मुदित नया साल
ओस भीगी धरा, किरनों के पाँव
उतरा है सूरज, अपने इस गाँव।
पत्तों से छनकर, आई है धूप
निखरा है प्यारा, धरती का रूप।
शरमाती कलियाँ, मुस्काते फूल
बाट में बिछाए, घास के दुकूल।
तरुवर पर पाखी, देते हैं ताल
द्वार पर खड़ा है, मुदित नया साल।
- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
इस अंक में
अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है... - डॉ. रत्ना वर्मा
आलेखः वंदे मातरम् की गौरव गाथा - प्रमोद भार्गव
प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान - रविन्द्र गिन्नौरे
दोहेः सूरज आने को हुआ - हरेराम समीप
संस्मरणः अयोध्या से वाराणसी - उमंग और ऊर्जा भरते घाट - सुदर्शन रत्नाकर
यादेंः नव वर्ष - एक उत्सव वाला दिन - डॉ. जेन्नी शबनम
आलेखः शोर में डूबता जीवन : हेडफोन की आदत... - संध्या राजपुरोहित
व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए - गिरीश पंकज
व्यंग्यः शुभकामनाओं की दहशत - विनोद साव
लघुकथाएँः 1. सफाई, 2. लीडर - अनुवाद: सुकेश साहनी
कविताः परिवार : सात कविताएँ - जयप्रकाश मानस

बेहतरीन अंक। उत्कृष्ट रचनाकारों की उत्कृष्ट रचनाओं से सुसज्जित है।
ReplyDeleteसंपादक सहित सभी को आँग्ल नववर्ष की शुभकामनाएँ-महादेव सबका कल्याण करें। भारत एक विकसित राष्ट्र बने।
शुभकामनाएँ।
आदरणीय सोनी जी,
ReplyDeleteआपके स्नेहिल शब्द और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।
आपकी शुभकामनाएँ हमारे लिए संबल हैं।
महादेव की कृपा हम सभी पर बनी रहे और भारत निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो—यही कामना है।
सादर 🙏
नए वर्ष में निखार लिए हुए उदंती बेहतरीन अंक के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteशुभकामनाओं के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार सुदर्शन जी।
Delete