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May 1, 2026

कविताः वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

 - अंजू खरबंदा

ढक्का गाँव की एक गली से

गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी

पार्क की एक बेंच पर बैठी

दो प्रौढ़ स्त्रियों पर…

मग्न थीं वे

अपने सुख-दुःख बाँटने में,

जैसे समय ठहर गया हो

उनकी बातों के आसपास!

उम्र के इस पड़ाव तक

आते-आते

कितने विषय होंगे उनके पास,

कितनी कहानियाँ, 

कितनी उपलब्धियाँ!

जो किसी किताब में दर्ज नहीं!

उनके चेहरे की झुर्रियों ने

सहे होंगे जीवन के

अनगिनत थपेड़े,

हर लकीर एक किस्सा 

कहती होगी,

इस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते

एक लंबा इतिहास

बस गया होगा उनकी स्मृतियों में,

उम्र बढ़ने के साथ-साथ

तजुर्बा भी गहराता गया,

कमी-बेशी को नज़रअंदाज़ कर

जीवन को गति देती रहीं 

वे दो प्रौढ़ स्त्रियाँ!

20 comments:

  1. बहुत सुंदर कविता।

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    1. Anonymous04 May

      स्नेहिल आभार 🌹🌹

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  2. Anonymous04 May

    जीवन का सत्य। बहुत सुंदर रचना।बधाई। सुदर्शन रत्नाकर

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  3. Anonymous17 May

    सुंदर कविता - जय प्रकाश मानस

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  4. Anonymous17 May

    बढ़िया

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  5. Anonymous17 May

    बहुत सुंदर रचना है . जीवन सा सार होगा निश्चय ही उन प्रौढ़ स्त्रियों की बातों में . शुभकामनाएं .

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  6. निर्देश निधि17 May

    निर्देश निधि

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  7. यथार्थ का चित्रण करती सुंदर कविता।

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  8. हँसती मुस्कुराती स्त्रियाँ!!संवेदनशील रचना |

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  9. Anonymous17 May

    सुंदर कविता

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  10. Anonymous17 May

    सुंदर कविता, पूनम चंद्रलेखा

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  11. सार्थक सृजन

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  12. Anonymous17 May

    सुंदर कविता!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  13. sushma gupta17 May

    बहुत सुंदर कविता सुंदर भाव

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  14. सत्य का एक खामोश पड़ाव। बढ़िया।
    बधाई।

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  15. Anonymous17 May

    बहुत सुंदर कविता 👌

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  16. Anonymous17 May

    Wow bahut sunder

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  17. Nirmal Dalal17 May

    बहुत सुंदर रचना, बहुत बहुत बधाई

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  18. बहुत सुंदर।

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