September 23, 2009

इन्हें दस घंटे तो सोने दें


8 से 12 वर्ष की उम्र वाले लगभग सभी बच्चे टीवी देखने के लिए दस बजे के बाद सोते हैं, और उन्हें शाला आने के लिए सुबह 6 बजे उठना ही पड़ता है। जबकि इन बच्चों को लगभग दस घंटे तो सोना ही चाहिए।
- विश्वमोहन तिवारी

कितनी नींद कम है और कितनी अधिक, इसका कोई वैज्ञानिक माप नहीं है। स्वयं व्यक्ति ही जान सकता है कि उसके लिए कितनी नींद पर्याप्त है? वैज्ञानिक मानते हैं कि औसतन एक वयस्क व्यक्ति को लगभग आठ घंटे सोना चाहिए, यद्यपि किसी के लिए 6 घंटे भी पर्याप्त हो सकते हैं। यह भी सही है कि रात के अंधेरे व शांत वातावरण की नींद दिन के उजाले तथा कोलाहल भरे वातावरण की नींद से कहीं बेहतर होती है। नींद अभी तक वैज्ञानिकों के लिए भी एक रहस्य ही है। इसका आशय  यह है कि वे यह तो समझते हैं कि नींद शरीर को विश्राम देने के लिए आवश्यक है, किन्तु यह एक सवाल है कि क्या नींद और विश्राम एक जैसा कार्य करते हैं? उनको यह भी समझ में आता है कि नींद के दौरान शरीर विकास सम्बंधी कार्य जैसे शिशुओं का विकास आदि, तथा मस्तिष्क को साफ सुथरा करने का कार्य करता है। नींद पूरी न होने से मन तथा शरीर अस्वस्थ हो जाते हैं।
3 दिसंबर 2008 की साइंस न्यू$ज पत्रिका में लॉरा सैंडर्स लिखती हैं कि अब वैज्ञानिक बहुत प्रसन्न हैं कि उन्होंने नींद और स्वास्थ्य के बीच सम्बंध खोज निकाला है। पहले तो उन्होंने अनुसंधान कर नींद की प्रक्रिया समझी। मानव शरीर में एक जैविक घड़ी उसके कार्यों की लय-ताल को निर्धारित करती है, नींद को नियमित रखती है। यह घड़ी सूर्य के प्रकाश से अपने अणुओं के बनने बिगडऩे की लय निश्चित करती है, प्रत्येक 24 घंटे में अणुओं का निर्माण और क्षय शारीरिक समय का निर्धारण करता है। एक प्रयोग में कुछ मनुष्यों को ऐसे बंद स्थानों में रखा गया जहां सूर्य की किरण भी नहीं जा सकती थी। उन्हें बिजली की रोशनी में रखा गया था। पाया गया कि उनके दिन की लंबाई गड़बड़ा गई। सूर्य का प्रकाश और शारीरिक घड़ी मिलकर एक हॉरमोन मेलाटोनिन के स्राव का नियंत्रण करते हैं। धूप के जाते ही मेलाटोनिन का स्राव बढ़ जाता है, और सुबह धूप आते ही मेलाटोनिन का स्राव कम होने लगता है। यह मेलाटोनिन निद्रा देवी को आमंत्रित करता है। नींद के गड़बड़ होने से मेलाटोनिन का स्राव भी गड़बड़ हो सकता है, और इसका उल्टा तो देखा ही जाता है। इसीलिए सभी अनुभवी लोग नियम से सोना आवश्यक मानते हैं।
लॉरा सैन्डर्स बतलाती हैं कि रोग नियंत्रण केन्द्र ने आंकड़ों से दर्शाया है कि यूएसए में औसत व्यक्ति की नींद की अवधि घट रही है और एक चिकित्सा  शोध पत्रिका सर्कुलेशन  में खबर है कि यूएसए में द्वितीय किस्म के मधुमेह की दर बढ़ रही है। तीन वैश्विक दलों के अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि वर्तमान में मनुष्यों की कम होती नींद की अवधि और मधुमेह की बढ़ती दर में गहरा सम्बंध है, जो मेलाटोनिन की अल्पता पर आधारित है।
अभी वैज्ञानिक अल्पनिद्रा तथा मेलाटोनिन तथा इन्सुलिन के सम्बंधों की पड़ताल कर रहे हैं। प्रयोग यह भी दर्शा रहे हैं कि स्वस्थ किशोरों को मात्र तीन रात गहरी नींद से वंचित करने पर उनके रक्त में चीनी की मात्रा पर नियंत्रण गड़बड़ा गया और इन्सुलिन के प्रति प्रतिरोध पैदा हो गया। अर्थात उन पर इन्सुलिन कम असर करने लगा था। यह भी देखा जाता है कि नींद की कमी से पीडि़त व्यक्ति अधिक मीठी चीजें मांगते हैं। इस विचित्रता को भी वैज्ञानिक समझने में लगे हैं। मेलाटोनिन, इन्सुलिन तथा स्वास्थ्य के सम्बंध और अधिक जटिल हैं क्योंकि इनमें एक प्रोटीन भी है जो मेलाटोनिन ग्रहण करता है, और इन्सुलिन के प्रति प्रतिरोध भी अपना करतब दिखलाता है। आंकड़े बार-बार दर्शा रहे हैं कि नींद की कमी का रक्त में ग्लूकोज तथा मधुमेह में कुछ सम्बंध है।
नई-नई समृद्घि तथा आरामदेह पश्चिमी जीवन शैली की अंधी नकल के कारण भारत में भी मधुमेह महामारी की तरह फैल रहा है। भारत में आज टीवी, होटल तथा देर रात के मनोरंजनों के चलते वयस्क तो क्या बच्चे भी खुशी-खुशी कम ही सोते हैं। मुझे अचरज होता है कि कक्षाओं में सभी बच्चे जम्हाई लेते रहते हैं, उन्हें अक्सर सिरदर्द होता है। पूछने पर पता चलता है कि सभी को कोला पीने का बेहद शौक है और चिप्स या कुरकुरे जैसे जंक फूड का। माता पिता उन्हें पौष्टिक भोजन के स्थान पर यही सब देते हैं। 8 से 12 वर्ष की उम्र वाले लगभग सभी बच्चे टीवी देखने के लिए दस बजे के बाद सोते हैं, और उन्हें शाला आने के लिए सुबह 6 बजे उठना ही पड़ता है। जबकि इन बच्चों को लगभग दस घंटे तो सोना ही चाहिए। माता-पिता भी तो नींद की कमी से पीडि़त हैं, क्योंकि उन्हें भी तो टीवी देखना, देर रात पार्टीबाजी करना, जंक फूड खाना आधुनिकता की निशानी लगता है। इन सबसे वे वही रोग भुगत रहे हैं जो पश्चिम के लोग भुगत रहे हैं। किन्तु पश्चिम में अब कोला, जंक फूड आदि के खिलाफ जागरूकता आ रही है। हम भी उनकी नकल करते हुए बाद में सीखेंगे शायद, किन्तु जब तक हमारे बच्चों का बहुत नुकसान हो चुका होगा। क्या बुद्घिमानी इसमें नहीं कि हम शीघ्र ही विज्ञान से सीख लें, क्योंकि विज्ञान ने सिद्घ कर दिया है कि कोला में $जहर है, जंक फूड हानिकारक हैं, नींद की कमी रोगों और अस्वस्थता को न्यौता है। (स्रोत )

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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