- डॉ. योगिता जोशी
"अरे! यह बोझ अपने माथे पर लिए कहाँ जा रही हो सुगनी? और इस बच्चे को कब तक अपने सीने से लगाए-लगाए फिरती रहोगी ?"
सुगनी की सहेली लक्ष्मी ने पूछा, तो सुगनी ने बड़ी मासूमियत के साथ अपनी सहेली को ज़वाब दिया, "यह कैसी बातें कर रही हो? जिसे तुम बोझ कह रही हो वह मेरे लिए बिल्कुल भी बोझ नहीं है। यह तो मेरे जिगर का टुकड़ा है.. मेरी जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी को बोझ नहीं कहते। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं इस काबिल तो हूँ कि अपने बीमार पति की सेवा कर पा रही हूँ और मुसीबत के समय उनका हाथ बँटा रही हूँ। और यह प्यारा बच्चा तो हम दोनों के प्यार की निशानी है। मेरी उम्मीदों का चिराग है। इसे मैं खूब पढ़ा-लिखाकर बड़ा अफसर बनाऊँगी । यह हमारी तरह मेहनत - मजदूरी नहीं करेगा । "
सुगनी ने एक साँस में बिना रुके लक्ष्मी को ज़वाब दे दिया। वह मुस्कुराने लगी और बोली, ''तुम धन्य हो सुगनी। कितना अच्छा सोचती हो तुम। वरना हम मजदूरों के बच्चे तो मजदूर ही रह जाते हैं। पढ़-लिख देख नहीं पाते ; लेकिन तुम अपने बच्चे की कितनी चिंता कर रही हो। तू तो भारत माता है, भारत माता!
लक्ष्मी की बात सुनकर सुगनी हँस पड़ी और बोली, "अरे ! इतना मत चढ़ा दे मुझे । मैं इस बच्चे की माता बनकर इसकी अच्छे से परवरिश कर लूँ, यही बहुत बड़ी बात होगी।"
लक्ष्मी बोली, "तू बहुत समझदार है। इस बच्चे का भविष्य बहुत उज्ज्वल होगा। जब तुम जैसी बहादुर महिला इसकी माँ है तो, तो बेशक यह बच्चा बड़ा होकर कुछ-न-कुछ कमाल ज़रूर करेगा। बड़ा प्यारा बच्चा दिख रहा है। क्या नाम रखा है इसका?"
सुगनी ने मुस्कुरा कर कहा, " वीरबहादुर ।"
लक्ष्मी बोली, "वाह! वीर भी और बहादुर भी! बहुत अच्छा किया। जैसा नाम है, तो बड़ा होकर वैसा काम भी करेगा। ठीक है। लकड़ी बेचकर वापस आ, तो हम लोग बैठ कर कुछ और बातें करेंगी।"
इतना बोलकर लक्ष्मी भी अपने काम पर चली गई।
लक्ष्मी के जाने के बाद सुगनी चलते-चलते अतीत की स्मृतियों में खोती चली गई। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ उसके साथ अभी-अभी घटित हो रहा है। सुगनी पास ही के गाँव मोतीकला के किसान सूरजमल और रामकली की बेटी थी, जिसकी शादी पड़ौसी गाँव काबरी डूंगरी के किसान भोलाराम के बेटे रामधन से हुई थी।
बात दो साल पहले की है, जब भोलाराम अपने पुत्र रामधन की बारात लेकर सुगनी के गाँव आया था ।सुगनी को आज भी याद है कि कैसे उस वक़्त वह मन-ही-मन हर्षित होकर मंद-मंद मुस्कुराई थी, जब उसकी सहेली गीता ने आकर उससे कहा था, "तेरा दूल्हा तो बहुत हृष्ट-पुष्ट और सुंदर है रे! बिल्कुल राजकुमार लग रहा है ।"
सुगनी ने भी उसे दूर से देखा तो बहुत खुश हो गई। सोचने लगी, एक अच्छे परिवार में ज्यादा जा रही है वह। जीवन सुख से बीतेगा।"
बहुत ही धूमधाम से सुगनी का ब्याह हुआ। पिता सूरजमल ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया। जितने भी बाराती आए, सब स्वागत-सत्कार से बहुत खुश हुए। पिता ने फिर खुशी-खुशी अपनी बेटी की विदाई की थी । माँ रामकली की आँखों में आँसू थे लेकिन ये खुशी के आँसू थे कि उनकी बिटिया एक अच्छे घर की बहू बनकर जा रही है।
सुगनी एवं रामधन का वैवाहिक जीवन बहुत खुशहाल था। दोनों में खूब प्यार था। रामधन बहुत मेहनत करने वाला इंसान था । वह पूरे दिन मजदूरी करता और शाम को आते वक्त सुगनी के लिए तरह-तरह की मिठाई तो कभी साड़ी, चूड़ी और बिंदिया वगैरह लेकर आता। सुगनी को बहुत प्यार से रखता था । जब वह मज़दूरी करके घर लौटता था, तो सुगनी भी उसका मनपसंद भोजन बना कर रखती थी। फिर दोनों साथ बैठकर प्रेमपूर्वक भोजन करते। रामधन मस्ती में कोई गीत गुनगुनाने लगता। दोनों के जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। दिन-महीने गुजरते गए और सुगनी पेट से भी हो गई। उनके घर में खुशी छा गई। मानो कोई त्योहार आ गया हो। पूरे नौ महीने रामधन ने सुगनी का बहुत ख्याल रखा। उसे किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी।
देखते-ही-देखते पूरे नौ महीने बीत गए और एक दिन सुगनी एवं रामधन को गाँव के सरकारी अस्पताल में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई । दोनों बहुत खुश हुए । बच्चा काफी तंदरुस्त था। उसके मुँह से निकल गया, " अरे! यह तो वीर बहादुर है।"
सुगनी ने कहा, "वाह! हम अपने बच्चे का नाम वीरबहादुर ही रखें तो कैसा रहेगा?"
रामधन बोला, "एकदम सही रहेगा।"
पूरे गाँव में लड्डू बाँटे गए। बेटे का जब नामकरण हुआ तो उसका नाम वही रखा गया, 'वीरबहादुर' । गाँववाले भी इस नाम से बड़े प्रसन्न हुए। सब उसे बच्चे को वीरू कह कर बुलाने लगे।गाँव के किसी सयाने ने कहा, "यह बालक हमारे गाँव का भविष्य है। बड़ा होकर वीरबहादुर ही बनेगा और हमारे गाँव का नाम रोशन करेगा।"
समय बड़ा बलवान होता है । समय का पहिया कब किधर घूम जाए, कहा नहीं जा सकता। वही हुआ रामधन और सुगनी के साथ। एक शाम रामधन मजदूरी करके घर नहीं लौटा । बहुत देर हो गई तो सुगनी चिंता में पड़ गई । अचानक उसे खबर मिली कि रामधन अस्पताल में भर्ती है। रास्ते में कोई दुर्घटना हो गई है । सुगनी के पैरों तले से मानों जमीन ही सरक गई । एकदम सुन्न पड़ गई। लगा अब नीचे गिर जाएगी। लेकिन वह सँभल गई । उसने फौरन अपने अपने चार महीने के बेटे वीरू को अपने कंधे पर बाँध लिया और अस्पताल की ओर भागी। वहाँ पहुँचकर पता चला कि रामधन के मस्तिष्क में गंभीर चोट आई है और उसके शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया है। उसे ठीक होने में साल-छः महीने लगेंगे।
सुगनी की आँखों में आँसू आ गए।
वह सोचने लगी, "हे भगवान ! अचानक यह क्या हो गया?"
दूसरे दिन रामधन को छुट्टी तो मिल गई परंतु वह बहुत दु:खी था। उसकी आँखों में भी आँसू थे। सुगनी से बोला वह, ''ऐसे जीवन से तो अच्छा था कि मैं मर ही जाता। मैं खुद ही बोझ बन गया हूँ और तुम पर भी बोझ रहूँगा। अब मैं तुम दोनों के लिए कुछ नहीं कर सकूँगा। "
सुगनी ने आँसू पोंछते हुए अपने पति को भरोसा दिलाया था, "चिंता मत करो। बहुत जल्द ठीक हो जाओगे। आप जब तक वह ठीक नहीं होंगे, तब तक मैं आपका और बेटे का पूरा ध्यान रखूँगी। मेहनत - मजदूरी करके अपना घर चलाऊँगी । कल आप काम कर रहे थे, आज मैं करूँगी ।"
सुगनी की बात सुनकर रामधन के आँसू थम गए। पास खड़े सुगनी के बुजुर्ग ससुर भोलाराम ने कहा, "तू तो देवी है, देवी! पति-पत्नी जीवन में सुख-दुख साथ बिताने की कसम खाते हैं। आज जब पति पर भी विपदा आई है, तो तू उसे कैसे छोड़ सकती है। तू धन्य है।"
रामधन को लेकर सुगनी घर पहुँच गई ।
अतीत की इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते सुगनी चली जा रही थी । अचानक उसका बेटा रोया, तो उसकी चेतना जाग्रत हुई और वह अपने अतीत की स्मृतियों से बाहर आई।
घर आकर उसने रामधन को रास्ते में लक्ष्मी से मिलने का सारा किस्सा कह सुनाया। तो रामधन बोला, " सुगनी! तुम मेरा सीना गर्व से चौड़ा कर देती हो। तुम वास्तव में बहुत ही होनहार, बहादुर एवं हिम्मतवाली स्त्री हो । मैं बहुत ही खुशकिस्मत हूँ कि मुझे तुम जैसी स्त्री जीवन-संगिनी के रूप में मिली ।धन्य है तुम्हारे माँ-बाप, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारी कोख से जन्मा हमारा बेटा वीर बहादुर निश्चित ही हमारा ही नहीं बल्कि पूरे देश का भविष्य है। तुम्हारी सहेली ने ठीक ही कहा है कि जब तुम इसकी माँ हो, तो इसका भविष्य निश्चित ही बहुत उज्ज्वल होगा ।"
दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे।
उस दिन से सुगनी ने इस बात को अपना धर्म बना लिया था कि कि मुझे पति की सेवा भी करनी है और घर भी चलाना है। वह रोज सवेरे जंगल जाती। वहाँ से लकड़ियाँ काटती एवं लड़कियों के गट्ठर को अपने सर पर बाँधकर गाँव में लाकर बेच देती ।अपने बेटे को भी वह रानी लक्ष्मीबाई की तरह अपनी पीठ से बाँध लेती । जब वह रोता तो बीच-बीच में रुक कर उसे दूध भी पिला देती । गाँव के लोग सुगनी को देखते तो आपस में चर्चा करते हुए यही कहते कि सुगनी तो आज की लक्ष्मीबाई है। जैसे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी पीठ पर अपने बच्चों को बाँधकर अँग्रेज़ों से मुकाबला किया था, उसी तरह सुगनी भी परेशानियों से मुकाबला कर रही है।सुगनी को इस बात का पूरा भरोसा था कि उसके पति रामधन जल्दी ही ठीक हो जाएँगे और उनका जीवन फिर से पहले की तरह सामान्य हो जाएगा । सुगनी पता नहीं किस मिट्टी के बनी थी । वह बहुत ही दृढ़-संकल्पित और बहुत हौसले वाली महिला थी। निराशा से दूर। जिसके मन में केवल आशा थी, बेहतर भविष्य की आशा। उसके सामने उसे सिर्फ दो ही लक्ष्य दिखाई दे रहे थे ; पहला तो यह कि अपने पति रामधन की बहुत अच्छे से देखभाल करनी है,जिससे वह जल्द-से-जल्द ठीक हो जाए और दूसरा यह है कि उसे अपने बेटे वीरबहादुर की देखभाल करनी है। उसकी अच्छी परवरिश करनी है और खूब पढ़ा-लिखा कर बहुत बड़ा अफसर बनाना है। सुगनी यह बात बहुत अच्छी तरह से जानती थी कि अपने इन दोनों लक्ष्य को पाने के लिए उसे बहुत कठिन परिश्रम करना होगा । और वह पीछे नहीं हटेगी.. कभी नहीं।
सुगनी ने बस इस बात की गाँठ ही बाँध ली थी। रोज सुबह जल्दी उठकर घर के सारे काम निपटाती। खाना बनती. अपने पति के काम करती। फिर अपने बच्चे को साथ में लेकर काम पर निकल जाती। चेहरे पर उसके मुस्कान रहती। हृदय में हौसला रहता। चलती रहती अपने लक्ष्य को पाने के रास्ते पर। वैसे यह सब करना सुगनी के लिए आसान तो नहीं था, पर वह जानती थी कि यदि उसे पति और बेटे का ख्याल रखना है, तो यह मेहनत करनी ही होगी। कष्ट भी सहन करने ही होंगे।
यह सिलसिला डेढ़ साल यूँ ही चलता रहा ।
एक दिन सुगनी के हौसले एवं हिम्मत के आगे समय एवं किस्मत ने हार मान ली। सुगनी के कष्ट के दिन समाप्त हो गए। एक दिन सुगनी जब जंगल से लौटी तो उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। जब उसने अपने पति रामधन को घर के आँगन में खड़ा देखा। सुगनी इस चमत्कार को देखकर पहले तो जोर-जोर से रोने लगी, फिर बोल पड़ी, "भगवान ने मेरी सुन ली!"
फिर खुशी से झूमने लगी, मानो बावली हो गई हो। पूरा गाँव उसके घर इकट्ठा हो गया । सबने रामधन और सुगनी को खूब बधाई एवं आशीर्वाद दिया। सबकी जुबान पर यही बात थी कि सुगनी की मेहनत, हौसले एवं जज्बे ने कमाल कर दिया। अगर यह न होती तो सोचो रामधन का क्या हुआ होता।
गाँव वाले शुभकामनाएँ देकर लौट गए । सुगनी तो मानो खुशी के मारे सुध-बुध ही खो बैठी थी । रामधन ने बड़े प्यार से सुगनी को अपने गले से लगा लिया और बोला, "जैसे कभी सती सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के मुँह से वापस लौटा लिया था, उसी तरह तूने भी मेरी सेवा करके मुझे पहले जैसा कर दिया। समझ लो, मैं भी तो मौत के मुँह से वापस लौटा हूँ।"
रामधन की बात सुनकर सुगनी हँस पड़ी । कुछ दिन आराम करने के बाद रामधन फिर काम पर जाने लगा। सुगनी घर पर रहकर अपने वीरू की देखभाल करने लगी। समय बीतता गया। अब उनका भविष्य यानी बेटा वीरबहादुर भी अपने पैरों पर चलने ही नहीं, दौड़ने लगा था।



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