September 23, 2009

50 बरस का सुनहरा सफर


दूरदर्शन ने अपने पचास साल पूरे कर लिए। तब यूनेस्को ने इसके लिए भारत सरकार को 20, 000 डॉलर की आर्थिक मदद और 180 फिलिप्स टेलीविजन सेट्स दिए थे। दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को प्रयोगात्मक आधार पर आधे घण्टे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया। 15 सितम्बर 1959 को दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में सिर्फ तीन दिन आधा-आधा घंटे होता था। तब इसे 'टेलीविजन इंडिया' नाम दिया गया था, 1975 में इसका हिन्दी नाम 'दूरदर्शन' किया गया। तब दिल्ली में मात्र 18 टेलीविजन सेट लगे थे और एक बड़ा ट्रांसमीटर लगा था।
दूरदर्शन को देश भर के शहरों में पहुंचाने की शुरुआत 80 के दशक में हुई और इसकी वजह थी 1982 में दिल्ली में आयोजित किए जाने वाले एशियाई खेल। एशियाई खेलों के दिल्ली में होने का एक लाभ यह भी मिला कि श्वेत और श्याम दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया था। 1984 में देश के गांव-गांव में दूरदर्शन पहुंचाने के लिए देश में लगभग हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया।
यह वह दौर था जब दूरदर्शन का राज चलता था। कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों को जब मोहल्ले के इक्के-दुक्के रइसों के घर में टीवी हुआ करता था और सारा मोहल्ला टीवी में आ रहे कार्यक्रमों को आश्चर्यचकित सा देखता था। पारिवारिक कार्यक्रम हम लोग ने लोकप्रियता के तमाम रेकॉर्ड तोड़ दिए। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना बुनियाद जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परीचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ  घर घर में लोकप्रिय हो चुके थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारवाहिकों ने दूरदर्शन को घर- घर में पहचान दे दी।  दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले मालगुडी डेज़, ये जो है जिन्दगी, रजनी, नुक्कड़, ही मैन, सिग्मा, स्पीड, जंगल बुक, वाह: जनाब, कच्ची धूप, रजनी, तमस, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सुरभि, शांति आदि ने जो मिसाल कायम की है उसकी तुलना आज के  किसी भी धारावाहिक से नहीं की जा सकती। वहीं भारत एक खोज, दि सोर्ड आफ टीपू सुल्तान और चाणक्य ने लोगों को भारत की ऐतिहासिक तस्वीर से रूबरू कराया। जबकि जासूस करमचंद, रिपोर्टर व्योमकेश बक्शी, तहकीकात, सुराग और बैरिस्टर राय जैसे धारावाहिकों ने समाज में हो रही अपराधिक घटनाओं को स्वस्थ ढंग से पेश करने की कला विकसित की।
1986 में शुरु हुए रामायण और महाभारत के प्रसारण ने तो टीवीं को ईश्वरत्व प्रदान किया। जब ये धारावाहिक आते तो पूरा परिवार हाथ जोड़कर देखता था। रामायण में राम और सीता का रोल अदा करने वाले अरूण गोविल और दीपिका को लोग आज भी राम और सीता के रुप में पहचानते हैं तो नीतिश भारद्वाज महाभारत सीरियल के कृष्ण के रुप में जाने गए। रामायण की लोकप्रियता का आलम तो ये था कि लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके अगरबत्ती और दीपक जलाकर रामायण का इंतजार करते थे और एपिसोड के खत्म होने पर बकायदा प्रसाद बांटी जाती थी।  टर्निंग प्वाइंट, अलिफ लैला, कथासागर, विक्रम बेताल शाहरुख़ खान की सर्कस, फौजी और देख भाई देख ने देश भर में अपना एक खास दर्शक वर्ग ही नहीं तैयार किया था बल्कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी इन धारावाहिकों को ज़बर्दस्त लोकप्रियता मिली। बुधवार और शुक्रवार को 8 बजे दिखाया जाने वाले फिल्मी गानों पर आधारित चित्रहार और प्रति सप्ताह दिखाए जाने वाले लोकप्रिय फिल्म का इंतजार लोग बड़ी उत्सुकता से करते थे। उस दिन शहरों के सिनेमा हाल सुने हो जाते थे।

दूरदर्शन के समाचार की बात की जाए तो उसके समाचारों में सहजता आज तक कायम है जबकि निजी समाचार चैनलों में न्यूज जैसे गंभीर विषय में मनोरंजन का तड़का लगाया जाता है। दूरदर्शन से 15 अगस्त 1965 को प्रथम समाचार बुलेटिन का प्रसारण किया गया था। तब से लेकर नेशनल चैनल पर रात 8. 30 बजे प्रसारित होने वाला राष्र्ट्रीय समाचार बुलेटिन आज भी बदस्तूर जारी है। समाचार की महत्ता को देखते हुए ही दूरदर्शन ने 2003 में पृथक रूप से 24 घंटे का समाचार चैनल डीडी न्यूज शुरू किया। यह एकमात्र चैनल है जो केबल- विहीन और उपग्रह सुविधा रहित घरों तक पहुंचता है।  डीडी न्यूज पर रोजाना 16 घंटे सीधा प्रसारण होता है जिसमें हिन्दी में 17 और अंग्रेजी में 13 समाचार बुलेटिन शामिल है। उर्दू और संस्कृत में रोज एक बुलेटिन के अलावा मूक- बधिर लोगों के लिए सप्ताह में एक बुलेटिन प्रसारित होता है। साथ ही राज्यों की राजधानियों में 24 क्षेत्रीय समाचार एकांशों द्वारा प्रतिदिन 19 भाषाओं में 89 बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं।
दूरदर्शन ने मनोरंजन के साथ-साथ लोगों को शिक्षित करने में भी अहम भूमिका अदा की है। सन् 1966 में कृषि दर्शन कार्यक्रम के द्वारा दूरदर्शन देश में हरित क्रांति लाने का सूत्रधार बना। आज भी यह कार्यक्रम जारी है। और जहां तक  खेल की बात है तो दूरदर्शन ने अपनी स्थापना के कुछ समय बाद से ही खेल और खिलाडिय़ों के लिए विशेष कार्यक्रम देना शुरू कर दिया था। सन् 1999 में पृथक डीडी स्पोर्ट चैनल शुरू किया गया जो देश का एकमात्र फ्री टू एयर स्पोटर्स-24 घंटे प्रसारक चैनल है। देश की विभिन्न संस्कृतियों के दर्शन भी आज दूरदर्शन पर ही होता है। शास्त्रीय नृत्य-संगीत हो या ऐतिहासिक विरासत, दूरदर्शन का डीडी भारती चैनल सभी को भव्यता से प्रस्तुत करता है। जबकि उत्तर पूर्व और विभिन्न भाषा- भाषी लोगों की जरूरतों, उनके मनोरंजन का ख्याल प्रादेशिक भाषा के चैनल कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दूरदर्शन ने अपनी आमद दर्ज करा रखी है। डी डी इंडिया चैनल 1995 में इसी कड़ी के रूप में शुरू किया गया था। पहले इसका नाम डीडी वल्र्ड था। आज इसे 146 देशों में देखा जा रहा है।
 दूरदर्शन के 16 चैनलों को अब (डीबीवी-एच प्रसारण) मोबाइल पर देखा जा सकता है। जबकि एचडीटीवी (हाईडेफीनिशन टेलीविजन) और आईपीटीवी (इंटरनेट प्रोटोकाल टेलीविजन) प्रसारण तकनीक अपनाने को लेकर तैयारियां चल रही हैं। 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों का प्रसारण एचडी सिग्नल पर ही किया जाएगा। जो देश में पहली बार होगा। (उदंती फीचर्स)

1 Comment:

दीपक said...

एक मजेदार और रोचक रपट के लिये आभार....मै अभी भी दुर-दर्शन देखना पसंद करता हुँ !!

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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