृतिका ने चित्रांश को उठाकर स्कूल के लिए तैयार किया। उसे स्कूल भेजा। उसे बुरा लग रहा था। फालतू में ही चित्रांश को डांट दिया। रिवान से बड़ा है तो क्या हुआ! है तो अभी छोटा ही। अगले दिन रोज की तरह कृतिका स्कूल गेट पर खड़ी थी।

चित्रांश स्कूल वैन से आने को तैयार नहीं होता था। सुबह उसके पापा उसे स्कूल छोड़ने जाते, लेकिन दोपहर में कृतिका को छोटे रिवान को साथ ले उसे लेने आना पड़ता। कभी-कभी ड्राइवर के न आने पर वह बहुत परेशान हो जाती। सब कहते कृतिका तुमने चित्रांश को बहुत बिगाड़ रखा है। सब बच्चे स्कूल वैन से जाया करते हैं। अब वह कैसे समझाए उन्हें कि चित्रांश किसी से बात नहीं करता, वह और लोगों के साथ सहज महसूस नहीं करता। स्कूल वैन का नाम सुनकर रोने लगता है। तभी कृतिका ने चित्रांश को आते देखा। उसके हाथ में एक टोकरी देखकर वह चौंकी, “अरे यह क्या है?” चित्रांश ने टोकरी आगे बढ़ाई। उसमें एक छोटा सा क्यूट पप्पी बैठा था।

“यह कहाँ से आया?” कृतिका ने चित्रांश का बैग पकड़ते हुए पूछा।

“शिखा मैम ने दिया।”

“सच? मैम ने दिया?। धन्यवाद बोला न मैम को।”

चित्रांश नीचे देखने लगा।

“धन्यवाद बोलते हैं न चित्रांश कितनी बार समझाया है न तुम्हें।”

कृतिका मायूस हो गई। घर आते ही कृतिका ने सबसे  पहले  शिखा मैम को कॉल करके पप्पी के लिए धन्यवाद बोला। शिखा मैम ने कुछ और भी बातें की और कृतिका को चित्रांश की तरफ से निश्चिंत रहने के लिए समझाया। कृतिका ने चित्रांश के कपड़े बदले।

“चित्रांश पप्पी का क्या नाम रखें?”

“आप बताओ।”

“ देखो यह जो पप्पी है, यह तो आपका दोस्त है न!”

चित्रांश को पप्पी को एज अ फ्रेंड सोचकर बहुत अच्छा लगा। उसने हाँ में सिर हिलाया।

“ठीक है तो फिर पप्पी का नाम रखते हैं बड्डी। बड्डी ठीक रहेगा न।”

“ हम्म!”

कृतिका अभी चित्रांश को खाना खिला ही रही थी कि रिवान जाग कर रोने लगा। कृतिका उठकर जाने लगी तो हमेशा की तरह चित्रांश भी उसके साथ हो लिया।

“चित्रांश आप यहीं रुको मैं बस रिवान को लेकर आ रही हूं।”

“ अकेले? नहीं, अकेले नहीं रूकूँगा।”

“अकेले कहाँ हो देखो तुम्हारा फ्रेंड बड्डी है न तुम्हारे पास। तुम इतने इसे यह चपाती खिलाओ।”

कृतिका चली गई और चित्रांश चपाती के टुकड़े करके बड्डी को देने लगा। कृतिका जल्दी ही वापस आ गई। उसने बड्डी के कटोरे में दूध डाला और रिवान को गोदी में लेकर दूर बैठ गई।

“मम्मी खिलाओ न खाना।” चित्रांश बोला।

“देखो बड्डी तो तुम से भी छोटा है। वह तो खुद से खा लेता है। तुम भी कोशिश करो।”

चित्रांश ने देखा बड्डी ने सब खाना चट कर डाला था। उसने एक और चपाती बड्डी को दी और खुद भी अपना खाना खाने लगा। कृतिका ध्यान से चित्रांश को देखती रही। वह मन ही मन शिखा मैम का शुक्रिया अदा कर रही थी।

“मम्मी बड्डी कितना पेटू है।”

चित्रांश बड्डी को और खाना देते हुए खिलखिलाया। कृतिका भी हंसने लगी।

“तुम देखना वह ज़्यादा-ज्यादा खाना खाकर जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाएगा। तुम भी खत्म करो अपना खाना नहीं तो तुम छोटे रह जाओगे और बड्डी बड़ा हो जाएगा।”

चित्रांश ने अपना पूरा खाना खत्म कर लिया। आज बहुत दिनों बाद कृतिका ने खुद को हल्का महसूस किया। वह दोनों बच्चों को सुलाने लगी। तभी चित्रांश बोला,  “मम्मा वाशरूम।”

“ आप जाओ और बड्डी को साथ ले जाओ। बड्डी बाहर बैठा रहेगा।”

“ नहीं, आप चलें।”

“आप जाओ तो बड्डी को लेकर, आपने देखा है न मूवी में कुत्ते कितने वफादार होते हैं। चोर को भी पकड़ लेते हैं।”

चित्रांश की थोड़ी हिम्मत बंधी। वह बड्डी को लेकर चला गया। बड्डी दरवाजे के पास उछलता रहा और कू- कू करके चित्रांश को दिलासा देता रहा कि घबराना नहीं, "मैं हूं न!"

शाम को कृतिका ने रिवान को प्राम में लिटाया और बड्डी को बास्केट में बिठाकर चित्रांश को दिया। वे सब पार्क के लिए निकले।

“चित्रांश इज अ बिग बॉय ! बड्डी का भी कितना ध्यान रखता है।” कृतिका ने कहा तो चित्रांश खुश हो गया।

 पार्क में बड्डी को देखने के लिए सब बच्चे चित्रांश के आसपास जुट गये। कृतिका जानबूझ कर रिवान को ले कर थोड़ा दूर घूमने लगी।

“इसका नाम क्या है ?” एक बच्चे ने पूछा।

  “काटता है क्या ?”  दूसरे ने पूछा

“कहाँ से मिला?” जितने बच्चे उतने सवाल।

चित्रांश शुरू में तो शरमा रहा था फिर धीरे-धीरे बच्चों की बातों का जवाब देता गया। थोड़ी देर में ही सब बच्चे बड्डी के साथ खेलने लगे। बड्डी कभी एक बच्चे के पीछे भागता कभी दूसरे के और फिर लौटकर चित्रांश के पास आ जाता। अब तो यह रोज का नियम बन गया। चित्रांश जहाँ जाता बड्डी उसके साथ जाता। बड्डी चित्रांश का ध्यान रखता, चित्रांश बड्डी का। चित्रांश का दिल तो करता कि बड्डी को अपने साथ स्कूल भी ले जाए ; लेकिन क्या करता। स्कूल में उसका दाखिला संभव नहीं था लेकिन घर पर जरूर वह स्कूल के सभी पाठ बड्डी को सुनाता और बड्डी भी ऐसे सिर हिलाता, जैसे उसे सब समझ आ गया हो।

 धीरे-धीरे पार्क में रोज मिलने से चित्रांश और बच्चों के साथ भी घुलने - मिलने लगा। उसका डर कम होने लगा। कृतिका रविवार को उसके स्कूली दोस्तों को घर बुला लेती थी या उसे उनके घर खेलने ले जाती। कुछ महीनो बाद चित्रांश ने खुद कहा कि मुझे स्कूल वैन से स्कूल जाना है मेरे सभी फ्रेंड वैन से जाते हैं।

फाइनल एग्जाम रिजल्ट लेने जब कृतिका स्कूल पहुची तो शिखा मैम ने कहा, “अब तो चित्रांश को कहना पड़ता है कि हर सवाल का जवाब आप नहीं दे सकते हो और बच्चों को भी मौका मिलना चाहिए।”

कृतिका ने कहा, “कैसे आपको शुक्रिया कहूँ! आप ने तो चित्रांश को पूरा बदल दिया।”

शिखा मैम ने कहा, “नहीं कृतिका वह तो शुरू से ही हीरा था। बस थोड़ा तराशने की जरूरत थी।”


लेखक के बारे में- 


पेशे से चिकित्सक निधि अग्रवाल की रचनाएँ प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। कुछ कहानियों का पंजाबी, गुजराती और बांग्ला अनुवाद हुआ है। वे अपने लेखन में सूक्ष्म मनोभावों के चित्रण के लिए जानी जाती हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पंडित बद्री प्रसाद शिंगलू सम्मान सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। कहानी संग्रह 'अपेक्षाओं के बियाबान',उपन्यास 'अप्रवीणा' काव्य संग्रह ' कोई फ्लेमिंगो नीला नहीं होता ‘ व ' गिल्लू की नई कहानी’ उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। ई-मेल:nidhiagarwal510@gmail.com



कविताः शुक्रिया नन्ही दोस्त!

 -   डॉ. आरती स्मित 

शुक्रिया नन्ही दोस्त!

शुक्रिया  

मुझसे बोलने-बतियाने के लिए


शुक्रिया कि

तुमने नहीं बनाई दूरी

नहीं परोसी उपेक्षा

नहीं उड़ाई खिल्ली

मेरे ठूँठ शरीर की,

जबकि

बसंत ने पहना दी है 

हर एक को

रंग-बिरंगी पोशाक


हरियाते-मुस्काते

हजारों रंगों से आकंठ

भर-भर आते

वे 

मुझे देखते तक नहीं


न ही पास फटकते हैं 

तोता, मैना और कबूतर ही


मतलबी दुनिया का मारा 

मेरा साथी कौआ 

मुझे 

मेरे होने के मायने समझाता है

और दे जाता है उपहार

आत्मीय स्पर्श का


नन्ही दोस्त (डव)!

अब

तुम आई हो   

सुनाने लगी हो बासंती गीत


अपनी नन्ही अँजुरी में 

भर-भरकर नेह

बरसाने लगी हो

इस सूखे, कठुआए 

तन-मन पर


तन अब भी जर्जर है

मन में कोंपल फूटी है

 नैनों में उषा मुस्काई है


मैं सुन पा रहा हूँ

आलिंगन करती हवा का

जीवन- राग


नन्ही दोस्त!

मैं अब जीना चाहता हूँ

सँजोना चाहता हूँ 

कुछ खिलखिलाते लम्हें 


तुम साथ दोगी न?


सम्पर्क: डी 136, गली नं. 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली 110092,  ईमेलः dr.artismit@gmail.com, ब्लॉगः https://smitarti.wordpress.com/


किताबेंः ‘लघुकथा- यात्रा’ लघुकथाओं का दस्तावेज

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

लघुकथा यात्रा: डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’, पृष्ठ: 122, मूल्य: 320 रुपये, ISBN: 978-93-6423-834-2, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे–19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली–110059

संवेदनापरक लघुकथाओं पर केंद्रित नीलाम्बरा के पुस्तक रूप संग्रह ‘लघुकथा- यात्रा’ के अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ। यहाँ पढ़ने के बजाय अध्ययन शब्द- प्रयोग इसलिए समीचीन है; क्योंकि यह संग्रह अध्येताओं, शोधार्थियों के लिए न केवल एक महत्त्वपूर्ण शोध सामग्री है बल्कि एक पुस्तकालय है जहाँ उन्हें संवेदना की सार्वभौमिक सत्ता की शिक्षा मिलती है, जो जीवन- जगत् के लिए अपरिहार्य है। 

आज के मशीनी युग में मानवीय संवेदनाओं का अस्तित्व मिट गया है। व्यक्ति यंत्रवत् अपने भौतिक सुख के लिए दौड़ रहा है। हर किसी के प्रति वह संवेदनहीन है।

संवेदना का महत्त्व बताते हुए संपादकीय में सम्पादक डॉ. कविता भट्ट ने लिखा है– संवेदना साहित्य की आत्मा है।

72 लघुकथाकारों की बेजोड़ लघुकथाओं से सुसज्जित यह संग्रह मानवीय मूल्यों की एक पाठशाला है।

ख्यातिलब्ध कथाकार व अनुवादक सुभाष नीरव के लेख से लघुकथा की रचना- प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

संग्रह की पहली लघुकथा ‘राष्ट्र का सेवक’ (प्रेमचन्द) में सामाजिक विषमता व जातिवाद का चित्रण है। राष्ट्र का सेवक सबको समान मानता है; परन्तु जब उसकी बेटी निम्न जाति के युवक से विवाह की इच्छा जताती है, तो वह अपने भीतर छिपे असमानता के सच और सामाजिक मान्यताओं की विडम्बना को उजागर करता है।

लघुकथा ‘फ़र्क’ (विष्णु प्रभाकर) में जानवरों के माध्यम से आपसी मानवीय भेद के परिहार का संदेश निहित है।

अंजू खरबंदा की लघुकथाओं ‘खिड़की’, ‘खाली पलंग’ में क्रमशः सामान बेचने वालों की भावनात्मक स्थिति और ससुराल पक्ष द्वारा निर्मित सम्बन्धों को जोड़ता एक मजबूत पुल है। लघुकथा ‘ख़ूबसूरती’ (डॉ. उपमा शर्मा) समाज में व्याप्त सौंदर्य की संकीर्ण परिभाषा को चुनौती देती है। ‘जल संरक्षण’ (कमला निखुर्पा) जल संरक्षण की महत्ता और व्यक्ति के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। 

‘कुलच्छन’ (डॉ. कविता भट्ट) सामाजिक मूल्य, धार्मिकता और व्यक्तिगत आचरण के मध्य के अंतर का आवरण हटाकर सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य की कथनी और करनी में कितनी भिन्नता है। लघुकथा ‘हैप्पी मदर्स डे’ (कृष्णा वर्मा) आधुनिक जीवन की व्यस्तता और अकेलेपन का भाव दर्शाते हुए बहू की परिवार के प्रति संवेदनशीलता से एक भावनात्मक मोड़ लाती है।

लघुकथा ‘लड़की’ (प्रेम गुप्ता मानी) में समाज की भीतरी मानसिकता झलकती है। कथानक मानव स्वभाव का बखान करता है कि कैसे बिना जानकारी के लोग एक-दूसरे का मूल्यांकन करते हैं।

संवेदनशील लघुकथा ‘उड़ान’ (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) अकेलेपन और उपेक्षा का दर्द बयान करती है।  इन्हीं की ‘ख़ुशबू’ लघुकथा एक महिला की कुंठा और अकेलेपन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर उस सामाजिक ढाँचे को दर्शाती है जिसमें महिलाओं की समर्पित भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है; कथा के उत्तरार्ध में गुलाब जीवन की ओर बढ़ने का पर्याय है। ‘ख़ूबसूरत’ लघुकथा सिखाती है कि वास्तविक सुंदरता व्यक्ति के आंतरिक गुणों में होती है। ‘गंगा स्नान’ की वृद्ध महिला पारो गंगा स्नान के लिए रखे पैसे स्कूल निर्माण हेतु दान कर शिक्षा को व्यक्तिगत लाभ से अधिक महत्त्व देते हुए संदेश देती है कि सच्चा ‘गंगा स्नान’ उस सेवा में है, जो हम समाज के लिए करते हैं। धारणा, कमीज और टुकड़खोर भी गहन भावबोध की लघुकथाएँ हैं।

लघुकथा ‘कसौटी’ (रश्मि विभा त्रिपाठी) में विवाह संस्था के पारंपरिक नियमों पर प्रश्न करती एक युवा महिला की परिष्कृत सोच है। ‘मंजिलें लाँघता दर्द’ (शशि पाधा) लघुकथा में दादी और पोते के बीच का भावनात्मक सेतु है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव की मार्मिक लघुकथा ‘इकतीसवाँ दिन’ में आज के सम्बन्धों के क्षरण का सटीक विश्लेषण है। डॉ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘दिखावा’ में युवा पीढ़ी का सामाजिक पाखण्ड और मानवता के प्रति एक विरोधाभासी दृष्टिकोण है।

लघुकथा (सुकेश साहनी) ‘संस्कार’ पिता-पुत्र के रिश्ते और पारिवारिक जिम्मेदारियों को दर्शाती एक गहन भावनात्मक यात्रा है, जो पहले पारिवारिक रिश्तों की उपेक्षा और फिर कर्तव्यबोध के मार्ग पर ले जाती है। ‘धुँए की दीवार’ बँटवारे और उसके परिणामों पर प्रकाश डालते हुए, अंत में पुनर्मिलन की संभावना प्रकट करती है। कथा में बेटी और चाचा के बीच का निश्छल प्रेम, बँटवारे की दीवार को भेदकर इस सकारात्मक विचार को दृढ़ करता है कि यदि प्रेम, सद्भावना हो, तो रिश्तों की दीवारें भी धुँए की तरह उड़ सकती हैं। ‘पितृत्व’ दोहरी मानसिकता को दर्शाती लघुकथा है।

लघुकथा ‘मुक्ति’ (सुदर्शन रत्नाकर) में एक बेटे के आंतरिक संघर्ष और माँ की गम्भीर मानसिक स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। क्या सच में मुक्ति वही थी, जो उसे चाहिए थी?

डॉ. सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘ज़िंदा का बोझ’ एक गहन सामाजिक, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। हिंसक प्रवृत्ति के पीर साहब की हत्या होने पर सारे समाज का ध्यान जाता है, जबकि बेटी तक के प्रति उसकी कामुक प्रवृत्ति का किसी को पता नहीं। हिंसा झेलते हुए पल- पल मरती गुलाबो को किसी ने नहीं देखा। ‘ज़िंदा का बोझ’ शब्द में उसका भारी मानसिक संघर्ष दबा है।  

डॉ. हरदीप कौर सन्धु की हृदयस्पर्शी लघुकथा ‘ख़ूबसूरत हाथ’ में करमो का नजरिया मातृत्व और श्रम को गरिमामय बनाता है।

‘लघुकथा यात्रा’ संग्रह पाठकों को लघुकथा की अद्भुत दुनिया में ले जाता है। एक यायावर की तरह संवदनाओं की खोज में निकली संग्रह की ये उत्कृष्ट लघुकथाएँ पाठक को उस मोड़ पर ले जाती हैं, जहाँ वह एक नए दृष्टिकोण का सामना करता है। लघुकथा के विकास, तकनीकी विश्लेषण सम्बन्धी लेख, महत्त्वपूर्ण संग्रहों की समीक्षा और अनुवाद सामग्री सहेजे अध्येताओं और शोधार्थियों को लघुकथा की अनंत संभावनाओं की मंजिल की ओर ले जाती साहित्य- जगत् की इस लघुकथा- यात्रा के सम्पादन हेतु आदरणीया ‘शैलपुत्री’ जी को साधुवाद।

जीवन दर्शनः रोवन एटकिंसन उर्फ़ मिस्टर बीन

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

ये कह के दिल ने मेरे हौसले बढ़ाए हैं
ग़मों की धूप के आगे खुशी के साए हैं 
- जीवन में हर चीज़ पर हमारा अधिकार नहीं होता। भले ही वह हमारा व्यक्तित्व हो या अन्य कुछ। अपनी नैसर्गिक अच्छाइयों एवं कमियों के साथ हमारा धरती पर आगमन होता है। सफलता की एकमात्र शर्त सिर्फ यही है कि एक ओर जहाँ हम अपनी अच्छाइयों का लाभ उठाएँ, वहीं दूसरी ओर कमियों का साहस के साथ सामना करते हुए विजय प्राप्त करें।
- रोवन एटकिंसन मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे और बचपन में हकलाने की वजह से उन्हें बहुत तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा। स्कूल में भी उनके लुक की वजह से उन्हें चिढ़ाया और मजाक उड़ाया जाता था। सब उन्हें एलियन जैसा समझते थे। जल्द ही उन्हें एक अजनबी के तौर पर पहचाना जाने लगा और वे एक बहुत ही शर्मीले एवं एकाकी बन गए, जिनके ज़्यादा दोस्त नहीं थे; इसलिए उन्होंने विज्ञान की तरफ़ रुख किया।
- उनमें कुछ भी ख़ास नहीं था, लेकिन उन्होंने सभी को गलत साबित कर दिया। फिर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद उन्हें अभिनय से प्यार होने लगा, लेकिन बोलने की बीमारी के कारण वे असफल रहे। उन्होंने किसी भी टीवी शो में आने से पहले इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने अपने सपने को पूरा करने एक अभिनेता बनने का फैसला किया। एक कॉमेडी ग्रुप में दाखिला लिया, लेकिन उनकी हकलाहट उनके रास्ते में आ गई।
- बहुत से टीवी शो ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। वह बहुत निराश महसूस करते थे, लेकिन कई अस्वीकृतियों के बावजूद उन्होंने खुद पर विश्वास नहीं छोड़ा। उन्हें लोगों को हँसाने का बहुत शौक था और जानते थे कि वह इसमें बहुत अच्छे हैं। उन्होंने अपने मूल कॉमेडी स्केच पर अधिक ध्यान केंद्रित करना शुरू किया और उन्हें एहसास हुआ कि जब भी वह कोई किरदार निभाते हैं, तो धारा प्रवाह बोल सकते हैं।
- उन्होंने अपनी हकलाहट पर काबू पाने का तरीका ढूँढ लिया और इसका इस्तेमाल अभिनय के लिए प्रेरणा रूप में किया। अपनी पढ़ाई के दौरान रोवन एटकिंसन ने मिस्टर बीन के नाम से जाने जाने वाले अजीब, असली और किरदार का सह-निर्माण किया।
- उन्हें अन्य शो में भी सफलता मिली। जिसने बीन को विश्व स्तर पर प्रसिद्ध बना दिया और अपनी शक्ल और बोलने की बीमारी के कारण आने वाली सभी बाधाओं के बावजूद साबित कर दिया कि बिना किसी हॉलीवुड चेहरे के आप दुनिया के सबसे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक बन सकते हैं। 
- यही है रोवन एटकिंसन की सफलता की प्रेरणादायी कहानी, जो यह सीखाती है कि जीवन में सफल होने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीजें हैं जुनून, कड़ी मेहनत, समर्पण और कभी हार न मानना अपनी भावनाओं और कमजोरियों की परवाह किए बिना।
- निष्कर्ष : कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण पैदा नहीं होता। डरो मत। लोग अपनी कमजोरियों और असफलताओं के बावजूद हर दिन अद्भुत चीजें हासिल कर सकते हैं। इसलिए जाओ और अपने पास मौजूद जीवन के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ करो।
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

Nov 1, 2024

उदंती.com, नवम्बर- 2024

 वर्ष- 17, अंक- 4

शुभ दीपावली

आओ अँधकार मिटाने का हुनर सीखें हम

कि वजूद अपना बनाने का हुनर सीखें हम

रोशनी और बढ़े, और उजाला फैले

दीप से दीप जलाने का हुनर सीखें हम

- शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

इस अंक में

अनकहीः गाँव की बात... -डॉ.  रत्ना वर्मा

आदरांजलिः रतन टाटा - संवेदनशीलता का सफ़रनामा - विजय जोशी

पर्व- संस्कृतिः कैसे करें माँ लक्ष्मी की आराधना - रविन्द्र गिन्नौरे

कविताः अँधियार ढल कर ही रहेगा - गोपालदास ‘नीरज’

जीव जगतः हिमालय के रंग- बिरंगे मैगपाई - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

धरोहरः रहस्यमयी लेपाक्षी मन्दिर - अपर्णा विश्वनाथ

प्रेरकः सपने  सच  होंगे - निशांत

कहानीः आशंका - डॉ. परदेशीराम वर्मा

कविताः रातों रात बदल गई नीयत... - सुधा राजा

व्यंग्यः देखने का नया उपकरण - गिरीश पंकज

नवगीतः महानगर - रमेश गौतम

लघुकथाएँः 1. लौह-द्वार, 2. अपराधी, 3. असभ्य नगर  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

संस्मरणः आह से वाह होने लगी ज़िंदगी - कृष्णा वर्मा

कविताः बनाये घर - डॉ. शैलजा सक्सेना

किताबेंः ...सम्यक मूल्यांकन ‘अपने अपने देवधर’ - डॉ. राघवेंद्र कुमार दुबे

वन्य जीवनः ...प्रकृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की कला - सीताराम गुप्ता

लघुकथाः अनावरण, 2. तरकीब - उपमा शर्मा

कविताः तुम यहीं  कहीं हो  - शुभ्रा मिश्रा

पर्यावरणः ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने काष्ठ तिज़ोरियाँ