August 14, 2013

चिंतन

 क्या हम  सचमुच आज़ाद है?
- अनिता ललित
देश आज़ाद, शहर आज़ाद, गाँव आज़ाद, गली आज़ाद, घर-परिवार आज़ाद! मगर फिर भी हम गुलाम हैं... अपनी सोच, अपनी इच्छाओं, अपने व्यवहार, अपनी मानसिकता... सबके गुलाम हैं!
 कहने को तो हम धर्म-निरपेक्ष देश में रहते हैं... मगर धर्म की आड़ में क्या कुछ अधर्म नहीं होता...! उदाहरण के लिए अयोध्या नगरी  के विवाद को ही देख लें! राम-जन्मभूमि से श्री रामचन्द्र जी के संस्कार तो खो गये... सिर्फ़ भूमि ही रह ग! कौन -सा धर्म सिखाता है कि इंसानियत को ताक पर रखकर, धर्म के नाम पर अपने ही भाई-बहनों, मासूम बच्चों की बलि चढ़ा दें! कोई य क्यों नहीं सोचता कि उस स्थान का विकास हो, वहाँ के रहने वालों का विकास हो, अच्छे अस्पताल बनें, विद्यालय खुलें.. जिससे आम जनता को कुछ लाभ हो... और इस प्रकार हम उन्नति की ओर अग्रसर हों...! मगर नहीं! सब अपने स्वार्थ में जकड़े हुए हैं...! ऐसे मुद्दों  पर ध्यान जाता है... तो सिर्फ़ वोटों की खातिर! जनता की भावनात्मक दुर्बलता की आड़ में सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा किया जाता है!
देश को एक इकाई की तरह देखने की जगह...उसके टुकड़े कर दिए हैं! ठीक है! देख-भाल सही ढंग से हो ;इसलिए तो ये समझ आता है...कि हर कोई अपने हिस्से को साफ़-सुथरा बनाए , अपराध-रहित, उन्नति की राह पर ले चले! मगर जब किसी एक हिस्से पर कोई भारी विपदा आती है... तब तो हर एक का यही कर्त्तव्य होना चाहिए... कि एकजुट होकर हर संभव प्रयास करके  उस हिस्से को, उस विपदा से उबारने में सहायता करें! मगर ऐसा नहीं होता! ये मेरा! वो उसका! कोई हस्तक्षेप चाहता नहीं... या कोई खुद को उससे अलग कर अपने हिस्से में ही खुश है...! यही नहीं! उस विपदा से उसको क्या लाभ मिल सकता है.. उसकी तिकड़म भी लगाने में चूकता नहीं! अपने ही घर में सेंध लगाना... ये कैसी  ओछी सोच है? क्या इसीलिए हमारे देश के वीरों ने देश की स्वतंत्रता में अपनी प्राण न्योछावर किए थे और आज भी देश की सीमा पर कर रहे हैं
देशवासी ही एकजुट होकर नहीं रह पा रहे हैं। एक दूसरे पर गम्भीर आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं और देश के कानून तक की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। क्षेत्रवाद और जातिवाद की विषबेल को सींच रहे हैं तो ऐसे में आतंकवाद का फैलना कितना आसान हो जाता है! और तब.... किसी दूसरे देश पर आरोप मढ़ने से पहले कभी कोई अपने दामन में झाँककर देखता है। कि ऐसा क्यों हुआ? अपनी अमूल्य विरासत जब खुद नहीं सँभाल पाएँगे , तो बाहर वाले तो फूट का अनुचित लाभ उठाएँगे ही! और इसके दु:खद ,म्भीर परिणाम झेलती है मासूम जनता! जो हर समय एक अनजान, दिल दहला देने वाले आतंक के डर के साए में साँस ले रही है! ये कैसी आज़ादी का सुकून है?
 बोलने की आज़ादी मिली तो जिसको देखो, वही भाषण देता है, बहाना कोई भी हो, मगर असली  कारण सिर्फ़ दूसरों की बुराई की आड़ में अपनी अच्छाई का ढोल पीटना होता है! या फिर वो बोला जाता है ; जो बिकता है! उससे क्या नुकसान हो रहा है, कोई नहीं देखता! कोई भी दुर्घटना हो , लोग उसकी तह तक जाने की जगह... उसकी आकर्षक व स्वादिष्ट दिखने वाली मलाई का स्वाद लेते हैं। उसकी नीचे की जली हुई परत पर कोई मल्हम लगाने की नहीं सोचता, उसकी वजह को जड़ से मिटाने की बजाय उसके चटखारे लेते हैं, उस पर अपने हाथ सेंकते हैं! ऐसे लोग लालच में इस क़दर डूबे होते हैं । कि उन्हें अपने ज़मीर की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती!
 सरकार चुनने की आज़ादी मिली....तो कहीं उसके हिसाब से अक्ल नहीं मिली... या फिर इस पदवी के लायक कोई नेता नहीं मिला! समझ ही नहीं आता...किसको उस बहुमूल्य गद्दी पर बिठाएँ! आजकल जनता देखती है...कौन कम खराब है...जिसे वोट दिया जाए! अच्छे लोग राजनीति में जाना नहीं जाते, वे दायित्व निभाना नहीं चाहते फिर गुंडा-राज नहीं होगा , तो क्या होगा? बुराई नेता की पदवी में नहीं , हमारे अंदर है ; क्योंकि जो नेता बना , हमारी मर्ज़ी  से बना और हममें ही से कोई बना!
 इसी मजबूरी की आड़ में जनता भी लापरवाह हो अपना कर्त्तव्य भूल जाती है! कितने लोग तो मतदान के लिए जाते ही नहीं और कुछ बिक जाते हैं और ग़लत लोगों का चुनाव कर बैठते हैं, जो थोड़े-बहुत समझदार बच जाते हैं उनके मत बेकार चले जाते हैं! नतीजा घूम-फिर कर जनता को ही भुगतना पड़ता है! ये कौन सी आज़ादी है? जहाँ धनबल और बाहुबल पर सही ग़लत सारे कार्य हो जाते हैं ; मगर जो निर्बल है, निर्धन है। उसकी आवाज़ बंद कर दी जाती है। चाहे डरा-धमकाकर या फिर लोभ देकर! और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज किसी अत्याचारी या मुजरिम को सज़ा नहीं मिल पाती ; क्योंकि क़ानून  गवाह माँगता है। और गवाही देने वाले न्यायालय तक पहुँचते-पहुँचते अपने बयान बदल देते हैं! इससे अधिक दु:खद बात और क्या हो सकती है! इसी  कारण देश में अपराधों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है! ये कैसी उन्नति है? कैसी प्रगति है? कैसी आज़ादी  है?
 जिधर देखिए, उधर शोषण हो रहा है! आजकल का सबसे ज्वलंत शोषण मुद्दा है... नारी-शोषण, बाल-शोषण! भ्रूण हत्या भी उसी का एक हिस्सा मान लीजिए ; क्योंकि उसमें भी एक भावी नारी का ही शोषण होता है! कौन है इसका जि़म्मेदार? आए दिन खबरें पढ़ने-सुनने में आतीं हैं। फलाँ नारी के साथ दुर्व्यहार हुआ! दुर्व्यहार भी अब अपनी सीमा लाँघ चुका है! कभी-कभी किसी बड़े शहर की सड़क पर, कभी शहर के जेल में, कभी गाँव की पंचायत में, तो कभी खुद अपने ही घर में किसी अपने के ही हाथों सोचकर ही मन में वितृष्णा होने लगती है! कोई मशहूर, धनवान्  हुआ... तो स्केंडल बनकर टी वी और समाचार पत्रों में हफ्तों तक सुर्खियाँ बनकर सज़तीं हैं। और अगर कोई ग़रीब हुआ- तो कहीं घुट-मर कर जि़ंदा लाश बनकर गुमनामी के अंधेरों में गुम हो जाता है!
अक्सर भीड़ भरी सड़क पर, कोई पीछे से हमें पकड़ लेता है। मुड़कर देखो, तो भीख माँगते नन्हें बच्चे-बच्चियाँ होते हैं..! कभी सोचा है- उन लावारिस जैसे बच्चों का शोषण किस हद को पार कर जाता होगा! जो इंसानी भेड़िए अपने घर, मोहल्लों, शहरों में किसी को भी अपना निशाना बनाने में नहीं चूकते वो इन फटे-चीथड़ों में लिपटे मासूम, बेसहारा बच्चों का क्या हश्र करते होंगे- सोचकर ही दिल काँप उठता है! मगर हम नज़र चुराकर आगे बढ़ जाते हैं- हम उनसे नहीं... खुद से नज़रें नहीं मिला पाते! हम सब घर बैठकर किसी के चरित्र पर उँगली उठाते रहते हैं। मगर जो चार उँगलियाँ जो हमारी ओर इशारा करतीं हैं...उन्हें अनदेखा कर जाते हैं! क्यों? क्योंकि हम अपनी मानसिकता के गुलाम हैं!
घर-परिवार में देखें कहीं बहू अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रही है, तो कहीं सास अपने आधिपत्य के लिए! या फिर कहीं सास-बहू को अपने इशारों पर नचाना चाहती है, तो कहीं बहू-सास को! इसी चक्कर में कहीं बहू घुटकर जीती है। तो कहीं सास-ससुर! इन दोनों के बीच में बेटा बेपेन्दी के लोटे- जैसा घनचक्कर बना फिरता है!
   बड़े  आख़िर बड़े हैं, जितना उनको सम्मान मिलना चाहिए, उतना ही उनको अपना बड़प्पन बनाए रखना चाहिए! छोटे-छोटे ही हैं। उनको अपनी स्वतंत्रता का उपयोग एक सीमा में रहकर ही करना चाहिए! एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए। हर कोई सम्मान का अधिकारी है। मगर सम्मान छीना नहीं जाता, दिल से कमाया जाता है!
 यही कम नहीं है! कहीं-कहीं पति पत्नी को बाँधकर रखना चाहता है। तो कहीं पत्नी पति को अपने इशारों पर नचाना चाहती है! हर किसी को अपने हिस्से की जि़ंदगी जीने का हक़ है। तो फिर इतनी खींचतान क्यों?
इसका जि़म्मेदार कौन? खुद हम!  क्योंकि हम अपनी ओछी सोच और व्यवहार के ग़ुलाम हैं!
इतना सब सोचने के बाद...अक्सर यही प्रश्न दिमाग़ में उठता है। कि 'क्या हम सचमुच आज़ाद हैं...?’  जब अपने ही घर में हम आज़ादी की साँस नहीं ले पाते... तो देश की आज़ादी क्या सँभालेंगे?

संपर्क: 1/16 विवेक खंड,गोमतीनगर, लखनऊ 226010


3 Comments:

Ashok Saluja said...

अनीता जी ,बड़ा भरी-भरकम सवाल किया है आपने और इसका ज़वाब तो आज के किसी नेता के पास भी नही है या कोई नेता इसका जवाब देना भी नही चाहेगा जो कुछ भी आपने पूछा है वो सिर्फ एक आम नागरिक से सम्बंधित है ,,जो पहले भी गुलाम था और आज भी गुलाम है ,,लगता है आगे भी रहेगा .जब तक हमारी किस्मत में ऐसे नेता हैं ,,,हाँ आज़ाद है ,,आज के चोर-उच्चक्के ,लुटेरे,डाकू,खुनी ,बलात्कारी ,रिश्वतखोर ,कामचोर ,निकम्मे ...कोई रह गया है हो तो उसे भी गिन लो ..बस एक आम आदमी को छोड़ कर ,,जो बेबसी से बस आज़ादी के खवाब देख रहा है और अंत में इसी में दफ़न हो जायेगा ..काश मैं यहाँ गलत साबित हो जाऊं ..शुभकामनायें हर आम आदमी को जो अपने खुश होने की आज़ादी चाहता है |

jyotsana pradeep said...

अनीता जी, आपने सच कहा की हम आजाद हो कर भी गुलाम है। श्री राम के संस्कारों को खोतें जा रहें है। राम जी ने स्वय को भूल कर परहित के लिये जीवन जिया, मगर आज मानव ही मानवता की परिभाषा भूल गया। अनीता जी, ज्वलंत समस्यायों पर चिंतन करवाने के लिये धनयवाद। बहुत बढ़िया बधाई।

Anita (अनिता) said...

अशोक सलूजा जी व ज्योत्स्ना प्रदीप जी ... आपकी टिप्पणी से बहुत उत्साहवर्धन हुआ!
सराहना तथा प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद व आभार!!!:)

~सादर
अनिता ललित

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

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