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Sep 23, 2009

बदलती फिल्मी दुनिया


जिन्दगी का साज भी क्या साज है, बज रहा है और बेआवाज है...
'जागृति' जैसी बच्चों की फिल्म अब कौन बनाता है। आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की ... ने इस फिल्म को अमर कर दिया। राजकपूर की 'आवारा' ने दिखाया है कि बढ़ते बच्चे पर वातावरण का  वंशानुक्रम से ज्यादा असर पड़ता है।
- अरुण कुमार शिवपुरी
हिन्दी सिनेमा ने समाज को बदला है या समाज की छिपी भावनाओं को सिनेमा ने उभारा है, यह कहना मुश्किल है। दादा साहब फाल्के के वक्त से अब तक हिन्दी सिनेमा ने काफी लम्बा सफर तय किया है। इसमें चोटी के कलाकारों, निर्माता निर्देशकों व संगीतकारों का बड़ा हाथ रहा है। मूक फिल्मों के दौर से निकलकर हमने बहुत तकनीकी ऊंचाईयों को छुआ है। आजकल की फोटोग्राफी, लोकेशन और रंग आपको दूसरी दुनिया में ले जाते हैं। लेकिन वहीं कला की बारीकियों में धीरे-धीरे गिरावट देखी गई है।
आपको मालूम होगा कि मीनाकुमारी का असली नाम माहजबीं था यानि चान्द की मुस्कराहट। उनकी अभिनीत फिल्में किसको नहीं याद हैं? बिमल मित्र लिखित 'साहिब बीबी और गुलाम' फसाने पर गुरुदत्त ने यादगार फिल्म बनाई। उसमें जहां गुलाम की वफा व कौतुहल दिखाया था, वहीं छोटी बहू के किरदार को मीनाकुमारी ने जिस ऊंचाई पे पहुंचा दिया शायद ही उस तक कोई पहुंच पाये। यह इन कलाकारों की कड़ी मेहनत, लगन व समझ को दर्शाता है। गुरुदत्त ने बहुत ही बीरीकी से उस समय के बंगाल के जमींदार परिवार की जीवनशैली, ठाट-बाट व अधोपतन को दिखाया है। तिजोरी का खाली दिखना, मीनाकुमारी का अपने पति की मंगल कामना के लिए फि़टन पर बैठकर गुलाम के संग जाना व उसका अन्त तथा रहमान व सप्रू की एक्टिंग गजब की है। अबरार अल्वी के डायलॉग ने फिल्म को अमर बना दिया।
एक लम्बा अर्सा गुजर जाने पर भी अनेक फिल्में हमारे दिलो दिमाग पर अभी भी छाई हुई हैं। विमल राय की देवदास, मधुमती, दो बीघा जमीन, महबूब खां  की अमर, मदर इंडिया, कमाल अमरोही की महल व पकीजा, गुरुदत्त  की कागज के फूल, प्यासा, मिस्टर एंड मिसेज 55, चौदवीं का चांद, राजकपूर की आवारा व श्री 420, के.आसिफ की मुगले आजम, वी शांताराम की दो आंखें बारह हाथ, सुबह का तारा, सत्यजीत रे की मुंशी प्रेमचंद की कथा पर बनी मार्मिक सद्गति आदि मील के पत्थर हैं।
 'बैजू बावरा' के मीनाकुमारी व भारत भूषण, उसका संगीत,  'शबाब' में नूतन का यौवन व सौन्दर्य साथ में भारत भूषण, सोहराब मोदी की  'मिर्जा गालिब'  में सुरैय्या व गालिब के किरदार में भारत भूषण,  'शिकस्त' की नलिनी जयवन्त जमीदारनी की भूमिका में व अशोक कुमार  'अलबेला'  का मनमोहने वाला संगीत गीताबाली की खूबसूरती, और भगवान का रोल,  'खूबसूरत' की दीना पाठक, अनारकली का संगीत व बीनाराय,  'सिकन्दर' के सोहराब मोदी व पृथ्वीराज कपूर बेजोड़ हैं। परिणीता (मीनाकुमारी, अशोक कुमार) तीसरी कसम, जुनून, त्यागपत्र, मुझे जीने दो, अमानुष, नमक हराम, कोरा कागज, चश्मे बद्दूर, जाने भी दो यारो, सारांश, गुमराह... आदि नामी फिल्में थीं।
बिमल राय की  'देवदास'  में दिलीप कुमार ने देवदास, वैजयन्तीमाला ने नर्तकी चन्द्रमुखी, मोतीलाल ने चुन्नी बाबू व सुचित्रा सेन ने पारो का अभिनय जिस खूबसूरती से किया है वह आप शायद ही किसी फिल्म में अब देख पाएं। आज के कलाकारों ने जब वह जीवन ही नहीं देखा, न वैसी तालीम पाई, तो उसको सुनना, समझना व पेश करना उनके लिए बड़ा मुश्किल है।
फातिमा कनीज, जो फिल्मों में नरगिस के नाम से आईं ने  'मदर इंडिया' में अभिनय कर के दिखा दिया कि वे कला में कितनी पारंगत हैं। उनके जैसा अभिनय शायद ही कोई कर पाता। 'किस्मत' में अशोक कुमार कितने चपल व सुन्दर हैं, वहीं 'महल' में मधुबाला वीनस नजर आती हैं। इस फिल्म में लता मंगेश्कर का गाया गाना आयेगा आने वाला... दीपक बगैर कैसे परवाने जल रहे हैं ... को अभी भी कोई भूला नहीं हैं। 'महल' में असली कथक को दिखाया गया है जिसको समझने वाले अब कम ही हैं।
मिर्जा हादी रूसवा के उपन्यास पर बनी फिल्म 'उमराव जान' में मुजफ्फर अली ने उन्नीसवींसदी के अवध को बहुत सुन्दरता से उतार कर रख दिया। बंगला (फैजाबाद) की अमीरन का सफर किस- किस दौर से गुजरा, उसने अपनी जईफी में लखनऊ के चौक में खुद, रूसवा को जबानी सुनाया था। मुजफ्फर अली ने अवध के रहन-सहन, नजाकत-नफासत व महफिलो को बहुत क्लासिकल अंदाज से आपके सामने पेश किया। इन फिल्मों में जीवन की वास्तविकता को दिखाया जाता था, खूबसूरत चित्रण था व शिक्षा भी मिलती थी।
'मुगले आजम' में पृथ्वीराज कपूर ने दिखा दिया कि अकबर की भूमिका के लायक उनसे बढ़कर किसी और का होना मुश्किल है। 'पाकीजा' को राजकुमार, मीनाकुमारी व वीना ने यादगार बना दिया। कमाल अमरोही ने इस फिल्म में रुहेलखण्ड के चूड़ीदार पजामा कुत्र्ता, वहां के रहन- सहन व तवायफ की दुनिया को बेजोड़ ढंग से दर्शकों के सामने पेश किया है। इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मोरा ... व ठाड़े रहियो ... अब आपको आजकल की फिल्मों में नहीं मिलेगा।
'जागृति' जैसी बच्चों की फिल्म अब कौन बनाता है। आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की ... ने इस फिल्म को अमर कर दिया। राजकपूर की 'आवारा' ने दिखाया है कि बढ़ते बच्चे पर वातावरण का वंशानुक्रम से ज्यादा असर पड़ता है। 'श्री 420' का रिमझिम बारिश में छाता लिए नर्गिस व राजकपूर पर फिल्माया गाना प्यार हुआ इकरार हुआ .... आपको रोमान्स की खूबसूरत दुनिया में ले जाता है पर उसमें आप नग्नता को कही नहीं पायेंगे।
शैलेन्द्र, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी व जां निसार अख्तर जैसे मशहूर कवि शायर अब कहां हैं? उनके गीतों, गजलों के मतलब होते थे। नौशाद, सी. रामचंद्र (चितलकर) खेमचन्द्र प्रकाश, खय्याम, ओपी नैय्यर, शंकर जयकिशन व एसडी बर्मन का संगीत सर चढ़कर बोलता था। गीता दत्त (राय) व मुकेश के गानों का दर्द अनूठा था। कुन्दन लाल सहगल के गाये गीत, भजन, गजल अपना सानी नहीं रखते। सहगल का गाया फिल्म 'देवदास' का गीत बालम आय बसो मेरे मन में ... या फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' के लिए गाया गीत बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाय ... प्रमाण है सहगल की उस गायन प्रतिभा के  जिसने उनके गाये प्रत्येक गीत गजल को अविस्मरणीय बना दिया।
तलत महमूह की रेशमी आवाज, मुहम्मद रफी ने बहुत खूबसूरत भजन भी गाये वे बुलंद आवाज के मालिक थे। जोहरा बाई अम्बाले वाली, कानन बाला/ देवी, राजकुमारी, उमा देवी, अमीर बाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम, सुरैय्या, मुबारक बेगम अब अतीत के होके रह गये पर लोग उन्हें भुला न पाये। इसी तरह लता मंगेश्कर के शुरुआती दौर के फिल्मी गाने बहुत मधुर थे। उनका गाया 'अमर' का गीत चलो अच्छा हुआ अपनो में कोई गैर तो निकला, अगर अपने ही होते सब, तो बेगाने कहां जाते.... अब आपको फिल्मों में नहीं मिलेगा।
पर अब गाने फास्ट बीट और साजों की तेज आवाज पर चलते हैं। नृत्य में भी हिन्दुस्तानी परंपरा तहजीब व कला का अभाव होता है। इसमें कोई गहराई नहीं होती। गीतों के कोई खास मायने भी नहीं होते, वे तुकबन्दी बन कर रह गये हैं। सांवरियां फिल्म में नायक को टॉवेल में दिखाया गया है। आजकल नायकों के शरीर को दिखाना एक आम बात सी हो गई है। फिल्मों में जिस्म को उघाढ़ कर दर्शकों के मन को खींचने की कोशिश की जाती है। अब फिल्में ग्लैमर का सहारा लेती हैं। आपको आस्ट्रेलिया, वेल्स, न्यूजीलैंड, नामीबिया की सैर कराई जाती है। अब फिल्मों में एक्शन ज्यादा व अभिनय की गहराई कम देखने को मिलती है। फिल्मी संवाद भी सभ्रान्त नहीं रह गये। बाजारू व चालू भाषा का प्रयोग कर आपको लुभाने की कोशिश की जाती है। जीवन की असलियत को बताने वाला गाना जिन्दगी का साज भी क्या साज है, बज रहा है और बेआवाज है... जो नसीम बानू ने फिल्म पुकार में गाया को सुनने, समझने वाले गिनती के मिलेंगे। तलफ्फुज (उच्चारण) को भी अब कुछ खास महत्व नहीं दिया जाता। आज की दुनिया में धनोपार्जन का अव्वल स्थान है, कला दोयम दर्जे पर पीछे हो गई हैं।

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