September 23, 2009

बेटी पुकारने में झिझक क्यों

- सुजाता साहा
छोटे पर्दे पर इन दिनों बेटियों को लेकर ढेर सारे कार्यक्रम चल रहे हैं - अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, बालिका वधू, 24/12 करोलबाग आदि, जिनमें हमारे देश में बेटियों की सामाजिक पारिवारिक स्थितियों के माध्यम से समाज की विभिन्न बुराईयों और कुरीतियों से लडऩे के लिए रास्ते निकाले जाने का बेहतर प्रयास किया जा रहा है। वहीं जब किसी कार्यक्रम में बेटियों को बेटा कहकर संबोधित किया जाता है तो मुझे गुस्सा आ जाता है।
हाल में स्टार टीवी पर एक नया कार्यक्रम शुरू हुआ है तेरे मेरे बीच में। फरहा खान द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के वर्तमान में मशहूर कलाकारों को बुलाया जा रहा है जिसमें उनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया जाता है। सलमान खान, शाहरूख खान, विजेन्द्र सिंह, प्रियंका चोपड़ा के बाद दो ग्लैमरस तारिकाओं को दर्शकों के सामने पेश किया गया बिपाशा बसु और शिल्पा शेट्टी।
आप सोच रहे होंगे कि इनके बारे में मुझे भी आता है गुस्सा  स्तंभ में बताने की क्या जरुरत पड़ गई?  मैं इस कार्यक्रम के बारे में नहीं बल्कि फरहा द्वारा इन दोनों तारिकाओं को बार- बार यह कहकर संबोधित करने पर, कि आप मिल रहे हैं अपने परिवार के दो बेटों से, पर आपत्ति दर्ज कराना चाहती हूं। आखिर फरहा को ऐसा कहने की जरुरत महसूस क्यों हुई? जबकि वह खुद भी एक काबिल बेटी है और बेटियों की मां है, फिर आज के दौर में जबकि बेटे और बेटी के बीच भेदभाव मिटाने के लिए कई धारावाहिक चल रहे हैं, वहां बेटियों को बेटा कहकर संबोधिन किया जाना कुछ अटपटा लगा। बेटा कहे जाने पर इन दोनों बेटियों ने भी आपत्ति दर्ज नहीं की। जबकि फरहा ने इसी कार्यक्रम में एक ऐसे परिवार को बुलाकर सम्मानित किया और एक लाख का चेक देकर उनकी सहायता की जो अपने माता- पिता व भाई का पालन- पोषण नौकरी करके कर रही है। इन दोनों तारिकाओं ने भी उनके दोनों नालायक बेटों को खरी- खोटी  सुनाई- शिल्पा ने कहा 'आपके बेटों की इज्जत बिल्कुल नहीं करती।' और बिपाशा ने कहा 'मेरे बेटे होते तो मैं मार- मार के निकालती।' कहने का तात्पर्य यह कि अगर आप मीडिया के माध्यम से नामी सितारों के जरिए एक अच्छा संदेश देने जा रहे हैं तो कम से कम ऐसा तो मत कहिए कि संदेश ही गलत जाए।
इस कार्यक्रम के बहाने मेरा गुस्सा उन लोगों के प्रति भी उभर के आ गया जिनके माता- पिता अपनी काबिल बेटी का परिचय-  यह हमारी बेटी नहीं बेटा है, कहते हुए कराते हैं। वे गर्व के साथ यह भी तो कह सकते हैं ये है हमारी होनहार बेटी, जिसने आज एक मुकाम हासिल किया या जिसने अपने परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ली है। कितना ही अच्छा हो कि माता- पिता और फरहा जैसी सेलीब्रिटीज गर्व से कहें मिलिए हमारी इन होनहार बेटियों से.....

2 Comments:

Varsha said...

बिल्कुल सही लिखा आपने,आखिर बेटी को बेटा कहकर पुकारा जाए,तभी उसका मान बढ़े,वो घर का बेटा बनकर दिखाए,तभी जिम्मेदार हो, ये हमारी दोहरी मान्यता दिखाता है। इसके ज़रिए फिर हम बेटी को नहीं बेटे को ही मान दे रहे हैं। असल में सारी लड़ाई तभी शुरू हो जाती है जब बराबरी की नौबत आती है,जो जैसा है वैसा रहे, सबको अपना-अपना हक मिले तो तुलना की जरुरत ही नहीं रह जाएगी।
वर्षा निगम,दिल्ली

prabha said...

kabi es bat per dhyan nahi diya, aapne aankhe khol de.
dhanyavad

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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