August 20, 2009

शिक्षा प्रणाली के कायाकल्प पर बहस

शिक्षा प्रणाली के कायाकल्प पर बहस
- रत्ना वर्मा
जून के अंतिम सप्ताह में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी इरादों की घोषणा की है। जहां उन्होंने दसवी कक्षा (हाई स्कूल) की बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने, बारहवीं कक्षा ( इंटरमीडियेट) की परीक्षा को एक केन्द्रीय बोर्ड से करवाने तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान अनेक नियामक संस्थाओं के स्थान पर सिर्फ एक स्वतंत्र नियामक संस्था की आवश्यकता तथा गरीब छात्रों द्वारा शिक्षा हेतु लिए जाने वाले ऋणों पर ब्याज सरकार द्वारा भुगतान किे जाने जैसे अनेक सुधारों की घोषणा की है। इसके साथ ही उन्होंने परीक्षा परिणामों में अंको के स्थान पर श्रेणी ए, बी, सी इत्यादि देने की बात की है।
स्वतंत्रता के बाद यह पहली बार है कि किसी केन्द्रीय मंत्री ने शिक्षा प्रणाली के आमूल- चूल कायकल्प करने का निश्चय प्रगट किया है। प्रसन्नता की बात है कि श्री कपिल सिब्बल की इस पहल को प्रधानमंत्री का भी समर्थन है। इस घोषणा का देश के करोड़ों छात्र- छात्राओं और उनके अभिभावकों द्वारा वैसे ही हर्ष और उल्लास से स्वागत किया गया जैसा कि वर्षों से सूखे से त्रस्त क्षेत्र में रिमझिम वर्षा होने पर होता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि जनता शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन की अपेक्षा कई दशकों से कर रही थी।  इससे पहले आज तक सिर्फ केन्द्रीय शिक्षा मंत्री बनने पर श्री एमसी छागला ने केन्द्रीय स्कूलों की स्थापना करके केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के बच्चों के लिए पूरे देश में समान पाठ्यक्रम से अच्छे स्तर की स्कूली शिक्षा का प्रावधान किया गया था। उसके बाद से शिक्षा मंत्री शिक्षा के क्षेत्र को सिर्फ राजनीति का अखाड़ा बनाकर पाठ्यपुस्तकों से अपने संकीर्ण नजरिये के अनुरुप छेेड़- छाड़, प्रबंधन और तकनीकी उच्च संस्थाओं में दखलंदाजी, तुगलकी फरमानों से कालेजों और विश्वविद्यालयों की स्थापना की अनुमति देने जैसे विस्मयकारी खेल खेलते रहे। मरणासन्न शिक्षा प्रणली में अत्यंत संदिग्ध किस्म के कालेज और विश्वविद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह प्रगट होने लगे और शिक्षा जगत भी भ्रष्टाचार के काले रंग में रंग गया। इस परिप्रेक्ष्य में श्री कपिल सिब्बल के विचार शिक्षा की काली कोठरी में आशा की किरण की तरह चमके हैं।
हम श्री सिब्बल के इरादों का स्वागत करते हुए उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहेंगे कि उन्होंने अपनी घोषणा में प्रारंभिक (प्राइमरी) स्कूलों का नाम तक नहीं लिया है।  कक्षा 1 से 5 तक की प्राथमिक शिक्षा किसी भी मनुष्य की शिक्षा की बुनियाद होती है अतएव शिक्षाविद इसे शिक्षा प्रणाली में सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। सभी विकसित देश जैसे अमरीका, इंग्लैन्ड और योरप के अन्य देश अपने शिक्षा बजट में प्राथमिक शिक्षा को सर्वोच्च स्थान देते हैं और कक्षा 1 से 12 तक की शिक्षा को सभी शैक्षणिक आवश्यकताओं से युक्त स्कूलों के माध्यम से सभी बच्चों को मुफ्त देने की जिम्मेदारी उठाते हैं। इन स्कूलों में बच्चों को पुस्तकों कापी, कलम पेन्सिल भी मुफ्त दी जाती है। परिणाम है कि यह देश इतने समृद्ध और शक्तिशाली हैं। 
शिक्षाविदों के अनुसार उचित प्रारंभिक शिक्षा के लिए स्कूल में उचित संसाधन होना अनिवार्य है। संसाधनों से अभिप्राय है स्कूल भवन, फर्नीचर, पीने का पानी, शौचालय, क्रीड़ांगन इत्यादि। इस मामले में देश के ग्रामीण क्षेत्र में अधिकांश स्कूलों की हालत शर्मनाक है। उनमें यह अनिवार्य संसाधन कल्पना से भी परे हैं। इतना ही नहीं पीने का पानी, शौचालय क्रीड़ांगन और पुस्तकालय तो अधिकांश शहरों के प्राइमरी स्कूलों में भी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि ऐसी दुव्र्यवस्था के चलते बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से विमुख हो जाते हैं। इन स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों के भी अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन होने की वजह यही है। श्री सिब्बल को याद रखना चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा तो शिक्षारुपी गंगा की गंगोत्री है अतएव शिक्षा सुधारों में प्राथमिक शिक्षा को सुव्यवस्थित करने को उन्हें अपने कार्यक्रम में सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
मंत्री महोदय ने अपने कार्यक्रम में शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले कदाचारों की रोकथाम के लिए वर्तमान संसद के प्रथम 100 दिनों के अदर एक कानून बनाने के निर्णय की घोषणा की है। यह स्वागतेय कदम है, जिसकी बहुत जरुरत है। रैगिंग जैसे अपराधों, शिक्षा संस्थानों के प्रशासकों द्वारा भ्रामक प्रचार द्वारा छात्रों और अभिभावकों को आकर्षित करना, कैपिटेशन फीस लेना इत्यादि बहुत ही गंभीर अपराध हैं जिनकी रोकथाम के लिए कानून की आवश्यकता बहुत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। सर्वोच्च न्यायालय ऐसा कानून बनाने की आवश्यकता पर वर्षों से जोर देता रहा है। देर आये दुरुस्त आये।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि शिक्षा जैसी व्यापक प्रणाली में सुधार एक जटिल प्रक्रिया है जो रातों- रात नहीं हो सकती। वास्तव में बहुत कठिन है डगर पनघट की। प्रांतीय सरकारों और राजनैतिक दलों से विरोध के स्वर उठने भी लगे हैं। श्री सिब्बल ने स्वयं ही यह कहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार प्रांतीय सरकारों तथा शिक्षाविदों से विस्तृत विचार विमर्ष तथा उनके सार्थक सहयोग से ही संभव हो पायेगा। यही उचित भी है। विविध भाषाओं और संस्कृतियों से भरपूर हमारे जैसे देश में विकासोन्मुखी योजनायें और कार्यक्रम तभी कारगर हो सकते हैं जबकि उन पर संवैधानिक दिशा निर्देशों के अनुरुप उनसे संबधित समूहों में गहन मनन- चिन्तन से उत्प्रेरित विचार- विमर्ष के बाद उन्हें अंतिम रुप दिया जाए।
वास्तव में श्री सिब्बल ने शिक्षा जैसे समाज के सबसे महत्वपूर्ण विषय पर हम सभी को व्यापक राष्ट्रीय बहस का सुअवसर प्रदान किया है। व्यापक जनहित के मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस स्वस्थ और सुचारु जनतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों में और तो और संसद जिसका मुख्य उद्देश्य ही जनहित के मुद्दों पर बहस करना होता है, से ही बहस की संस्कृति लुप्त हो गई है। संयोग से नव निर्वाचित लोकसभा में शोर- शराबे से संसद की कार्रवाई को बाधित करने वाले बाहुबली सांसदों की संख्या में काफी कमी आई है। अतएव आशा है कि शिक्षा सुधार जैसे राष्ट्रीय मुद्दे पर संसद में विस्तृत बहस होगी।
इस परिप्रेक्ष्य में यह भी आवश्यक है कि इस विषय पर छात्र, अभिभावक, शिक्षाविद और बुद्धिजीवी भी इस बहस को पुनीत कर्तव्य मानते हुए इसमें भाग लें।  समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और टेलीविजन का भी कर्तव्य है कि इस बहस को अपने पृष्ठों और कार्यक्रमों में वांछित स्थान और प्रोत्साहन दें। हमें विश्वास है कि इस प्रक्रिया से शिक्षा प्रणाली के कायाकल्प के लिए ऐसे सुझाव आऐंगे जिनसे प्राथमिक स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक की शिक्षा का ऐसा रुप दिया जा सकेगा जिससे देश के सभी बच्चों, युवकों और युवतियों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सुलभ हो सकेगी।
शिक्षा सुधार संबंधी बहस के इस पुनीत अभियान में अपना विनम्र योगदान करने के उद्देश्य से हम इस मुद्दे पर सुचिंतित लेख आमंत्रित करते हैं। अच्छे सुझावों को हम अपने पृष्ठों पर स्थान देंगे।

4 Comments:

Unknown said...

education se related yah artcle bahut achchha hai.same sthiti Nepal me bhi hai.is bar ham ne ek lekh lage raho munna bhai chhapa hai. absya dhekhen.
s.n.mishra
www.himalini.com

Rashmi Swaroop said...

अच्छी पहल.

Rashmi Swaroop said...

अच्छी पहल.

Rashmi Swaroop said...

अच्छी पहल.

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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