मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 22, 2009

आपके पत्र / मेल बॉक्स

ई-मेल भी प्रकाशित करें
सितम्बर अंक मिला। अंक सदा की भांति अति सुंदर और उपयोगी बना है जिसमें आपका श्रम झलकता है। विविधरंगी उदंती मन को भा गई है। इसके प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। सलाह है कि इसमें पत्र लेखकों के ई मेल पते भी यदि उपलब्ध हों तो अवश्य प्रकाशित किया करें।
- अविनाश वाचस्पति, नई दिल्ली, avinashvachaspati@gmail.com
जनता है भई सब जानती है
बढिय़ा अंक निकालने के लिए बधाई। अनकही/सादगी का व्यापार पढ़ा। दरअसल हमारे नेताओं की सादगी का मखौल इसलिए बनाया जा रहा है कि यह सादगी केवल दिखावा है। करोड़ों रुपये के जीवन में कुछ सौ रुपये की बचत बतला कर हमारे नेता जनता को उल्लू नहीं बना सकते। ये जनता है भई सब जानती है।
-चन्द्रमौलेशवर प्रसाद,cmpershad@gmail.com
विविधता से भरा अंक
 नया अंक काफी अच्छा लगा। आपने इसमें काफी विविधता और व्यापकता ला दी है। इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं।
- डॉ. रमाकांत गुप्ता, मुंबई, drramakant@yahoo.com
ज्ञानवर्धक व रोचक
 पत्रिका प्राप्त हुई। बहुत अच्छी है। सभी विषयों पर इसमें चर्चा की गई है। अनकही में सादगी का व्यापार और व्यंग्य में निलम्बित डॉट काम ज्ञानवर्धक व रोचक है।
- अरून कुमार शिवपुरी, भोपाल
मैं अभी भी दूरदर्शन देखना पसंद करता हूं
दूरदर्शन के 50 बरस का सुनहरा सफर  में महत्वपूर्ण जानकारी  देने के लिये आपका आभार। इतने चैनलों की बाढ़ होने के बावजूद मैं अभी भी दूरदर्शन देखना पसंद करता हूं! सबसे कम उम्र की पोस्ट ग्रेजुएट .... में रश्मि स्वरूप का साक्षात्कार पढ़कर अच्छा लगा है। उदंती टीम व रश्मि जी को बधांईया और ढेरों मुबारकबाद!
- दीपक शर्मा, कुवैत, deepakrajim@gmail.com
विज्ञान संबंधी लेखों को अधिक स्थान दें
सितम्बर माह का अंक बहुत अच्छा है। इसमें पाठकों के जरूरत के अनुकूल सभी प्रकार की पठनीय एवं मनोरंजक सामग्री शामिल है। अनुपम मिश्र के लेख तालाब  में एक समुदाय द्वारा मिलजुल अपनी परंपराओं को संरक्षित रखने की बेहतर जानकारी दी गई है। पत्रिका में विज्ञान से संबंधित लेखों को अधिक स्थान दें।
- ब्रिजेन्द्र एस. श्रीवास्तव, brijshrivastava@rediffmail.com
प्रभावी रचनाएं
उदंती का नया अंक देखा हमेशा की तरह बहुत सुंदर है। गिरीश पंकज, अन्तोन चेखव, डॉ. रामाकान्त गुप्ता व देवी नागरानी सभी की रचनाएं प्रभावी है। उदंती टीम को धन्यवाद।
- जवाहर चौधरी, इंदौर, jc.indore@gmail.com
दोहरी मानसिकता
अभियान/ मुझे भी आता है गुस्सा में बेटी पुकारने में झिझक क्यों  में आपने बिल्कुल सही लिखा है।  आखिर बेटी को बेटा कहकर पुकारा जाए, तभी उसका मान बढ़े, वह घर का बेटा बनकर दिखाए, तभी जिम्मेदार हो, यह हमारी दोहरी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसा करके हम एक बार फिर बेटी को नहीं बेटे को ही मान दे रहे हैं। असल में सारी लड़ाई तभी शुरू हो जाती है जब बराबरी की नौबत आती है, जो जैसा है वैसा रहे, सबको अपना-अपना हक मिले तो तुलना करने की जरुरत ही पड़ेगी।
- वर्षा निगम, दिल्ली, varshanigam@gmail.com

घोंसले में रहने वाला मेंढक

यह तो सभी जानते हैं पंक्षी घोंसला बनाते हैं, लेकिन क्या आपने घोंसला बनाने वाले मेढ़क के बारे में सुना है। भारत के एक वैज्ञानिक ने मेंढकों की तीन ऐसी दुर्लभ प्रजातियां ढूंढने का दावा किया है जो अपने अंडे देने के लिए घोंसले बनाते हैं।
मेंढक की ये प्रजातियां केरल और कर्नाटक की पश्चिमी पहाड़ी श्रंखलाओं के जंगलों में पाई जाती है जहां ख़ूब बारिश होती है।  दिल्ली विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इनवॉयरोंमेंटल स्ट्डीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक एसडी बीजू ने बताया कि पूरी दुनिया से इस तरह की यह पहली रिपोर्ट है और एशिया में इस तरह के मेंढक की यह एकमात्र प्रजाति है, जो कीटों और गर्मी से बचने के लिए घोंसला बनाता है। चमकीला हरा या हल्की लालिमा लिए हुए हरे रंग वाले विलुप्तप्राय प्रजाति के इस मेंढक को एक सदी के बाद फिर से खोज निकाला गया है जो एशिया भर में सिर्फ यहीं पाए जाते हैं
 इनका घोंसला 53 से 80 मिमी लंबा और 28-64 मिमी चौड़ा होता है, जिसमें एक साथ 43 से 72 अंडे समा सकते हंै। इस घोंसले को बनाने में मादा मेढ़क 15 मिनट से आधे घंटे का वक्त लेती है।
वैज्ञानिक को दुर्लभ प्रजाति के इन मेंढकों का पता 20 वर्ष के शोध के बाद चला है। वर्ष 2000 से 2005 के बीच केरल में वयनाड जिले के कलपेट्टा में किए गये इस अध्ययन की रिपोर्ट करेंट साइंस के नए अंक में प्रकाशित हुआ है।
क्या आपने खेले हैं ऐसे अनोखे खेल
जिंदगी में आनंद और उत्साह भरने की कला कोई फिनलैंड वासियों से सीखे। फिनलैंड वासियों ने अपने मनोरंजन के लिए अनेक ऐसे खेल ईजाद किए है जिनके बारे में सुनकर अन्य लोग सोच में पड़ जाते हैं, जैसे मोबाइल फोन थ्रोइंग गेम। पिछले दिनों फिनलैंड में मोबाइल फोन थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप आयोजित की गई। फिनलैंड में आयोजित की जाने वाली अन्य खेल प्रतियोगिताओं में वाइफ कैरीइंग रेस, बूट थ्रोइंग, सौना एन्ड्योरेस जैसे अनेक खेल शामिल है। खास बात यह है कि फिनलैंड वासियों के लिए ये प्रतियोगिताएं मजाक नहीं है, बल्कि इन खेल आयोजनों को लोग बड़ी गंभीरता से लेते है।
मोबाइल फोन थ्रोइंग प्रतियोगिता की शुरूआत वर्ष 2000 में फिनलैंड में अंतरराष्ट्रीय खेल के रूप में हुई। इसके बाद से हर साल इसके आयोजन का सिलसिला बरकरार है। इस खेल में यह देखा जाता है कि आपने कितनी दूरी से मोबाइल फोन फेंका है या उसे फेंकने की आपकी शैली कैसी है। इस खेल में हर प्रकार के मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा सकते है, बस शर्त यह है कि उनका वजन 220 ग्राम या उससे अधिक होना चाहिए।
वाइफ कैरीइंग चैम्पियनशिप  प्रतियोगिता में पुरूषों को अपनी पार्टनर को कंधे पर लादकर दौड़ लगानी होती है। इस रेस में पानी इत्यादि जैसी कुछ बाधाएं भी होती हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक पार करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता।
 बूट थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप के दो बार आयोजक रहे हैरी किनूनन कहते है कि इस खेल की शुरूआत की कहानी तो ज्ञात नहीं है, पर मैं समझता हूं कि शराब के नशे में चूर कुछ लोगों ने अपने जूते उतार कर फेंके होंगे और जब उन्हें इसमें आनंद मिलने लगा, तो यह एक खेल बन गया। वर्ष 1992 में
फिनलैंड में प्रथम बूट थ्रोइंग वल्र्ड र्चैम्पियनशिप आयोजित की गई थी। धीरे-धीरे यह खेल ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी लोकप्रिय हो गया। इस खेल के नियम-कायदे सुनिश्चित करने का कार्य इंटरनेशनल बूट थ्रोइंग एसोसिएशन पर है। बूट थ्रोइंग गेम के लिए इटैलियन मैन्यूफैक्चरर द्वारा खास तौर पर जूते डिजाइन किए जाते है। इस खेल के दौरान इस संबंध में भी कड़ी नजर रखी जाती है कि खिलाडिय़ों ने निषेध वस्तुओं का सेवन तो नहीं किया। फिनलैंड में यह खेल काफी लोकप्रिय है।

Sep 23, 2009

उदंती.com, सितम्बर 2009

उदंती.com , वर्ष 2, अंक 2, सितम्बर 2009
 
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स्वच्छता, पवित्रता और आत्मसम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती।
-महात्मा गांधी
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अनकही: सादगी का व्यापार
समाज/ परंपरा से बनते तालाब - अनुपम मिश्र
बातचीत/ सबसे कम उम्र की पोस्ट ग्रेजुएट ने कहा ....
नींद-शोध/ इन्हें दस घंटे तो सोने दें - विश्वमोहन तिवारी
चर्चा-भाषा/ हिंदी का भविष्य और भविष्य में हिंदी - डॉ. रमाकांत गुप्ता
दूरदर्शन: 50 बरस का सुनहरा सफर- उदंती फीचर्स
शिक्षा-बहस/ ग्रेडिंग प्रणाली: क्या तनाव से बचाएगा - संजय द्विवेदी
पुरातन-मंदिर/ पलारी का ऐतिहासिक सिद्धेश्वर मंदिर - नंदकिशोर वर्मा
सिनेमा-कला/ बदलती फिल्मी दुनिया - अरुन कुमार शिवपुरी
कहानी/ गिरगिट - आंतोन चेखव
ई-पोर्टल/ शिक्षकों के लिए एक मंच
गजल/ शहर में - देवी नागरानी
21वीं सदी के व्यंग्यकार/ निलंबित डॉट कॉम - गिरीश पंकज
किसानों के लिए खुशखबरी/ इसे कहते हैं सादगी
अभियान-मुझे भी आता है गुस्सा/
बेटी पुकारने में झिझक क्यों - सुजाता साहा
वाह भई वाह/ सरकारी काम
इस अंक के लेखक      
आपके पत्र/ इन बाक्स
रंग बिरंगी दुनिया

सादगी का व्यापार

सूखे और महंगाई की मार झेल रहा हमारा देश इन दिनों एक और मार से त्रस्त है, और वह है सादगी की मार। कांग्रेस पार्टी ने अपने सभी जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को निजी जिंदगी में सादगी बरतने तथा अनावश्यक खर्च करने पर रोक की जो सलाह दी है, उस सलाह ने पूरे देश की सोच को एक ऐसे मुद्दे की ओर ढकेल दिया है जिससे आम आदमी का कोई लेना देना ही नहीं है। 
लेकिन फिर भी इस सादगी ने एक मुद्दे का रूप अख्तियार कर लिया है और इसे लेकर एक बहस ही छिड़ गई है। देश की गंभीर समस्याएं एक तरफ और सादगी पर बहस एक तरफ। क्या टीवी क्या अखबार सब के सब इस विषय को इस तरह हाथो- हाथ उठा रहे हैं, मानों देश के सामने ऐसा गंभीर सवाल उठ खड़ा हो गया हो जिसका हल मिलना मुश्किल है। ऐसे में यह प्रश्न उठाया जाना भी लाजमी है,  कि जब देश पर सूखे और मंहगाई का भारी संकट सामने नजर आया तब धन के अनावश्यक प्रदर्शन पर रोक लगाने का विचार क्यों आया? क्या इससे पहले हालात बहुत अच्छे थे? देश की एक बड़ी आबादी दशकों से गरीबी रेखा से नीचे जीवन- यापन कर रही है। दो जून की रोटी, पीने को साफ पानी, रहने को स्वच्छ हवादार मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन के समुचित साधन जैसी बुनियादी सुविधाएं उन्हें आज भी उपलब्ध नहीं हंै। ऐसे में अचानक ही सादगी का यह नारा हास्यास्पद लगता है?  देश के समूचे तंत्र पर भ्रष्ट्राचार का तंत्र हावी हो तब इस भ्रष्ट तंत्र के साये तले सादगी का यह मंत्र कितना कारगर होगा यह सोचने वाली बात है।
यह तो जानी और मानी हुई बात है कि हमारे देश में जितनी भी लग्जरी सेवाएं हैं-  रेल, विमान या होटल उनका आधा से ज्यादा कारोबार तो सरकारी मंत्रियों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर होने वाले सरकारी पैसे से चलता है। उन्हें इस तरह की मिलने वाली सुविधाओं पर रोक लगाए जाने की बात जब- तब उठती भी रही है पर देखा तो यह गया है कि उनके भौतिक सुख- सुविधाओं में कटौती के बजाए वे बढ़ती ही जाती हैं।
कितना अच्छा होता कि सादगी के इस दिखावी प्रदर्शन के बजाय देश के ऊपर आए सूखे और मंहगाई के संकट से जूझने के लिए सार्थक उपाय सोचे जाते। सादा जीवन और उच्च विचार को अपनाना ही था, तो बिना किसी दिखावे या प्रदर्शन के उसे अपने- अपने जीवन में ढाल कर एक मिसाल कायम करते।
वैसे भी जीवन को किस तरह से जिया जाए उसके लिए कोई नियम कायदे नहीं होते।  सादगी से जीवन जीना एक कला है, जीवन दर्शन है, शैली है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा से अपनाता है और जो मनुष्य के साथ जीवन पर्यन्त रहती है।
सादगी की बात जब भी उठती है तब गांधी जी का नाम लिया जाता है। गांधी जी ने सादगी को स्वेच्छा से अपनाया था। उनकी सादगी में दिखावा बिल्कुल नहीं था। इसके विपरित आजकल जो हो रहा है वह अनैतिक है। जिंदगी भर एयर कंडीशन कार में यात्रा करने वाला यदि एक दिन बैलगाड़ी में सिर्फ प्रचार के उद्देश्य से यात्रा करेगा तो यह सादगी के साथ क्रूर मजाक ही कहलायेगा। एक दिन किसी गरीब की कुटिया में बैठकर भोजन कर लेने से गरीबों का भला नहीं होने वाला।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांधी जी पर लिखे अपने एक विचारात्मक लेख में सादगी और कम खर्च के बारे में जो कुछ भी कहा है वह आज के संदर्भ में भी सामयिक है - गांधीवादी सिद्धान्त के रहन- सहन में सादगी और कमखर्ची वाले हिस्से को दुनिया के लोगों ने पसन्द नहीं किया है।  किसी उल्लेखनीय संख्या में किसी प्रकार के चुने हुए लोगों ने भी इसे नहीं अपनाया है। पिछड़े हुए लोगों के लिए यह एक व्यंग्य है, और विकसित लोगों के लिए यह मजाक। फिर भी रहन-सहन की सादगी अपने आप में एक क्रांति है, क्योंकि यह सामान्य रूचि और अर्थव्यवस्था के विरुद्ध है। वस्तुओं की संख्या बढऩे और जरूरतों की संख्या घटने का द्वंद किसी हद तक नकली है, सम्पूर्ण जीवन के लिये इसमें तालमेल आवश्यक है। जो आदमी बहुत कुछ अनजाने ही, स्वभाव और आदत से अपनी जरूरतें नहीं घटाता, वह भौतिक या आध्यात्मिक दृष्टि से, या सौन्दर्यात्मक दृष्टि से भी अच्छी तरह या सुख से नहीं रह सकता। आज की दुनिया में सार्थक होने के लिये जरूरत घटाने की धारणा को सापेक्ष होना पड़ेगा, पूरे राष्ट्र की कुल संभावनाओं के संदर्भ में, या उन चीजों के संदर्भ में जो मिल सकती हैं, लेकिन स्वभाववश या सोच-समझ कर छोड़ दी जाती हैं। इस तरह सादगी और विलासिता की सीमाएं कुछ लचीली हैं। ..... जीवन की एक कला के रूप में सादगी से रहने की इच्छा शायद उतनी ही पुरानी है जितना विचार,  जो समूची मनुष्य जाति में कुछ खास लोगों में ही मिलती है।

-रत्ना वर्मा


परंपरा से बनते तालाब

आगौर में कदम रखना नहीं कि रख-रखाव का पहला काम देखने को  मिल जाएगा। देश के कई क्षेत्रों में तालाब का आगौर प्रारंभ होते ही उसकी सूचना देने के लिए पत्थर के सुंदर स्तंभ लगे मिलते हैं। स्तंभ को देखकर समझ लें कि अब आप तालाब के आगौर में खड़े हैं, यहीं से पानी तालाब में भरेगा। इसलिए इस जगह को साफ-सुथरा रखना है।
तालाब में पानी आता है, पानी जाता है। इस आवक-जावक का पूरे तालाब पर असर पड़ता है। वर्षा की तेज बूंदों से आगौर की मिट्टी धुलती है तो आगर में मिट्टी घुलती है। पाल की मिट्टी कटती है तो आगर में मिट्टी भरती है।
तालाब के स्वरूप के बिगडऩे का यह खेल नियमित चलता रहता है। इसलिए तालाब बनाने वाले लोग, तालाब बनाने वाला समाज तालाब के स्वरूप को बिगाडऩे से बचाने का खेल भी उतने ही नियमपूर्वक खेलता रहा है। जो तालाब देखते ही देखते पिछले पचास-सौ बरस में नष्ट कर दिए गए हैं, उन तालाबों ने नियम से खेले गए खेलों के कारण ही कुछ सैकड़ों बरसों तक समाज का खेल ठीक से चलाया था।
पहली बार पानी भरा नहीं कि तालाब की रखवाली का, रख-रखाव का काम शुरु हो जाता था। यह आसान नहीं था। पर समाज को देख के इस कोने से उस कोने तक हजारों तालाबों को ठीक-ठाक बनाए रखना था, इसलिए उसने इस कठिन काम को हर जगह इतना व्यवस्थित बना लिया था कि यह सब बिल्कुल सहज ढंग से होता रहता था।
आगौर में कदम रखना नहीं कि रख-रखाव का पहला काम देखने को  मिल जाएगा। देश के कई क्षेत्रों में तालाब का आगौर प्रारंभ होते ही उसकी सूचना देने के लिए पत्थर के सुंदर स्तंभ लगे मिलते हैं। स्तंभ को देखकर समझ लें कि अब आप तालाब के आगौर में खड़े हैं, यहीं से पानी तालाब में भरेगा। इसलिए इस जगह को साफ-सुथरा रखना है। जूते आदि पहन कर आगौर में नहीं आना है, दिशा मैदान आदि की बात दूर, यहां थूकना तक मना रहा है।  'जूते पहन कर आना मना है', 'थूकना मना है' जैसे बोर्ड नहीं ठोंके जाते थे पर सभी लोग बस स्तंभ देखकर इन बातों का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे।
आगर के पानी की साफ-सफाई और शुद्धता बनाए रखने का काम भी पहले दिन से ही शुरु हो जाता था। नए बने तालाब में जिस दिन पानी भरता, उस दिन समारोह के साथ उसमें जीव-जंतु लाकर छोड़े जाते थे। इनमें मछलियां, कछुए, केकड़े और अगर तालाब बड़ा और गहरा हो तो मगर भी छोड़े जाते थे। कहीं-कहीं जीवित प्राणियों के साथ सामथ्र्य के अनुसार   चांदी या सोने तक के जीव-जंतु विसर्जित किए जाते थे। छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में अभी कोई पचास-पचपन बरस पहले तक तालाब में सोने की नथ पहनाकर कछुए छोड़े गए थे।
पहले वर्ष में कुछ विशेष प्रकार की वनस्पति भी डाली जाती थी। अलग-अलग क्षेत्र में इनका प्रकार बदलता था पर काम एक ही था-पानी को साफ रखना। मध्यप्रदेश में यह गदिया या चीला थी तो राजस्थान में कुमुदिनी, निर्मली या चाक्षुष से ही चाकसू शब्द बना है। कोई एक ऐसा दौर आया होगा कि तालाब के पानी की साफ-सफाई के लिए चाकसू पौधे का चलन खूब बढ़ गया होगा। आज के जयपुर के पास एक बड़े कस्बे का नाम चाकसू है। यह नामकरण शायद चाकसू पौधे के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए किया गया हो।
पाल पर पीपल, बरगद और गूलर के पेड़ लगाए जाते रहे हैं। तालाब और इन पेड़ों के बीच उम्र को लेकर हमेशा होड़-सी दिखती थी। कौन ज्यादा टिकता है-पेड़ या तालाब? लेकिन यह प्रश्न प्राय: अनुत्तरित ही रहा है। दोनों को एक दूसरे का लंबा संग इतना भाया है कि उपेक्षा के इस ताजे दौर में जो भी पहले गया, दूसरा शोक में उसके पीछे-पीछे चला गया है। पेड़ कटे हैं तो तालाब भी कुछ समय में सूखकर पट गया है। और यदि पहले तालाब नष्ट हुआ है तो पेड़ भी बहुत दिन नहीं टिक पाए हैं।
तालाबों पर आम भी खूब लगाया जाता रहा है, पर यह पाल पर कम, पाल के नीचे की जमीन में ज्यादा मिलता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में बहुत से तालाबों में शीतला माता का वास माना गया है और इसलिए ऐसे तालाबों की पाल पर नीम के पेड़ जरूर लगाए जाते रहे हैं। बिना पेड़ की पाल की तुलना बिना मूर्ति के मंदिर से भी की गई है।
बिहार और उत्तरप्रदेश के अनेक भागों में पाल पर अरहर के पेड़ लगाए जाते थे। इन्हीं इलाकों में नए बने तालाब की पाल पर कुछ समय तक सरसों की खली का धुआं किया जाता था ताकि नई पाल में चूहे आदि बिल बनाकर उसे कमजोर न कर दें।
ये सब काम ऐसे हैं, जो तालाब बनने पर एक बार करने पड़ते हैं, या बहुत जरूरी हो गया तो एकाध बार और। लेकिन तालाब में हर वर्ष मिट्टी जमा होती है। इसलिए उसे हर वर्ष निकालते रहने का प्रबंध सुंदर नियमों में बांध कर रखा गया था। कहीं साद निकालने के कठिन श्रम को एक उत्सव, त्योहार में बदलकर आनंद का अवसर बनाया गया था तो कहीं उसके लिए इतनी ठीक व्यवस्था कर दी गई कि जिस तरह वह चुपचाप तालाब के तल में आकर बैठती थी, उसी तरह चुपचाप उसे बाहर निकाल कर पाल पर जमा दिया जाता था।
साद निकालने का समय अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम को देखकर तय किया जाता रहा है। उस समय तालाब में पानी सबसे कम रहना चाहिए। गोवा और पश्चिम घाट के तटवर्ती क्षेत्रों में यह काम दीपावली के तुरंत बाद किया जाता है। उत्तर के बहुत बड़े भाग में नववर्ष यानी चैत्र से ठीक पहले, तो छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल, बिहार और दक्षिण में बरसात आने से पहले खेत तैयार करते समय।
आज तालाबों से कट गया समाज, उसे चलाने वाला प्रशासन तालाब की सफाई और साद निकालने का काम एक समस्या की तरह देखता है और वह इस समस्या को हल करने के बदले तरह-तरह के बहाने खोजता है। इसके नए हिसाब से यह काम खर्चीला है। कई कलेक्टरों ने समय-समय पर अपने क्षेत्र में तालाबों से मिट्टी नहीं निकाल पाने का एक बड़ा कारण यही बताया है कि इसका खर्च इतना ज्यादा है कि उससे तो नया तालाब बनाना सस्ता पड़ेगा। पुराने तालाब साफ नहीं करवाए गए और नए तो कभी बने ही नहीं। साद तालाबों में नहीं, नए समाज के माथे में भर गई है।
तब समाज का माथा साफ था। उसने साद को समस्या की तरह नहीं बल्कि तालाब के प्रसाद की तरह ग्रहण किया था। प्रसाद को ग्रहण करने के पात्र थे किसान, कुम्हार और गृहस्थ। इस प्रसाद को लेने वाले किसान प्रति गाड़ी के हिसाब से मिट्टी काटते, अपनी गाड़ी भरते और इसे खेतों में फैलाकर उनका उपजाऊपन बनाए रखते। इस प्रसाद के बदले वे प्रति गाड़ी के हिसाब से कुछ नकद या फसल का कुछ अंश ग्राम कोष में जमा करते थे। फिर इस राशि से तालाबों की मरम्मत का काम होता था। आज भी छत्तीसगढ़ में लद्दी निकालने का काम मुख्यत: किसान परिवार ही करते हैं। दूर-दूर तक साबुन पहुंच जाने के बाद भी कई घरों में लद्दी से सिर धोने और नहाने का चलन जारी है।
बिहार में यह काम उड़ाही कहलाता है। उड़ाही समाज की सेवा है, श्रमदान है। गांव के हर घर से काम कर सकने वाले तालाब पर एकत्र होते थे। हर घर दो से पांच मन मिट्टी निकालता था। काम के समय गुड़ का पानी बंटता था। पंचायत में एकत्र हर्जाने की रकम का एक भाग उड़ाही के संयोजन में खर्च होता था।
दक्षिण में धर्मादा प्रथा थी। कहीं-कहीं इस काम के लिए गांव की भूमि का एक हिस्सा दान कर दिया जाता था और उसकी आमदनी सिर्फ साद निकालने के लिए खर्च की जाती थी। ऐसी भूमि को कोडगे कहा जाता था।
राज और समाज मिलकर कमर कस लें तो फिर किसी काम में ढील कैसे आएगी। दक्षिण में तालाबों के रख-रखाव के मामले में राज और समाज का यह तालमेल खूब व्यवस्थित था। राज के खजाने से इस काम के लिए अनुदान मिलता था पर उसी के साथ हर गांव में इस काम के लिए एक अलग खजाना बन जाए, ऐसा भी इंतजाम था।
हर गांव में कुछ भूमि, कुछ खेत या खेत का कुछ भाग तालाब की व्यवस्था के लिए अलग रख दिया जाता था। इस पर लगान नहीं लगता था। ऐसी भूमि मान्यम कहलाती थी। मान्यम से होने वाली बचत, आय या मिलने वाली फसल तालाब से जुड़े तरह-तरह के कामों को करने वाले लोगों को दी जाती थी। जितनी तरह के काम, उतनी तरह के मान्यम। जो काम जहां होना है, वहीं उसका प्रबंध किया जाता था, वहीं उसका खर्च जुटा लिया जाता था।
अलौति मान्यम से श्रमिकों के पारिश्रमिक की व्यवस्था की जाती थी। अणैंकरण मान्यम पूरे वर्ष भर तालाब की देखरेख करने वालों के लिए था। इसी से उन परिवारों की जीविका भी चलती थी, जो तालाब की पाल पर पशुओं को जाने से रोकते थे। पाल की तरह तालाब के आगौर में भी पशुओं के आने-जाने पर रोक थी। इस काम में भी लोग साल भर लगे रहते थे। उनकी व्यवस्था बंदेला मान्यम से की जाती थी।
तालाब से जुड़े खेतों में फसल बुवाई से कटाई तक पशुओं को रोकना एक निश्चित अवधि तक चलने वाला काम था। यह भी बंदेला मान्यम से पूरा होता था। उसे करने वाले पट्टी कहलाते थे।
सिंचाई के समय नहर का डाट खोलना, समय पर पानी पहुंचाना एक अलग जिम्मेदारी थी। इस सेवा को नीरमुनक्क मान्यम से पूरा किया जाता था। कहीं किसान पानी की बर्बादी तो नहीं कर रहे- इसे देखने वालों का वेतन कुलमकवल मान्यम से मिलता था। तालाब में कितना पानी आया है, कितने खेतों में क्या-क्या बोया गया है, किसे कितना पानी चाहिए-जैसे प्रश्न नीरघंटी या नीरुकुट्टी हल करते थे। यह पद दक्षिण में सिर्फ हरिजन परिवार को मिलता था। तालाब का जल स्तर देखकर खेतों में उसके न्यायोचित बंटवारे के बारीक हिसाब-किताब की विलक्षण क्षमता नीरकुट्टी को विरासत में मिलती थी। आज के कुछ नए समाजशास्त्रियों का कहना है कि हरिजन परिवार को यह पद स्वार्थवश दिया जाता था। इन परिवारों के पास भूमि नहीं होती थी इसलिए भूमिवानों के खेतों में पानी के किसी भी विवाद में वे निष्पक्ष हो कर काम कर सकते थे। यदि सिर्फ भूमिहीन होना ही योग्यता का आधार था तो फिर भूमिहीन ब्राह्मण तो सदा मिलते रह सकते थे! लेकिन इस बात को यहीं छोड़े और फिर लौटें मान्यम पर।
कई तालाबों का पानी सिंचाई के अलावा पीने के काम भी आता था। ऐसे तालाबों से घरों तक पानी लेकर आने वाले कहारों के लिए उरणी मान्यम से वेतन जुटाया जाता था।
उप्पार और वादी मान्यम से तालाबों की साधारण टूट-फूट ठीक की जाती थी। वायक्कल मान्यम तालाब के अलावा उनसे निकली नहरों की देखभाल में खर्च होता था। पाल से लेकर नहरों तक पर पेड़ लगाए जाते थे और पूरे वर्ष भर उनकी सार-संभाल, कटाई, छंटाई आदि का काम चलता रहता था। यह सारी जिम्मेदारी मानल मान्यम से पूरी की जाती थी।
खुलगा मान्यम और पाटुल मान्यम मरम्मत के अलावा क्षेत्र में बनने वाले नए तालाबों की खुदाई में होने वाले खर्च संभालते थे।
एक तालाब से जुड़े इतने तरह के काम, इतनी सेवाएं वर्ष भर ठीक से चलती रहें - यह देखना भी एक काम था। किस काम में कितने लोगों को लगाना है, कहां से कुछ को घटाना है- यह सारा संयोजन करैमान्यम से पूरा किया जाता था। इसे कुलम बेट्टु या कमोई वेट्टु भी कहते थे।
दक्षिण का यह छोटा और साधारण-सा वर्णन तालाब और उससे जुड़ी पूरी व्यवस्था की थाह नहीं ले सकता। यह तो अथाह है। ऐसी ही या इससे मिलती-जुलती व्यवस्थाएं सभी हिस्सों में, उत्तर में, पूरब-पश्चिम में भी रही ही होंगी। पर कुछ काम तो गुलामी के उस दौर में टूटे और फिर विचित्र आजादी के इस दौर में फूटे समाज में यह सब बिखर गया।
लेकिन गैंगजी कल्ला जैसे लोग इस टूटे-फूटे समाज में यह सब
बिखर गई व्यवस्था को अपने ढंग से ठीक करने आते रहे हैं।
नाम तो था गंगाजी पर फिर न जाने कैसे वह गैंगजी हो गया। उनका नाम स्नेह, आत्मीयता के कारण बिगड़ा या घिसा होगा लेकिन उनके शहर को कुछ सौ साल से घेर कर खड़े आठ भव्य तालाब ठीक व्यवस्था टूट जाने के बाद धीरे-धीरे आ रही उपेक्षा के कारण घिसने, बिगडऩे लगे थे। अलग-अलग पीढिय़ों ने उन्हें अलग-अलग समय में बनाया था, पर आठ में से छह एक शृंखला में बांधे गए थे। इनका रखरखाव भी उन पीढिय़ों ने शृंखला में बंध कर ही किया होगा। सार-संभाल की वह व्यवस्थित कड़ी फिर कभी टूट गई।
इस कड़ी के टूटने की आवाज गैंगजी के कान में कब पड़ी, पता नहीं। पर आज जो बड़े-बूढ़े फलौदी शहर में हैं, वे गैंगजी की एक ही छवि याद रखे हैं: टूटी चप्पल पहने गैंगजी सुबह से शाम तक इन तालाबों का चक्कर लगाते थे। नहाने वाले घाटों पर, पानी लेने वाले घाटों पर कोई गंदगी फैलाता दिखे तो उसे पिता जैसी डांट पिलाते थे।
कभी वे पाल का तो कभी नेष्टा का निरीक्षण करते। कहां किस तालाब में कैसी मरम्मत चाहिए- इनकी मन-ही-मन सूची बनाते। इन तालाबों पर आने वाले बच्चों के साथ खुद खेलते और उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाते। शहर को तीन तरफ से घेरे खड़े तालाबों का एक चक्कर लगाने में कोई 3 घंटे लगते हैं। गैंगजी कभी पहले तालाब पर दिखते तो कभी आखरी पर, कभी सुबह यहां मिलते तो दोपहर वहां और शाम न जाने कहां। गैंगजी अपने आप तालाबों के रखवाले बन गए थे।
वर्ष के अंत में एक समय ऐसा आता जब गैंगजी तालाबों के बदले शहर की गली-गली में घूमते दिखते। साथ चलती बच्चों की फौज। हर घर का दरवाजा खुलने पर उन्हें बिना मांगे एक रुपया मिल जाता। बरसों से हरेक घर जानता था कि गैंगजी सिर्फ एक रुपया मांगते हैं, न कम न ज्यादा। रुपए बटोरने का काम पूरा होते ही वे पूरे शहर के बच्चों को बटोरते। बच्चों के साथ ढेर सारी टोकरियां, तगाडिय़ां, फावड़े, कुदान भी जमा हो जाते। फिर एक के बाद एक तालाब साफ होने लगता। साद निकालकर पाल पर जमाई जाती। हरेक तालाब के नेष्टा का कचरा भी इसी तरह साफ किया जाता। एक तगाड़ी मिट्टी- कचरे के बदले हर बच्चे को दुअन्नी इनाम में मिलती।
गैंगजी कल्ला कब से यह कर रहे थे - आज किसी को याद नहीं। बस इतना पता है कि यह काम सन् 55-56 तक चलता रहा। फिर गैंगजी चले गए।
शहर को वैसी किसी मृत्यु की याद नहीं। पूरा शहर शामिल था उनकी अंतिम यात्रा में। एक तालाब के नीचे ही बने घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। बाद में वहीं उनकी समाधि बनाई गई।
जो तालाब बनाते थे, समाज उन्हें संत बना देता था। गैंगजी ने तालाब तो नहीं बनाया था। पहले बने तालाबों की रखवाली की थी। वे भी संत बन गए थे।
फलौदी में तालाबों की सफाई का खेल संत खिलवाता था तो जैसलमेर में यह खेल खुद राजा खेलता था।
सभी को पहले से पता रहता था फिर भी नगर-भर में ढिंढोरा पिटता था। राजा की तरफ से, वर्ष के अंतिम दिन, फाल्गुन कृष्ण चौदस को नगर के सबसे बड़े तालाब घड़सीसर पर ल्हास खेलने का बुलावा है। उस दिन राजा, उनका पूरा परिवार, दरबार, सेना और पूरी प्रजा कुदाल, फावड़े-तगाडिय़ा लेकर घड़सीसर पर जमा होती। राजा तालाब की मिट्टी काट कर पहली तगाड़ी भरता और उसे खुद उठाकर पाल पर डालता। इस गाजे-बाजे के साथ ल्हास शुरु। पूरी प्रजा का खाना-पीना दरबार की तन्मय हो जाते कि उस दिन उनके कंधे से किसी का भी कंधा टकरा सकता था। जो दरबार में भी सुलभ नहीं, आज वही तालाब के दरवाजे पर, मिट्टी ढो रहा है। राजा की सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले, उनके अंगरक्षक भी मिट्टी काट रहे हैं, मिट्टी डाल रहे हैं।
ऐसे ही एक ल्हास में जैसलमेर के राजा तेजसिंह पर हमला हुआ था। वे पाल पर ही मारे गए थे। लेकिन ल्हास खेलना बंद नहीं हुआ। यह चलता रहा, फैलता रहा। मध्यप्रदेश के भील समाज में भी ल्हास खेला जाता है, गुजरात में भी ल्हास चलती है। वहां यह परंपरा तालाब से आगे बढ़कर समाज के ऐसे किसी भी काम से जुड़ गई थी, जिसमें सबकी मदद चाहिए।
सबके लिए सबकी मदद। इसी परंपरा से तालाब बनते थे, इसी से उनकी देखभाल होती थी। मिट्टी कटती थी, मिट्टी डलती थी। समाज का खेल ल्हास के उल्हास से चलता था।

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