- अनिता मंडा
वे तुम्हारे पंखों को
अनावश्यक बोझ बताकर
कतरने की कोशिश करेंगे
तुम होशियार रहना मेरी बहनो!
कहना उनसे-
अपने सपनों का बोझ
हम किसी के कंधों पर नहीं डालेंगे
मत डरो
वे तुम्हारे सपनों की कीमत
हीरे जवाहरात से लगाएँगे
तुम इतनी कच्ची सौदागर मत बनना
हीरों की चमक से
अपनी आँखों को बचाना
वे तुम्हारे लिए संस्कृति का
सिंहासन सजाएँगे
घर के बाहर बैठे हैं लुटेरे
कहकर डराएँगे
तुम डर पर नहीं
अपनी हिम्मत पर भरोसा करना
वे आँचल को
परचम बनाने की बातों की
खिल्ली उड़ायेंगे
भूलना मत
हिम्मत की आँधियों में वे
राख की मानिंद उड़ जाएँगे
तुम अपनी आग को ज़िंदा रखना
राहतों का पानी तुम्हें
ख़ुद ही खोज लेगा।

जागरूकता का संदेश देती बहुत सुंदर कविता । बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत आभारी हूँ।
ReplyDeleteस्त्री मन की संवेदनाओं को सजग करती हुई कविता.. 🙏🏻
ReplyDeleteबहुत सुन्दर... 🙏🏻👏🏻👏🏻
बहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर!
ReplyDelete~सादर
अनिता ललित
सटीक,सुंदर व सही .....रीता प्रसाद
Deleteनारी के प्रति सोच, उसे दिए जाने वाले प्रलोभन एवं दिखाए जाने वाले डर का यथार्थ चित्रण करती तथा जागरण का संदेश देती बहुत सुंदर कविता।हार्दिक बधाई आपको।
ReplyDeleteस्त्रियों को जागरुक करती सशक्त रचना, बधाई!!!
ReplyDeleteशीला मिश्रा