September 23, 2009

सबसे कम उम्र की पोस्ट ग्रेजुएट ने कहा

अपने सपनों को जरुर साकार करूंगी
16 वर्ष की रश्मि स्वरूप का जन्म राजस्थान के बारां जिले के जैपला गांव में 29 सितम्बर 1992 को हुआ था। उसके मम्मी- पापा, श्री आर. एस. वर्मा और श्रीमती प्रभा स्वरुप यहां  के पहले शिक्षित दम्पति हैं। ज़ाहिर है उसके दादा- दादी और नाना- नानी अपने समय से बहुत आगे थे। रश्मि स्वरूप 9 वर्ष की आयु में दसवीं प्रथम श्रेणी से, 11 वर्ष की आयु में 12वीं जीव विज्ञान (biology) और 15 वर्ष में विज्ञान स्नातक (B.Sc.) करके राजस्थान की सबसे कम उम्र 16 वर्ष में M.Sc.करने वाली पहली छात्रा बनी। रश्मि स्वरूप ने पिछले दिनों ऑनलाइन हमारे सवालों के जवाब दिए, प्रस्तुत है कुछ अंश :
आपने इतनी कम उम्र में यह सब कैसे हासिल कर लिया?
* मुझे स्कूलों के लम्बे- लम्बे होमवर्क से बड़ी कोफ्त होती थी। मुझे बेवजह कागज़ काले करने में कोई रूचि नहीं थी। मैं जल्दी ही अपनी पढ़ाई ख़त्म कर लेना चाहती थी। उन्ही दिनों पापा के पास कुछ दसवी की लड़कियां गणित पढऩे आती थी। मुझे अपने होमवर्क से अधिक आसान तो उनके गणित के घुमावदार सवाल लगते थे जिन्हें मैं उन लड़कियों से पहले हल कर लिया करती थी। उन्ही दिनों बिहार के एक छात्र तथागत तुलसी के बारे में अखबार में आ रहा था। पापा ने जब इसके बारे में बताया तो मुझे नहीं लगा इसमें कोई मुश्किल हो सकती है। पापा ने प्रस्ताव रखा की यदि में एक महीने में बीजगणित हल कर दू तो मंै भी ऐसा कर सकती हूं, चुनौतियां तो मुझे वैसे भी प्यारी थी। और फिर मुझे पांच सालों की पढ़ाई से मुक्ति मिल रही थी और पास होने पर कंप्यूटर भी मिलने वाला था। मैंने दसवी पास की और फिर मेरे लिए अनगिनत दरवाज़े खुल गए। मेरे पास समय और ऊर्जा दोनों थे। अपने माता पिता के मार्गदर्शन में और अपनी रूचि के अनुसार मैंने इसका उपयोग करने की ठान ली। केवल प्रसिद्धि मेरा उद्देश्य कभी नहीं था। जब- जब मुझे असाधारण माना गया मैंने इससे जुड़ी जि़म्मेदारी का अनुभव किया। मैं बचपन से अपने औटिस्टिक भाई प्रतीक के लिए कुछ करना चाहती थी। पर मैंने अनुभव किया की न केवल उसके लिए बल्कि देश के 3' और इतने ही विश्व के मैंटली रिटायर्ड बच्चों के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अब इन बच्चों को मुख्य धारा में लौटा लाना ही मेरा ध्येय है।
आपकी पढ़ाई में आपके माता पिता का सहयोग कितना रहा?
* बहुत। मुझ पर कभी पढाई या किसी भी चीज़ का दबाव नहीं रहा न ही कभी लड़की होने के कारण मैंने उनके व्यवहार में कोई अंतर पाया। बल्कि लड़की होना उनके लिए सौभाग्य की बात थी। मैं हर काम के लिए स्वतंत्र थी। मेरे माता पिता ने ही मेरी प्रतिभा और रूचि को पहचाना, निखारा, मुझे भी इस बात का अहसास दिलाया और मुझमें विश्वास दिखाया। और यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात रही। 
क्या आप इसके लिए कोई ट्यूशन लेती थी?
* नहीं। दसवी में गणित और विज्ञान मैंने पापा से और गुजराती, हिंदी, इंग्लिश और सामाजिक विज्ञान मम्मी से पढ़े। मैं जानती ही नहीं कि किस तरह चतुराई से मुझे पांच सालों का कोर्स एक साल में इतनी आसानी से पढ़ाया गया। पढ़ाई मेरे लिए खेल और नयी चीजे जानने से अधिक कुछ नहीं रही। मुझे मेरे विषय रोचक लगते रहे और जल्द ही मैं खुद पढऩे लगी। मैं तो कहती हूं सीखने को इतना कुछ है पांच साल कि बचत कुछ अधिक नहीं।
कम उम्र के बाद भी आपको ऊंची कक्षाओं में परीक्षा देने की अनुमति कैसे मिली?
* माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के दूरस्थ शिक्षा विभाग द्बारा ओपन स्कूल के माध्यम से मुझे ये सुविधा मिली। इसमें कोई आयु सीमा नहीं थी और कितने भी प्रयासों में दसवीं पास कि जा सकती थी। लेकिन मैंने एक ही प्रयास में 62 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। साथ ही इंग्लिश और गुजराती में डिक्टेशन भी हासिल किया। इसके बाद नियमित छात्रा के रूप में जीव विज्ञान विषय लेकर हायर व सीनियर सेकंड्री प्रथम श्रेणी 62  प्रतिशत अंकों के साथ ही उत्तीर्ण की। इसके बाद कॉलेज में एडमिशन में भी कोई परेशानी नहीं आई और मैंने स्नातक और प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर भी नियमित छात्रा के रूप में ही किया।
आप कितने भाई बहन है उनमें से कौन आपकी तरह प्रतिभाशाली है?
* मेरे दो भाई हैं। 13 वर्षीय प्रतीक जो autistic है और मीनू मनोविकास मंदिर, चाचियावास, अजमेर में पढ़ता है और वहां रहकर तेजी से रिकवर हो रहा है। दूसरा भाई रवि 8 साल का है और केंद्रीय विद्यालय नं. 1 में फिफ्थ क्लास में पढ़ता है, और उसका तो जैसे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही दीदी के सब रेकॉर्ड्स तोड़ डालना है, वह मेधावी छात्र है, उसे क्रिकेट बेहद पसंद है और वह पायलट बनना चाहता है। वैसे मेरी तरह क्लासेस जम्प करने कि उसकी कोई योजना नहीं!

 क्या आपको ऐसी प्रतिभा अपने माता या पिता से मिली है?
 * बेशक! आखिर जूलॉजी की स्टुडेंट हूं, जानती हूं कि माता- पिता के अनुवांशिक गुण तो मुझमें आयेंगे ही! मेरे माता- पिता ने भी हमेशा लीक से हटकर काम किये है और यही ज़ज्बा मुझे विरासत में मिला है। दादा- दादी और नाना- नानी के अशिक्षित होने के बावजूद भी उन्होंने पूरी शिक्षा प्राप्त की और अब भी वे अपने गांव के  प्रथम शिक्षित दम्पति हैं। और उन्होंने अपनी शिक्षा का पूरा उपयोग भी किया। मेरे माता पिता प्रगतिशील विचारधारा के हैं और हमेशा समाज के घोर विरोध के बावजूद प्रगति करते रहे। लोगों की नजऱों में वे अब भी मुझे (लड़की को) पढ़ाकर और प्रतीक (भाई) में पैसा लगाकर वे धन और समय व्यर्थ ही कर रहे हैं! 
कम उम्र में इतना ज्ञान हासिल करके क्या आपको ऐसा लगता कि आपने बचपन में बड़ों की तरह सोचना शुरू कर दिया है?
* नहीं। बल्कि दूसरे बच्चों की सोच अब तक मैच्योर नहीं हुई, मुझे लगता है, आखिर हम ही तो देश का भविष्य हैं! हम नहीं सोचेंगे तो फिर कौन सोचेगा। मैं तो सोचती हूं ये सोचने वाला कीड़ा हर एक के दिमाग में घुसा देना चाहिए! (लेकिन अगर उनमें इतना दम है तो ही, बेवजह बच्चों पर दबाव डालने के भी मैं खिलाफ हूं।  मेरी  नजऱ में बच्चों का दिमाग भी तो एक प्राकृतिक रिसोर्स ही है। शिव खेड़ा जी ने कहा है की यदि हर व्यक्ति समाज और प्रकृति से जितना पाते हैं उससे अधिक लौटाने की ठान ले तो फिर देश के विकास को कोई रोक नहीं सकता।) लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि मैं किसी भी तरह के दबाव में हूं। आखिर कौन नहीं चाहेगा ख़ास होना बशर्ते वे ऐसा कर सकें।
आपके दोस्त आपकी उम्र के हैं या आपकी डिग्री के अनुसार बड़ी उम्र के?
* मेरी एक सबसे अच्छी दोस्त रागिनी मेरी ही हमउम्र हैं और बाकी सभी मुझसे बड़े हैं (लेकिन मानसिक स्तर में मैंने कोई अंतर नहीं पाया, दोस्ती में उम्र वैसे भी कोई मायने नहीं रखता। वैसे मुझे लोगों के  मानसिक स्तर में इजाफा करने का शौक है!

पढऩे वालों बच्चों को आप क्या टिप्स देना चाहेंगी?
* हमारे पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा है की सपना वह नहीं जो सोने के बाद आये बल्कि सपना वह है जो आपको सोने ही न दे। बस देख लीजिये अपने लिए भी कोई सपना, बड़ा सोचिये और उसमें जुट जाईये। अपने लिए, अपने परिवार, समाज और देश के लिए, बिना किसी बाहरी दबाव के। अपनी अन्त: प्रेरणा को महसूस कीजिये। अपनी रूचि के काम कीजिये और उसमें बेहतरीन प्रदर्शन करके ये साबित कर दीजिये कि वह वास्तव में आपकी रूचि है। अपनी, और बहुत जरुरी है कि  दूसरों कि गलतियों से भी सीखे। हर असफलता को एक सीख समझे और इसे संकेत समझे कि आपसे सिर्फ कुछ बेहतर कि उम्मीद कि जा रही है। बेस्ट ऑफ़ लक!
  अब आगे आप क्या करना चाहती हैं?
* इस वर्ष मैंने जूलॉजी में एमएससी कर लिया है। आगे मैं एमफिल या पीएचडी करना चाहती हूं। साथ ही अपनी पुस्तक 'जूही और मिरेकल लैंड' का दूसरा भाग 'जूही और मिम्स' भी लिख रही हूं। बाकी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभी मैं छोटी हूं। नेट जिसकी एज लिमिट 19 वर्ष है और आईएएस जिसकी एज लिमिट 21 वर्ष है, भविष्य में दूंगी। आगे मैं रिसर्च करना चाहती हूं ताकि मैंटली रिटायर्ड और autistic बच्चों से सम्बंधित क्षेत्र में विज्ञान में बढ़ोतरी कर सकूं।
(उदंती फीचर्स)

रश्मि स्वरुप के बारे में और अधिक जानने के लिए आप देख सकते हैं- nanhilekhika.blogspot.com                        
उनका पता है- आर.एस.वर्मा, जमुना सदन 1-डी 27, जे.पी. कालोनी, नाका मदर, अजमेर, राजस्थान 305001, मो. 09772962920 

2 Comments:

दीपक said...

एक अच्छा साक्षात्कार .........रश्मी जी को बधाँईया और ढेरो मुबारकबाद !!

Rishish said...

Rashmi is a really Great Personalty. We like her writing & poems as well as paintings.

I Have become a fan of Her.

Carry On & On & On.

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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