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Oct 20, 2015

व्रत-उपवास

इन्द्रियों के

नियामक का

साधन...
- रंजना सिंह
किसी भी धर्म में, परम्परा में निहित कर्मकांडों में कालक्रमानुसार भले बहुत से ऐसे नियम विधान जुड़ गए जो पूर्णरूपेण उसी विधि के साथ ग्राह्य अथवा अनुकरनीय न हों, पर उसकी पड़ताल उसके सूक्ष्म और व्यापक उद्देश्यों की धरातल पर करेंगे तो पाएंगे कि उसमे कितना गहन अर्थ छुपा पड़ा है। धार्मिक आस्था को दृढ़ करने के साथ साथ आचरण को व्यवस्थित करते हुए मानव संबंधों को प्रगाढ़ कर सभ्यता संस्कृति के पोषण संरक्षण की कैसी अद्भुद क्षमता इसमे निहित है। लंबे समय से चले आ रहे इन कर्मकांडों को वाहियात और बकवास कह नकारे जाने के पूर्व इनके पीछे छिपे तथ्यों और उद्देश्यों की पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है।



व्रत उपवासों का आध्यात्मिक ही नहीं कल्याणकारी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पहलू भी है। समग्र रूप में व्रत अपने आप से किया हुआ एक संकल्प है, जिसकी पूर्णता आत्मबल बढ़ाने में परम सहायक होता है और उपवास सांकेतिक रूप में इन्द्रियों के नियामक का साधन है। शरीर की सबसे मौलिक आवश्यकता भूख पर नियंत्रण पाने का प्रयास, हठ साधना द्वारा मौलिक आवश्यकता पर विजय प्राप्त कर आत्मबल की संपुष्टि है। मनुष्य इन्द्रियों को जितना अधिक वश में रखने में क्षमतावान होगा उसका आत्मबल, क्षमता उतनी ही उन्नत होगी और विवेक जागृत होगा। सकारात्मक शक्ति ही मनुष्य को सकारात्मक कार्य के लिए भी उत्प्रेरित करती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि सि$र्फ भोजन भर त्याग देना व्रत या उपवास कहलायेगा और यह उतना ही सिद्धिदायी होगा। उपवास वस्तुत: मन, कर्म, वचन तथा व्यवहार में शुचिता लाने का व्रत/ संकल्प लेते हुए अटलता से उस पर कायम रहते हुए सत्य पथ पर चलने के प्रयास का नाम है। भोजन भर छोड़ देना और अवधि समाप्ति तक मन ध्यान भोजन पर केंद्रित रखते हुए व्यंजनों के ध्यान में झुंझलाहट के साथ समय निकलना, व्रत उपवास नही है। ईश्वर ने मानव शरीर को जिन पचेंद्रियों से विभूषित किया है, जिनकी सहायता से हम सुख प्राप्त करते हैं, सुख प्रदान करने वाली ये इन्द्रियां यदि मनुष्य के विवेक की सीमा में न रहें तो बहुधा अत्यधिक सुख की अभिलाषा व्यक्ति को अनुचित कार्य करने को उकसाती ही नहीं कभी कभी विवश भी कर देती हैं और मनुष्य का अधोपतन हो जाता है, इसलिए इन व्रत उपवासों का प्रावधान सभी धर्मो में एक तरह से इन्द्रियों के नियमन के निमित्त किया गया है।
किसी भी देवी देवता चाहे उसे अल्लाह कहें, जीसस क्राइष्ट या राम कृष्ण, शंकर, दुर्गा, हनुमान या इसी तरह के अन्य देवी देवता (हिंदू धर्म में देवी देवताओं की जो संख्या तैंतीस करोड़ मानी गई है, वह भी अपने आप में अद्भुत इसलिए है कि इस ब्रह्माण्ड में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे श्रद्धा का पात्र नही माना गया है, चाहे वह चल हो या अचल और उसके प्रतिनिधि विशेष के रूप में उसे देव या देवी के रूप में पूजनीय माना गया है ) सबसे पहले तो धार्मिक दृष्टि से यदि देखें तो, जिस किसी देवी- देवता के नाम पर यह व्रत अनुष्ठान किया जाता है, मनुष्य जब इसका परायण करता है तो सहज ही उस से जुड़ जाता है और ध्यान में जब इष्ट हों, उसके प्रति प्रेम श्रद्धा और निष्ठा हो, तो सहज ही उसके स्मृति से जुड़कर मन उस इष्ट विशेष के गुणों से
अभिभूत हो उसका अनुकरण करने को प्रेरित होता है। ईश्वर जो सकारात्मकता का पुंज है, सद्गुणों का भण्डार है, व्यक्ति जितना उसकी भक्ति में डूबता है उतना अधिक सद्गुणों से विभूषित होता है। यूँ भी तो हम देखते हैं न कि जिस किसी मनुष्य से मानसिक रूप से हम जितने गहरे जुड़े होते हैं अनजाने ही उस व्यक्तिविशेष के कई गुण हममे ऐसे आ मिलते हैं कि लंबे समय तक के प्रगाढ़ मानसिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों के बीच सोच विचार और आचरण में आश्चर्यजनक साम्यता ला व्यक्तित्व को एक दूसरे का प्रतिबिम्ब सा बना देता है। यही कारण है कि अपने मन में ईश्वर की प्रीति धारण कर मन कर्म वचन से सदाचार पर चलने वाले मनुष्य भी देवतुल्य पूज्य हो जाते हैं। इसका एक पहलू यह भी है कि चूँकि प्रत्येक व्यक्ति में इतनी मात्रा में करनीय अकरणीय में विभेद कर अनुशाषित जीवन जीने की विवेक क्षमता तो होती नही है, सो यदि कर्मकांडों से जोड़कर उसे ईश्वर के प्रति आस्था रखने को विवश कर दिया जाता है तो व्रत विशेष के कालखंड में अनिष्ट के भय से ही सही जुड़कर कुछ पल को उस सर्वशक्तिमान से जुड़ता तो है और उस उपास्य विशेष से जुडऩा और उसके सद्गुणों की स्मृति भी व्यक्ति को सन्मार्ग के अनुसरण को प्रेरित करती है।
मानव समुदाय को परस्पर सुदृढ़ बंधन में आबद्ध रखने में धर्म सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और धर्म से मनुष्य को जोड़े रखने में धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड पोषक की भूमिका निभाते हैं। क्योंकि समुदाय विशेष जब एक साथ किसी कालखंड विशेष में किसी अनुष्ठान को संपन्न करते हैं तो स्वाभाविक हो उनमे भाईचारे की भावना का संचार होता है। उदहारण के लिए हम देख सकते हैं, रमजान के महीने में एक साथ विश्व के सभी मुस्लिम धर्मानुयायी महीने भर का व्रत रख सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं। निश्चित रूप से यह पूरे समुदाय को एकजुटता के सूत्र में आबद्ध करने में प्रभावकारी भूमिका निभाता है।
शारीरिक रूप से देखें तो भी उपवास का शरीर पर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन जो हम आहार ग्रहण करते हैं लाख चाहकर भी वे पूर्णरूपेण पोषक संतुलित और ऋतु अनुकूल नही होते। असंतुलित आहार शरीर में रक्त, वायु या पित्त दोष उत्पन्न करते हैं तथा लगातार भोजन के पाचन क्रिया में संलग्न तंत्र शिथिलता को प्राप्त होने लगते हैं। ऐसे में सप्ताह, पखवाड़े या मास में एक बार नियमित रूप से यदि फलाहार, निराहार, एक संझा या बिना नमक के भोजन किया जाए तो पाचन तंत्र बहुत हद तक व्यवस्थित हो जाता है। किंतु उपर्युक्त किसी भी उपवास में जल के पर्याप्त सेवन से शरीर में संचित दूषित अवयव ( टाक्सिन) शरीर से निकल जाता है। कुछ लोग भोजन को दैनिक आवश्यकता मानते हैं और उपवास करना अपने शरीर को कष्ट पहुँचाना मानते हैं। लेकिन यह नि:संदेह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं। उपवास शरीर के हानिकारक अवयवों से शुद्धिकरण का सर्वथा कारगर उपाय है।
हम कहते हैं, विश्व ने, विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है और मनुष्य का जीवन स्तर चमत्कारी रूप से उन्नत हुआ है। तथ्य को नाकारा नही जा सकता, परन्तु विश्व स्तर पर तरक्की लाख उचाईयाँ पा चुका हो अन्नाभाव में मरने वालों की संख्या में कमी करने की दिशा में बहुत कम कर पाया है। आज भी जनसँख्या वृद्धि का जो दर है, अन्न उत्पादन के दर की तुलना में वह कई गुना अधिक है,जो दिनोदिन मांग और पूर्ती के संतुलन को ध्वस्त करती जा रही है। पेट्रोल डीजल की बढ़ती दरों को महंगाई का प्रमुख कारण मानने वाले बहुत जल्दी ही यह मानना शुरू करेंगे कि जनसँख्या वृद्धि के सामने अन्न की कमी का दिनोदिन बढ़ता असंतुलन, इस संकट का बहुत बड़ा कारण है। भारत तथा इस जैसे बहुत से देशों में आज खेती करना निम्न दर्जे का काम माना जाता है और न तो पढ़े लिखे लोग कृषि कार्य में दिलचस्पी रखते हैं और न ही कृषि कार्य को बेहतर रोजगार का विकल्प मानते हैं। कृषि कार्य में जो लोग संलग्न हैं अधिकाँश संसाधनहीन ही हैं तथा कृषिकार्य उनका शौक नही मजबूरी है। बहुत तेज गति से पारंपरिक कृषकों का अन्य वैकल्पिक रोजगार क्षेत्र में पलायन हो रहा है। आज यह स्थिति तो आ ही गई न, कि विश्व भर में पेयजल समस्या बहुत बड़े रूप में उपस्थित हो गया है और -पानी बचाओ- मुहिम आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है।  हाल की ही बात है न दस रुपये किलो दूध पीने वाला समाज शुद्ध पेय जल के लिए न्यूनतम दस रुपये लीटर पानी खरीद कर पी रहा है।  कारखाने उद्योग तो खूब लग रहे हैं। रोजगार के साधनों में निरंतर वृद्धि हो रही है, परन्तु खाने के लिए तो अन्न ही चाहिए। बहुत कुछ करना सर्वसाधारण के वश में नहीं पर इतना तो किया ही जा सकता है कि हम अपनी खुराक को उतनी ही रखें जितने की आवश्यकता इस शरीर को सुचारू रूप से स्वस्थ रखने के लिए है। धर्म के लिए न सही, सम्पूर्ण मानव समुदाय के हित के लिए और साथ ही अपने शरीर के लिए भी हितकारी नियमित निराहार का संकल्प लें तो किसी न किसी रूप में अन्न संकट से जूझने की दिशा में अपना योगदान दे सकते हैं। लोहे और कंक्रीट के फलते फैलते जंगल और सिकुड़ते कृषि भूमि के बीच मनुष्य मात्र का यह नैतिक कर्तव्य बनता है। 
धर्म में निहित कर्मकांड और व्रत उपवास के प्रावधान का यह महत सर्वमंगलकारी सामाजिक पहलू है, जिसकी उपयोगिता किसी भी काल में सन्दर्भहीन नही होगा।धर्म व्यक्ति के ह्रदय के सबसे निकट होता है और धर्म के नाम पर आचरण की शुचिता का कार्य सर्वाधिक प्रभावकारी ढंग से कराया जा सकता है। धर्म के साथ इसलिए अनिष्ट के भय को जोड़ा गया कि यदि इसे स्वेच्छा पर नैतिक दायित्व रूप में छोड़ दिया जाता तो बहुत कम लोग ही इसका अनुसरण करते।  धर्म से मजबूती से जोड़े रखने के महत उद्देश्य से ही कर्मकांडों की व्यवस्था की गई।  कर्मकांड एक ओर जहाँ उत्सव रूप में व्यक्ति के मनोरंजन का सुगम साधन हैं वहीं समाज को एकजुट रखने में सहायक भी। धार्मिक सामाजिक और शारीरिक रूप से मानव समुदाय के लाभ हेतु ही मनीषियों ने व्रत- उपवास का प्रावधान कर रखा है... अत: इन प्रावधानों का अनुसरण कर हम नि:संदेह सुखी होंगे... 

राम-रावण का अपराजेय समर


रह गया राम-रावण का अपराजेय समर 

- परिचय दास
 (कवि एवं सचिव, मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली)
उत्सवों का मौसम है। बिल्कुल कविता की तरह। इसमें कोई शक नहीं कि कविता कल्पतरु है। कविता से जो माँगोगे मिलेगा। कविता एक उत्सव है, जो आपको नित नूतन नवोन्मेषी बनाए रखती है। कविता दशहरा है, जो नौ दिन की आंतरिक तपस्या के बाद आपको सात्विक अवकाश देती है। कविता उत्सव रचती है, तो उत्सव भी कविता की सृष्टि करते हैं। विजयदशमी मात्र एक उत्सव नहीं, कविता है। कविता को 'पाठ' की तरह लेने वाले उसकी जो व्याख्या करें, विजयदशमी के कुछ मांगलिक 'पाठ' हैं, जो सदियों से हमें अनुप्राणित किए हुए हैं। 'रह गया राम-रावण का अपराजेय समर'- निराला। राम की लड़ाई हर युग में, हर समय में बनी रहती है, यह निश्चित है। ऐसा हो नहीं सकता कि एक बार आपने रण जीत लिया, तो बात खत्म। रण बना रहता है, जीतने के बाद भी। प्रवृत्तियाँ अमूमन नष्ट नहीं होतीं। उन्हें हटाने का संघर्ष जारी रहता है। यह एक जिद है। बगैर जिद के भी कोई जिंदगी होती है! यह संघर्ष, यह जिद एक निश्चय है। यही 'निश्चय' कहलवाता है- 'काल तुझसे होड़ है मेरी।' काल की छाती पर सृजन करना ही कविता है, दशहरा है। समय के विरुद्ध सोचना एक बात है, धारा से समांतरित होकर अपने तरह से गतिशील होना दशहरा है।
वर्षों से कवि-लेखक रावण को खलनायक बताते रहे हैं। रावण खलनायक नहीं, प्रतिनायक है। राम की दूसरी ओर बैठा हुआ। आप उससे असहमत हैं, उसकी अनेक प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनसे आपको गुरेज है। आपको स्त्री-हरण, भाई के अपमान, अनेक शक्तियों को स्वकेंद्रित करने की बात तो याद है, लेकिन मृत्यु के समय रावण द्वारा लक्ष्मण को दिया ज्ञान भी आपके स्मरण में है? हमारी परंपरा कीचड़ से भी कमल खिला लेती है। वर्जना से भी हम सृजन कर लेते हैं। इसी परंपरा के कारण धतूरे से भी गुण ले लेते हैं।
विरोधों, विद्वानों के समुच्चय भरे इस कोलाहल में सफेद कुर्ता-पाजामा पहने सफेदपोशों द्वारा रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के पुतलों को आग लगाने मात्र से उत्सव नहीं आ सकता। बल्कि इन्हें खुद में पहचानना होगा। कोई भी समाज सिर्फ ताकत, पैसे या राज की दबंगई से बेहतर नहीं हो सकता। वह व्यक्ति के बेहतर संबंधों, लोकतांत्रिक स्वभावों, मनुष्य की पक्षधरता के कारण अच्छा होता है। आत्मीयता के तंतु ही उसकी बनावट करते हैं। भीनी- भीनी चदरिया स्नेेह के तांत से ही बुनी जानी चाहिए। यदि हमें मुग्ध होना है, तो अपनी मानवीय तकनीक, भाषायी संपन्नता, सांस्कृतिक विविधता पर मुग्ध हों। अपने देश की छह ऋतुओं पर विभोर हों, जो स्वयं ललित निबंध का विषय हैं। भारत समूची पृथ्वी को अपना मानता रहा है। यह 'वसुंधरा' है। इसके पास शक्ति की उपासना की एक आंतरिक शक्ति है, जो साधनापूर्वक अर्जित की जाती है, जहाँ नौ दिन अंत:प्रज्ञा व शुद्धि के होते हैं। यह अंतरात्मा के नर्तन से संबद्ध है। गरबा में सिर्फ देह नहीं नाचती, आत्मा भी आलाप लेती है। कहीं प्रेम के कोण उभरते हैं, कहीं कसक का विस्तार है।
दुर्गा के विविध रूप हमारी मनुष्यता के विविध रूप हैं। मातृ, शक्ति, क्षमा आदि अनेक कोणों से उसे हम देख पाते हैं। हम क्षमा को प्रणाम करते हैं, हम शक्ति को प्रणाम करते हैं। प्रणाम करने से यही ताकत हमें वापस मिलती है। हम धरती की तरह क्षमाशील होते हैं। हमारे पास केवल दशरथ के राम नहीं हैं। हमारे पास कबीर के राम भी हैं। हम अपना राम स्वयं बना सकते हैं। राममनोहर लोहिया राम को यों ही अपना पुरखा नहीं कहते थे। शंबूक प्रकरण राम को कोई मोहलत नहीं देता। सीता का वनवास राम को यों ही छोड़ नहीं देता। राम का आकलन हम ही कर सकते हैं, क्योंकि हम एक लोकतांत्रिक समाज हैं। हम आलोचना को घृणा की वस्तु नहीं मानते। समालोचना तो हमारी धमनियों में है। समालोचना का संतुलन हमें विवेक देता है। यही संतुलन हमारे भीतर कुछ रचता है। यही सम्यकता हमारे साहित्य का मेरु है। यही हमें विश्वसनीय बनाता है। उत्सवों के इस मौसम में, जबकि न गरमी है, न सर्दी, जीने का मजा ही कुछ और है। यह मौसम हमें अतिरेक से रोकता है। विचारों के अतिरेक से, दबावों के अतिरेक से, गरमी के अतिरेक से, सर्दी के अतिरेक से -इन सबसे अलग, हम स्वायत्त होकर जी सकते हैं, सोच सकते हैं। यही कल्पनाशील स्वायत्तता इन उत्सव भरे दिनों का प्राण है। हम प्रसन्नता को साझा करें, दुख को भी। यदि दोनों को साझा कर लें, तो वे उत्सव बन जाते हैं। दुख बाँटना भी उत्सव है। हम इन त्योहारों से यह समझ सकते हैं कि अपने का विस्तार करना ही मनुष्यता है। केवल पाना लालच है। देना विस्तार है। यदि लालच ही करना है, तो बड़े होने का लोभ पालें। जो परंपरा व समाज से प्राप्त हो, उसे बाँट दें। सबके भले में ही अपना भला समझना त्योहार है। आज अपने भले पर ही सबका ध्यान केंद्रित है। इससे इतर सारी मनुष्यता को सरस आकृति दीजिए।
उत्सव वृक्ष की तरह होते हैं। उनमें छाया है, शीतलता है। शाखाएँ हैं। ऊपर उठने और आकाश में देखने का माद्दा है। धरती से जुड़े रहना इनकी जड़ों से कोई सीखे। वृक्ष में फूल है, इनमें फल है, इनमें गंध है। इनसे पर्यावरण बनता है। इन पर मैना बैठती है। इन पर कोयल कूकती है। ये हमसे संवाद करते हैं। ये हमारे स्वजन हैं। ये हमारे साथी हैं, कुटुंबी हैं।
मनुष्य का मन दशहरे की तरह उत्सवधर्मी है। बच्चों के लिए बिकने वाला धनुष, गदा वगैरह भी उनके लिए अहिंसक जैसा है। बच्चों ने दशहरे में अस्त्र-शस्त्रों को भी आत्मीय बना लिया है, हिंसाहीन बना लिया है। वे हमें सीख देते हैं। सीख लेना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें हम झुकते हैं और झुकना हमें विनम्र बनाता है। विनम्रता में हमारी वास्तविक उपस्थिति होती है। हम स्वयं के अंदर छिपे उत्सव-विरोध को उसी तरह निहारें जैसे अपने अंदर छिपे उत्सव को देखते हैं। आप देखेंगे, उसमें नए-नए संवादी-विसंवादी स्वर मिलते हैं। अपना राम स्वयं सृजित करें, जैसे अपना गति-पथ स्वयं निर्धारित करते हैं। वर्णहीन, सत्ता निरपेक्ष राम। सीता के लिए गद्दी छोडऩे वाले राम। परंपराओं की व्याख्या से लेकर नई परंपराओं के सृजन तक की यात्रा करें। यह एक ऐसा समीकरण होगा, जिसमें शब्द, रूपनिर्मिति व भाषा- तीनों का समंजन होगा।

हरेली

अंधविश्वास नहीं...
- पंकज अवधिया
हरेली (हरियाली अमावस्या) का पर्व वैसे तो पूरे
देश में मनाया जाता है पर छत्तीसगढ़ में इसे विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों के सामने नीम की शाखाएँ लगा देते है। यह मान्यता है कि नीम बुरी आत्माओं से रक्षा करता है। यह पीढिय़ों पुरानी परम्परा है पर पिछले कुछ सालों से इसे अन्ध-विश्वास बताने की मुहिम छेड़ दी गयी है। इसीलिये मैने इस विषय को विश्लेषण के लिये चुना है।
नीम का नाम लेते ही हमारे मन मे आदर का भाव आ जाता है क्योंकि इसने पीढिय़ों से मानव जाति की सेवा की है और आगे भी करता रहेगा। आज नीम को पूरी दुनिया में सम्मान से देखा जाता है। इसके रोगनाशक गुणों से हम सब परिचित हैं। यह उन चुने हुये वृक्षों में से एक है जिनपर सभी चिकित्सा प्रणालियाँ विश्वास करती हैं। पहली नजर में ही यह अजीब लगता है कि नीम को घर के सामने लगाना भला कैसे अन्ध-विश्वास हो गया?
बरसात का मौसम यानि बीमारियों का मौसम। आज भी ग्रामीण इलाकों में लोग बीमारी से बचने के लिये नीम की पत्तियाँ खाते हैं और इसे जलाकर वातावरण को विषमुक्त करते है। नीम की शाखा को घर के सामने लगाना निश्चित ही आने वाली हवा को रोगमुक्त करता है पर मैंने जो हरेली में नीम के इस अनूठे प्रयोग से सीखा है वह आपको बताना चाहूँगा।
इस परम्परा ने वनस्पति वैज्ञानिक बनने से बहुत पहले ही नीम के प्रति मेरे मन मे सम्मान भर दिया था। ऐसा हर वर्ष उन असंख्य बच्चों के साथ होता है जो बड़ों के साये मे इस पर्व को मनाते हंै। पर्यावरण चेतना का जो पाठ घर और समाज से मिलता है वह स्कूलों की किताबों से नहीं मिलता। हमारे समाज से बहुत से वृक्ष जुड़े हुये हैं और यही कारण है कि वे अब भी बचे हुये हैं।
नीम के बहुत से वृक्ष हैं हमारे आस-पास हैं पर हम उनकी देखभाल नहीं करते। हरेली में जब हम उनकी शाखाएँ एकत्र करते है तो उनकी कटाई-छटाई हो जाती है और इस तरह साल-दर-साल वे बढ़कर हमें निरोग रख पाते हैं। यदि आप इस परम्परा को अन्ध-विश्वास बताकर बन्द करवा देंगे तो अन्य हानियों के अलावा नीम के वृक्षों की देखभाल भी बन्द हो जायेगी।
पिछले वर्ष मैं उड़ीसा की यात्रा कर रहा था। मेरे सामने की सीट पर जाने-माने पुरातत्व विशेषज्ञ डाँ.सी.एस.गुप्ता बैठे थे। उन्होंने बताया कि खुदाई में ऐसी विचित्र मूर्ति मिली है जिसमें आँखो के स्थान पर मछलियाँ बनी है। उनका अनुमान था कि ये मूर्ति उस काल में हुयी किसी महामारी की प्रतीक है। मैंने उन्हें बताया कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हर बीमारी को राक्षस रूपी चित्र के रूप मे दिखलाया गया है। वे प्रसन्न हुये और मुझसे उन ग्रंथों की जानकारी ली। पहले जब विज्ञान ने तरक्की नहीं की थी और हम बैक्टीरिया जैसे शब्द नहीं जानते थे तब इन्हीं चित्रों के माध्यम से बीमारियों का वर्णन होता रहा होगा। इन बीमारियों को बुरी आत्मा के रूप मे भी बताया जाता था और सही मायने में ये बीमारियाँ किसी बुरी आत्मा से कम नहीं जान पड़ती है। यदि आज हम बुरी आत्मा और बीमारी को एक जैसा मानें और कहें कि नीम बीमारियों से रक्षा करता है तो यह परम्परा अचानक ही हमें सही लगने लगेगी। मुझे लगता है कि नीम के इस प्रयोग को अन्ध-विश्वास कहना सही नहीं है।
हर वर्ष हरेली के दिन कई संस्थाओं के सदस्य गाँव-गाँव घूमते है और आम लोगों की मान्यताओं व विश्वास को अन्ध-विश्वास बताते जाते हैं। एक बार एक अभियान के दौरान एक बुजुर्ग मुझे कोने मे लेकर गये और कहा कि छत्तीसगढ़ की मान्यताओं और विश्वासों को समझने के लिये एक पूरा जीवन गाँव मे बिताना जरूरी है। मुझे उनकी बात जँची और इसने मुझे आत्मावलोकन के लिये प्रेरित किया।

Oct 2, 2015

दो लघुकथाएँ

1. वज्रपात
अनुवाद- सुकेश साहनी

तूफानी दिन था। एक औरत गिरजाघर में पादरी के सम्मुख आकर बोली, 'मैं ईसाई नहीं हूँ, क्या मेरे लिए जीवन की नारकीय यातनाओं से मुक्ति का कोई मार्ग है?’
पादरी ने उस औरत की ओर देखते हुए उत्तर दिया, 'नहीं, मुक्ति मार्ग के विषय में मैं उन्हीं को बता सकता हूँ, जिन्होंने विधिवत् ईसाई धर्म की दीक्षा ली हो।
पादरी के मुँह से यह शब्द निकले ही थे कि तेज गडगड़़ाहट के साथ बिजली वहाँ आ गिरी और पूरा क्षेत्र आग की लपटों से घिर गया।
नगरवासी दौड़े- दौड़े आए और उन्होंने उस औरत को तो बचा लिया, लेकिन तब तक पादरी अग्नि का ग्रास बन चुका था।

2.निद्राजीवी

मेरे गाँव में एक औरत और उसकी बेटी रहते थे, जिनको नींद में चलने की बीमारी थी। एक शांत रात में, जब बाग में घना कोहरा छाया हुआ था, नींद में चलते हुए माँ बेटी का आमना- सामना हो गया।
माँ उसकी ओर देखकर बोली, 'तू? मेरी दुश्मन, मेरी जवानी तुझे पालने- पोसने में ही बर्बाद हो गई। तूने बेल बनकर मेरी उमंगों के वृक्ष को ही सुखा डाला। काश! मैंने तुझे जन्मते ही मार दिया होता।
इस पर बेटी ने कहा, 'ऐ स्वार्थी बुढिय़ा! तू मेरे सुखों के रास्ते के बीच दीवार की तरह खड़ी है! मेरे जीवन को भी अपने जैसा पतझड़ी बना देना चाहती है! काश तू मर गई होती!
तभी मुर्गे ने बांग दी और वे दोनों जाग पड़ीं।
माँ ने चकित होकर बेटी से कहा,  'अरे, मेरी प्यारी बेटी, तुम!
बेटी ने भी आदर से कहा,  'हाँ, मेरी प्यारी माँ !

गोताखोर सुबह

गोताखोर सुबह

- डॉ. सरस्वती माथुर
1
मौन माटी का
दिया जलाया कर
भोर आएगी।
2
उगी सुबह
आँखों में लाली भरे
धरा उतरी।
3
मेघ की बाँह
दामिनी को जकड़
खिली धूप-सी।
4
डूबा सूर्य तो
गोताखोर सुबह
खींच ले आई।
5
झरने चले
प्रकृति के अँगना
नूपुर बोले।
6
एक पीपल
मन खण्डहर में
याद का उगा।
7
सर्द हवाएँ
शाम पुरवाई में
थिरहोजमीं।
8
चुप्पी तोड़ते
खण्डहर घर में
चूहों के बिल।
9
मौन तोड़ती
अँधेरे में चिडिय़ाँ
देख शिकारी।
10
हवा-सामन
आकाश नापकर
ख्वाब बुनता।
11
नि:शब्द नैन
मन की पीड़ा बुन
नींद चुराते।
12
कौन आएगा
ख्वाबों में बसकर
नीड बनाने?
13
नभ से भागी
चाँद संग चाँदनी
हुई प्रवासी।
14
चाँद- जुलाहा
चाँदनी बुनकर
प्रेम पिरोता।
15
पुरवा पाँव
ठुमक कर चली
बीजनाबाजे।
16
खोल के मेघ
घुँघराले केशों को
धूप दिखाए।
17
सूर्य डूबा तो
फूलों के रंग उड़
नभ पे छाए।
18
बच्चे सोते हैं
सितारों को सौंप के
आँखों के ख्वाब।
19
वायलिन-सी
देर तक बारिश
बजाती रही।
20
हवा थी चुप
चिडिय़ा का संगीत
गूँजता रहा।
 21
डूबता सूर्य
आधे रास्ते जाकर
पेड़ों में छिपा।
 22
जल लेबहा
भरा हुआ बादल
आकाश खाली।
23
पर्वत-चीर
धरा की ओर जाऊँ
नदिया हूँ मैं।
24
शाम हुई तो
चहचहाते पंछी
नीड में लौटे।

सम्पर्क:2, सिविल लाइंस,जयपुर-6, फोन-0141-2229621