मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Mar 1, 2026

कविताः मेरी बहनो!

 - अनिता मंडा


वे तुम्हारे पंखों को 

अनावश्यक बोझ बताकर

कतरने की कोशिश करेंगे

तुम होशियार रहना मेरी बहनो!

 

कहना उनसे-

अपने सपनों का बोझ

हम किसी के कंधों पर नहीं डालेंगे

मत डरो

 

वे तुम्हारे सपनों की कीमत 

हीरे जवाहरात से लगाएँगे

तुम इतनी कच्ची सौदागर मत बनना

हीरों की चमक से

अपनी आँखों को बचाना

 

वे तुम्हारे लिए संस्कृति का 

सिंहासन सजाएँगे

घर के बाहर बैठे हैं लुटेरे

कहकर डराएँगे

तुम डर पर नहीं

अपनी हिम्मत पर भरोसा करना

 

वे आँचल को 

परचम बनाने की बातों की

खिल्ली उड़ायेंगे

भूलना मत

हिम्मत की आँधियों में वे

राख की मानिंद उड़ जाएँगे

तुम अपनी आग को ज़िंदा रखना

राहतों का पानी तुम्हें

ख़ुद ही खोज लेगा।


8 comments:

  1. Anonymous02 March

    जागरूकता का संदेश देती बहुत सुंदर कविता । बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

    ReplyDelete
  2. बहुत आभारी हूँ।

    ReplyDelete
  3. Dr.Kanak Lata08 March

    स्त्री मन की संवेदनाओं को सजग करती हुई कविता.. 🙏🏻
    बहुत सुन्दर... 🙏🏻👏🏻👏🏻

    ReplyDelete
  4. sushma Gupta08 March

    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  5. Anonymous08 March

    बहुत सुंदर!

    ~सादर
    अनिता ललित

    ReplyDelete
    Replies
    1. Anonymous09 March

      सटीक,सुंदर व सही .....रीता प्रसाद

      Delete
  6. नारी के प्रति सोच, उसे दिए जाने वाले प्रलोभन एवं दिखाए जाने वाले डर का यथार्थ चित्रण करती तथा जागरण का संदेश देती बहुत सुंदर कविता।हार्दिक बधाई आपको।

    ReplyDelete
  7. Anonymous09 March

    स्त्रियों को जागरुक करती सशक्त रचना, बधाई!!!
    शीला मिश्रा

    ReplyDelete