मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Sep 26, 2013

आपके पत्र

आपके पत्र/ मेल बॉक्स
यथार्थ का दर्पण
उदन्ती का अगस्त अंक मिला। धन्यवाद! हमेशा की तरह सबसे पहले 'अनकहीके अन्तर्गत 'ये कैसा मध्याह्न भोजन हैपढ़कर अभिभूत हो गई। सम्पादकीय तथ्यों का खज़ाना  और  यथार्थ का दर्पण है ! ज्योत्स्ना प्रदीप के  हाइकु मार्मिक हैं। सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथाएँ हृदयस्पर्शी हैं, जिनमें 'घर की लक्ष्मीने ज़्यादा प्रभावित किया। डॉ. उर्मिला अग्रवाल द्वारा 'झरे हरसिंगारकी समीक्षा  ताँका-संग्रह का पूरा परिचय देने में सक्षम है। पत्रिका का अन्तिम लेख 'बापू ने नहीं मनाया आज़ादी का जश्नतो स्वर्णिम दस्तावेज़ है। काश! हमने बापू को 'राष्ट्रपिताका पद देने के साथ-साथ कुछ सीखा भी होता तो आज के भारत की तस्वीर कुछ और ही होती ।
 -डॉ. सुधा गुप्ता, साकेत, मेरठ

ज्यों-ज्यों निहारिए
उदंती का अगस्त अंक सचमुच सुन्दर है। कविवर मतिराम के शब्दों में-
ज्यों-ज्यों निहारिए नेरे ह्वै नैननि,
त्यों-त्यों खरी निकरै सी निकाई
विषय- सामग्री की दृष्टि से भी अंक सार्थक है। अच्छी पत्रिका हर महीने निकालना कोई हँसी-खेल नहीं।  आप यह कार्य बख़ूबी निभा रही हैं। शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।
-   डॉ. गोपाल बाबू शर्मा, आगरा (उ.प्र.)

...भ्रष्टाचार के शिकार मासूम बच्चे 
 इस अंक में प्रकाशित अनकही में आपने सही कहा। भ्रष्टाचार ने मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ा।  तमिलनाडु में जब मध्याह्न भोजन का कार्य सफलतापूर्वक चल सकता है, तो अन्य प्रदेशों में क्यू नहीं? इसी तरह पाकिस्तान के प्रति भी कड़ा प्रतिकार आवश्यक है।
इसी अंक में अनिता जी के चिंतन- 'हम आजाद हैंमें  उन्होंने सच कहा है कि हम आजाद हो कर भी गुलाम हैं। श्री राम के संस्कारों को खोते जा रहें है। राम जी ने स्वय को भूलकर परहित के लिए जीवन जिया, मगर आज मानव ही मानवता की परिभाषा भूल गया।  ज्वलंत समस्याओं पर चिंतन करवाने के लिए आपका धन्यवाद।
  -ज्योत्स्ना प्रदीप

 ...जवाब किसी के पास नहीं है
अनिता जी चिंतन में आपने बड़ा भारी-भरकम सवाल किया है और इसका ज़वाब तो आज के किसी नेता के पास भी नहीं है या कोई नेता इसका जवाब देना भी नहीं चाहेगा जो। कुछ भी आपने पूछा है वो सिर्फ एक आम नागरिक से सम्बंधित है, जो पहले भी गुलाम था और आज भी गुलाम है, लगता है आगे भी रहेगा।
जब तक हमारी किस्मत में ऐसे नेता हैं- हाँ आज़ाद हैं, आज के चोर-उचक्के, लुटेरे, डाकू, खूनी, बलात्कारी, रिश्वतखोर, कामचोर, निकम्मे... कोई रह गया है हो तो उसे भी गिन लो... बस एक आम आदमी को छोड़ कर, जो बेबसी से बस आज़ादी के ख़्वाब देख रहा है और अंत में इसी में दफ़न हो जाएगा... काश मैं यहाँ गलत साबित हो जाऊँ... शुभकामनाएँ हर आम आदमी को जो अपने खुश होने की आज़ादी चाहता है।
 -अशोक सलूजा

दिल भर आया...
पल्लवी सक्सेना ने मेरे अनुभव स्तम्भ में विम्बलडन के बहाने रोचक जानकारी प्रस्तुत की है। इसी अंक में सुदर्शन रत्नाकर की सभी लघुकथाएँ दिल को छू गयीं... मुरलीधर वैष्णव जी आपकी कविता  'प्रिय बहनाबहुत सुंदर है! काश! आप जैसा हर कोई सोचे....  ज्योत्स्ना जी... इतने भावपूर्ण, इतने मार्मिक हाइकु....सच में दिल भर आया... बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति! खोज के अन्तर्गत 'नींद में खलल और याददाश्तबहुत अच्छी जानकारी है। धन्यवाद
 - अनिता

संग्रहणीय अंक
 हृदयनाथ मंगेशकर के शब्दों में मुकेश दा के अंतिम दिनों की यादों को प्रस्तुत करके उदंती ने इस महान गायक को स्मरण किया है। मुकेश दा को मेरा नमन। छत्तीसगढ़ की अनूठी परम्परा 'मितान बधईके बारे में क्या कहूँ लेखक डॉ. कौशलेन्द्र इसके लिए बधाई के पात्र हैं, आज की पीढ़ी को इसके बारे में बताया जाना चाहिए फ्रेंडशिप डे की परम्परा हमारे छत्तीसगढ़ में न जाने कब से चली आ रही है।  यात्रा संस्मरण में 'कच्छ के रनकी जानकारी अच्छी लगी। इसमें कच्छ के इतिहास और संस्कृति के बारे में कुछ और बातें जानने को मिलती तो अच्छा लगता।
  - रश्मि वर्मा, भिलाई

सकारात्मक विचार
 सुदर्शन जी आपकी सभी लघुकथाएँ बहुत अच्छी लगीं। इनमें से घर की लक्ष्मी तो बहुत ही सुन्दर है। इसकी सकारात्मक विचारधारा ने सास-बहू के रिश्ते को बहुत मधुर बना दिया है। 
 - मंजू


Aug 14, 2013

उदंती.com ,अगस्त 2013

 वर्ष 6, अंक- 1

आप अपने विचारों की चोरी की फिक्र न करें। अगर आपका आइडिया वास्तव में काम का है तो विश्वास रखें – उसे लोगों के गले से नीचे उतारने में आपको वास्तव में बहुत मशक्कत करनी होगी।

                         - हॉवर्ड आईकेन


  अनकही: ये कैसा मध्याह्न भोजन है... - डॉ. रत्ना वर्मा
  चिंतन: हम अपनी मानसिकता के गुलाम है? - अनिता ललित
  स्वामी विवेकानंद: दुखियों का दर्द समझो
  दो ग़ज़लें: ऐसा हिन्दुस्तान मिले, गढ़ें नई तक़दीर - गिरीश पंकज
 संस्कृति: मितान बधई- छत्तीसगढ़ की...- डॉ. कौशलेन्द्र
 खोज: नींद में खलल और याददाश्त
 यादें: २८ अगस्त पूण्यतिथि: ओ जाने वाले हो सके तो...
 यात्रा संस्मरण: कच्छ के रन में, मांडवी बीच पर - प्रिया आनंद
 मेरे अनुभव: मैदान में खेल देखने का आनन्द - पल्लवी सक्सेना
 प्रेरकः योग्य शत्रु का सम्मान
 अनुसंधान: स्वाधीनता के साढ़े छह दशक और हमारा विज्ञान - चक्रेश जैन
 कालजयी कहानियाँ: काठ का सपना - गजानन माधव मुक्तिबोध
 हाइकु: बदलते सपने चूडिय़ों जैसे - ज्योत्स्ना प्रदीप              
 व्यंग्य: हम आजाद हैं? - डॉ. गोपाल बाबू शर्मा
 कविता: प्रिय बहना - मुरलीधर वैष्णव
 चार लघुकथाएँ: अनुत्तरित, मैल, घर की लक्ष्मी, उड़ान - सुदर्शन रत्नाकर
 पुस्तक: मन की वादियों में झरे हरसिंगार - डॉ. उर्मिला अग्रवाल
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स्वतंत्रता दिवस: बापू ने नहीं मनाया आजादी का जश्न

ये कैसा मध्याह्न भोजन है...

ये कैसा मध्याह्न भोजन है...
 - रत्ना वर्मा
 बेहतर जीवन जीने के लिए शिक्षा का मनुष्य के जीवन में कितना महत्त्व है , इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता।  शिक्षा के मूलभूत अधिकार को ध्यान में रखते हुए  केन्द्र सरकार ने 15 अगस्त 1995 को सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना का शुभारंभ किया था। आरंभ में बच्चों को हर दिन 100 ग्राम अनाज मुफ्त दिया जाता था। फिर 2004 में इस योजना में बदलाव करते हुए कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को  स्कूल में ही खाना पकाकर खिलाना शुरू किया गया तथा अक्टूबर 2007 में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को मध्याह्न भोजन दिया जाने लगा। इस योजना का आरंभ ही इस उद्देश्य से किया गया था कि खाने के बहाने बच्चे स्कूल तो आएँगे ही और साथ में पढ़ेंगे भी।
उपर्युक्त योजना का फायदा कितना हुआ कितना नहीं हुआ इस समय हम इस मुद्दे पर न जाकर मध्याह्न भोजन योजना में बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता पर बात करेंगे, जिसमें की गई लापरवाही की वजह से पिछले माह बिहार के एक स्कूल के 23 बच्चों की मौत हो गई। बच्चों की मौत के बाद से केन्द्र सरकार की इस योजना पर कई गम्भीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। हमेशा की तरह सरकार ने जाँच का आदेश जारी कर, मृतकों के परिवारों को नाममात्र का मुआवज़ा देकर या कुछ कर्मचारियों को बर्खास्त कर अपनी जिम्मेदारी तो पूरी कर ली, पर सवाल अभी भी वहीं का वहीं है। अफ़सोस तो इस बात पर है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ सामने आ रहे चुनाव को देखते हुए ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने से नहीं चूक रही हैं।
छपरा के 23 बच्चों की मौत ने देशभर में चल रहे मध्याह्न भोजन की इस योजना की सारी पोल खोल कर रख दी है। स्कूलों को निम्न स्तर का अनाज सप्लाई किए जाने की शिकायतें तो जब-तब आती ही रही हैं। बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की पौष्टिकता पर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं ; लेकिन किसी ने भी इसे मुद्दा बनाकर इसके विरूद्ध आवाज उठाने की ज़हमत नहीं उठाई ,न किसी  राजनीतिक पार्टी  ने और न किसी अन्य संगठन ने। दरअसल मध्याह्न भोजन योजना का लाभ लेने वाले वे बच्चे हैं ; जिनके घरों में दो जून की रोटी ब-मुश्किल जुट पाती है। माता-पिता इसीसे खुश रहते हैं उनका बच्चा एक समय का खाना स्कूल में खाकर उनके घर की आर्थिक हालत में सहायता ही कर रहा है, साथ ही थोड़ी बहुत पढ़ाई भी कर लेता है। ऐसे अभिभावक भोजन की गुणवत्ता को लेकर आवाज भला उठाएँ भी तो कैसे? लेकिन बच्चों को कीटनाशक युक्त भोजन खिलाए जाने के बाद अब गरीब माता-पिता भी अपने कलेजे के टुकड़े को स्कूल का खाना खिलाने के नाम पर डरने लगे हैं।
केन्द्र सरकार की इस योजना के बारे में वेबसाइट में जो जानकारी दी गई है ,उसके अनुसार एक बच्चे को 50 ग्राम सब्जी, 20 ग्राम दाल और 100 ग्राम चावल दिया जाता है। लेकिन यह हम सब जानते हैं कि कैसी दाल और कैसी सब्जी उन्हें परोसी जाती है। अधिकतर स्कूलों में खाना खुले प्रांगण में पकाया जाता है और बच्चे स्कूल प्रांगण में ही इधर उधर बैठ कर खाना खाते हैं।  अनाज में कीड़े- मकोड़े निकलने और सड़ा-गला अनाज खिलाए जाने की खबरें सुनने को मिलती हैं। अनाज साफ है या नहीं, तेल कौन- सा दिया जा रहा है, सब्जी को धोकर बनाया जाता है या नहीं आदि बातों की निगरानी करने वाला कोई नहीं होता। स्कूलों की स्थिति पर लगातार किए जा रहे अध्ययनों से जो बातें उभर कर आई हैं, उसके अनुसार हमारे देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर, पीने का पानी और शौचालय जैसी मूलभूत जरुरत की व्यवस्था तक नहीं है ; वहाँ भला बच्चों को मुफ्त दिए जाना वाला भोजन कैसे व्यवस्थित और गुणवत्ता के आधार पर दिया जा सकता है, यह सोचने वाली बात है।
 भ्रष्टाचार ने हर जगह अपनी जड़ें जमा ली हैं तो भला मध्याह्न भोजन योजना इससे कैसे अछूता रहती, यहाँ भी करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं।  सरकार ने इस योजना की निगरानी की जिम्मेदारी पंचायतों को अवश्य सौंप दी है ; पर देखा यही गया है कि राशन वितरण  का ठेका भी उन्हीं लोगों के हाथों में हैं , जिनकी पहुँच राजनीतिक स्तर पर है। ऐसे माहौल में इस योजना के उद्देश्य कि  स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ेगी, कुपोषण के शिकार बच्चों को गुणवत्ता युक्त भोजन मिलेगा, एक साथ बैठकर भोजन करने से भाईचारा बढ़ेगा और जात- पाँत की भावना दूर होगी... आदि आदि न जाने कहाँ विलुप्त हो गये हैं।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2007 में मध्याह्न भोजन के लिए बजट में 7324 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था लेकिन 2013-14 में इसे बढ़ाकर 13215 करोड़ रुपए कर दिया गया है। करोड़ों की ऐसी योजना में कहाँ चूक हो रही है कि हम बच्चों को जहरीला खाना परोस रहे हैं? दरअसल जिस योजना को पूरा करने की जिम्मेदारी बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त शिक्षकों के मत्थे ही मढ़ दी जाए वहाँ शिक्षक बच्चों को खाना खिलाएँ या फिर पढ़ाएँ। इस मामले में तमिलनाडु में सफलतापूर्वक चल रहे मध्याह्न भोजन योजना का उदाहरण सामने रखा जाता है कि जब वहाँ के स्कूलों में बगैर किसी गड़बड़ी के निगरानी समीति बनाकर बच्चों को पौष्टिक भोजन खिलाया जा सकता है तो अन्य प्रदेशों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? जाहिर है कि व्यवस्था में ही खामियाँ है और सबसे बड़ी बात ,शासन -तंत्र के पास दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव है।
कोई भी सरकारी योजना देश की बेहतरी के लिए बनती है लेकिन सिर्फ योजना बना देना ही सरकार का काम नहीं है, उसे सही तरीके से लागू करना भी उनकी जिम्मेदारी बनती है। सरकार को, देश में चलने वाली कुछ कल्याणकारी योजनाओं को राजनीतिक फायदे से ऊपर उठ कर देखना होगा। मासूमों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करके वे सत्ता पर आसीन नहीं हो सकते। यदि बच्चों के खाने में लापरवाही हुई है तो इसके लिए पूरे शासन तंत्र को जिम्मेदार माना जाना चाहिए।
छपरा जैसी दुर्घटना फिर न हो इसके लिए दोषियों को सजा हो यह बहुत जरूरी है ,पर साथ ही यह भी जरूरी है कि इस योजना के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को अलग से सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। एक ऐसी निगरानी समीति बने जिसमें महिला स्वसहायता समूहों तथा स्वयंसेवी संगठनों के साथ-साथ अभिभावकों को भी शामिल किया जा सकता है, जो बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता एवं साफ- सफाई पर नजर रखें। यदि सरकार चाहती है कि आर्थिक कमजोरी की वजह से बच्चे स्कूल न छोड़ें और स्कूलों में उनकी उपस्थिति बढ़ती रहे तो उन्हें अब यह विश्वास दिलाना होगा कि बच्चों के भोजन के साथ अब किसी तरह की लापरवाही नहीं की जाएगी और लापरवाही करने वाले पर कड़ी कार्यवाही भी होगी।  
(एक तरफ हम अगस्त माह में 15 तारीख को भारत की आजादी का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे हैं पर यह गहरे दुख की बात है कि पुंछ क्षेत्र में भारत के सीमारक्षक वीर, पाकिस्तानी सेना के गोलियों का शिकार हो जाते हैं। जब कठोर कार्यवाही की जाएगी ,तभी पाकिस्तान इस तरह की हिमाक़त  करने से बाज़ आएगा । बयानबाजी से हम पाकिस्तान को नहीं समझा सकते। इसका सिर्फ़ एक ही उपाय है -कड़ा प्रतिकार । दूसरी बात-सुरक्षा जैसे इस नाज़ुक मुद्दे पर राजनैतिक छींटाकशी और वैचारिक विषमता चिन्ता का विषय है। हद तो तब हो जाती है, जब किसी राज्य का मन्त्री भी इन मुद्दों पर बचकाना बयान देने पर उतर आए। ऐसे अवसर पर वाणी-संयम बहुत ज़रूरी है । सीमा पर  शहीद होने वाले  उन वीर जवानों  को  हमारी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। )

चिंतन

 क्या हम  सचमुच आज़ाद है?
- अनिता ललित
देश आज़ाद, शहर आज़ाद, गाँव आज़ाद, गली आज़ाद, घर-परिवार आज़ाद! मगर फिर भी हम गुलाम हैं... अपनी सोच, अपनी इच्छाओं, अपने व्यवहार, अपनी मानसिकता... सबके गुलाम हैं!
 कहने को तो हम धर्म-निरपेक्ष देश में रहते हैं... मगर धर्म की आड़ में क्या कुछ अधर्म नहीं होता...! उदाहरण के लिए अयोध्या नगरी  के विवाद को ही देख लें! राम-जन्मभूमि से श्री रामचन्द्र जी के संस्कार तो खो गये... सिर्फ़ भूमि ही रह ग! कौन -सा धर्म सिखाता है कि इंसानियत को ताक पर रखकर, धर्म के नाम पर अपने ही भाई-बहनों, मासूम बच्चों की बलि चढ़ा दें! कोई य क्यों नहीं सोचता कि उस स्थान का विकास हो, वहाँ के रहने वालों का विकास हो, अच्छे अस्पताल बनें, विद्यालय खुलें.. जिससे आम जनता को कुछ लाभ हो... और इस प्रकार हम उन्नति की ओर अग्रसर हों...! मगर नहीं! सब अपने स्वार्थ में जकड़े हुए हैं...! ऐसे मुद्दों  पर ध्यान जाता है... तो सिर्फ़ वोटों की खातिर! जनता की भावनात्मक दुर्बलता की आड़ में सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा किया जाता है!
देश को एक इकाई की तरह देखने की जगह...उसके टुकड़े कर दिए हैं! ठीक है! देख-भाल सही ढंग से हो ;इसलिए तो ये समझ आता है...कि हर कोई अपने हिस्से को साफ़-सुथरा बनाए , अपराध-रहित, उन्नति की राह पर ले चले! मगर जब किसी एक हिस्से पर कोई भारी विपदा आती है... तब तो हर एक का यही कर्त्तव्य होना चाहिए... कि एकजुट होकर हर संभव प्रयास करके  उस हिस्से को, उस विपदा से उबारने में सहायता करें! मगर ऐसा नहीं होता! ये मेरा! वो उसका! कोई हस्तक्षेप चाहता नहीं... या कोई खुद को उससे अलग कर अपने हिस्से में ही खुश है...! यही नहीं! उस विपदा से उसको क्या लाभ मिल सकता है.. उसकी तिकड़म भी लगाने में चूकता नहीं! अपने ही घर में सेंध लगाना... ये कैसी  ओछी सोच है? क्या इसीलिए हमारे देश के वीरों ने देश की स्वतंत्रता में अपनी प्राण न्योछावर किए थे और आज भी देश की सीमा पर कर रहे हैं
देशवासी ही एकजुट होकर नहीं रह पा रहे हैं। एक दूसरे पर गम्भीर आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं और देश के कानून तक की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। क्षेत्रवाद और जातिवाद की विषबेल को सींच रहे हैं तो ऐसे में आतंकवाद का फैलना कितना आसान हो जाता है! और तब.... किसी दूसरे देश पर आरोप मढ़ने से पहले कभी कोई अपने दामन में झाँककर देखता है। कि ऐसा क्यों हुआ? अपनी अमूल्य विरासत जब खुद नहीं सँभाल पाएँगे , तो बाहर वाले तो फूट का अनुचित लाभ उठाएँगे ही! और इसके दु:खद ,म्भीर परिणाम झेलती है मासूम जनता! जो हर समय एक अनजान, दिल दहला देने वाले आतंक के डर के साए में साँस ले रही है! ये कैसी आज़ादी का सुकून है?
 बोलने की आज़ादी मिली तो जिसको देखो, वही भाषण देता है, बहाना कोई भी हो, मगर असली  कारण सिर्फ़ दूसरों की बुराई की आड़ में अपनी अच्छाई का ढोल पीटना होता है! या फिर वो बोला जाता है ; जो बिकता है! उससे क्या नुकसान हो रहा है, कोई नहीं देखता! कोई भी दुर्घटना हो , लोग उसकी तह तक जाने की जगह... उसकी आकर्षक व स्वादिष्ट दिखने वाली मलाई का स्वाद लेते हैं। उसकी नीचे की जली हुई परत पर कोई मल्हम लगाने की नहीं सोचता, उसकी वजह को जड़ से मिटाने की बजाय उसके चटखारे लेते हैं, उस पर अपने हाथ सेंकते हैं! ऐसे लोग लालच में इस क़दर डूबे होते हैं । कि उन्हें अपने ज़मीर की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती!
 सरकार चुनने की आज़ादी मिली....तो कहीं उसके हिसाब से अक्ल नहीं मिली... या फिर इस पदवी के लायक कोई नेता नहीं मिला! समझ ही नहीं आता...किसको उस बहुमूल्य गद्दी पर बिठाएँ! आजकल जनता देखती है...कौन कम खराब है...जिसे वोट दिया जाए! अच्छे लोग राजनीति में जाना नहीं जाते, वे दायित्व निभाना नहीं चाहते फिर गुंडा-राज नहीं होगा , तो क्या होगा? बुराई नेता की पदवी में नहीं , हमारे अंदर है ; क्योंकि जो नेता बना , हमारी मर्ज़ी  से बना और हममें ही से कोई बना!
 इसी मजबूरी की आड़ में जनता भी लापरवाह हो अपना कर्त्तव्य भूल जाती है! कितने लोग तो मतदान के लिए जाते ही नहीं और कुछ बिक जाते हैं और ग़लत लोगों का चुनाव कर बैठते हैं, जो थोड़े-बहुत समझदार बच जाते हैं उनके मत बेकार चले जाते हैं! नतीजा घूम-फिर कर जनता को ही भुगतना पड़ता है! ये कौन सी आज़ादी है? जहाँ धनबल और बाहुबल पर सही ग़लत सारे कार्य हो जाते हैं ; मगर जो निर्बल है, निर्धन है। उसकी आवाज़ बंद कर दी जाती है। चाहे डरा-धमकाकर या फिर लोभ देकर! और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज किसी अत्याचारी या मुजरिम को सज़ा नहीं मिल पाती ; क्योंकि क़ानून  गवाह माँगता है। और गवाही देने वाले न्यायालय तक पहुँचते-पहुँचते अपने बयान बदल देते हैं! इससे अधिक दु:खद बात और क्या हो सकती है! इसी  कारण देश में अपराधों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है! ये कैसी उन्नति है? कैसी प्रगति है? कैसी आज़ादी  है?
 जिधर देखिए, उधर शोषण हो रहा है! आजकल का सबसे ज्वलंत शोषण मुद्दा है... नारी-शोषण, बाल-शोषण! भ्रूण हत्या भी उसी का एक हिस्सा मान लीजिए ; क्योंकि उसमें भी एक भावी नारी का ही शोषण होता है! कौन है इसका जि़म्मेदार? आए दिन खबरें पढ़ने-सुनने में आतीं हैं। फलाँ नारी के साथ दुर्व्यहार हुआ! दुर्व्यहार भी अब अपनी सीमा लाँघ चुका है! कभी-कभी किसी बड़े शहर की सड़क पर, कभी शहर के जेल में, कभी गाँव की पंचायत में, तो कभी खुद अपने ही घर में किसी अपने के ही हाथों सोचकर ही मन में वितृष्णा होने लगती है! कोई मशहूर, धनवान्  हुआ... तो स्केंडल बनकर टी वी और समाचार पत्रों में हफ्तों तक सुर्खियाँ बनकर सज़तीं हैं। और अगर कोई ग़रीब हुआ- तो कहीं घुट-मर कर जि़ंदा लाश बनकर गुमनामी के अंधेरों में गुम हो जाता है!
अक्सर भीड़ भरी सड़क पर, कोई पीछे से हमें पकड़ लेता है। मुड़कर देखो, तो भीख माँगते नन्हें बच्चे-बच्चियाँ होते हैं..! कभी सोचा है- उन लावारिस जैसे बच्चों का शोषण किस हद को पार कर जाता होगा! जो इंसानी भेड़िए अपने घर, मोहल्लों, शहरों में किसी को भी अपना निशाना बनाने में नहीं चूकते वो इन फटे-चीथड़ों में लिपटे मासूम, बेसहारा बच्चों का क्या हश्र करते होंगे- सोचकर ही दिल काँप उठता है! मगर हम नज़र चुराकर आगे बढ़ जाते हैं- हम उनसे नहीं... खुद से नज़रें नहीं मिला पाते! हम सब घर बैठकर किसी के चरित्र पर उँगली उठाते रहते हैं। मगर जो चार उँगलियाँ जो हमारी ओर इशारा करतीं हैं...उन्हें अनदेखा कर जाते हैं! क्यों? क्योंकि हम अपनी मानसिकता के गुलाम हैं!
घर-परिवार में देखें कहीं बहू अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रही है, तो कहीं सास अपने आधिपत्य के लिए! या फिर कहीं सास-बहू को अपने इशारों पर नचाना चाहती है, तो कहीं बहू-सास को! इसी चक्कर में कहीं बहू घुटकर जीती है। तो कहीं सास-ससुर! इन दोनों के बीच में बेटा बेपेन्दी के लोटे- जैसा घनचक्कर बना फिरता है!
   बड़े  आख़िर बड़े हैं, जितना उनको सम्मान मिलना चाहिए, उतना ही उनको अपना बड़प्पन बनाए रखना चाहिए! छोटे-छोटे ही हैं। उनको अपनी स्वतंत्रता का उपयोग एक सीमा में रहकर ही करना चाहिए! एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए। हर कोई सम्मान का अधिकारी है। मगर सम्मान छीना नहीं जाता, दिल से कमाया जाता है!
 यही कम नहीं है! कहीं-कहीं पति पत्नी को बाँधकर रखना चाहता है। तो कहीं पत्नी पति को अपने इशारों पर नचाना चाहती है! हर किसी को अपने हिस्से की जि़ंदगी जीने का हक़ है। तो फिर इतनी खींचतान क्यों?
इसका जि़म्मेदार कौन? खुद हम!  क्योंकि हम अपनी ओछी सोच और व्यवहार के ग़ुलाम हैं!
इतना सब सोचने के बाद...अक्सर यही प्रश्न दिमाग़ में उठता है। कि 'क्या हम सचमुच आज़ाद हैं...?’  जब अपने ही घर में हम आज़ादी की साँस नहीं ले पाते... तो देश की आज़ादी क्या सँभालेंगे?

संपर्क: 1/16 विवेक खंड,गोमतीनगर, लखनऊ 226010


स्वामी विवेकानंद

दुखियों का दर्द समझो
एक अज्ञान संन्यासी के रूप में हिमालय से कन्याकुमारी की यात्रा करते हुए स्वामी विवेकानंद ने जनता की दुख-दुर्दशा का अपनी आँखों से अवलोकन किया था। अमेरिका की सुविधाओं तथा विलासिताओं के बीच सफलता की सीढ़ियों पर उत्तरोत्तर चढ़ते हुए भी, भारतीय जनता के प्रति अपने कर्त्तव्य का उन्हें सतत स्मरण था। बल्कि इस नये महाद्वीप की सम्पन्नता ने, अपने लोगों के बारे में उनकी संवेदना को और भी उभारकर रख दिया।
वहाँ उन्होंने देखा कि समाज से निर्धनता, अंधविश्वास, गंदगी, रोग तथा मानव कल्याण के अन्य अवरोधों को दूर करने के लिए मानवीय प्रयास, बुद्धि तथा निष्ठा की सहायता से सब कुछ सम्भव बनाया जा सकता है। 20 अगस्त 1893 ई. को उन्होंने अपने भारतीय मित्रों के हृदय में साहस बँधाते हुए लिखा-
कमर कस लो, वत्स! प्रभु ने मुझे इसी काम के लिए बुलाया है। आशा तुम लोगों से है- जो विनीत, निरभिमानी और विश्वास परायण हैं। दुखियों का दर्द समझो और ईश्वर से सहायता की प्रार्थना करो-  वह अवश्य मिलेगी। मैं बारह वर्ष तक हृदय पर यह बोझ लादे और मन में यह विचार लिए बहुत से तथाकथित धनिकों और अमीरों के दर-दर घूमा। हृदय का रक्त बहाते हुए मैं आधी पृथ्वी का चक्कर लगाकर इस अजनबी देश में सहायता माँगने आया।
परन्तु भगवान अनंत शक्तिमान हैं। मैं जानता हूँ, वह मेरी सहायता करेगा। मैं इस देश में भूख या जाड़े से भले ही मर जाऊँ, परन्तु युवको! मैं गरीबों, मूर्खों और उत्पीडि़तों के लिए इस सहानुभूति और प्राणपण प्रयत्न को तुम्हें थाती के तौर पर सौंपता हूँ। जाओ, इसी क्षण जाओ उस पार्थसारथी (श्रीकृष्ण) के मंदिर में और उनके सम्मुख एक महाबलि दो, अपने समस्त जीवन की बलि दो- उन दीनहीनों और उत्पीडि़तों के लिए ; जिनके लिए भगवान युग- युग में अवतार लिया करते हैं और जिन्हें वे सबसे अधिक प्यार करते हैं। और तब प्रतिज्ञा करो कि अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ लोगों के उद्धार कार्य में लगा दोगे, जो दिनोंदिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं।

प्रभु की जय हो, हम अवश्य सफल होंगे। इस संग्राम में सैकड़ों खेत रहेंगे, पर सैकड़ों पुन: उनकी जगह खड़े हो जाएँगे। विश्वास, सहानुभूति, दृढ़ विश्वास और ज्वलंत सहानुभूति चाहिए! जीवन तुच्छ है, मरण भी तुच्छ है, भूख तुच्छ है और शीत भी तुच्छ है। जय हो प्रभु की! आगे कूच करो- प्रभु ही हमारे सेना नायक हैं। पीछे मत देखो कि कौन गिरा- आगे बढ़ो, बढ़ते चलो।