मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Oct 1, 2024

उदंती.com, अक्टूबर- 2024

वर्ष - 17, अंक- 3

 विज्ञान मानवता के लिए एक खूबसूरत तोहफा है,

 हमें इसे बिगाड़ना नहीं चाहिए।  विज्ञान से बेहतर कुछ

हो ही नहीं सकता। विज्ञान का उपयोग विकास के लिए

 होना चाहिए, विनाश के लिए नहीं।  -डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

इस अंक में

अनकहीः घर से उजाला जा रहा है... - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः मानस के मोती  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

आलेखः लंका विजय के बाद राम अयोध्या विमान से आए थे - प्रमोद भार्गव

कविताः कर्म फल -सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

आलेखः रसोईघर से टूटा माताओं का नाता - डॉ. महेश परिमल

प्रेरकः एक सीख ऐसी भी - सुरभि डागर

पर्व- संस्कृतिः सृष्टि की ऊर्जा है देवी दुर्गा - प्रमोद भार्गव

धरोहरः छत्तीसगढ़ में है माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर

स्वास्थ्यः नारियल के फायदे अनेक - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

कविताः तीर्थ के साथ आते हैं पिता - मधु बी. जोशी

कहानीः दहेज की रकम - प्रियंका गुप्ता

कविताः सुनो स्त्री!  - डॉ. शिप्रा मिश्रा

व्यंग्यः आरोप के कारोबार में संभावनाएँ बहुत हैं - अखतर अली

दो लघुकथाः 1. फूल, 2. अन्तर -  रत्नकुमार साँभरिया

लघुकथाः बुद्ध -  पूनम कतरियार

दो लघुकथाः 1. डोरियाँ, 2. मोबाइल है न! -  अर्चना राय

कविताः आदर्श स्त्री - मंजूषा मन

किताबेंः सवेदनाओं से साक्षात्कार - अंजु खरबन्दा

जीवन दर्शनः श्री कृष्ण से सीखें : सफलता के सूत्र - विजय जोशी

अनकहीः घर से उजाला जा रहा है...


 - डॉ. रत्ना वर्मा

पारम्परिक पर्व त्योहारों को मनाते हुए हम क्या कुछ खोते चले जा रहे हैं, यह आज चिंतन का विषय होते जा रहा है। एक जमाना था, जब पर्व त्योहार का मतलब  परिवार, समाज और  पूरे विश्व को लेकर प्यार, भाईचारा तथा सहयोग की भावना के साथ अपने सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना हुआ करता था। घर में बनाई गई मिठाई व स्वादिष्ट व्यंजनों से परिवार में खुशहाली छा जाती थी और सब लोग मिल-जुलकर आनंद मनाते थे। रोजमर्रा के दुःख-दर्द भूल कर एक दिन के लिए ही सही, अपने रिश्तेदारों और मित्रों  के साथ मुस्कुराते और सबकी अच्छी सेहत व खुशहाली के लिए मंगल कामना करते थे।   

आज त्योहारों का मतलब क्या रह गया है- भीड़ से भरा बाजार, माल या ऑनलाइन में खुशियाँ खरीदने का दिखावा करते हुए, पैसे को पानी की तरह बहाते लोग। इन सबमें व्यापारी तो भरपूर कमाई करते ही हैं, अमीर अपना धन अपने शौक पूरे करने के लिए उड़ाते हैं, साधारण और मध्यमवर्ग अपनी गाढ़ी कमाई को थोड़ी- सी खुशियाँ खरीदने के लिए सोच समझकर खर्च करते हैं और गरीब वर्ग खर्च न कर पाने पर भी कभी उधार लेकर, तो कभी ओवरटाइम काम करके, खुशियाँ खरीदते हैं। यह तो हुई व्यक्तिगत खुशियों की बात; परंतु बात जब सार्वजनिक रूप से मनाए जाने वाले पर्व- त्योहारों की बात आती है, तब मामला सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का हो जाता है। 

 पिछले माह हमने गणेशोत्सव का पर्व धूम- धाम से मनाकर- ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’- कहते हुए उनका विसर्जन किया है; फिर पितरों को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए दुर्गा पूजन की तैयारी में जुट गए हैं। इसके बाद दशहरा और दीपावली की धूम रहेगी। जाहिर है, ये सब हमें अपनी धरती, अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का अहसास कराते हैं। इन सबके माध्यम से भारतीय परम्परा और संस्कृति पल्लवित, पुष्पित, होती है जिसपर हमें गर्व  है।  

एक वह भी समय था, जब चाहे गणपति जी को विराजित करना हो या दुर्गा माता को या रावण दहन का कार्यक्रम,  गाँव या शहर से कुछ दूर खुले मैदान पर इनका आयोजन किया जाता था। दूर- दूर से लोग वहाँ इकट्ठा होते। मेले जैसा माहौल होता। मनोरंजन के साधन होते, लोगों से मेल- मिलाप होता। न सड़कें जाम होने की समस्या, न धक्का- मुक्की, न शोर- शराबा। परंतु अब तो प्रत्येक गली- मोहल्ले में गणेश जी विराजित होते हैं, दुर्गा माता बिठाई जाती हैं और रावण का पुतला जलाया जाता है। ऐसा लगता है यह सब सार्वजनिक उत्सव न होकर अपनी -अपनी गली और कॉलोनी का उत्सव बन गया है। लोगों को यह कहते भी देखा जाता है कि देखो हमारा गणेश तुम्हारे गणेश से कितना भव्य है। इस बात की परवाह किसी को नहीं होती कि दिन रात के शोर- शराबा और कानफोड़ू डीजे की आवाज से लोगों के दिमाग की नसें फटने लगी हैं । बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है। चारों तरफ गंदगी फैल रही है, जबकि महापर्व दीपावली में तो साल भर की गंदगी को साफ करके देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है।

 दीपों का यह पर्व तो हमारी धरती से, फसल से, धन और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी की पूजा से और 14 वर्षों के वनवास के बाद लंका पर विजय प्राप्त करके लौटे श्रीराम के स्वागत से जुड़ा हुआ है। जब चारों तरफ मिट्टी के दिए जलाकर अमावस्या की रात को जगमगा दिया जाता था। अब सिर्फ परम्परा का निर्वहन करने के लिए गिनती के दीए खरीद कर लाए जाते हैं और बाकी जगमगाहट बिजली के बल्बों और झालर से की जाती है। पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद, इतने पटाखे फोड़े जाते हैं कि पूरा शहर पटाखों के धुएँ से ढक जाता है।  अब तो इन सभी पारम्परिक त्योहारों में राजनीति का प्रदूषण भी घुलता जा रहा है। दशहरे के दिन रामलीला का आयोजन तो होता है; पर रावण वध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य धनुषबाण लेकर क्षेत्र के नेता करते दिखाई देते हैं और न जाने किस बुराई पर विजय प्राप्त करने का नारा लगाते हैं। तात्पर्य यही कि अब किसी भी मौके को, जहाँ भीड़ इकठ्ठा होती है, उसे वोट बैंक के रूप में भुनाने की कोशिश की जाती है। 

इसमें कोई दो मत नहीं कि बहुत कुछ बदल गया है, बदलाव प्रकृति का नियम है और समाज के रहन- सहन से लेकर रीति रिवाजों और पर्व त्योहारों में भी परिवर्तन हो रहे हैं और होते हैं। लेकिन इस तरह के विनाशकारी पर्यावरण और सामाजिक बदलाव के लिए क्या हम स्वयं ही जिम्मेदार नहीं हैं? समय के अनुसार सामाजिक बदलाव जरूरी तो हैं;  परंतु यह तभी स्वीकार्य होना चाहिए जब यह मानवता, समाज और हमारे देश की संस्कृति- सभ्यता को समृद्ध करने वाला हो, सकारात्मक हो,  न कि उसे पतन की दिशा में ले जाने वाला।   

जैसे हम ध्वनि प्रदूषण को तो बहुत हल्के में लेते हैं, जबकि आजकल इन सभी पर्व- उत्सव में ध्वनि प्रदूषण अपने चरम पर होता है।  इस वर्ष गणेश पूजा के दौरान डीजे की तेज आवाज के चलते एक व्यक्ति के दिमाग की नस फटने से उसकी मृत्यु ही हो गई। क्या इस विषय को मुद्दा बनाकर देश भर में ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए कोई पहल होगी और सख्त कदम उठाए जाएँगे?  इसी तरह न पटाखों की आवाज में कमी आ रही है और न बिजली से जलने वाले लट्टूओं की झालर की ल़ड़ियाँ कम हो रही हैं। ऐसे माहौल में आप ही बताइए, हम अपनी संस्कृति, परम्परा, भाईचारा और एकता को किस माहौल में ढूँढे ? जबकि हम अपनी धरती को, अपने रहने वाली जगह को किसी भी तरह के प्रदूषण से मुक्त ही नहीं रख पा रहे हैं। परिणाम तो पूरे विश्व में दिखाई दे रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से दिखाई दे रहा तबाही का मंजर किसी को क्यों नजर नहीं आता?

 अब विश्व प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर के प्रसाद में मांसाहार मिलावट की बड़ी धोखाधड़ी के मामले को ही  लें, यह भी तो भ्रष्टाचार रूपी एक प्रदूषण ही है। मिलावट का यह प्रदूषण सिर्फ प्रसाद में ही नहीं, यह मिलावट तो हमारे जीवन के हर क्षेत्र में न जाने कब से घुस चुका है और सबसे खतरनाक खबर तो नकली दवाइयाँ और उसमें हो रही मिलावट की है। सोचने वाली बात यह है कि जितनी तेजी से प्रसाद में हो रहे मिलावट को लेकर त्वरित कार्यवाही की गई, क्या उतनी ही तेजी से दवाओं में हो रही मिलावट या नकली दवाइयों के मामले में तुरंत कार्यवाही होगी? क्या हमारी सरकार, हमारा प्रशासन अपने राजनीतिक फायदे और अपनी कुर्सी बचाने से इतर जनता की सेहत के बारे  में सोचते हुए मामले को गंभीरता से लेंगे?  क्या मौत के इन सौदागरों खिलाफ कड़े कदम कदम उठाए जाएँगे? या यूँ ही चुप बैठ कर इस अँधियारे पक्ष में कृत्रिम रोशनी के नीचे बैठकर बस मूक दर्शक बने रहेंगे?

 ऐसे में फ़ना निज़ामी कानपुरी का ये शेर याद आ रहा है- 

अँधेरों को निकाला जा रहा है,

मगर घर से उजाला जा रहा है ।

आलेखः मानस के मोती

  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

तुलसी और तुलसी के राम के विषय में कुछ कहना  वैसा ही है, जैसे महासागर  की एक बूँद को पा लेना। तुलसी ने अपने काव्य के माध्यम से जो भी कथा कही है, वह उनके व्यापक ज्ञान, गहन अनुभव और  स्वाध्याय की परिणति है। अकेले अयोध्याकाण्ड  में लगभग दो सौ ग्रन्थों का सार निहित है। प्रत्येक काण्ड में तुलसी के स्वाध्याय का सौरभ अभिभूत करता है-

नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि

 स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबंधमति मंजुलमातनोति!

जिसको लेखन में आए सात-आठ ही वर्ष हुए हों, वह अपने नाम के सामने वरिष्ठ साहित्यकार लिखना आरम्भ कर देता है, वहीं तुलसी ने इतना व्यापक अध्ययन किया, फिर भी उनकी विनम्रता से भरी स्वीकारोक्ति देखिए-

कबित बिबेक एक नहीं मोरे, सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे!

वाणी और अर्थ यानी शब्द और अर्थ की अभिन्नता पर उनके भाषा  वैज्ञानिक ज्ञान  की गहराई को समझा जा सकता है। यह बात ‘रघुवंशं’ में कालिदास भी कह चुके हैं। वे  जगत् के माता-पिता पार्वती-शिव को वाणी और अर्थ की तरह सम्पृक्त/ एकीकृत/सम्बद्ध मानते हैं

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। 

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।

तुलसी ने इसी सत्य को चौपाई में कहा है

गिरा अरथ जल बीचि सम, कहिअत भिन्न न भिन्न।

वाणी और अर्थ जल और उसकी लहर के समान अभिन्न हैं।

श्रीरामचरितमानस का अध्ययन करते समय किष्किंधाकाण्ड का एक प्रसंग ऐसा है, जिसके बारे में अर्थ की भ्रान्ति बनी रहती है। उसका कारण है तुलसी के पूरे कथ्य की सूक्ष्मता को न समझना। प्रसंग है मयसुत  मायावी के साथ बालि का युद्ध- 

नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥

मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥1॥

मायावी ने बालि को चुनौती दी। दोनो द्वन्द्व युद्ध के लिए एक गुफा में चले गए। बालि ने सुग्रीव से कहा-

परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥3॥

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥

बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥4॥

बालि ने एक पखवाड़े यानी पन्द्रह दिन के लिए गुफा के बाहर प्रतीक्षा करने को कहा था।  पन्द्रह दिन में वापस न आने पर समझ लेना कि मैं मारा दिया गया ।

सुग्रीव का कहना है –‘मास दिवस’ वहाँ खड़ा रहा। खून की धारा निकलते देखी, तो डर के कारण गुफा-द्वार पर शिला रखकर पलायन कर आया।

श्रीरामचरितमानस के  मास दिवस का अर्थ  महीना भर किया गया है,  जो सही नहीं है। सुग्रीव को कहा गया था- पन्द्रह दिन तक प्रतीक्षा करने के लिए, फिर वह वहाँ एक महीने  तक क्यों खड़ा रहेगा।

मन्त्रियों ने बिना शासक के नगर को देखा तो सुग्रीव को राजा बना दिया-

मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं॥

बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥5

बाली ने जब सुग्रीव को सिंहासन पर बैठे देखा, तो उसके मन में भेद  का भाव क्यों उत्पन्न हुआ? एक  पखवारे तक खड़े रहने लिए कहा और वह बेचारा महीने भर खड़ा रहा। वस्तुत ऐसा नहीं है। ‘मास’ बारह होते हैं; इसलिए मास दिवस लिखा यानी बारह दिन। चौपाई में बारह /द्वादश  लिखा जाता, तो चौपाई की एक मात्रा अधिक हो जाती। तीस दिवस लिखना तुलसी जी का अभिप्राय होता, तो लिख देते, कोई छन्द दोष नहीं होता; लेकिन वे तीस लिखना ही नहीं चाहते थे।  बारहवें  दिन रुधिर की धार  निकलती देखकर सुग्रीव  डरकर भाग आया। पन्द्रह दिन वहाँ रुका ही नहीं। दूसरा  कारण- चट्टान से गुफा के द्वार को बन्द कर दिया। बालि के मन में भेद उत्पन्न होना स्वाभाविक था; क्योंकि सुग्रीव गद्दी पर  बैठ गया था।

तुलसी ने लोक व्यवहार को लेकर बहुत से अनुभव रामकथा में पिरोए हैं। मित्र को लेकर कहे ये वचन कितने महत्त्वपूर्ण हैं-

-जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥

निज दुख गिरि सम, रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥

-कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥2॥

पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं च गूहति गुणान्प्रकटीकरोति, 

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः -नीति शतक

मित्र के नाम पर कुछ प्रपंची लोग भी होते हैं। ‘अहि गति’ -सर्प की गति वालों से भी सावधान किया है, जो सामने होने पर, बनाकर मृदु बचन बोलेंगे और परोक्ष में अहित करेंगे, मन में कुटिलता का पोषण करेंगे-

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥

जाकर ‍चित अहि गति सम भाई।अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥4॥

चाणक्य ने भी यही बात कही थी-

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।

वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

लोक- व्यवहार में नारी के सम्मान को वरीयता दी है, वह चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो। आज नारी का शोषण चरम पर है। नारी-शोषक को मारने में कोई पाप नहीं है। यह आज के युग की भी माँग है।

अनुज बधू, भगिनी, सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥

तुलसी सज्जन और दुर्जन दोनों में एक साम्य मानते हैं, वह है दुःख। दुष्ट का मिलना और सज्जन का बिछुड़ना, दोनों ही दुःखप्रद हैं-

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥2॥

तुलसीदास ने  कुछ विशेष प्रकार के दुष्टों की भी मन के शुद्ध एवं  सच्चे भाव से वन्दना की है, जो बिना किसी  कारण के लोगों को कष्ट पहुँचाते हैं।  आज इस वर्ग की भरमार है। तथाकथित मित्रों में ये हर समय उपलब्ध हैं

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥

पर हित हानि, लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष, बिषाद बसेरें॥

दूसरों की हानि उनके लिए लाभ है, किसी के उजड़ने पर जिनको हर्ष होता है, बसने या उन्नति होने पर वे विषाद ग्रस्त हो जाते हैं।

समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हमें मिलते हैं, जिनकी कथनी और करनी में बहुत अन्तर होता है। ऐसे अवसरवादी लोग अपनी मीठी वाणी से स्वार्थ- सिद्धि कर लेते हैं। तुलसी ने उनकी पहचान बताई है कि उनका सारा सामाजिक साम्राज्य स्वार्थपरता, क्रूरता और झूठ की बुनियाद  पर खड़ा होता है। तुलसी का यह जीवननुभव हम सबको सचेत करता है। मोर की तरह मधुर वचन बोलने वाले ये कठोर हृदय वाले लोग, मोर की तरह सर्प तक को खा जाते है-

झूठइ लेना, झूठइ देना। झूठइ भोजन, झूठ चबेना॥

बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाई महा अहि हृदय कठोरा॥

किसी की प्रशंसा इनको नहीं पचती। तुलसी ने भी दुष्टों को झेला होगा। हमारे आसपास भी ऐसे बहुत से लोग जमा रहते हैं, जिनको पहचान पाना  बहुत कठिन है-

काहू की जौ सुनहि बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जुडी आई।

व्यास जी ने धर्म और अधर्म की सरल व्याख्या की है। परोपकार पुण्य के लिए और परपीड़ा पाप के लिए है।  कुछ को दूसरों को पीड़ित और अपमानित करने में ही आनन्द आता है। तुलसीदास जी ने  भी व्यास जी के इस श्लोक को सार रूप में प्रस्तुत किया है-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । 

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

जगत् में गुण-अवगुण सब हैं। जिसकी जैसी प्रवृत्ति होती है, वह उसी के अनुसार ग्रहण करता है। पानी में कमल और जोंक  दोनों उपजते हैं, लेकिन दोनों के गुण अलग होते है-

उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥

कुछ लोग सत्ता  पाकर विवेक खो देते हैं और निरंकुश हो जाते हैं; लेकिन राम की उदारता और न्यायप्रियता देखिए कि वे विनम्रतापूर्वक कहते हैं-

जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥3॥

वह तो बात थी मर्यादा पुरुषोत्तम राम की, यहाँ तो लोग किसी छोटी-सी संस्था का छोटा-सा पद पाकर दूसरे लोगों को घास-कूड़ा समझने की भूल कर जाते हैं। अवसान देख ही रहे हैं कि जो सत्ता के शीर्ष पर थे, वे आज अतीत की कथा बनकर रह गए हैं। हम और आप तो सामान्य हैं। गधे के सींग की तरह कब पटल से  गायब हो जाएँगे, नहीं कह सकते।

राजा होने का अर्थ, कर्म को महत्त्व देना है। यहाँ तो एक छोटा-सा अधिकारी और छुटभैया नेता भी चाहता है कि उसके अधीन कर्मचारी, नौकर बनकर  उनके काम करें, उसको जूता तक पहनाएँ। सुग्रीव को राम ने जो वस्त्र पहनाए, वे भरत ने अपने हाथों से बनाए थे। आज सेवकों का मुँह जोहने वालों लोगों को इस कथन से सीख लेनी चाहिए- 

सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥3॥

सभी के जीवन में उतार -चढ़ाव आते हैं। हमें धैर्यपूर्वक कठिनाइयों का सामना करना चाहिए। अरण्यकाण्ड में तुलसीदास जी ने अनसूया  के माध्यम से  सीता को बताया -धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी की परख आपत्ति के समय होती है। अनसूया का निम्न कथन आने वाले घटनाक्रम (सीता-हरण, सुग्रीव, हनुमान और विभीषण का मिलना, सीता का पातिव्रत्य, लंका में युद्ध  आदि) का संकेत भी है-

धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परिखिअहिं चारी।

सार रूप में कहें, तो श्रीरामचरितमानस केवल धार्मिक या काव्य की पुस्तक नहीं, बल्कि यह सर्वांगीण  जीवनबोध का ग्रन्थ है, जो हमें प्रति पग पर दिशा निर्देश देता  है। समाज का कोई पक्ष रामचरित मानस में अछूता नहीं रहा है।

आलेखः लंका विजय के बाद राम अयोध्या विमान से आए थे

  - प्रमोद भार्गव

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम की पुरातन एवं सनातन ऐतिहासिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना भी हो जाएगी। अब विभिन्न रामायणों में दर्ज उस विज्ञान की वैज्ञानिकताओं को भी मान्यता देने की जरूरत है, जिन्हें वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी न केवल नकारते रहे हैं, बल्कि इनकी ऐतिहासिकता को भी कपोल-कल्पित कहकर उपहास उड़ाते रहे हैं। अतएव यह समय प्राचीन भारतीय विज्ञान के पुनरुत्थान का भी काल है; क्योंकि रामायण और महाभारत कथाएँ नाना लोक स्मृतियों और विविध आयामों में प्रचलित बनी रहकर वर्तमान हैं। इनका विस्तार भी सार्वभौमिक है। देश-दुनिया के जनमानस में राम-कृष्ण की जो मूर्त-अमूर्त छवि बनी हुई है। शायद इसीलिए भवभूति और कालिदास ने रामायण को इतिहास बताया। वाल्मीकि रामायण और उसके समकालीन ग्रंथों में ‘इतिहास’ को ‘पुरावृत्त’ कहा गया है। गोया, कालिदास के ‘रघुवंश’ में विश्वामित्र राम को पुरावृत्त सुनाते हैं। मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने रामायण को महाकाव्यात्मक इतिहास की श्रेणी में रखा है,  जबकि इन ग्रंथों में विज्ञानसम्मत अनेक ऐसे सूत्र व स्त्रोत मौजूद हैं, जिनके जरिए नए आविष्कार की दिशा में बढ़ा जा सकता है। विज्ञानसम्मत अंशों को  संकलित कर पाठ्यक्रमों में शामिल करने की जरूरत है। ऐसा करने से मेधावी छात्रों में विज्ञानसम्मत महत्त्वाकांक्षा जागेगी और भारतीय जीवन-मूल्यों के इन आधार ग्रंथों से मिथकीय आध्यात्मिकता की धूल झाड़ने का काम भी संपन्न होगा। वैसे भी ज्यादातर रामायणों में उल्लेख है कि भगवान राम लंका विजय के बाद माता सीता,भाई लक्षमण, हनुमान और सुग्रीव के साथ पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या पहुँचे थे। 

 इतिहास तथ्य और घटनाओं के साथ मानव की विकास यात्रा की खोज भी है। यह तय है कि मानव, अपने विकास के अनुक्रम में ही वैज्ञानिक अनुसंधानों से सायास-अनायास जुड़ता रहा है। ये वैज्ञानिक उपलब्धियाँ या आविष्कार रामायण, महाभारतकाल मे उसी तरह चरमोत्कर्ष पर थे, जिस तरह ऋग्वेद के लेखन-संपादन काल के समय संस्कृत भाषायी विकास के शिखर पर थी। रामायण का शब्दार्थ भी राम का ‘अयन’ अर्थात ‘भ्रमण/ गति’ से है।  तीन सौ रामायण और अनेक रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथ, जिनके प्रभाव को नकारने के लिए पाउला रिचमैन ने 1942 में ‘मैनी रामायणस द डाइवर्सिटी आफ ए नैरेटिव ट्रेडिशन इन साउथ एशिया’ लिखी और एके रामानुजन ने ‘थ्री हंड्रेड‘ रामायण फाइव एग्जांपल एंड थ्री थॉट्स आन ट्रांसलेशन’ निबंध लिखकर अनर्गल अंशों को गढ़कर  सच्चाई को झुठलाया। जबकि इन्हीं रामायणों, रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथों और मदन मोहन शर्मा शाही के बृहद् उपन्यास से  विज्ञानसम्मत आविष्कारों की पड़ताल की जा सकती है। रामायण एकांगी दृष्टिकोण का वृतांत भर नहीं है। इसमें कौटुम्बिक सांसारिकता है। राज-समाज संचालन के कूट-मंत्र हैं। भूगोल है। वनस्पति और जीव जगत हैं। राष्ट्रीयता है। राष्ट्र के प्रति उत्सर्ग का चरम है। अस्त्र-शस्त्र हैं। यौद्धिक कौशल के गुण हैं। भौतिकवाद है। कणाद का परमाणुवाद है। सांख्य दर्शन और योग के सूत्र हैं। वेदांत दर्शन है और अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हैं। गांधी का राम-राज्य और पं. दीनदयाल उपाध्याय के आध्यात्मिक भौतिकवाद के उत्स इन्हीं रामायणों में हैं। वास्तव में रामायण और उसके परवर्ती ग्रंथ कवि या लेखक की कपोल-कल्पना न होकर तात्कालिक ज्ञान के विश्वकोश हैं। जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने तो ऋग्वेद को कहा भी था कि यह अपने युग का विश्वकोश है। अर्थात् ‘एन-साइक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड’ !

लंकाधीश रावण ने नाना प्रकार की विधाओं के पल्लवन की दृष्टि से यथोचित धन व सुविधाएँ उपलब्ध कराई थीं। रावण के पास लड़ाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बड़े भण्डार थे। प्रक्षेपास्त्र और ब्रह्मास्त्रों का अकूत भण्डार व उनके निर्माण में लगी अनेक वेधशालाएँ थीं। दूरसंचार व दूरदर्शन के तकनीकी-यंत्र लंका में स्थापित थे। राम-रावण युद्ध केवल राम और रावण के बीच न होकर एक विश्व युद्ध था। जिसमें उस समय की समस्त विश्व-शक्तियों ने अपने-अपने मित्र देश के लिए लड़ाई लड़ी थी। परिणामस्वरूप ब्रह्मास्त्रों के विकट प्रयोग से लगभग समस्त वैज्ञानिक अनुसंधान-शालाएँ उनके आविष्कारक, वैज्ञानिक व अध्येता काल-कवलित हो गए। यही कारण है कि हम कालांतर में हुए महाभारत युद्ध में वैज्ञानिक चमत्कारों को रामायण की तुलना में उत्कृष्ट व सक्षम नहीं पाते हैं। यह भी इतना विकराल विश्व-युद्ध था कि रामायण काल से शेष बचा जो विज्ञान था, वह महाभारत युद्ध के विध्वंस की लपेट में आकर नष्ट हो गया। इसीलिए महाभारत के बाद के जितने भी युद्ध हैं, वे खतरनाक अस्त्र-शस्त्रों से न लड़े जाकर थल सेना के माध्यम से ही लड़े गए दिखाई देते हैं। बीसवीं सदी में हुए द्वितीय विश्व युद्ध में जरूर हवाई हमले के माध्यम से अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा-नागाशाकी में परमाणु हमले किए थे।

वाल्मीकि रामायण एवं नाना रामायणों तथा अन्य ग्रंथों में ‘पुष्पक-विमान’ के उपयोग के विवरण हैं। इससे स्पष्ट होता है, उस युग में राक्षस व देवता न केवल विमान-शास्त्र के ज्ञाता थे, बल्कि सुविधायुक्त आकाशगामी साधनों के रूप में वाहन उपलब्ध थे। रामायण के अनुसार पुष्पक-विमान के निर्माता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा ने यह विमान कुबेर को भेंट किया था। कुबेर से इसे रावण ने छीन लिया। रावण की मृत्यु के बाद विभीषण इसका अधिपति बना और उसने फिर से इसे कुबेर को दे दिया। कुबेर ने इसे राम को उपहार में दे दिया। राम लंका विजय के बाद अयोध्या इसी विमान से पहुँचे थे।

रामायण में दर्ज उल्लेख के अनुसार पुष्पक-विमान मोर जैसी आकृति का आकाशचारी विमान था, जो अग्नि-वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। इसकी गति तीव्र थी और चालक की इच्छानुसार इसे किसी भी दिशा में गतिशील रखा जा सकता था। इसे छोटा-बड़ा भी किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदेह यानी वातानुकूलित था। इसमें स्वर्ण-खंभ, मणि निर्मित दरवाजे, मणि-स्वर्णमय सीढ़ियाँ, वेदियाँ (आसन) गुप्त-गृह, अट्टालिकाएँ (केबिन) तथा नीलम से निर्मित सिंहासन (कुर्सियाँ) थे। अनेक प्रकार के चित्र एवं जालियों से यह सुसज्जित था। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। इस विवरण से ज्ञात होता है, यह उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तुकला का अनूठा नमूना था।

‘ऋग्वेद’ में भी चार तरह के विमानों का उल्लेख है, जिन्हें आर्य-अनार्य उपयोग में लाते थे। इन चार वायुयानों को शकुन, त्रिपुर, सुन्दर और रुक्म नामों से जाना जाता था। ये अश्वहीन, चालक रहित , तीव्रगामी और धूल के बादल उड़ाते हुए आकाश में उड़ते थे। इनकी गति पतंग (पक्षी) की भाँति, क्षमता तीन दिन-रात लगातार उड़ते रहने की और आकृति नौका जैसी थी। त्रिपुर विमान तो तीन खण्डों (तल्लों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था। रामायण में ही वर्णित हनुमान की आकाश-यात्राएँ, महाभारत में देवराज इन्द्र का दिव्य-रथ, कार्तवीर्य अर्जुन का स्वर्ण-विमान एवं सोम-विमान, पुराणों में वर्णित नारदादि की आकाश यात्राएँ एवं विभिन्न देवी-देवताओं के आकाशगामी वाहन रामायण-महाभारत काल में वायुयान और हेलीकॉप्टर जैसे यांत्रिक साधनों की उपलब्धि के प्रमाण हैं।

किंवदंती यह भी है कि गौतम बुद्ध ने भी वायुयान द्वारा तीन बार लंका की यात्रा की थी। ऐरिक फॉन डानिकेन की किताब ‘चैरियट्स ऑफ गॉड्स’ में तो भारत समेत कई प्राचीन देशों से प्रमाण एकत्र करके वायुयानों की तात्कालीन उपस्थिति की पुष्टि की गई है। इसी प्रकार डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने अनेक पाश्चात्य अनुसंधानों के मतों के आधार पर संभावना जताई है कि रामायण में अंकित हनुमान की यात्राएँ वायुयान अथवा हेलीकॉप्टर की यात्राएँ थीं या हनुमान ‘राकेट-बेल्ट‘ बाँधकर आकाश गमन करते थे, जैसा कि आज के अंतरिक्ष-यात्री करते हैं। हनुमान-मेघनाद में परस्पर हुआ वायु-युद्ध हावरक्रफ्ट से मिलता-जुलता है। आज भी लंका की पहाड़ियों पर चौरस मैदान पाए जाते हैं, जो शायद उस कालखण्ड के वैमानिक अड्डे थे। प्राचीन देशों के ग्रंथों में वर्णित उड़ान-यंत्रों के वर्णन लगभग एक जैसे हैं। कुछ गुफा-चित्रों में आकाशचारी मानव एवं अंतरिक्ष वेशभूषा से युक्त व्याक्तियों के चित्र भी निर्मित हैं। ये चित्र मूर्तियों के रूप में दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में भी मिलते हैं। मिस्त्र में दुनिया का ऐसा नक्शा मिला है, जिसका निर्माण आकाश में उड़ान-सुविधा की पुष्टि करता है। इन सब साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि पुष्पक व अन्य विमानों के रामायण में वर्णन कोई कवि की कोई कोरी कल्पना की उड़ान नहीं है।

          ताजा वैज्ञानिक अनुसंधानों ने तय किया है कि रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी इतनी अधिक विकसित थी, जिसे आज समझ पाना भी कठिन है। रावण का ससुर मयासुर अथवा मय दानव ने भगवान विश्वकर्मा (ब्रह्मा) से वैमानिकी विद्या सीखी और पुष्पक विमान बनाया। जिसे कुबेर ने हासिल कर लिया। पुष्पक विमान की प्रौद्योगिकी का विस्तृत ब्यौरा महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित पुस्तक ‘यंत्र-सर्वेश्रवम्‘ में भी किया गया था। वर्तमान में यह पुस्तक विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके 40 अध्यायों में से एक अध्याय ‘वैमानिक शास्त्र’ अभी उपलब्ध है। इसमें भी शकुन, सुन्दर, त्रिपुर एवं रुक्म विमान सहित 25 तरह के विमानों का विवरण है। इसी पुस्तक में वर्णित कुछ शब्द जैसे ‘विश्व क्रिया दर्पण’ आज के राडार जैसे यंत्र की कार्यप्रणाली का रूपक है।

नए शोधों से पता चला है कि पुष्पक-विमान एक ऐसा चमत्कारिक यात्री विमान था, जिसमें चाहे जितने भी यात्री सवार हो जाएँ, एक कुर्सी हमेशा रिक्त रहती थी। यही नहीं, यह विमान यात्रियों की संख्या और वायु के घनत्व के हिसाब से स्वमेव अपना आकार छोटा या बड़ा कर सकता था। इस तथ्य के पीछे वैज्ञानिकों का यह तर्क है कि वर्तमान समय में हम पदार्थ को जड़ मानते हैं, लेकिन हम पदार्थ की चेतना को जागृत कर लें तो उसमें भी संवेदना सृजित हो सकती है और वह वातावरण व परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालने में सक्षम हो सकता है। रामायण काल में विज्ञान ने पदार्थ की इस चेतना को संभवतः जाग्रत कर लिया था, इसी कारण पुष्पक- विमान स्व-संवेदना से क्रियाशील होकर आवश्यकता के अनुसार आकार परिवर्तित कर लेने की विलक्षणता रखता था। तकनीकी दृष्टि से पुष्पक में इतनी खूबियाँ थीं, जो वर्तमान विमानों में नहीं हैं। ताजा शोधों से पता चला है कि यदि उस युग का पुष्पक या अन्य विमान आज आकाश गमन कर लें तो उनके विद्युत चुंबकीय प्रभाव से मौजूदा विद्युत व संचार जैसी व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो जाएँगी। पुष्पक- विमान के बारे में यह भी पता चला है कि वह उसी व्यक्ति से संचालित होता था, जिसने विमान संचालन से संबंधित मंत्र सिद्ध किया हो, मसलन जिसके हाथ में विमान को संचालित करने वाला रिमोट हो। शोधकर्ता भी इसे कंपन तकनीक (वाइब्रेशन टेकनोलॉजी) से जोड़कर देख रहे हैं। पुष्पक की एक विलक्षणता यह भी थी कि वह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक ही उड़ान नहीं भरता था, बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक आवागमन में भी सक्षम था। यानी यह अंतरिक्षयान की क्षमताओं से भी युक्त था।

सम्पर्कः  शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100


कविताः कर्म फल

  -सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

कई बार हमारी प्रार्थनाएँ

साथ देती नहीं हैं हमारा

और करने लगती हैं

प्रदक्षिणा

उल्टे कदमों से


दुखों की गाँठें

खुलने के बदले

कसती जाती हैं

मणिबंध पर

 

हल्दी- केशर का तिलक भी

सौभाग्य नहीं बन पाता

 

चिंताओं की भभूत

चमक उठती है

ललाट के मध्य बिंदु

पर

 

विपरीत परिस्थितियाँ

करती हैं शंखनाद

 

सफलता के प्राचीर पर

लहराने लगती है

असफलता की पताका

 

ग्रहों के खेल में उलझी

हथेलियों की रेखाएँ

करती है जाने कितने जतन

हवन- पूजन

 

पर संचित कर्म

प्रारब्ध कर्म बन

लगाता है फेरा

और हमारे वर्तमान में

लिखता है हमारे ही कर्मों का

लेखा -जोखा।