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Jul 18, 2013

आपके पत्र



एक पाती... 
उदंती के जून,  2013  अंक में आपका संपादकीय ‘ निदान खोजना ही होगा…’ के लिए साधुवाद! आपने फैलती नक्सली हिंसा की भर्त्सना करते हुए जिस गहराई से इस समस्या के मूल कारणों की तरफ देश, शासन और प्रशासन का ध्यान खींचा है, वह काबिले गौर है और स्पष्ट रूप से यह सुझाव देता है कि नक्सल प्रभाव को रोकने के लिए हमें तत्काल ऐसे सभी उपाय करने होंगे ;जिनसे आदिवासियों को शोषण से निजात मिल सके।  इस सन्दर्भ में मैं यहाँ आपके इस अंक में छपी डॉ. श्याम सखा  श्याम  की इन पँक्तियों को दोहराना चाहता हूँ कि- ‘ ‘आज नहीं तो कल होगा, हर मुश्किल का हल होगा’  यूँ सदैव की भाँति उदंती के जून अंक में प्रकाशित सभी रचनाएँ सामायिक और प्रभावी हैं। सभी लेखकों को बधाई! आपकी इस  अनकही से प्रभावित होकर मैंने  नक्सलवादियों के नाम एक पत्र लिखा  हैं जो इस प्रकार से है-
जरूरी नहीं है कि हम सही हों, जरूरी नहीं कि तुम सही हो,
या फिर मेरी या फिर तुम्हारी हाँ में हाँ  मिलानी वाली भीड़;
तो फिर क्या करें ?
क्या इस असहमति के चलते, बन्दूक और बमों का सहारा लें?
निर्दोष लोगों का खून बहायें, आतंकवाद को अपनाएँ;
लोगों को अपनी बात मनवाने के लिए, उनके खून से नहाएँ,
और फिर किसी एक दिन सरकारी गोली के निशाने पर आएँ, ;
अथवा पकड़े जाने पर  कहीं फाँसी के फंदे पर झूल जाएँ ?
जरा सोचो, क्या यह जरूरी है? जान खुदा की अमानत है।
न दूसरों की जान लें, न अपनी जान दें, और वो भी सिर्फ इसलिए,
किसी ने तुम्हें बरगलाया है, अपने जाल में फँसाया है;
अपने स्वार्थ साधने के लिए कठपुतली बनाया है!
मुद्दा इतना बड़ा नहीं कि यूँ कीमती जान को गँवाया जाए,
आओ, संवाद के रास्ते इस गुत्थी को सुलझाया जाए!
                                     -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली          
                              subhash.surendra@gmail.com
जुझारूपन का भाव
आपका जून अंक विश्व पर्यावरण दिवस पर केंद्रित हैं। हमने वरुण देवता का सम्मान करना छोड़ दिया, वरुण देवता रुष्ट हैं, कुपित तो होंगे ही। हमें पुन: प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करना सीखना होगा। 
 चिंतन में विनोद साव के लेख पर मेरी राय है- भारत में नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। चीनी माओवाद ने उसकी हत्या कर दी है। बस्तर की भौगोलिक दुर्गमता और छत्तीसगढ़ के लोगों में जुझारूपन के अभाव ने आन्ध्र के उग्रवादियों को आमंत्रित किया है। हमारी राज्य सरकारें चीनी आतंकवाद को रोक पाने में असफल रही हैं। चीन छत्तीसगढ़ में है .... चीन भारत की सीमाओं पर है और और उसका सशक्त प्रतिरोध करने वाला कहीं कोई नहीं है। किंतु हम केवल सरकारों को ही पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। समाज की निष्क्रियता भी इसके लिए,  कम जि़म्मेदार नहीं है।
                                                                   -कौशलेन्द्र
                                                    kaushalblog@gmail.com

साहित्य और समाज का व्यापक फलक
पिछले अंक में प्रकाशित ग़ज़ल जंगल का न होना, फिर बादल का न होना, बादल न होने पर जल का न होना, परस्पर नाखून और मांस कि तरह जुड़ा है, जिसे श्याम जी ने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। घर की कलह रिश्तों को दलदल बना देती है, यह आज के पारिवारिक विघटन का कटु सत्य है। कम से कम शब्दों में जीवन और जगत का सत्य पेश कर दिया है। विनोद साव जी का नक्सली अन्दोलन पर प्रस्तुत विश्लेषण तार्किक है। भैरव प्रसाद की कहानी ' एक पाँव का जूता '  बहुत मार्मिक है। पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहती। क्या इस तरह की कालजयी रचना से हमारे राजनेता कुछ सीखेंगे? अँधियारे रास्ते और उजला सवेरा- भावना सक्सैना जी का आलेख शोषण के इतिहास को परत-दर-परत खोलने में सक्षम है। अपने साढ़े तीन साल के प्रवास में उन्होंने भारतीयों की 140 साल पहली पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा। अनुपम मिश्र का आलेख और डॉ रत्ना जी का सम्पादकीय हमें वर्तमान की अपरिहार्य चिन्ता से रूबरू कराते हैं। छोटी-पत्रिका में साहित्य और समाज के व्यापक फलक को प्रस्तुत किया गया है। अनिता ललित के हाइकु गागर में सागर की तरह हैं साथ ही अभिव्यक्ति की ताज़गी को भी सँजोए हैं।
                                                         -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु’
                                                        rdkamboj@gmail.com

अर्थपूर्ण हाइकु
इस अंक में प्रकाशित अनिता ललित की हाइकु लगाओं पौधे बहुत सुंदर, बहुत खूबसूरत, बहुत अर्थपूर्ण, बहुत सार्थक और बहुत मार्मिक है। बधाई।
                                                                  -अशोक सालुजा

Jun 11, 2013

उदंती.com, जून 2013

उदंती.com, जून 2013



प्रकृति अपरिमित ज्ञान का भंडार है, पत्ते-पत्ते में शिक्षापूर्ण पाठ है, परंतु उससे लाभ उठाने के लिए अनुभव आवश्यक है।                                                     - हरिऔध




 अनकही: निदान खोजना ही होगा... - डॉ. रत्ना वर्मा
 आपके पत्र/ मेल बॉक्स        

निदान खोजना ही होगा...

निदान खोजना ही होगा...
 - डॉ. रत्ना वर्मा
25 मई 2013 की शाम, जब सूरज ढला नहीं था। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला बस्तर के घने जंगल जीरम घाटी के बीच से गुजर रहा था अपने पूर्व निर्धारित परिवर्तन यात्रा के एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में, कि एक जोरदार धमाका हुआ और काफिले की सभी लगभग 20 गाडिय़ों के पहिए थम गए। सड़क की दोनों तरफ से उनकी गाडिय़ों पर अंधाधुंध फाइरिंग शुरू हो गई। किसी को भी जरा भी सोचने समझने का समय ही नहीं मिला। जब तक सुरक्षाकर्मियों के पास गोलियाँ थीं जवाबी फायरिंग चलती रही पर आखिर कब तक? उन्हें अपने हथियार डाल देने पड़े। यह खूनी मंजर दो घंटे तक चला और इस दो घंटे में उन्होंने चुन-चुन कर दिग्गज नेताओं पर गोलियाँ दागी उनके नाम पूछ-पूछकर। नक्सलियों की तैयारी इतनी जबरदस्त थी कि उन्होंने बचने का कोई मौका ही नहीं दिया; बल्कि ऐसी दरिंदगी दिखाई कि प्रत्यक्षदर्शियों की आपबीती सुन कर सबके रोंगटें खड़े हो गए। यहाँ उस खूनी मंजर की कहानी दोहराने की जरूरत नहीं क्योंकि मीडिया में लगातार इस खूनी मंजर की दिल दहला देने वाली कहानी को सबने देखा और पढ़ा है।

इस खूनी खेल में प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के साथ राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नंद कुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल तथा पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कई कांग्रेसी कार्यकर्ता और सुरक्षा कर्मी मारे गए, जिनकी संख्या 30 तक पहुँच गई है। इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल भी घायल हैं, जिनका गुडग़ाँव के वेदांता अस्पताल में इलाज चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में हुए इस क्रूर हिंसा की वारदात के बाद हर तरफ सिर्फ एक ही आवाज उठ रही है कि नासूर बन चुके इस नक्संलवाद के मर्ज का कारगर इलाज क्या हो? आँकड़ें बताते हैं कि नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले लोगों की तादाद देश में आतंकी हमलों में मरने वाले लोगों से कहीं ज्यादा है। देश के 9 राज्य नक्सलवाद की चपेट में हैं जहाँ के लगभग 107 जिले नक्सल प्रभावित हैं। जिनमें छत्तीसगढ़ के 16 जिले शामिल हैं। प्रभावित राज्यों में इस समस्या को खत्म करने के लिए कई दशकों से रणनितियाँ बनाई जाती रहीं हैं पर अब तक कोई ऐसा कारगर कदम नहीं उठाया जिससे इन राज्यों को राहत मिले। फलस्वरूप इन राज्यों में उनकी ताकत बजाय कम होने के लगातार बढ़ती ही जा रही है।
हमारी रक्षातंत्र की कमजोरी इसी से साबित होती है कि नक्सली कितने अत्याधुनिक हथियार से लैस हैं। सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया जानकारियाँ भी आसानी से उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं और वे अपनी मर्ज़ी से कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं। आदिवासी बहुल कई इलाकों में नक्सलियों का समानांतर प्रशासन भी चलता है। वे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और जन अदालतों का संचालन करते हैं तो ठेकेदारों, खदान मालिकों एवं उद्योगपतियों और यहाँ तक कि सरकारी अधिकारियों से भी पैसा वसूल करते हैं।
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जितने प्रभावित राज्य हैं वे मिल कर इस समस्या को जड़ से उखाडऩे के बारे में अब तक एकजुट क्यों नहीं हो पाए हैं? केन्द्र सरकार इन राज्यों के साथ गंभीरता से बात करके कोई हल क्यों नहीं निकाल पाई? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है पर पिछले सालों में जो भी प्रयास हुए हैं या नक्सलियों से निपटने के लिए जितने भी उपाय करने की बात कही गई या की गई वे सब नाकाफी साबित हुए हैं। यदि अब तक गंभीरता से इस समस्या को खत्म करने के लिए कारगर उपाय हुए होते तो नक्सली हौसले इतने बुलंद नहीं होते और न ऐसा खूनी खेल जारी रख पाते।
कहने को तो आम आदमी को बहुत से अधिकार मिले हुए हैं पर अफसोस हमारे देश की व्यवस्था अपने नागरिकों को पूरी तरह यह विश्वास नहीं दिला पाती कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में उसके जीने के अधिकार की हर हाल में रक्षा की जाएगी। आदिवासी अपनी ही संपदा जल- जंगल और जमीन के लिए लड़ रहा है। विकास के जो कुछ भी कार्य उनके लिए किये जाते हैं उन्हें लगता हैं उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए किया जा रहा है नतीजा न वहाँ कोई विकास के कार्य होने दिया जाता न आदिवासियों को मुख्य धारा से जुडऩे दिया जाता।
नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिसियों को मुख्यधारा में जोडऩे के लिए जरूरी है कि उनतक रोजगार, न्याय, शिक्षा, और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ आसानी से पँहुचाई जाए। यह तो सर्वविदित है कि बस्तर प्राकृतिक संपदा से भरपूर इलाका है। अब तक यदि इस संपदा का उपयोग क्षेत्र और यहाँ के लोगों के विकास में किया जाता तो आज इन शोषित और सीदे-सादे आदिवासियों का सहारा लेकर नक्सलवाद बेखौफ होकर पनप नहीं पाता। विकास के नाम पर हुआ भी यही कि इस क्षेत्र की सम्पदा का दोहन धनबल, बाहुबल और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त करने वाले लोग ही करते रहे हैं। यहाँ का मूल निवासी निरन्तर गरीब और साधनहीन होता गया, रसूख़्वाल वर्ग निरन्तर फलता-फूलता रहा है। सामान्यजन समृद्धि का भागी नहीं बन सका, यही नहीं न्याय भी उसके लिए सहायक नहीं बना। यही वंचना धीरे-धीरे उसके भीतर सुलगती रही और उसके इस विश्वास को पुख़्ता करती गई कि उसके साथ छल किया जा रहा है। अविश्वास की इस खाई को भी पाटना ज़रूरी है। भेदपूर्ण व्यवहार इस समस्या के निवारण में सबसे बड़ी बाधा है।
केन्द्र सरकार ने इस सबसे बड़े नक्सली हमले में हुई चूक को स्वीकार तो कर लिया है और इन हत्याओं की जाँच, नेशनल जाँच एजेंसी- एनआईए को सौंप दी है। राज्य सरकार ने भी इसकी जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग बिठा दी है पर यह भी सत्य है कि यह इस समस्या का निदान नहीं है। दरअसल बस्तर में व्याप्त नक्सल समस्या का सफाया मात्र जाँच दल बिठाकर, सुरक्षा बल बढ़ाकर या बस्तर को छावनी में तब्दील करके नहीं होने वाला। इसका खात्मा वहाँ रहने वाले स्थानीय लोगों की जमीनी लड़ाई से जुड़कर करना होगा; क्योंकि हर स्तर पर कई दशकों से वे राजनीतिक, आर्थिक और व्यावसायिक स्तर पर शोषित हो रहे हैं। जिसके कारण आदिवसियों का वर्तमान व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है और इसी का फायदा नक्सली उठाते हैं, वे आदिवासियों को इस शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं उन्हें वह सब देते हैं जो उन्हें अपनी सरकार से मिलना चाहिए। इतना ही नहीं वे ऐसा माहौल तैयार करते हैं कि सरकारी स्तर पर किए जाने वाले कार्य को भी वे अपने विरूद्ध समझते हैं।
 अतः यह लड़ाई वहाँ रहने वाले सीधे सच्चे और भोले भाले आदिवासियों का विश्वास हासिल करके जीतना होगा।  राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ एक कारगर रणनीति बनाकर ही इस समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है।                                                              

पर्यावरणः महाविनाश के मुहाने पर धरती

महाविनाश के मुहाने पर धरती
- राजेश कश्यप
धरती दिनोंदिन गरमा रही है। मौसम में जो अप्रत्याशित परिवर्तन व असंतुलन निरन्तर बढ़ रहे हैं, असाध्य बीमारियों का जो मकडज़ाल लगातार फैलता चला जा रहा है, समय-असमय जो अतिवृष्टि व अनावृष्टि हो रही है, जिस तेजी से भूस्खलन निरन्तर बढ़ रहे हैं, भूकम्प आ रहे हैं, हिमनद सूख रहे हैं और जिस तरह से उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ पिंघलकर महाविनाश की भूमिका तैयार कर रही है, वह सब चरम सीमा पर पहुँच रहे पर्यावरण प्रदूषण के परिणामस्वरूप ही हो रहा है।
समस्त जीव-जगत के जीवन में जो जहर घुल चुका है और जो निरन्तर घुल रहा है, उसके लिए कोई एक प्रदूषक तत्त्व जिम्मेदार नहीं है। वर्तमान पर्यावरण प्रदूषण में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, नाभिकीय प्रदूषण आदि सब प्रदूषक शामिल हैं। वायु को प्रदूषित करने वाले मुख्यत: तीन कारक हैं, अचल दहन, चलायमान दहन और औद्योगिक अपशिष्ट। अचल दहन के तहत जब कोयला, पेट्रोलियम आदि जीवाश्मी ईंधन जलते हैं तो इससे सल्फर डाइऑक्साइड, सल्फर ट्राइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड आदि गैंसें निकलती हैं और वातावरण में मौजूद जलीय कणों के साथ मिलकर गन्धकीय तेजाब, सल्फ़्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल आदि का निर्माण करती हैं और अम्लीय वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आकर अपने घातक प्रभाव डालती हैं। इन घातक प्रभावों में मुख्य रूप से पौधों की बढ़वार प्रभावित होना, मृदा के पोषक तत्त्वों का हनन होना, मत्स्य प्रजनन का रुकना, श्वसन तंत्र का प्रभावित होना आदि-आदि शामिल हैं। इन सबके अलावा भी इन गैसों के कुप्रभाव देखने में आते हैं।
चलायमान दहन के तहत स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार, बस, हवाई जहाज, रेल आदि परिवहन के समस्त साधनों से निकलने वाले धुएँ से वातावरण में जहर घुलता है। इस धुएँ में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है। इसके अलावा पेट्रोलियम के जलने से टेऊटाइथल लैड, टेऊटामिथाइल लैड जैसे लैड योगिक पैदा होते हैं और शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण को रोककर बेहद घातक कुप्रभाव डालते हैं। औद्योगिक कारखानों में रासायनिक प्रक्रियाओं से होने वाले उत्पादन, उद्योगों से निकलने वाली कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि विषैली गैसों और औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित कचरे से पर्यावरण बेहद प्रदूषित होता है। जल प्रदूषण के लिए हमारी छोटी बड़ी सभी लापरवाहियाँ उत्तरदायी हैं। इनमें मशीनों का असहनीय शोर-शराबा, डायनामाइट विस्फोट, गोला-बारूद का प्रयोग, हथियारों व बमों का परीक्षण, वाहनों का भारी शोर, लाउडस्पीकर्स आदि सब चीजें जिम्मेदार हैं। विकिरण प्रदूषण ने तो समस्त जीव जगत के जीवन पह गहरे प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं आणविक विखण्डनों से होने वाली विघटनाभिका प्रक्रिया के तहत विकिरण प्रदूषण होता है। इतिहास साक्षी है वर्ष 1945 का, जिसके दौरान अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख नगरों हीरोशिमा व नागासाकी में अणु बम गिराए थे और जिससे पूरी दुनिया दहल  उठी थी। आज साढ़े छह दशक बाद भी उन नगरों को उस आणविक हमले की चोट से मुक्ति नहीं मिली है। क्योंकि नाभिकीय अपशिष्ट के रेडियोऐक्टिव तत्व कम से कम एक हजार वर्षों तक सक्रिय रहने की क्षमता रखते हैं। नाभिकीय परीक्षणों के चलते तो विकिरण प्रदूषण विश्व के लिए एक गंभीर स्थिति पैदा हो चुकी है।
कुल मिलाकर पर्यावरण प्रदूषण ने मौसम और अन्य पर्यावरणीय समीकरणों को गड़बड़ाकर रख दिया है। मौसम और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक अपनी चरम प्रदूषण के चलते एशिया के सात देशों की जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन आ चुका है और स्थिति निरन्तर भयावह होती चली जा रही है। गत दशक में ही आठ देशों के सरकारी और निजी अनुसंधान संस्थानों के 60 से भी अधिक विशेषज्ञों ने चेताया था कि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और फिलीपीन जलवायु परिवर्तन के दुश्चक्र में फँस चुके हैं और इन देशों के तापमानों व समुद्री जल स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है, जिससे इन देशों के तटवर्ती स्थानों पर समुद्री तूफान अपना कहर बरपाएँगे, करोड़ों लोग शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए बाध्य होंगे और महामारियों की बाढ़ भी आएगी।
विशेषज्ञों ने जो भी चिन्ताएँ व्यक्त कीं वो अक्षरश: सत्यता की तरफ अग्रसर होने लगी हैं। भारत के केरल, आन्ध्र प्रदेश और बांग्लादेश, चीन, जापान, अमेरिका आदि देशों के समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों में आने वाले समुद्री तूफान धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करने लग गए हैं। गत कुछ वर्षों के समुद्री तूफानों ने विश्वभर में भारी तबाही मचाई है। दिसम्बर, 2004 में 'सुनामी’  ने दक्षिण एशियाई देशों भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, थाईलैण्ड, मलेशिया आदि देशों में, अगस्त, 2005 में 'कैटरिना’  ने अमेरिका में, नवम्बर, 2009 में 'मिरिना’  ने वियतनाम में, नवम्बर, 2009 में ही 'सीडर’  ने बांग्लादेश में, मई, 2010 में 'लैला’  ने भारत में, मार्च, 2011 में 'गत 140 साल के इतिहास के सबसे भयंकर सुनामी’  ने जापान में, अगस्त, 2011 में 'आइरीन’ ने अमेरिका में, अगस्त, 2011 में ही 'मुइफा’ ने चीन में, सितम्बर, 2011 में 'तलस’ ने जापान में, सितम्बर, 2011 में ही 'नेसाट’ ने चीन में और दिसम्बर, 2011 में 'सुनामी’ ने फिलीपींस में न केवल भयंकर तबाही मचाई, अपितु हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया, लाखों लोगों के जीवन को तबाह कर दिया, अरबों-खरबों की सम्पति को पानी में मिला दिया और प्रकृति को भारी नुकसान पहुँचाया।
एक अनुमान के अनुसार धरती पर पाई जाने वाली लगभग चार करोड़ प्रजातियों में से लगभग एक सौ प्रजातियाँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। एक प्रसिद्ध जीव विज्ञानी के अनुसार तो वनों की अंधाधुंध कटाई से प्रतिदिन एक सौ चालीस रीढ़ वाले जीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं। समुद्र में तेल के रिसाव व पानी में गन्दे कूड़े-कचरे के बहाव के चलते कई समुद्री जीवों का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। पेयजल के बढ़ चुके संकट ने दुनिया की नींद हराम करके रख दी है। बाढ़ व सूखे की विकरालताओं ने भी सबको हिलाकर रख दिया है। कृषि की उपज व मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी भारी कमी आने लगी है। कई छोटे समुद्री द्वीपों के डूबने का खतरा भी मँडराने लगा है। हमारी लापरवाहियों के चलते पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा है और उसी के चलते धरती गरमा उठी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली गैसें पृथ्वी का तापमान बढ़ाने के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा-कवच ‘ओजोन परत’ को भी बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न कर रही हैं। यह ओजोन परत गैस की ऐसी परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती हैं और हमें चमड़ी के रोगों व कैंसर जैसी असंख्य दु:साध्य बीमारियों के प्रकोप से बचाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के चलते हमारी रक्षा-कवच ओजोन परत अत्यन्त क्षीण हो चुकी है और इसमें किसी भी समय भयंकर छिद्र हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पृथ्वी के समस्त जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा और पृथ्वी का स्वर्गिक वातावरण नरक में तब्दील हो जाएगा।
निरन्तर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सभी देशों की सरकारें अत्यन्त गंभीर तो हैं, लेकिन, इसे रोकने में अहम् भूमिकाएँ नहीं निभा पा रहे हैं। आए बन भयंकर बमों व मिसाइलों का परीक्षण, परमाणु परीक्षण, सरकारी लापरवाहियों के चलते आयुध भण्डारों में लगने वाली आग, समुद्री युद्ध परीक्षण, सरकारी गोदामों का सड़ा गला व विषैला खाद्य-भण्डार समुद्र के हवाले करना, समुद्री दुर्घटनाएँ आदि सब प्रदूषण को रोकने की प्रतिबद्धता की पोल खोल रहे हैं। पिछले वर्षों में जो कई देशों द्वारा परमाणु परीक्षण किए गए और अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान व इराक में जो बड़े भारी भयंकर व विनाशकारी बमों की वर्षा की गई, वो सब भी विश्व पर्यावरण प्रदूषण को उसकी चरम सीमा पर पहुँचाने की बराबर जिम्मेदार घटनाएं हैं। पिछले वर्षों में सॉर्स ने पूरे विश्व में कोहराम मचाया, वह भी एक देश द्वारा किए जाने वाले जैविक बम के परीक्षण को सन्देह के दायरे में लाया जा चुका है। कैटरिना जैसे समुद्री तूफानों ने भी भयंकर कहर बरपाया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सैकड़ों देश प्रतिवर्ष इकट्ठे बैठकर पर्यावरण प्रदूषण पर जो चिन्ताएँ व्यक्त करते हैं और उससे निपटने के लिए जो बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं, उन्हें वास्तविकता में तब्दील करने की कड़ी आवश्यकता है, वरना सभी देशों की यह सब गतिविधियाँ एक ढ़कोसले के सिवाय कुछ भी नहीं होंगी।
विश्व के देशों की सरकारों के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति को भी पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक होना होगा और पर्यावरण प्रदूषण के प्रति अपनी लापरवाही, अज्ञानता व स्वार्थपरता पर एकदम अंकुश लगाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि जन-जन को अधिक से अधिक पेड़ लगाने का दृढ़ संकल्प लेना होगा और लगे हुए पेड़ों के संरक्षण पर भी बराबर ध्यान रखना होगा। कुल मिलाकर, पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारकों पर तुरन्त अंकुश लगाना, अधिक से अधिक पेड़ लगाना और उनकीं रक्षा करना ही पर्यावरण प्रदूषण के प्रकोप से बचने के अचूक उपाय हैं।  (लेखक स्वतंत्र पत्रकार, समाजसेवी एवं पर्यावरण प्रेमी हैं।)

सम्पर्क: मकान नं. 1229, पाना. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
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