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Apr 1, 2024

कविताः बाट जोहते चौखट

 





 -  शुभ्रा मिश्रा


बाट जोहते दरवाजे

अपलक निहारतीं खिड़कियाँ

अपने बच्चे को गोद में लेने के लिए         

व्याकुल मेरा आँगन

जैसे ही मैं गई

चारों तरफ से आवाजें गूँज रही थीं

बचिया! बचिया! बचिया!

ऐसा लगा जैसे माँ पुकार रही हो!

बाबूजी आवाज दे रहे हों!

दादी कहानी सुना रही हो!

बाबा दौड़कर मुझे गोद में उठा लिये हों!

सब कुछ वैसा ही था 

जैसा मैं वर्षों पहले यहाँ से 

विदा होते समय छोड़ गई थी

 त्याग ना सकी मैं कुछ भी                             

मेरे भीतर आज भी सब कुछ वैसे ही जीवंत है

आज भी चारों दिशाओं ने मेरा स्वागत किया

गिरती हुई दीवारों में आज भी 

वही शक्ति है

थाम लिया उसने मुझे!

मुझे फिर गिरने से बचा लिया उसने

सहेलियों के साथ बिताए अनगिनत किस्से

दीवारों को अब भी याद है!

तुलसी का चबूतरा वहीं है

लगा कि माँ सूर्य को जल देकर

चौरे की परिक्रमा कर रही है!

मैं भी उसका आँचल पकड़ उसके पीछे- पीछे 

चल रही हूँ

गाय के साथ उसकी बछिया 

निहार रही है मुझे

बाबूजी हम सभी के लिए लाए हों               

रंग बिरंगी ढेर सारी टॉफियाँ 

हम सभी एक ही रंग के लिए 

मचा रहे हैं धमा-चौकड़ी

कोई चढ़ जाता बाबा के कंधे पर

तो कोई दादी की सुरक्षित गोद में

कोई माँ के आँचल में 

तो कोई बाबूजी के पीछे

सब कुछ तो वैसा ही था

जब अचानक किसी ने पूछा-

कब आई??

तो देखा

बदल गए हैं चौखट के पहरेदार!

प्रेरकः जीवन कितना न्यायपूर्ण है

  - निशांत

कभी किसी गाँव में एक लड़का नदी के किनारे चल रहा था। उसे किसी की मदद की पुकार सुनाई दी।

“मुझे बचाओ, मुझे इस जाल से बाहर निकालो, मेरी मदद करो”- एक मगरमच्छ चिल्ला रहा था। वह किसी जाल में उतनी ही बुरी तरह फँस गया था, जैसे कोई मनुष्य विषयों के जाल में फँस जाता है।

लड़का मगरमच्छ की मदद करना चाहता था; लेकिन भयभीत था। उसने कहा, “यदि मैंने तुम्हारी मदद की, तो तुम मुक्त होते ही मुझे खा जाओगे।”

मगरमच्छ ने रोते हुए कहा, “मैं भला अपने प्राणों की रक्षा करने वाले को क्यों मारूँगा? मगरमच्छ इतने कृतघ्न नहीं होते। मैं वचन देता हूँ कि मैं तुम्हें स्पर्श भी नहीं करूँगा और सदैव तुम्हारा ऋणी रहूँगा।”

लड़के को दया आ गई और वह जाल काटने लगा। अभी मगरमच्छ का सिर जाल से बाहर निकला ही था कि उसने लड़के का पैर अपने जबड़े में दबा लिया और बोला, “मैं कई दिनों से भूखा हूँ…”

“यह क्या कर रहे हो!”, लड़का चिल्लाया- “तुम बहुत दुष्ट हो। मेरी भलाई का मोल तुम इस तरह चुका रहे हो!”

“मैं कर ही क्या सकता हूँ? यह तो दुनिया की रीत है! ज़िंदगी ऐसी ही होती है!”, मगरमच्छ ने कहा।

“लेकिन यह अच्छी बात नहीं है!”, लड़के ने रोते हुए कहा।

“अच्छी बात नहीं है से तुम्हारा क्या मतलब! किसी से भी पूछो, तो वह तुम्हें बताएगा कि संसार ऐसे ही चलता है। यदि तुम मुझे गलत साबित कर दोगे, तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।”

लड़के ने पास ही पेड़ पर एक चिड़िया बैठी देखी और उससे पूछा, “क्या तुम्हें इस मगरमच्छ की बातें उचित जान पड़ती हैं? क्या दुनिया की रीत इतनी ही अन्यायपूर्ण होती है?”

चिड़िया यह सारा प्रकरण देख रही थी। उसने कहा, “मगरमच्छ सही कह रहा है। भलाई के एवज में हमेशा भलाई नहीं मिलती। मैंने अपने चिड़े के साथ मिलकर इस पेड़ पर अपने बच्चों को आँधी-तूफान से बचाने के लिए मजबूत घोंसला बनाया; लेकिन साँप हमेशा मेरे अंडे खा जाता था। यह दुनिया ऐसी ही है। यहाँ वफादारी की कोई उम्मीद मत रखो”।

“तुमने सुन लिया, बच्चे” -मगरमच्छ ने कहा, और लड़के के पैर को ज़ोरों से दबाते हुए कहा, “अब मैं तुम्हें खाऊँगा।” 

“ठहरो…”, लड़के ने एक गधे को किनारे पर घास चरते देखा और उससे भी वही सवाल किया।

“दुर्भाग्यवश, मगर की बात सही है,” गधे ने कहा, “मैं गधा हूँ और सब समझते हैं कि मैं मूर्ख हूँ ; लेकिन मुझे भी यह पता है कि दुनिया बिल्कुल भी न्यायपूर्ण नहीं है। भले लोगों के साथ हमेशा बुरी चीजें होती रहती हैं। जब मैं जवान था, तब मेरा मालिक मुझ पर गीले कपड़े लाद देता था और मुझसे खूब काम कराता था। मैंने कई साल तक उसकी सेवा की। जब मैं बूढ़ा और कमजोर हो गया, तो उसने मुझे यह कहकर छोड़ दिया कि वह मुझे खिला नहीं सकता। , तो मगरमच्छ सही कह रहा है। दुनिया में घोर अन्याय, असमानता, और अनैतिकता है।”

“बहुत हो गया,” मगरमच्छ ने लड़के से कहा, “मैं भूख से मरा जा रहा हूँ। अब मैं और नहीं रुक सकता। तुम अपने भगवान को याद कर लो।”

“रुको-रुको,” लड़के ने कहा, “बस मुझे आखिरी बार खरगोश से पूछने दो। लोग कहते हैं कि कोई भी काम तीसरी बार करने पर परिणाम शुभ होता है।”

“चूँकि तुमने मुझे बचाया है, तुम्हें अंतिम अवसर, तो देना ही पड़ेगा”, मगरमच्छ ने कहा।

लड़के ने खरगोश को सारी बात बताई। खरगोश का उत्तर चिड़िया और गधे के उत्तर का बिल्कुल उल्टा था।

खरगोश ने कहा, “यह सरासर गलत है! ऐसा नहीं होता। दुनिया कतई अन्यायपूर्ण नहीं है।”

“तुम क्या कह रहे हो, मूर्ख खरगोश!”, मगरमच्छ ने कहा, “यह दुनिया बिल्कुल भी न्यायपूर्ण नहीं है। मुझे ही देखो! मैं अकारण ही इस जाल में फँस गया।”

खरगोश ने कहा, “ठीक से बोलो। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे तुम पान खाकर बोल रहे हो। मैं तुम्हारी बात नहीं समझ पा रहा हूँ। साफ-साफ बोलो और जोर से बोलो।”

मगरमच्छ ने कहा, “तुम मुझे बेवकूफ समझते हो! मैं जोर से बोलने के लिए मुँह खोलूँगा, तो यह लड़का मेरी पकड़ से छूट जाएगा।”

“क्या तुम सच में इतने बेवकूफ हो?”, खरगोश ने कहा, “तुम्हें पता है न कि तुम्हारी पूँछ कितनी शक्तिशाली है? वह भागने की कोशिश करेगा, तो तुम पूँछ के एक वार से ही उसे ढेर कर सकते हो। तुम जितना ताकतवर यहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं है!”

मगरमच्छ खरगोश के बहकावे में आ गया और उसने अपनी बात साफ-साफ कहने के लिए मुँह थोड़ा और खोला।

खरगोश चिल्लाया, “भागो लड़के, भागो! दूर तक भाग जाओ!”, और लड़का सरपट भाग लिया।

मगरमच्छ गुस्से से पागल हो गया, “धोखेबाज खरगोश! तुमने मेरा खाना खराब कर दिया। यह बहुत बुरा हुआ!”

“यह तुम कह रहे हो!”, खरगोश ने पेड़ से टपके फल को कुतरते हुए कहा।

लड़का भागकर अपने गाँव पहुँचा और सभी को पूरी बात बताई। वे लोग बरछी-भाले लेकर आए और मगरमच्छ को मार दिया।

किसी के साथ आए पालतू कुत्ते ने खरगोश को देखा और उसके पीछे दौड़ पड़ा।

“रुको-रुको!”, लड़का चिल्लाया और उसने कुत्ते को रोकने की कोशिश की। “इस खरगोश ने मेरी जान बचाई है। इसे मत मारो; लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुत्ते ने खरगोश की गर्दन अपने मुँह में दबा ली थी। खरगोश मर गया।

“अंततः मगरमच्छ की बात सही साबित हुई”, लड़के ने दुखी मन से कहा, “यही दुनिया की रीत है! ज़िंदगी ऐसी ही होती है!”

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इस कहानी के मार्फत मैं आपको क्या बताना चाहता हूँ?

जीवन यदि अन्यायपूर्ण है, तो सबके लिए है। इस हिसाब से जीवन सबके लिए एक समान है और न्यायपूर्ण है।

                    ■

जीवन दर्शनः मनवा भीतर क्यों ना झाँके

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

   धरती पर आदमी का पदार्पण ईश्वर प्रदत्त समस्त सुख, सुविधा, संसाधन के साथ होता है एक निश्चित कर्तव्य बोध के साथ, जिसमें सहायक हैं बुद्धि, विद्या, विवेक की थाती। अब संपादन के भी दो अवयव हैं। पहला शरीर जिसे आप हार्डवेयर कह सकते हैं और दूसरा अंतस या आत्मा जिसे आप सॉफ्टवेयर कहा जा सकता है। अंतस कभी झूठ नहीं बोलता और दुविधा के पलों में हमें विवेकयुक्त सही सटीक परामर्श प्रदान करता है। पर बाहरी चकाचौंध से ग्रस्त आदमी क्षुद्र स्वार्थवश उसे अनसुना कर देता है। कहा भी गया है आदमी सबसे तो मिल सकता है, लेकिन अपने भीतर झाँकने से डरता है। यही है समाज में भले बुरे का वर्गीकरण।

     एक बार भगवान विष्णु स्वरचित सृष्टि को परखने जब पृथ्वी पर जाने लगे तो लक्ष्मी ने उन्हें यह कहकर रोकने का प्रयास किया कि  मनुष्य यदि धूर्त न निकलें तो ही लौटना अन्यथा उनके बीच ही रह जाना।

     धरतीवासियों ने जब सुना कि विष्णु स्वयं पधार रहे हैं तो उनके आगमन पूर्व ही अपार भीड़ एकत्रित हो गई और उनके पदार्पण पर धर्म कर्म पालन के प्रश्नों के बजाय खुद की मनोकामना पूर्ति हेतु आग्रह करने लगे।

      पुरुषों की इस लोभ लिप्सा से त्रस्त विष्णु ने बद्रीनाथ पर्वत की ओर प्रस्थान कर दिया लेकिन लोग वहाँ भी पहुँच गए तो वे दुखी होकर समुद्र मध्य द्वारिका में जाकर अदृश्य रूप से स्थापित हो गए; किंतु लज्जावश लक्ष्मीजी के पास नहीं लौटे।

      फिर चिंतित होकर उन्होंने महर्षि नारद से पूछा : ये कैसे लोग हैं, , जो केवल लालच की रट लगाते रहते हैं और कर्तव्य पालन की उपेक्षा। इसलिए कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं चैन से रह सकूँ।

      और फिर नारद ने , जो उत्तर दिया वह अद्भुत था : आप मनुष्य के हृदय में बस जाइए। , जो बहिर्मुखी, स्वार्थी होंगे उनकी दृष्टि भीतर तक न पहुँचेगी और , जो विवेकी तथा आत्मदर्शी होंगे वे आपको तुरंत ढूँढ लेंगे।

     तब से ईश्वर मनुष्य के मन में ही समाए हुए हैं, पर अंदर झाँकने की फुर्सत ही किसे है।

      मित्रों यही है वह मूलमंत्र जिसकी व्याख्या महात्मा गांधी ने की थी कि दुविधा के पलों में यदि हम इधर- उधर की बजाय केवल अपने अंदर ही झाँक सकें तो उत्तर अपने आप मानस पटल पर उभर जाएगा।  पर उसके लिए चाहिए शुद्ध, निर्मल मन और सोच-

बाहर की तू माटी फाँके, 

भीतर मनवा क्यों ना झाँके।  

                                                   ■

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Mar 7, 2024

उदंती.com, मार्च - 2024

वर्ष - 16, अंक - 8

प्रेम

विपदाएँ आते ही,

 खुलकर तन जाता है

हटते ही, 

चुपचाप सिमट ढीला होता है;

वर्षा से बचकर,

 कोने में कहीं टिका दो,

प्यार एक छाता है, 

आश्रय देता है, गीला होता है।

                  - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना     

इस अंक में

अनकहीः रंगों और उमंगों की बौछार - डॉ. रत्ना वर्मा

विकासः असुरक्षित बाँधों को हटाना आवश्यक है - हिमांशु ठक्कर

जीवन दर्शनः महाभारत: मैं से मुक्ति - विजय जोशी

पर्व - संस्कृतिः छत्तीसगढ़ में होली- चली फगुनाहट बौरे आम... - डॉ. परदेशीराम वर्मा

बाल कविताः होली की धूम - डॉ. कमलेंद्र कुमार

महिला दिवसः स्त्री - पुरुष असमानता और हमारा समाज - डॉ. सुरंगमा यादव

कविताः  कितना कुछ कर जाती है औरत  - विजय जोशी

पर्व- संस्कृतिः शिव मंदिरों का एक सीधी रेखा में बने होने का रहस्य - प्रमोद भार्गव

कविताः  परवाज़ - प्रणति ठाकुर

फिल्मः भारतीय सिनेमा की आवाज़ को 93 वर्ष पूरे - डॉ. दीपेंद्र कमथान

कविताः ठोकरों की राह पर - लिली मित्रा

लघुकथाः क्वालिटी टाइम - अर्चना राय

बांग्ला कहानीः वह पेड़ - ऋत्विक घटक , अनुवाद - मीता दास

लघुकथाः अथ विकास कथा - सुकेश साहनी

व्यंग्यः अर्थों का दिवंगत होना - डॉ . गिरिराजशरण अग्रवाल

किताबेंः अनुवाद  मूल रचनात्मकता से बड़ा काम होता है - सुभाष नीरव

दोहेः उड़त अबीर गुलाल -  ज्योतिर्मयी पंत

रपटः वार्षिक उत्सव- रोजगारमूलक शिक्षा मुख्य उद्देश्य - उदंती फीचर्स

विशेष लेखः छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण के लिए बड़ा कदम - डॉ. दानेश्वरी संभाकर

आलेखः महतारी वंदन योजना- महिलाओं को मिली खुशियों की गारंटी - श्रीमती रीनू ठाकुर

शोधः वृद्धावस्था थामने की कोशिश

अनकहीः रंगों और उमंगों की बौछार

 - डॉ. रत्ना वर्मा

इस बार फागुन में रंगों के बौछार तो होगी ही, साथ ही एक और भारी बौछार होने वाली है और वह है चुनावी बौछार। होली का त्योहार तो दो दिन की रंगों भरी मस्ती धमाल के बाद समाप्त हो जाएगा और रंग भी दो दिन में फीका पड़ जाएगा, परंतु चुनावी बौछार दो दिन की नहीं होती। चुनाव की तारीख की घोषणा होने के साथ ही मतदान के दिन तक  चुनावी वादों, इरादों और लुभावने भाषणों की बौछार लगातार चलती ही रहेगी। यह तभी रुकती है, जब  तक नतीजे सामने नहीं आ जाते। 

 इन दिनों के चुनाव रंग और फागुनी रंग में एक और समानता देखने को मिल रही है और वह है – होली में विशेषकर ब्रज की होली में  हास- परिहास के साथ गारी गीत गाने की परंपरा है, जिसका लोग बुरा नहीं मानते। उन्हें  होली गीतों की गाली गाली नहीं लगती वह प्रेम के रंगों में पगा कटाक्ष होता है, जो माधुर्यरस से भरा होता है। कुछ इसी तर्ज पर चुनावी भाषणों और राजनेताओं के वक्तव्यों में देखने को मिलता है; पर यहाँ  दोनों में भारी अंतर है। चुनावी गालियों ने तो सारी सीमाएँ लाँघ दी हैं। लोग एक दूसरी पार्टियों की और व्यक्तियों की ऐसी छीछालेदर करते हैं कि यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या हम उसी देश के नागरिक हैं, जो अपनी संयमित भाषा, भव्य सांस्कृतिक विरासत और एकता के लिए पहचाने जाते हैं। जबकि यह हम सब जानते हैं- भाषा में संयम रखना हमारी सांस्कृतिक समृद्धि के लिए बहुत आवश्यक है।  किसी संप्रदाय को राष्ट्र के ऊपर बताना, वर्ग विशेष को आहत करने के लिए टिप्पणी करना, ये सब देश को कमजोर करने वाले वक्तव्य हैं, ऐसी बातों से जनता का विश्वास आहत होता है।  

जिस प्रकार आज के समय में होली सिर्फ हुड़दंग मचाने, पार्टी करने और खाने- पीने के अलावा रेन डांस जैसे हंगामों में लाखों गैलन पानी बहाने तक ही सिमटकर रह गई है, उसी तरह चुनावी रंग भी बदरंग हो गए हैं। यद्यपि चुनावी रंग और होली के  इस रंग में भी जमीन- आसमान का अंतर है, चुनावी रंग में जनता अपने मत और विचार व्यक्त करती है तथा देश के भविष्य का रंग- रूप  सब मिलकर तय करते हैं,  जबकि फागुन के त्योहार होली में लोग आपसी भाईचारे के साथ एक दूसरे के जीवन में प्रेम और उमंग का रंग भरते हैं। हाँ इतना अवश्य कह सकते हैं कि चुनाव और होली दोनों में ही एकता और विविधता का महत्त्व होता है। तो क्यों न इसी महत्त्व को देखते हुए हम भारतीय संस्कृति के अपने मूल स्वरूप, जिसमें कभी होता था गीत- संगीत, नाच- गान, उमंग- उत्साह जो सामाजिक एकता को बढ़ावा देने में प्रमुख भूमिका निभाता था,  उसे एक बार फिर से जगाएँ, ताकि इस त्योहार को प्रेम और सौहार्द के साथ मनाते हुए अपने परिवार और समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर रंग बिरंगी खुशियों का आनंद ले सकें।  

तो फागुनी माहौल तो बनने लगा है  फिर वह रंग चाहे चुनावी हो या फागुनी, क्यों न इसे अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए गुम हो चुकी कुछ परम्पराओं को पुनर्जीवित करते हुए एक स्वस्थ माहौल का निर्माण करें और इसे एक सामाजिक और राष्ट्रीय अनुष्ठान के रूप में मनाकर समृद्धि और सहयोग के मूल सिद्धांतों से जोड़ दें। जैसे - सामूहिक रूप से वृक्षारोपण करके, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करके, पानी बचाओ अभियान चलाकर, जनसंख्या नियंत्रण के लिए पहल करके और शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे रचनात्मक काम करके इन दोनों ही उत्सव को रंगारंग बना सकते हैं।  सोने में सुगन्ध तो तब हो जाएगी, जब  परंपरागत गीतों, कथाओं, और पौराणिक किस्सों को नई पीढ़ी के साथ साझा करते हुए अपने मौलिक सिद्धांतों को भी बचाए रखें। 

इन सबके लिए अलग से कोई विशेष प्रयास करने की जरूरत भी नहीं होगी। आप होली के लिए पकवान बनाते ही हैं, रंग गुलाल का आयोजन भी करते हैं, दोस्तों के घर जाते हैं या थीम पार्टी करते हैं, बस इन्ही के बीच किसी एक विषय को केन्द्र में रखकर उत्सव का कलेवर बदल दें।  यही बात चुनावी उत्सव में भी लागू की जा सकती है। अपनी अपनी पार्टी का एजेंडा लेकर नेता चुनावी सभाएँ करते हैं, गाँव - गाँव में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, तो इन्हीं सबके बीच जनता से मात्र वादे न करके उनकी समस्यओं को गंभीरता से सुनें और निराकरण करने की पहल तुरंत शुरू कर दें न कि वोट के बदले सहायता का अश्वासन दें। इसके लिए  आपको जनता में विश्वास पैदा करना होगा और यह तभी संभव है जब आप अपने प्रति इमानदारी बरतेंगे। 

पैसे और ताकत के बल पर आप चुनाव तो जीत सकते हैं, पर जनता का दिल तभी जीतेंगे, जब उनसे जुड़कर काम करेंगे अन्यथा पाँच साल बाद आप फिर उनके सामने होंगे तब जनता आपको वोट न देकर बता देती है कि आपने कहाँ गलती की है। इसके लिए भी प्रत्येक भारतीय को एक जागरूक नागरिक होने का कर्त्तव्य निभाना होगा। यह तभी संभव होगा जब आपको राजनैतिक पार्टियों के किए हुए कार्यों की, अपने संविधान की, नियम- कानून की, आपके लिए किए जा रहे कार्य योजनाओं की सही जानकारी होगी। 

तो आइए, इन दोनों त्योहारों का स्वागत रंग और उल्लास के साथ करें तथा प्रेम और सौहार्द के साथ रंग खेलेते हुए देश की प्रगति और विकास के लिए अपने बहुमूल्य वोट का इस्तेमाल करें। वैसे ‘आदर्श बाराबंकवी’ के शब्दों में ये बात भी सही है कि- 

कर रहा हूँ फिर सभी सौहार्द की बातें वही,

और ये भी जानता हूँ मानेगा कोई नहीं।

 सुधी पाठकों को चुनावी और फागुनी होली दोनों के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।