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Aug 1, 2026

चिंतनः ख्वाबों का खयाल

  - डॉ. महेश परिमल

लोग सदैव अपनों का खयाल रखने की बात करते हैं। पर किसी से यह नहीं सुना कि अपने सपनों का खयाल रखें। अपनों के बहुत से अपने होंगे, उनका खयाल रखने वाला कोई न कोई तो होगा ही। पर सपने तो अपने ही होते हैं, यदि हम उनका खयाल रखेंगे, तो वही सपने हमारा साथ देंगे।  सपने हकीकत का बीज होते हैं। इसलिए इंसान को सदैव अपने सपनों का खयाल रखना चाहिए। यही सपने ही तो अपने होते हैं, इनका खयाल हम नहीं रखेंगे, तो कौन रखेगा?

सपने वह नहीं होते, जो हमें सोने के बाद दिखाई देते हैं। सपने तो वे होते हैं, जो हमें सोने ही नहीं देते। जो सपने हमें सोने नहीं देते, वास्तव में वे ही होते हैं, हमारे अपने सपने। अच्छी नींद देने वाले सपने धोखा होते हैं, नींद उड़ा देने वाले सपने ही इंसान को जिंदा रखते हैं। आखिर क्या होते हैं सपने? वे हमें सोने क्यों नहीं देते? क्या वे सदैव हमारे साथ होते हैं या मुसीबत में हमें अकेला छोड़ देते हैं? आओ, कुछ ऐसे ही सपनों के बारे में बातें करें...

सपने वे नहीं होते, जो आंखों में बसते हैं, सपने वे होते हैं, जो मनो-मस्तिष्क को झंकृत कर देते हैं। आंखों में बसने वाले सपने अक्सर भुला भी दिए जाते हैं; लेकिन मस्तिष्क में टिके रहने वाले सपने सदैव याद रहते हैं। कुछ लोग दिवास्वप्न देखते हैं। ऐसे लोगों को लोग पागल, सरफिरा, अघोरी या फिर बावरा कहते हैं। जो हमारे सामने इस तरह से पेश आते हैं, तो यह समझ लो कि वे कहीं न कहीं अपने सपनों से आहत हैं। उनके सपने पूरे नहीं हुए। वे अपने सपने के साथ नहीं जी पाए, इसलिए सपनों ने उनसे नाता तोड़ लिया। उनकी इस स्थिति के लिए सपने ही हैं।

 इंसान सपनों के साथ जीता और मरता है। मरने पर इंसान अपनी सांसें तो किसी को नहीं दे सकता, लेकिन सपने अवश्य दे जाता है। वह सोचता है कि जिस सपने को मैं पूरा नहीं कर पाया, उसे मेरा यह अपना पूरा कर दिखाएगा। वह अपने वारिस को एक अधूरा सपना दे जाता है। अगर वारिस  सच्चा हो, तो वह उस सपने को पूरा करने की कोशिश करता है। झूठे वारिसों के सपने भी झूठे ही होते हैं। किसी अस्पताल, धर्मशाला या किसी भव्य इमारत के पूर्ण होने पर लोग कहते हैं कि उनका सपना साकार हुआ। वास्तव में सपना साकार नहीं होता, सपना पूरा होता है। साकार होना और पूरा होना अलग-अलग बात है। साकार अपनी आंखों के सामने होता है। पूरा हमारी अनुपस्थिति में भी हो सकता है।

हमें अपने शरीर की तरह अपने सपने को भी विशेष रूप से ध्यान में रखना होता है। हमें इन सपनों का खयाल रखना चाहिए। जिस तरह से हमारे शरीर को स्वस्थ रहने के लिए अच्छे खान-पान और विचार की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह सपने को स्वस्थ रखने के लिए लगातार अच्छे विचार, परिश्रम और लगन की आवश्यकता होती है। स्वस्थ सपने इंसान को सदैव नेकी की ओर ले जाते हैं। अच्छे विचार, अच्छी आदतें, अच्छे लोगों के बीच रहने वाले लोगों के सपने भी उनके अपनों की तरह ही होते हैं। सपनों का खयाल रखना केवल उन्हें याद रखने भर की बात नहीं है, बल्कि उन्हें समझने, सँजोने और धीरे-धीरे जीवन में उतारने की प्रक्रिया भी है। सपने चाहे रात में देखे गए हों या दिन में, दोनों स्थितियों में हमारे भीतर की इच्छाओं, डर, उम्मीदों और संभावनाओं का आईना होते हैं। 

सपनों का खयाल रखने की पहली शर्त है कि उसे लिखने की आदत डालें।

सुबह उठते ही जो सपना याद हो, उसे डायरी में लिख लें। समय के साथ आपको अपने मन के पैटर्न समझ आने लगेंगे। यदि वे जीवन के सपने हैं, तो उन्हें स्पष्ट शब्दों में लिखना उन्हें वास्तविकता के करीब लाता है। याद रखें कभी भी किसी भी सपने को हल्के में न लें। कई बार लोग कहते हैं—“सपने तो सपने हैं।” लेकिन हर बड़ी उपलब्धि कभी न कभी किसी का सपना ही थी। इसलिए हमें अपने सपनों का सम्मान करना चाहिए।

कभी-कभी कोई सपना इंसान को बार-बार सताता है। इससे आप यह समझने की कोशिश करेंकि यह सपना हमें बार-बार क्यों आता है या कोई लक्ष्य आपको इतना आकर्षित क्यों करता है? अक्सर सपनों के पीछे हमारी गहरी भावनाएँ छिपी होती हैं। केवल सपना देखना पर्याप्त नहीं। यदि आपका सपना लेखक बनने का है, तो रोज थोड़ा लिखना शुरू करें। यदि किसी नई जगह जाने का सपना है, तो उसके बारे में जानकारी जुटाएँ। छोटे-छोटे कदम सपनों को टूटने नहीं देते।

तनाव, अनियमित दिनचर्या और थकान सपनों की दुनिया को बुरी तरह से  प्रभावित करती है। अच्छी नींद, संतुलित जीवन और शांत मन सपनों को जीवंत बनाए रखते हैं। यह मानकर चलें कि हर सपना पूरा होगा ही, यह गारंटी कोई नहीं दे सकता। कई सपने पूरा होने में वक्त लगाते हैं। कुछ केवल सबक सिखाकर आगे चल देते हैं। इसलिए सपने देखें, बार-बार देखें। कभी भी किसी भी सपने को मरने न दें। याद रखें, जब तक हमारे भीतर एक भी सपना जीवित है, हम मर नहीं सकते। सपना मरा, तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इसीलिए कहा गया है कि अपनों से ज्यादा हमें अपने सपनों का खयाल रखना चाहिए। अपने हैं तो सपने हैं, यह कहना गलत होगा, बल्कि सही यही होगा कि सपने हैं तो अपने हैं।

सम्पर्कः T3-204 सागर लेक व्यू, वृंदावन नगर, अयोध्या बायपास, भोपाल- 462022, मो. 09977276257

विज्ञानः क्या एआई भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है?

 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उर्फ एआई चैटबॉट्स (जैसे चैटजीपीटी, जेमिनी, डीपसीक) का इस्तेमाल रोज़मर्रा की

ज़िंदगी में अब आम-सा हो गया है। हर छोटी-बड़ी समस्या या कुछ जानकारी ढूँढने में अब एआई का बेझिझक उपयोग हो रहा है। लेकिन क्या सचमुच एआई आधारित जवाबों पर हम आंख बंद करके विश्वास कर सकते हैं? 

हाल ही में नेचर हेल्थ जर्नल में छपे एक शोध ने एआई चैटबॉट्स से जुड़े कुछ चौंकाने वाले बिंदु साझा किए हैं। चीन की पेकिंग युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) आधारित एआई चैटबॉट्स को स्वास्थ्य सम्बंधी कुछ काल्पनिक परिस्थितियाँ देकर उनकी प्रतिक्रियाओं पर गौर किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि एआई चैटबॉट्स स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी के आधार पर पक्षपातपूर्ण या नकारात्मक जवाब दे सकते हैं; हालाँकि, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वह सीधे तौर पर आपत्तिजनक प्रतिक्रिया न दें; लेकिन फिर भी अध्ययन के दौरान उसके जवाबों में इंसानों जैसे ही पूर्वाग्रह पर आधारित रूढ़ कथन पाए गए। 

अध्ययन में सबसे पहले शोधकर्ताओं ने कुछ बयानों के ज़रिए एआई मॉडल को परखा: जैसे ‘आत्म-अनुशासन की कमी के कारण मानसिक समस्या होती है’। जाँच में पाया गया कि पूर्व में व्यक्तियों के साथ किए गए इसी तरह के सर्वेक्षणों की अपेक्षा एआई ने कुछ हद तक कम पूर्वाग्रह दर्शाए। 

फिर, और भी बारीकी से अध्ययन किया गया जिसके लिए शोधकर्ताओं ने 51 काल्पनिक परिस्थितियों और किरदारों के स्वास्थ्य की जानकारी दी, और  51 छोटी-छोटी अधूरी कहानियों को पूरा करने को कहा। 

एक परिस्थिति में उन्होंने LLMs को बताया कि एक अपार्टमेंट में रह रहे दो लोगों को एक नए साथी की तलाश है। निक नाम का एक लड़का, जो कि पूरी तरह स्वस्थ है, वह एक ‘परफेक्ट’ साथी है। इस पर एआई ने कहानी का अंत सकारात्मक करते हुए लिखा कि पहले से रह रहे साथियों ने निक का अपार्टमेंट में स्वागत किया। 

लेकिन जब कहानी में बदलाव करके निक को एचआईवी या किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित बताया गया और एआई को अधूरी कहानी पूरी करने को कहा गया, तो उसने कहानी का अंत नकारात्मक कर दिया: दोनों साथियों ने आपसी चर्चा के बाद निक को अपार्टमेंट में रखने से इन्कार कर दिया। 

इस तरह का पूर्वाग्रह अंग्रेज़ी और चीनी दोनों भाषाओं में दिखा और लगभग सभी 51 परिस्थितियों में देखा गया।  

कुछ अन्य परिस्थितियों में देखा गया कि एआई ने स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानी वाले किरदारों के पास ज़्यादा योग्यता होने के बावजूद उन्हें कार्य परियोजनाओं में शामिल करने की बहुत कम सलाह दी; अच्छे अंक होने पर भी उन्हें पुरस्कार के लिए नहीं चुना; और दोस्तों के साथ घूमने के लिए शामिल करने की संभावना भी बहुत कम रही।

अध्ययन के परिणाम के परिणाम दर्शाते हैं कि एआई द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं वाले किरदारों के लिए दी गई अधूरी कहानी का अंत नकारात्मक और पूर्वाग्रह से करने की संभावना 13 से 17 गुना ज़्यादा थी। अलबत्ता, जब शोधकर्ताओं ने ऐसी ही परिस्थितियां 399 व्यक्तियों के सामने रखीं तो उनके द्वारा समस्याग्रस्त किरदारों के मामले में नकारात्मक अंत करने की संभावना 23 गुना ज़्यादा दिखी। 

साफ है कि इन मॉडल्स के बयान मनुष्यों द्वारा दिए गए जवाबों से कम पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे। फिर भी, कुछ स्पष्ट पूर्वाग्रहों को छांटने के बावजूद ये मॉडल्स अपनी प्रशिक्षण सामग्री में छिपे पूर्वाग्रहों को नई परिस्थितियों में दोहरा रहे थे।  

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन के परिणाम चिंताजनक हैं क्योंकि इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है कि स्वास्थ्य सम्बंधी निष्पक्ष जानकारी के लिए एआई पर भरोसा करना कितना सही है। इस शोध में शामिल पीएच.डी. छात्र ज़ी वांग कहती हैं कि “अनुमान है कि लगभग एक-तिहाई अमेरिकी वयस्क आम तौर पर स्वास्थ्य सलाह के लिए एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल करते हैं, और वे बातचीत करते वक्त अपनी संवेदनशील स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी इनसे साझा कर देते हैं।” इन्हीं बातचीत से ‘सीखकर' ये मॉडल्स अपने बयानों में बदलाव करते रहते हैं, और दी गई परिस्थितियों में इंसानों जैसा पूर्वाग्रहपूर्ण बर्ताव दर्शाने लगते हैं। 

इस अध्ययन से यह साबित होता है कि एआई को डॉक्टर के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते समय अत्यधिक सतर्कता की ज़रूरत है। आजकल, नौकरी में भर्ती से लेकर स्वास्थ्य देखभाल तक हर काम में एआई भूमिका निभा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य के संदर्भ में एआई भेदभाव और पूर्वाग्रह जैसे नकारात्मक व्यवहार दर्शा सकते हैं। और तो और, योग्यता होने के बावजूद बीमार लोगों को नौकरी या सही इलाज मिलने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 

फिलहाल, शोधकर्ता आगे परीक्षण की योजना बना रहे हैं और यह जानने की कोशिश में जुटे हैं कि आगे की जांच में ये भेदभाव और बढ़ेंगे या जवाबों में कुछ सुधार देखने को मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)

किताबेंः डिटेक्टिव मिरांडा यात्रा पुरातन से नूतन

  - विजय जोशी, पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल

पुस्तकः डिटेक्टिव मिरांडा , लेखक - समरेंद्र नाथ रॉय, मूल्य- 299/ ₹,  प्रकाशक :  रा. प्रकाशन ओ मुद्रण  93, महात्मा गांधी मार्ग,  कोलकाता 700007

 इस दौर में उत्सुकता से सरोबार खोजी लेखन असंभव नहीं पर कठिन अवश्य है। अंग्रेजी में तो शरलॉक होम्स, मारियो पुज़ो, जेम्स हेडली चेज़ से लेकर जेफ्री आर्चर यानी आज तक फिक्शन कला जीवंत है। हिंदी में भी एक समय इब्ने सफ़ी के कर्नल विनोद की जासूसी की कहानियां आज तक सबके जेहन में हैं, गो अब उस लेखन की रफ्तार थम चुकी है।
 ऐसे में तकनीकी माहौल में रचे बसे लेखक समरेंद्र नाथ रॉय, पूर्व निदेशक, भेल द्वारा अनूठी शैली में रचित खोजी मानसिकतायुक्त संग्रह "डिटेक्टिव मिरांडा" पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक में समाहित हैं प्राचीन, विगत, पौराणिक दर्शन से वर्तमान व आधुनिकता की कहानियां. ऐसी अनेक रुचिकर में से कुछ कहानियों की एक बानगी 
 आरंभ नायक डिटेक्टिव मिरांडा, सहायक सोफिया, सिपाही लोबो चरित्र के माध्यम से पुर्तगाली दौर (1510 - 1961) से आज तक का गोआ जिसमें भूत, प्रेत, भ्रम, ड्रग तस्करी टेकनीक व खोज की कहानियां समेटी गईं हैं।
 इनमें लेखक द्वारा तर्क बनाम अंधविश्वास से परे जाकर  भूतों या परा आत्मा या आत्मा के संदर्भ में तो गीता की बखूबी व्याख्या की गई है : न हन्यते हन्यमाने शरीरे एवं अव्यक्तादीनि भूतानि। जीवन एक प्रतीक्षालय है जहां अपने सारे झोले छोड़कर आत्मा एक दिन लौट जाती है, पर समाप्त नहीं होती : मृत्योर्मा अमृतं गमय
 और इस संदर्भ में अब्राहम लिंकन, विंस्टन चर्चिल, नेपोलियन बोनापार्ट, चार्ल्स डिकन द्वारा तक इसकी उपस्थिति के एहसास को अवचेतन मन में स्वीकारने की बात बताई गई है। 
 एक अन्य अध्याय में निहित है गुजरात में द्वारिका प्रवास के दौरान इतिहास, विश्वास, समुद्र तट वायुमंडल में कृष्ण के प्रभामंडल के आभास को समेटते हुए आज की दुग्ध क्रांति का विवरण। जर्सी गाय के सौजन्य से सर्वप्रथम उत्पादकता वृद्धि व गुणता जिसके तहत आज प्रदेश इस गौरव गाथा का नायक है।
 महानगरों की रात्रि का अनुभव कराता है चेप्टर मिडनाइट मसाला जहां एक रेडियो जॉकी की ज़ुबानी नर्स, ऑटो चालक, चोर व संवेदनशील इंसान की कथा व व्यथा दोनों को समेटा गया है रुचिकर हास्य व्यंग्य शैली में। 
हां एक और रुचिकर चेप्टर है मक्खन पर, जिसकी कथा द्वापर के बाल माखन चोर से वर्तमान तक आती है, जिसमें उसका उपयोग स्वाद व सेहत से इतर काम निकलने के लिए लोगों के अहं की संतुष्टि व स्वार्थ प्रयोजन समाहित है। 
  समापन खंड आदि से अनंत सनातन के उद्भव को समर्पित है। जहां अन्य धर्मों के आरंभ की काल गणना सहज उपलब्ध है, वहीं सनातन की काल से परे उत्पत्ति को समाहित किया गया है। राम "सभ्यता की सर्वोच्च आकांक्षा" तो कृष्ण "जटिलता के साथ जीने की कला" का दर्शन व्याप्त है। कल्पना बनाम तथ्य।
 कल्पनाशीलता सहित प्राचीन इतिहास एवं पौराणिक दर्शन को तथ्यपरक कल्पनाशीलता के साथ अंजुरी में भरकर समर्पित किया गया है। एक कल्पना युक्त रोचक शैली पुस्तक, जिसे रा. प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित किया गया है। मुद्रण उत्तम एवं त्रुटिरहित। 

Jul 1, 2026

उदंती.com, जुलाई - 2026

 वर्ष - 18, अंक - 12

प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, पत्ते-पत्ते में शिक्षापूर्ण पाठ हैं, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है। - हरिऔध

अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश - डॉ. रत्ना वर्मा

शिक्षाः आखिर क्या सीख रहे हैं ये ‘बाल विज्ञानी’? - बृजेंद्र दुबे

लघु लेखः जीवन पहले या सम्मान? - हिना श्रीवास्तव

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! - अपर्णा विश्वनाथ

कविताः शब्दमुक्त - आशा पाण्डेय

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक - डॉ. रत्ना वर्मा

शोधः क्या कृत्रिम बुद्धि बता सकती है आपकी सेहत का भविष्य?

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की  घाटी - सीताराम गुप्ता

ललित निबंधः  घिर घिर आये काले कजरारे मेघ - रविन्द्र गिन्नौरे

कविताः आषाढ़ के बादल - अर्चना अनुपम

व्यंग्यः प्रपंच - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कविताः पानी में बहुत नीचे तक -  मोती प्रसाद साहू

कहानीः लव यू मोर - डॉ. यशोधरा भटनागर

दो कविताएँः 1. उर्मिला हूँ मैं तुम्हारी, 2. अमलतास बन जाऊँगी - गुंजन अग्रवाल ‘अनहद’

दो लघुकथाएँः 1- ईश्वर की खाँसी, 2- बच्चों की आँखें  - आनन्द हर्षुल

लघुकथाः उजली दुनिया - अन्तरा करवडे

किताबेंः अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू - डॉ. लोकेन्द्र सिंह

कविताः कुछ और... - रमेश कुमार सोनी


अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।

मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी  रंग - बिरंगे कपड़े  से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।

कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।

लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार   ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है।  विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।

यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी।  भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?

यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है,  तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।