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Sep 15, 2015

धरोहर विशेष

   सिंघनपुर विश्व का प्राचीनतम शैलाश्रय

 छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला पुरातत्त्व  की दृष्टि से काफी समृद्ध है। यहाँ  विश्व का प्राचीनतम शैलाश्रय सिंघनपुर है। पुरातत्त्ववेताओं की दृष्टि से जो 30 हजार वर्ष ईसा- पूर्व के हो सकते हैं। उनके अनुसार यह स्पेन और मैक्सिको से प्राप्त शैलाश्रयों के समकालीन हैं। पुरातत्त्ववेत्ता स्व. एंडरसन ने 1912 में प्रथम बार इन शैलचित्रों को देखा था। इंडियन पेंटिंग्स 1918 में तथा इनसायक्लोपिडिया ब्रिटेनिका के 13 वें अंक में पहली बार सिंघनपुर के शैलचित्रों की सूचना प्रकाशित हुई थी और विश्व के पुरातत्त्वविद् इस ओर आकृष्ट हुए थे। 1923 से 1927 तक पुरातत्त्ववेत्ता स्व. अमरनाथ दत्ता ने सिंघनपुर के शैलचित्रों पर व्यापक सर्वेक्षण कार्य किया। उन्होंने अपनी पुस्तक 'ए फ्यू रैलिक्स एण्ड द राक पेटिंग ऑफ सिंघनपुर' का प्रकाशन  किया था। स्व. लोचनप्रसाद पाण्डेय 'महाकोशल हिस्टोरिकल पेपर्स' में सिर्फ सिंघनपुर ही नहीं अपितु अंचल के महत्त्वपूर्ण स्थलों का ऐतिहासिक महत्त्व  के साथ प्रकाशन किया था।

यह खुशी की बात है कि पिछले दिनों भारत सरकार के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) नई दिल्ली द्वारा पहली बार यहाँ  की एक दर्जन पहाड़ों और गुफाओं का वैज्ञानिक दृष्टि से विस्तृत अध्ययन व फिल्मांकन किया जा रहा है। इसके लिए क्षेत्र की आबोहवा, पर्यावरण आदिमानवों द्वारा छोड़े गए औजार, जानवरों की हड्डिया, उनके रहन-सहन जैसे विषयों का भी गहनता से अध्ययन हो रहा है। इस अध्ययन से उम्मीद जागी है कि छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का नाम भी शैलचित्रों के लिए विश्व परिदृश्य में उभर कर सामने आयेगा। इस समय किये जा रहे इस अध्ययन में यहाँ 12 करोड़ से 90 करोड़ वर्ष पुराने शैल चित्र पाये गये है।  शैलचित्रों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध रायगढ़ जिले की सिंघनपुर गुफा और कबरा पहाड़ के अलावा जिले में टिमरलगा, चोरमाड़ा, गाताडीह, सिरोली डोंगरी, कर्मागढ़, ओंगना, पोटिया, बसनाझर और बोतल्दा में भी अनेक शैलाश्रय हैं।  आदिमानवों द्वारा उकेरे गये इन शैलचित्रों के आधार पर तत्कालीन रहन-सहन, पशु और संस्कृति के साथ-साथ प्राकृतिक अवस्था का भी पता चलता है। कुछ  एक  शैलचित्रों  में शुतुरमुर्गडायनासोर  और जिराफ  से  मिलते- जुलते जानवरों को उकेरा गया है, जो  इस क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पूर्व इनकी मौजूदगी की ओर संकेत करता है। इनमें हिरण, वन भैंसा, मछली, सांप, हाथी जैसे पशुओं के अलावा कुछ नये शैल चित्र भी मिले है जो गोंडवाना शैली के है। साथ ही प्राकृतिक कारणों से आये बदलाव को भी ये शैलचित्र रेखांकित करते है।
आईए जानते हैं रायगढ़ जिले में प्राप्त कुछ महत्त्व पूर्ण शैलाश्रयों के बारे में-
बसनाझर शैलाश्रय- रायगढ़ से 28 किमी की दूरी पर बसनाहर शैलाश्रय है जो बम्हनीन पहाड़ों पर 2000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में लगभग चार सौ शैलचित्र हैं। यहाँ  के शैलचित्रों में जंगली पशुओं और आखेट के  दृश्य  प्रमुखता से चित्रित किए गए हैं। इस जिले में हाथी का चित्र केवल इसी शैलाश्रय में अंकित है। गहरे गैरिक रंग (रेड आर्च कलर) में अंकित इन चित्रों का आकार 7 इंच से लेकर 18 इंच तक है। इनमें सामूहिक नृत्य, शिकार, जंगली भैसा, हिरण गोह, अश्व के चित्र बड़ी संख्या में नजर आते हैं।
कबरा शैलाश्रय- कबरा शैलाश्रय रायगढ़ से 8 किमी पूर्व में ग्राम विश्वनाथ पाली तथा भैजा पाली के निकट पहाड़ी में स्थित है। यहाँ  करीब दो हजार फीट की सीधी चढ़ाई चढ़कर पहुँचा जा सकता है। इस शैलाश्रय के अनेक चित्र अभी भी सुरक्षित अवस्था में है। कबरा शैलाश्रय के गैरिक रंग के शैलचित्रों में कछुवा के चित्र प्रमुख रुप से पाए गए हैं जो तीन इंच से लेकर एक फीट तक हैं। यहाँ  अश्व के चित्र भी सजे हुऐ नजर आते हैं जो छोटे तथा बड़े आकार में हैं। यहाँ   हिरण की आकृतियाँ  भी दिखाई देती है। जिले के अब तक ज्ञात शैलचित्रों में विशालतम जंगली भैसे का चित्र प्रमुख है। 
 बसनाहट तथा धर्मजयगढ़ के ओंगना की शैलचित्रों में अद्भूत समानता है। कबरा शैलाश्रय जहाँ  पूर्वमुखी है वहीं सिंघनपुर दक्षिण पूर्व तथा बसनाझर उत्तर की ओर है।
ओंगना शैलाश्रय- यह रायगढ़ से 72 किमी उत्तर में धर्मजयगढ़ के निकट ओंगना गाँव  में स्थित है। पश्चिममुखी इस शैलाश्रय  में तीस फुट चौड़े और 20 फीट ऊँचे एक ही शिलाखण्ड पर गहरे और हल्के गैरिक रंग के लगभग एक सौ शैलचित्र अंकित है।
कर्मागढ़ शैलाश्रय- यह जिले का प्रागैतिहासिक धरोहर है जो रायगढ़ से 30 किमी पूर्व में उड़ीसा सीमा पर स्थित उषाकोठी पहाड़ी पर स्थित है। इस शैलाश्रय  में तीन सौ से अधिक बहुरंगी आकृतियाँ  एवं जलचरों की आकृतियाँ  हैं जो तीन सौ फीट लम्बी तथा बीस फीट चौड़े क्षेत्र में पूर्वामुखी पाषाण शिलाखण्ड  पर अंकित है।  कर्मागढ़ के पश्चिम में भैंसगढ़ी के बांस के जंगलों में भी बेनीपाट शैलाश्रय है।
जिले का एक और शैलाश्रय रायगढ़ से 66 किमी की दूरी पर घरघोड़ा के आगे नवागढ़ी पहाड़ी पर 2000 फुट ऊँचाई पर स्थित एक गुफा में है। यह चित्र गहरे गैरिक रंग में एक वृत्त का है। जिसका व्यास साढ़े सात फीट है। इस वृत्त के भीतर 4 फुट का एक व्यास आठ खड़ी और आठ आड़ी रेखाओं में विभाजित है, इन खण्डों में कई आकृतियाँ  उकेरी गई हैं। इन शैलचित्रों को देखकर लोग कहते हैं कि इन संकेतों के पीछे डोम राजाओं का खजाना छिपा हुआ हैं जिन्होंने 17 शताब्दी में यहाँ  आश्रय लिया था।

दुख की बात हैकि ये समस्त शैलचित्र संरक्षण के अभाव और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं, अत: पुरातत्त्वविद् चाहते हैं कि इन शैलाश्रयों के बारे में अधिकाधिक जानकारी जुटाकर उन्हें लिपिबद्ध किया जाए और उनके संरक्षण के बारे में  लोगों को जागरूक किया किया जाए। (उदंती फीचर्स)

धरोहरः पलारी- ऐतिहासिक सिद्धेश्वर मन्दिर

- डॉ. रत्ना वर्मा
उपेक्षित होते हमारे प्राचीन धरोहर
छत्तीसगढ़ में ईंटों के मन्दिरों की गौरवाशाली परम्परा रही है, इसी परम्परा का एक उदाहरण पलारी का सिद्धेश्वर मन्दिर  है जो रायपुर जिले में स्थित पलारी ग्राम के बालसमुंद तालाब के किनारे स्थित है। पश्चिमाभिमुख यह मन्दिर  लघु अधिष्ठान पर निर्मित है। मन्दिर  का गर्भगृह पंचस्थ शैली का है तथा जंघा तक अपने मूल रूप में सुरक्षित है। शिखर का शीर्ष भाग पुनर्निर्मित है। पाषाण निर्मित द्वार के चौखट कलात्मक एवं अलंकृत है, इसके दोनों पार्श्वों में नदी देवियों, गंगा एवं यमुना का त्रिभंग मुद्रा में अंकन है। सिरदल पर ललाट बिम्ब में शिव का चित्रण है, तथा दोनों पार्श्वों में ब्रह्मा तथा विष्णु का अंकन है। मन्दिर  के द्वार पर निर्मित पाषाण पर तराशे गए शिव विवाह का दृश्य दर्शनीय है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों के अनुसार शिव विवाह का यह अंकन अद्भुत है।  
सिद्धेश्वर मन्दिर  के सामने निर्मित बालसमुंद तालाब के बारे में अनेक जनश्रुतियाँ  प्रचलित हैं जिसके अनुसार इस मन्दिर  का निर्माण छैमासी रात में किया गया है तथा तालाब की खुदाई भी इसी दौरान की गई थी। बताया जाता है कि एक घुमंतू जाति के नायक अपने दल  बल सहित यहाँ  पहुँचे और यहीं आकर बस गए। तब यहाँ  चारो ओर जंगल था। लेकिन पानी के लिए कोई तालाब या पोखर न होने से वे सब परेशान हो गए। तब उनके नायक ने 120 एकड़ में विस्तारित विशाल तालाब का निर्माण कराया ; लेकिन तालाब खुदाई के बाद भी वह तालाब सूखा का सूखा ही रहा। तब गुरुजन की सलाह पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रखकर तालाब में छोड़ दिया, देवयोग से तालाब में पर्याप्त पानी आ गया और बालक भी सुरक्षित परात के ऊपर आ गया। कहते है इसी कारण इस तालाब का नाम बालसमुंद पड़ा। और तब से इस तालाब में हमेशा पानी रहता है। यह भी कहा जाता है कि भमनीदहा का स्रोत बालसमुंद तक आया है; इसलिए इस तालाब का पानी कभी नहीं सूखता। इस तालाब के बीच में एक  टापू है ,जिसके  बारे में भी लोग तरह तरह के किस्से सुनाते हैं - यह कि तालाब बनवाते समय तालाब की मिट्टी फेंकने के बाद उक्त स्थल पर टोकनी की मिट्टी झर्राने (झड़ाने) के कारण यह टापू बना है।
परन्तु बुजुर्गों द्वारा जो बात बताई जाती है वह सत्य के ज्यादा नजदीक जान पड़ती है। बात 1950- 60 के दशक की है जब  पलारी गाँव  के आस- पास घना जंगल था तथा शेर, भालू, तेंदुआ यहाँ  आसपास विचरते रहते थे। गाँव  के मालगुजार दाऊ कलीराम वर्मा शिकार के दौरान घूमते हुए घने जंगल से घिरे इस मन्दिर  के पास पहुँच गए तब यह मन्दिर  झाड़ -झंखाड़ से दबा हुआ जीर्ण- शीर्ण अवस्था में था। यद्यपि मन्दिर का गर्भगृह तब खाली था;लेकिन घाट और तालाब के अवशेष के चिह्न देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि हो न हो यह शिव मन्दिर  था। अत: धाराशायी होते इस जीर्णशीर्ण मन्दिर  का जीर्णोद्धार एवं घाट का निर्माण करने की इच्छा पलारी के मालगुजार दाऊ कलीराम वर्मा ने अपने स्व. पिता मोहन लाल की स्मृति में बनवाने की इच्छा जाहिर की। तब उनकी इच्छानुसार पुत्र बृजलाल वर्मा (भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने सन् 1960-61 में इस मन्दिर  का जीर्णोद्धार करवाया और मन्दिर  में शिवलिंग की स्थापना करके अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी की।
इस  प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अधिनियम 1964 तथा 65 के अधीन राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया हैं।
मन्दिर  के गर्भगृह में जीर्णोद्धार के समय ही संगमरमर का शिवलिंग स्थापित कर दिया गया था अत: 60 के दशक से ही यहाँ  पूजा अर्चना होती आ रही है। इस मन्दिर  में प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन भव्य मेले की आयोजन किया जाता है। मेले के दिन आस-पास के गाँव  से हजारो भक्त तालाब में स्नान करते हैं तथा दिन भर मेले का आनंद लेते हैं।
 कलाशैली की दृष्टि से यह मन्दिर 900 ई. का माना जाता  है।  जिसे छत्तीसगढ़ में ही स्थित विश्व विख्यात लक्ष्मण मन्दिर  जो सिरपुर में है, के समकक्ष कहा जा सकता है। सिरपुर में इन दिनों खुदाई का कार्य चल रहा है ,जिससे इतिहास के अनेक पन्ने खुलते चले जा रहे हैं।
 गुप्तकालीन वास्तुकला भारतीय इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाती है। यह मन्दिर  गुप्तकालीन स्थापत्यकला काअनुपम उदाहरण है। भारतीय स्थापत्यकला के विकास में नागर, द्राविण और बेसर शैलियों का मान निश्चित किया गया। पलारी का शिव मन्दिर  नागर शैली में निर्मित है। गुप्तकाल में मथुरा, सारनाथ, नालंदा, अमरावती आदि मूर्त्तिकला के प्रमुख केंद्र थे। शैली की दृष्टि से गुप्तकालीन मूर्त्तियाँ  व यक्ष प्रतिमाओं का विकास पुराण की देन है। गुप्तकालीन मन्दिरों के द्वार शाखाओं पर गंगा, यमुना की खूबसूरत मूर्त्तियों का रूपायन हुआ है, जो पलारी के इस सिद्धेश्वर मन्दिर  के द्वार पर भी देखने को मिलता है।
पुरातत्त्वविद डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार छत्तीसगढ़ के राजिम, सिरपुर, खरौद एवं पलारी के शिव मन्दिर  एक ही समय के निर्मित मन्दिर  हैं।
इस मन्दिर  के बाह्य भाग में सूर्यनारायण, नृसिंह भगवान, हनुमान जी, सरस्वती आदि के मनोमुग्धकारी चित्रांकन हैं, मौसम की मार से जो अब लुप्तप्राय स्थिति में हैं। मन्दिर  का पृष्ठ भाग भी काफी क्षतिग्रस्त हो गया है एवं मन्दिर  झुकता हुआ नजर आता है। जिसको दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है।
अफसोस की बात है कि हम अपनी ऐसी न जाने कितनी धरोहरों को उपेक्षित करते चले जा रहे हैं। नवीं शताब्दी में बने इस मन्दिर  के इस महत्त्व पूर्ण द्वार की मूर्त्तियों के ऊपर कुछ वर्ष पहले ग्रामवासियों ने अपनी अपार भक्ति का प्रदर्शन करते हुए वार्निश और चूने का उपयोग कर कलाकृतियों को खराब कर दिया था, जिसे बाद में पुरातत्त्व विभाग ने सन् 1995 में रासायनिक उपचार कर दुरुस्त किया था। इसी तरह की भक्ति दिखाते हुए कुछ वर्ष पहले मन्दिर के गर्भ गृह में अतिरिक्त निर्माण करके एक भारी भरकम पीतल की घंटी लगा कर मन्दिर  को कमजोर करने की कोशिश की गई थी। हाल ही में उक्त घंटी के चोरी हो जाने का भी समाचार मिला। अत: ऐसे ऐतिहासिक मन्दिरों की महत्ता के प्रति क्षेत्र के लोगों को जागरुक किया जाना अत्यावश्यक है। इसके लिए जरुरी है कि पुरातत्त्व विभाग भी आवश्यक कदम उठाए।
शिव विवाह का चित्रण
पुरातत्त्ववेत्ताओं का  मत है कि पूरे भारत में अब तक ज्ञात किसी भी मन्दिर  में ऐसी शिल्पकला नहीं देखी गई है और न ही किसी ग्रंथ में वर्णित है कि अमुक मन्दिर  में पुष्पक जैसे विमान पत्थरों पर चित्रित हैं। इस दृष्टि से पलारी के इस शिव मन्दिर  का महत्त्व  काफी बढ़ जाता है, साथ ही यह और अधिक अध्ययन की माँग करता है।
मन्दिर  के प्रवेश द्वार पर चित्रित पुष्पक जैसे विमान पर जब पहली बार पुरातत्त्व अधिकारियों की निगाह पड़ी तो वे चौंक गए।  सर्वेक्षण  में पत्थरों पर शिव विवाह को चित्रित किया गया है और बारातियों में शामिल देव समुदाय विमान पर सवार हैं। पुष्पक विमान का उल्लेख केवल पौराणिक ग्रंथों में मिलता है, जिसके अनुसार यह कुबेर का था, जिसे रावण ने छीन लिया था। लंका विजय के बाद भगवान श्री राम इसी से अयोध्या लौटे थे।

यहाँ  शिव विवाह से संबंधित कथानक को अत्यंत कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। मन्दिर  की चौखट पर शिव विवाह के दृश्य में देवाताओं को हाथियों अश्वों एवं बैल पर सवार होकर जाते अंकित किया गया है। चौखट के शीर्ष पर मृदंग आदि बजाते नृत्य करते लोगों को दर्शाया गया है;जो अत्यंत मनोहारी है। प्रवेश द्वार पर बारातियों में शामिल दिग्पालों का शिल्पांकन प्रमुखता से है। शिल्प शास्त्रों में वर्णित दिग्पालों के पारम्परिक वाहनों से अलग हटकर वाहन दर्शाए गए हैं। पुराणों में बताये गए वैमानिक का प्रतीकात्मक शिल्पाकंन यहाँ  मिला है। धर्मशास्त्रों के बाद वैमानिक कला का यह प्रतीकात्मक शिल्पांकन निश्चित रूप से प्राचीनकाल में वैमानिक ज्ञान की परम्परा का घोतक है। 

छत्तीसगढ़ः विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर


सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्त्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहाँ  अनेक मन्दिर , बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोशल) की राजधानी सिरपुर में जैसे जैसे उत्खनन का कार्य आगे बढ़ते जा रहा हैं वैसे- वैसे अतीत में छुपी अनेक पुरातात्विक, व ऐतिहासिक घटनाओं का खुलासा भी होते जा रहा है जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि व वास्तुकला के अकाट्य प्रमाण हैं।
सिरपुर प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात रहा है तथा पाण्डुवंशीय शासकों के काल में इसे दक्षिण कोशल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है। सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्त्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहाँ  अनेक मन्दिर , बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया। सातवीं सदी ईस्वी में चीन के महान पर्यटक व विद्वान ह्वेनत्सांग ने सिरपुर की यात्रा की थी। उस समय यहाँ  लगभग 100 संघाराम थे तथा महायान संप्रदाय के 10,000 भिक्षु निवास करते थे। महाशिवगुप्त बालार्जुन ने स्वयं शैव मतावलम्बी होते हुए भी बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक प्रचुर दान देकर संरक्षण प्रदान किया था।
वर्तमान में चल रही खुदाई से सिरपुर में कई बड़े-बड़े शिव मन्दिर  तथा पंचायतन शैली के मन्दिर  मिले हैं, जिसे भारत का सबसे बड़ा मन्दिर  माना जा है। इसके अलावा अनेक भव्य बौद्ध मठ, बौद्ध विहार, घंटा घर, वैदिक पाठशाला और कई प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। बौद्ध स्तूप और राजप्रासाद एवं ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में पत्थरों से निर्मित तहखाना और एक आयुर्वेदिक स्नानागार भी मिला है। जिस स्थान पर तहखाना और घंटाघर मिला है, वहीं पर 36 अन्नागार और 9 आयुर्वेदिक स्नानकुंड प्राप्त हुए हैं यह सब इस बात को इंगित करते हैं कि सिरपुर के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
मन्दिरों का नगर
यहाँ  का प्रसिद्ध लक्ष्मण मन्दिर  छठवीं शताब्दी में निर्मित भारत का सबसे पहले ईंटों से बना मन्दिर  है। यह मन्दिर  सोमवंशी राजा हर्षगुप्त की विधवा रानी बासटा देवी द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर  के समीप ही ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व  का राम मन्दिर  है, जो भग्नावस्था में है। इसके अलावा यहाँ  सोमवंशी राजाओं की वंशावली को दर्शाने वाले अनेक दर्शनीय मन्दिर  हैं हैं- गंधेश्वर महोदव मन्दिर , शिव मन्दिर , राधाकृष्ण मन्दिर , चण्डी मन्दिर ।
साँची के स्तूपों से भिन्न स्तूप
सिरपुर की खुदाई में एक किलोमीटर की परिधि में फैले दूसरी शताब्दी के अवशेषों के अंतर्गत जो स्तूप मिले हैं उन स्तूपों का सीधा  सम्बन्ध  भगवान बुद्ध से है। इन स्तूपों के  सम्बन्ध  में बताया जाता है कि ये स्तूप सांची के स्तूपों से अलग हैं और पत्थर के बने हैं। पत्थरों के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप तो बुद्ध ही बनाते थे। पुरातत्त्व  विभाग के अधिकारी बताते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध सिरपुर आए थे। यहाँ  के स्तूप उसी समय के हैं।
हाल की खुदाई में यहाँ  प्राप्त 184 टीलो के नीचे स्वर्णिम इतिहास दबा हुआ है। यहाँ  जो स्तूप मिले हैं उन्हें सम्राट अशोक के काल का स्तूप माना गया है। स्तूप मिलने के बाद अब यहाँ  की संस्कृति ईसा से तीन सदी पूर्व की मानी जाएगी। पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अरुणकुमार शर्मा के अनुसार जातक कथाओं मे भी इस बात का उल्लेख है कि महात्मा बुद्ध छत्तीसगढ़ आए थे। वे जहाँ- जहाँ  गये थे वहाँ  सम्राट अशोक ने उनके निर्वाण के बाद स्तूप बनवाए थे। अब छत्तीसगढ़ मे स्तूप मिलने से उनके यहाँ  आने की पुष्टि तो होती ही है, एक नए इतिहास की शुरुआत भी हो जाती है।
बौद्ध विहार
यहाँ  दो बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं इनका निर्माण भी ईंटों से हुआ है। विहार के मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की साढ़े छह फुट ऊँची प्रतिमा प्रस्थापित है। इसके अतिरिक्त यहाँ  अवलोकितेश्वर और मकर वाहिनी गंगा भी मिली है। अभिलेख से ज्ञात होता है महाशिव गुप्त बालार्जुन के राज्य में आनंदप्रभु नामक भिक्षु ने इस विहार का निर्माण करवाया था। दो मंजिला इस मठ में 14 कमरे थे। इसी के पास एक ध्वस्त विहार भी प्राप्त हुआ है। यहाँ  भी बुद्ध की प्रतिमा है।
घंटाघर
यहाँ  प्राप्त घंटाघर के संदर्भ में पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अरुण कुमार शर्मा का कहना है कि समय के ज्ञान के लिए तब घड़ी जैसे उपकरणों का अविष्कार नहीं हुआ था तब यह घंटाघर ही सिरपुर व्यवसायियों और रहवासियों के लिए समय की जानकारी देने का एकमात्र साधन रहा होगा। प्राचीनकाल में घंटा, मिनट और सेकंड के स्थान पर पहर, पल और छिन समय के सूचक हुआ करते थे। रात्रिकाल को चार पहर में बांटा गया था। सिरपुर में मिले लगभाग 2600 वर्ष पुराने लोहे- ताँबे जैसे कठोर धातु से निर्मित इस घंटे को ईसा पूर्व तीसरी-चौथी सदी का बताया जा रहा है। मिट्टी में सैकड़ोंसाल तक दबे रहने और जंग लगने से घण्टा जीर्ण अवस्था में है। घण्टे के साथ ही दो छोटी घण्टियाँ भी मिली हैं। बड़े घंटे की लंबाई 33 सेमी, चौड़ाई 26 सेमी और मोटाई 16 सेमी है।
पुरातन वैदिक पाठशाला
उत्खनन में 5वीं शताब्दी में बनाई गई वैदिक पाठशाला के प्रमाण भी यहाँ  देखे जा सकते हैं। इस वैदिक पाठशाला को अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में खोजा गया है। 10 मीटर लंबाई व 1. 5 मीटर चौड़ाई के कमरों के बीचोंबीच में विष्णु की मूर्त्ति  मिली है। इस कमरे में 60 विद्यार्थियों के पढऩे की व्यवस्था थी। डॉ. शर्मा के अनुसार यह भारत में खोजी गई सबसे प्राचीन पाठशाला है। यहाँ  पर शिक्षकों के कमरें भी मिले हैं।
भव्य स्नान-कुण्ड
डॉ. शर्मा ने नगर संरचना के उत्खनन में एक सार्वजनिक मकान खोजा है, जिसमें बरामदे ही बरामदे हैं। इसके अलावा यहाँ  सफेद पत्थरों से निर्मितकुण्ड  निकला है। 3.6 मीटर लंब व चौड़ेकुण्ड  की गहराई 70 सेंटीमीटर है।
कुण्ड के चारों तरफ 12 स्तम्भ भी थे। इनके अवशेष के रूप में आधार स्तम्भ शेष बचे हैं।कुण्ड  के उत्तर पूर्व में तुलसी  चौरा है। इसमें जल की निकासी के लिए एक भूमिगत नाली से जोड़करकुण्ड  से मिलाया गया है।कुण्ड  के दक्षिण-पश्चिम कोने पर भी भूमिगत नाली से जल निकासी के काम करने के प्रमाण यहाँ  पर मिले हैं। यहकुण्ड  संभवत: आयुर्वेदिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था।कुण्ड  में नीम की पत्तियाँ  डालने का अनुमान हो सकता है। यहाँ पर संभवत: तेल स्नान पद्धति का भी उपयोग किया जाता रहा होगा।
यहाँ  सात धान्य भण्डार भी मिले हैं। इसमें तुलसी और नीम पत्ती व गेरू के टुकड़े रखकर दीमक से सुरक्षा करने के प्रमाण मिले हैं।
व्यापारिक नगरी का प्रमाण
औद्योगिक नगर की प्रतिष्ठा शरभपुरिया और पांडूवंशीय काल में सिरपुर का वैभव एक महान राजधानी के तौर पर था लेकिन हाल में मिले साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि हो गई है कि इससे पहले भी इसकी ख्याति औद्योगिक उत्पादनों के लिए थी। सातवाहनों का प्रभुत्व इस नगर पर तीसरी सदी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी तक रहा। महानदी के तट पर स्थित सिरपुर अरब देशों में चावल निर्यात का प्रमुख केन्द्र था। सूरत बंदरगाह होते हुए सदियों पूर्व अरबदेश के व्यापारी यहाँ  आते थे।
उत्खनन के निदेशक डा. अरुण शर्मा ने बताया कि वहाँ  पानी के बड़ेकुण्ड  के पास एक कमरा मिला है। इसमें सोने के गहने और काँच की चूडिय़ों की ढलाई होती थी। 10 सेमी लम्बा और ढाई सेमी चौड़ा स्लेटी प्रस्तर खण्ड  पर एक ऐसा साँचा मिला है ,जिसमें बारीक नक्काशीदार आकृतियाँ  हैं। जिसे दो हजार वर्ष पहले की सातवाहन काल का बताया जाता है। सोने को गलाने के बाद इसमें डाला जाता था। आम और कई आकर्षक आकृतियों में गहनों की ढलाई कर ली जाती। गहने ही नहीं यहाँ  बनाई जाने वाली काँच की चूडिय़ों की माँग देश के कई हिस्सो में होती थी। सोने-चाँदी और काँच का सामान पिघलाने में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के पात्र भी पाए गए हैं। बड़े पैमाने पर गहने और कांच की चूडिय़ों का उत्पादन कर इनका गुजरात, उड़ीसा समेत देश के कई हिस्सों में व्यापार होता था।
राम वनवास और सिरपुर
खुदाई में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उससे फिर से इस बात की पुष्टि हुई है कि भगवान श्रीराम को जब 14 साल का वनवास मिला था तब उनको सिरपुर से होकर ही दक्षिण की तरफ जाना पड़ा था। श्रीराम के छत्तीसगढ़ के सिरपुर से होकर जाने के और कई प्रमाण पहले से भी छत्तीसगढ़ में मौजूद हैं जैसे आरंग में अहिल्या का स्थान होने के साथ तुरतुरिया में बाल्मीकि का आश्रम। सात ही दण्डकारण्य जाने का सबसे बेहतर रास्ता सिरपुर से होकर ही जाता था। श्रीराम ने शबरी से जो बेर खाए थे उसे सिरपुर के आस-पास के जंगलों में ही बताया जाता है।
शबरी जहाँ  रहती थीं उस नगर को शबरीपुर कहा जाता था। शबरीपुर का उल्लेख अलेक्जेंडर कनिंघम की पुस्तक में भी मिलता है, जो उन्होंने 1872 में लिखी थी। इस पुस्तक में शबरीपुर के साथ इस बात का भी उल्लेख है। यह बात भी स्थापित है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था। इस चौराहे से गुजरे बिना कोई भी दूसरी दिशा में जा ही नहीं सकता था। जहाँ  किसी को दक्षिण की और जाना होता था ,तो उसको इलाहाबाद, सतना, अमरकंटक के बाद सिरपुर होकर ही दक्षिण की और जाना पड़ता था। श्रीराम भी दक्षिण जाने के लिए इस चौराहे से होकर गए थे। इस मार्ग का उपयोग उस समय ज्यादा इसलिए भी होता था; क्योंकि यही एक ऐसा मार्ग था ,जिस मार्ग में नदियाँ  कम पड़ती थी।
मन्दोदरी पिता ने की टाउन प्लानिंग
ढाई हजार साल पुराने सिरपुर की खुदाई कर रहे पुरातत्त्ववेत्ताओं का यह भी दावा है कि इस शहर की डिजाइन लंका के राजा रावण के ससुर मय ने बनाया है। रावण की पत्नी मन्दोदरी के पिता मय का जिक्र पुराणों और पुरानी तमिल पाण्डुलिपियों में अद्वितीय वास्तुविद् के रूप में मिलता है। सिरपुर के महल, शहर संरचना, राजधानी के लिए जगह के चयन से लेकर ईंटों को जोडऩे के लिए प्रयुक्त गारे तक में वही सामग्री इस्तेमाल हुई है, जिसका जिक्र 10 हजार साल पहले मय ने किया था।
भवन निर्माण की सारी विधियों को संस्कृत भाषा में लिखी गई पाण्डुलिपियों में सुरक्षित किया गया था। कुछ साल पहले इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली ने इन पाण्डुलिपियों को मयमतम् (मय के विचार) किताब के रूप में प्रकाशित किया था। डेढ़ हजार से ज्यादा पेजों की दो हिस्सों में छपी किताब का अंग्रेजी में अनुवाद बेल्जियम के ब्रूनो डेगन्स ने किया है, जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद् और संस्कृत के शिक्षक हैं। ग्रंथ के हिसाब से पाण्दुवंशी राजाओं ने सिरपुर को ऐसे स्थान पर बसाया, जहाँ  पीली मिट्टी थी और उसका आकार नदी की धारा के साथ-साथ धनुष जैसा था। शहर की बाहरी दीवार नदी के धारा के समानान्तर ठीक 22 से 30 डिग्री के कोण पर थी। मयमतम् के अनुसार नदी से लगी दीवारों के ऐसे कोण से बाढ़ में भी शहर को नुकसान नहीं पहुँचता। सिरपुर का ढाल भी किताब के अनुसार पूर्व से पश्चिम की तरफ है।
सिरपुर में अब तक मिले 17 शिवमन्दिरों में भी एक खास सिद्धान्त का प्रयोग हुआ है, जिन्हें भी वास्तुविद् और भगवान शिव के भक्त मय ने बनाया था। सिद्धान्तके अनुसार मन्दिर  का दरवाजा शिवलिंग के आकार से दोगुना बड़ा और मन्दिर  काशिखर आठ गुना होना चाहिए। जाँच में पाया गया कि सारे शिवमन्दिर  उसी गणना के अनुरूप बने हैं। आज हम आधुनिक शहरों में भूमिगत नाली की व्यवस्था की बात करते हैं, लेकिन सिरपुर में 1800 से 2500 साल पुराने मकानों में पहले से ही यह व्यवस्था थी। शहर की कुछ भूमिगत नालियाँ  तो एक किमी से भी ज्यादा लंबी मिलीं है।
ईंटों की जुड़ाई का फार्मूला
मकान, मन्दिरों में इस्तेमाल ईंटों की जुड़ाई में मसाले की जगह फेविकोल जैसे पेस्ट का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। सीमेंट से कहीं ज्यादा मजबूत जुड़ाई करने वाले पेस्ट के नमूने को शर्मा ने केमिकल टेस्ट के लिए देहरादून के लैब में भेजा था। जाँच से उन्हें पता चला कि पेस्ट तैयार करने के लिए हजारों साल पुराने फार्मूले का इस्तेमाल हुआ था। इसे बबूल की गोंद, अलसी के तेल, भूसे, सड़े हुए गुड़, कुछ जड़ी-बूटियों के मिश्रण को सड़ाकर तैयार किया जाता था।
विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर?
सिरपुर के इन पुरातन विशेषताओं के देखते हुए लम्बे समय से इसे विश्व धरोहर घोषित कराने की माँग की जा रही है परन्तु इस पर अभी तक गम्भीरता से विचार नहीं किया गया है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस ओर पुन: प्रयास आरंभ करे ताकि विश्व के पर्यटन मानचित्र पर सिरपुर का नाम भी प्रमुकता से आए और आधिक से अधिक देशी और विदेशी पर्यटक इस ओर आकर्षित हों वैसे राज्य सरकार ने वर्ष 2006 से सिरपुर महोत्सव का आयोजन प्रारम्भ कर किया है; जिससे सिरपुर को राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष पहचान मिली है। इसके बावजूद अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। (उदंती फीचर्स)

पाली: शिव मन्दिर में कला का अद्भुत रूपांकन

पाली:
शिव मन्दिर में कला का अद्भुत रूपांकन 
  -  प्रो. अश्विनी केशरवानी
छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में 'दक्षिण कोशल' कहा जाता था। अतीत से वर्तमान तक यहाँ  अनेक राजवंश के राजाओं ने शासन किया, अपने पराक्रम और पराजय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया और वे काल के मरुस्थल में पद-चिह्न की स्याही में घुल मिलकर इन खण्डहरों, शिलालेखों और ताम्रपत्रों में लिखे रह गये हैं। राजाओं द्वारा अनेक मन्दिर , मठ और तालाब आदि के निर्माण के बारे में हमारा विचार है कि यहाँ  के गाँवों में स्कूल-कालेज न हो, हाट-बाजार न हो, तो कोई बात नहीं; लेकिन नदी-नाला का किनारा हो या तालाब का पार, मन्दिर  चाहे छोटे रूप में हों, अवश्य देखने को मिलता है। ऐसे मन्दिरों में शिव लिंग, राधाकृष्ण, हनुमान, राम-लक्ष्मण-जानकी के मन्दिर  प्रमुख होते हैं।' लेकिन पाली का शिव मन्दिर  प्राचीन ही नहीं अपितु मूर्त्तिकला का अनुपम उदाहरण भी है।
पाली, बिलासपुर राजस्व सम्भाग में नवगठित कोरबा जिलान्तर्गत कोरबा से लगभग 55 कि.मी., बिलासपुर अम्बिकापुर मार्ग में बिलासपुर से 40 कि. मी., राजधानी रायपुर से 160 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। प्राचीन काल में इस नगर को 'झांझनगर-पाली' कहा जाता था। कालान्तर में झांझनगर का लोप हो गया और 'पाली' नाम प्रचलित हो गया। पाली में बस्ती के बाहर सड़क किनारे एक तालाब है, जिसके तट पर उत्कृष्ट मूर्त्तिकला से सजा एक शिव मन्दिर  है। यह मन्दिर  छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालती है।
मध्ययुगीन मूर्त्तिकला का केन्द्र-
मध्ययुगीन मूर्त्तिकला की शुरूवात इस क्षेत्र में पाली के इस शिव मन्दिर  से हुई प्रतीत होता है। इस मन्दिर  के बाहरी भाग, भीतरी सभा मण्डप और गर्भगृह के द्वार पर खुदाई का इतना सुन्दर और दर्शनीय काम किया गया है, जिन्हें देखकर आबू पर्वत के जैन मन्दिर  पर किये गए जालीदार नक्काशी की बरबस याद आ जाती है। इस सम्बन्ध में बिलासपुर जिले के प्रथम सेटलमेंट अधिकारी मि. चीजम साहब ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है- 'इस मन्दिर  का अवशिष्ट भाग अर्थात् गर्भगृह का सभा मण्डप अष्टकोण गुम्बददार है तथा मण्डप में प्रवेश करते ही नीचे से ऊपर तक नक्काशी का जो बारीक काम किया गया है उसे देखकर मन आश्चर्य चकित हो उठता है। सभा- मण्डप का गुम्ब्द जिन खम्भों पर स्थित है, उन पर हिन्दू पुराणों और काव्यों में वर्णित प्रसिद्ध व्यक्तियों की आकृतियाँ  चित्रित हैं। गुम्बद के सबसे निचले भाग में अत्यंत विचित्र आकृतियाँ  लकीरों में बनाई गयी हैं। सबसे उत्तम और परिश्रमपूर्वक खुदाई का काम गर्भगृह के द्वार पर किया गया है। यह नक्काशी अत्यंत बारीक है और इसे बनाने में बड़ी कुशलता दिखाई गयी है।'
श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में लिखते हैं- 'किंवदंती है कि रतनपुर नगर का विस्तार दक्षिण पूर्व में 12 मील दूर पाली तक था, जहाँ  एक सुन्दर तालाब के तट पर शिवजी का एक अष्टकोणीय मन्दिर  अपनी भव्यता और शिल्पकला में अभी भी उत्कृष्ट समझा जाता है। आश्चर्य तो यह है कि धरातल से लेकर चोटी तक मन्दिर  का एक-एक इंच, अंग्रेज अधिकारियों द्वारा मरम्मत कराए गए भाग को छोड़कर, कलाकार की छेनी से अछूता नहीं है। मन्दिर  की दीवार पर चहुँ ओर अनेक कलात्मक मूर्त्तियाँ  इस चतुराई से अंकित हैं मानों वे बोल रहे हों कि 'देखो हमने अब तक कला की साधना की है और तुम पूजा के फूल चढ़ाओ।' सच पूछिए तो छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति का विकास इन्हीं मन्दिरों में अंकित मूर्त्तियों के सहारे हुआ है। ये मूर्त्तियाँ  अंग-भंगिमा और सूक्ष्म साज- सज्जा की दृष्टि से बेजोड़ है। सभा मण्डप में चौरासी योगिनियों की मूर्त्तियाँ  प्रतिष्ठित हैं जो अत्यंत सुन्दर और मनहरण हैं। इन्हें देखकर जबलपुर के भेड़ाघाट में स्थित चौसठ योगिनी मन्दिर  की याद आती है। इसी प्रकार मन्दिर  के भीतरी भग की कला कृतियों में जिन कोमल और मधुर भाव के दर्शन होते हैं उसका बयान सम्भव नहीं है। 'गिरा अनयन नयन बिन बानी।' मूर्त्तियों के शिल्प में रेखाओं की निपुणता लालित्यपूर्ण अंग सौष्ठव एवं विस्मयकारी शिल्प दृष्टि एवं कला प्रेमियों में रस का संचार की है। मन्दिर  की बाहरी और भीतरी दीवार पर देवी-देवताओं की मूर्त्तियाँ , नायक-नायिकाओं का प्रदर्शन, ब्याल अलंकरण और योग मुद्राएँ  आदि उत्कीर्ण की गई है। चामुण्डा, सरस्वती, गज लक्ष्मी और पार्वती के अलावा इंद्र, अत्रि, अग्नि, वरूण, वायु, कुबेर और ईशान देव की मूर्त्ति  प्रमुख है। खजुराहो, कोणार्क, भोरमदेव, नारायणपुर, सेतगंगा के मन्दिरों की तरह यहाँ  भी काम कला का चित्रण मिलता है।
 मन्दिर  की दीवार पर ब्याल अलंकरण में काल्पनिक पशु का चित्रण है ,जिसमें शरीर सिंह का और सिर किसी दूसरे पशु का है। यहाँ पर सिंह, गज, नर, वराह, शुक्र आदि का विचित्र चित्रण मिलता है। नायिकाओं का अत्यंत सजीव चित्रण गर्भगृह के बाह्य भित्तियों पर किया गया है। तोते को दाना चुगाती शुक अभिसारिका, बच्चे को दूध पिलाती माँ , नृत्य की आकर्षक मुद्रा में नर्तकी, आंखों में अंजन लगाती सुंदरी, केश सँवारती और अन्य अनेक भाव भंगिमा में अलमस्त चित्रण निश्चित रूप से मन को मोहित कर लेता है। मन्दिर  की उत्कृष्ट कलाकृति में शिव-पार्वती की विभिन्न मुद्राओं का चित्रांकन है। द्वार के साख पर दाईं  और बाईं ओर शिव-पार्वती की आलिंगनबद्ध मूर्त्तियों का चित्रांकन कलात्मक ढंग से किया है। ऊपर दाईं  ओर शिवजी की बायीं जांघ में पार्वती जी विराजमान हैं। शिवजी के हाथ में त्रिशूल बीजपूरक है। इस मूर्त्ति में एक हाथ खण्डित  है, जबकि दूसरे हाथ से वे पार्वती जी का आलिंगन कर रहे हैं। नीचे की मूर्त्तियों में शिव-पार्वती नंदी पर आरूढ़ हैं। शिवजी के हाथ में त्रिशूल, नाग एवं कपाल है। बाईं ओर शिव-पार्वती की प्रथम मूर्त्ति में शिव पार्वती की ठोढ़ी को स्पर्श कर रहे हैं और पार्वती जी मोहक मुद्रा में शिव जी की ओर निहार रहीं हैं। नीचे बैठा नंदी आश्चर्यचकित हो शिवजी की ओर निहार रहा है। एक और मूर्त्ति में शिवजी के बाएँ भाग में पार्वती जी हैं; लेकिन उनका मुख दूसरी ओर है, जैसे वे रूठी हों और शिवजी उन्हें मनाने का प्रयास कर रहे हों?
पाली का ऐतिहासिक सफर-
उत्कृष्ट मूर्त्तिकला से सुसज्जित पाली के इस मन्दिर  का निर्माण आखिर कराया किसने और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी यह सहज ही जिज्ञासा का प्रश्न है। मन्दिर  में कुछ स्थानों में 'श्री मज्जाजल्लदेवस्य कीर्तिरियम' खुदा हुआ है। इससे प्रतीत होता है, कि इसे कलचुरी वंशी राजा जाजल्लदेव ने बनवाया है? कलचुरी वंश की राजधानी पहले तुम्माण में फिर रत्नपुर में बनायी गयी। रत्नपुर के कलचुरी वंश में जाजल्लदेव नाम के दो राजा हुए । इनमें जाजल्लदेव प्रथम का शासनकाल सन् 1095 से 1120 तक था। मन्दिर  में उत्कीर्ण लेख की खुदाई भी इसी काल की प्रतीत होती है। अगर इसे जाजल्लदेव प्रथम ने बनवाया है, तब इसका निर्माण काल 11 वीं शताब्दी के अंत में निर्धारित होता है। लेकिन मन्दिर  इससे भी प्रचीन है क्योंकि मन्दिर  के गर्भगृह केद्वार पर गणेश पट्टी पर खुदा लेख विक्रमादित्य का है। इस लेख को सर्वप्रथम डॉ. देवदत्त भंडारकर ने लगभग 50 वर्ष पहले पढ़ा था। उनके अनुसार लेख का आशय है  'कि महामंडलेश्वर मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य ने यह देवालय निर्माण कराकर कीर्तिदायक काम किया है।इस काल में यह तो ज्ञात हो गया कि बाणवंश में विक्रमादित्य नाम के राजा हुए  थे। लेकिन वे उनका शासनकाल की जानकारी प्राप्त नहीं कर सके। आज इससे सम्बन्धित अनेक लेख प्रकाश में आ चुके हैं ,जिनसे ज्ञात होता है कि बाणवंश में विक्रमादित्य नाम के तीन राजा हुए । उनमें से प्रथम विक्रमादित्य जिसे जयमेरू भी कहा जाता था, मल्लदेव का पुत्र था। पाली के लेख में भी विक्रमादित्य को मल्लदेव का पुत्र बताया गया है। अत: यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि दोनों विक्रमादित्य एक ही थे। इसका दूसरा शिलालेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन उनके पुत्र विजयादित्य जिन्हें प्रभुमेरू भी कहा जाता है, का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। यह संवत् 820-831 (सन् 898-99 से 909-910 ईसवीं) का है। इस लेख से ज्ञात होता है कि विक्रमादित्य (जयमेरू) ने सन् 870 से 895 ई. में राज्य किया और इसी बीच उन्होंने पाली के इस शिव मन्दिर  का निर्माण कराया। इससे यह तो सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में विक्रमादित्य का शासन था।
श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में लिखते हैं- यद्यपि इनके प्रथम राजा का नाम शिवगुप्त था ; लेकिन यह प्रमाणित नहीं हो सका है कि पूर्ववर्ती पाण्डुवंशी से इनका कोई सम्बन्ध था। बल्कि पाण्डुवंशी राज्य प्रणाली के विपरीत किन्तु शरभवंशी राजाओं के समान इनकी राजमुद्राओं पर गजलक्ष्मी पायी जाती है। शिवगुप्त का एक भी प्रशस्ति पत्र अभी तक नहीं मिला है। इनके पुत्र महाभवगुप्त का एक प्रशस्ति पत्र मिला है जिसमें अंकित है-'स्वस्ति श्रीमत् परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर सोमकुल तिलक त्रिकलिंगाधिपति महाराज श्री भवगुप्त'
तुम्माण और रतनपुर के कलचुरी राजाओं के विभिन्न अभिलेखों में बताया गया है कि इस वंश हैहह रानी से दहाल का शासक कोकृल (ईसवी सन् 850 से 890) उत्पन्न हुआ, जिसके 18 पुत्र थे। इनमें से ज्येष्ठ पुत्र त्रिपुरी के राजगद्दी का उत्तराधिकारी हुआ और अन्य पुत्रों को विभिन्न मण्डलों का अधिपति बनाया गया। इनमें से एक पुत्र कलिंगराज हुआ जिसने अपने पूर्वजों की भूमि को छोड़कर दक्षिण कोसल जनपद में पहुँचकर उसे अपने बाहुबल से प्राप्त किया और तुम्माण को राजधानी बनाकर अपने राज्य की श्रीवृद्धि की। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि इसके पूर्व भी कलचुरियों ने तुम्माण में अपनी राजधानी स्थपित की थी। बिल्हारी अभिलेख के अनुसार कोकृलदेव प्रथम के पुत्र मुग्धतुंग ने पूर्व समुद्र के तटवर्ती देशों को जीतकर कोशल के राजा से पाली छीन ली। सम्भवत: ईसवीं सन 900 में पहली बार तुम्माण कलचुरियों की राजधानी बना और लगभग ईसवीं सन् 1000 में कलिंगराज ने तुम्माण को पुन: अपनी राजधानी बनाया। कोकृलदेव प्रथम और कलिंगराज के बीच के समय में इस वंश का इतिहास अंधकारमय है।
पंडित लोचनप्रसाद पांडेय ने उड़ीसा में समुद्र तट से 13 कि.मी. की दूरी पर स्थित 'पालिया' को उक्त अभिलेख का पाली माना है। उपर्युक्त तत्थों से स्पप्ट है कि पाली के इस मन्दिर  को बाणवंशी राजा विक्रमादित्य ने बनवाया है। लेकिन मन्दिर  की दीवार में कलचुरी राजा जाजल्लदेव के अभिलेख से ऐसा प्रतीत होता है कि इस मन्दिर  का जीर्णेद्धार राजा जाजल्लदेव ने कराया है। अन्य अभिलेखों से पता चलता है कि कलचुरी राजा जाजल्लदेव प्रथम ने अपने नाम पर 'जाजल्लपुर' बसाया जो वर्तमान में जांजगीर नगर को माना जाता है। यहाँ  उनहोंने विष्णु मन्दिर , मठ, सरोवर और आम्रवन आदि बनवाया तथा अनेक मन्दिरों-पाली का शिव मन्दिर , शिवरीनारायण का नारायण मन्दिर  आदि का जीर्णोद्धार कराया।  
मिस्टर कजिंस ने 50 वर्ष पूर्व इस मन्दिर  का अवलोकन किया था। वे लिखते हैं 'इस मन्दिर  का सभा मण्डप पहले चतुष्कोण था। बाद में ऊपर के गुम्बज को सहारा देने के लिये चारों कोणों में चार आड़ी दीवार बनायी गयी जिसके कारण अब मन्दिर  अष्ट-कोणीय दिखाई देता है। इसी प्रकार गर्भगृह के सामने दो नये स्तम्भ है, जिन पर नक्काशी का काम उतना नहीं है, जितना सभा मण्डप के अन्य स्तम्भों पर है। ये स्तम्भ ऊपर छत की टूटी हुई मयाल को सहारा देने के लिये बनाए गए हैं। इसके सिवाय सभा मण्डप का एक दरवाजा भी बाद में बना जान पड़ता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जितने भाग का जीर्णोद्धार किया गया है उन्हीं में जाजल्लदेव का नाम खुदा है। इन सब तथ्यों से स्पष्ट है कि जालल्लदेव प्रथम ने इस मन्दिर  का निर्माण नहीं बल्कि जीर्णोद्धार कराया था'। मध्य कालीन मूर्त्तिकला के उत्कृष्ट नमूने इस क्षेत्र के जांजगीर, पाली, भोरमदेव, नारायणपुर और शिवरीनारायण के मन्दिर  में देखे जा सकते हैं। प्राचीन काल का वैभवशाली नगर पाली आज एक अल्प विकसित कस्बा मात्र है। यहाँ  प्रतिवर्ष महाशिवरात्री पर शिव भक्तों की भीड़ मेला जैसा दृश्य उपस्थित करता है। यह नगर कई राजवंशों का काल निर्धारित ही नहीं करता वरन् इस क्षेत्र में उनके शासन काल को दर्शाता भी है। अत: यह मन्दिर  छत्तीसगढ़ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और इसकी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जानी चाहिये।

सम्पर्क- 'राघव' डागा कालोनी, चांपा-495671 (छ.ग.)