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Mar 1, 2026

पर्व- संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली

- पंकज चतुर्वेदी 
होली भारत में किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश की संस्कृति के रूप में होती है । वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती है, फागुन की सुरमई हवाएँ वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं । इन्हीं दिनों नई फसल भी तैयार होती है और किसानों के लिए यह उल्लास का समय होता है। तभी होली के बहाने नए अन्न की पूजा पूरे देश में की जाती है। यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह  अलग-अलग समय में त्योहार मनाए जाते हैं, जिनका असल मकसद तनावों से दूर कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश  के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है।

वास्तव में होली का अर्थ है – हो ली, यानी जो बीत गई सो बीत गई, अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे  मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो- रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व पर्यावरण का दुश्मन, नशाखोरी, रंग की जगह त्वचा को नुकसान पहुँचाने, आनंद की जगह भोंडे ऊधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और  परंपरा की मूल आत्मा को ही नष्ट  कर दिया है।

कहानियाँ, किवदंतियाँ कुछ भी कहें; लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश तो – स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य  खो दिया है और इसकी छवि पेड़ व हानिकारक पदाथों को जलाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाने और रंगों के माध्यम से जहर बाँटने की बनती जा रही है; हालाँकि देश के कई शहरों और मुहल्लों में बीते एक दशक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं।  हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता।

होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काटकर जलाने की है। वास्तव में होली भी  दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की ख़ुशी व्यक्त करने का पर्व है।  कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थ, मवेशियों के लिए चारा, जैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रौशनी  के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रहा जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले की माला अवश्य  डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जाकर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र करके रखते थे।

चूँकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सो, कंडे- उपले की जरूरत नहीं, तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। उपले की आँच धीमी होती है, लपटें ऊँची नहीं जातीं, इसमें नए अन्न – गेहूँ की बाली या चने के छोड़ (डण्ठल) को भूना भी जा सकता है, सो हमारे पूर्वजों ने होली में उपले के प्रयोग किए। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपटें आसमान से ऊँची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा जहरीला कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  एक बात और आदिवासी समाज में प्रत्येक कृषि  उत्पाद के लिए ‘नवा खाई’ पर्व होता है – जो भी नई फसल आई , उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है।

होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अष्टमी  का यह अवसर! शक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृष्ण  पक्ष पर  बासी खाना खाने का बसौड़ा। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले ही पक्की रसोई यानी पूड़ी कचौड़ी, चने, दही बड़े आदि बन जाते हैं। सुबह सूरज उगने से पहले होलिका के दहन स्थल पर शीतला मैया को भोग लगाया जाता है।

स्कंद पुराण शीतलाष्टक  स्तोत्र  के अनुसार-

‘वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।।’

अर्थात् गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूँ।

 शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं।  हकीकत में संदेश यही है कि यदि स्वच्छता रखेंगे, तो ये रोग नहीं हो सकते।

तनिक गौर करें, होली का प्रारंभ हुआ, घर-खलिहान से कूड़ा-कचरा बुहारकर होली में जलाने से, पर्व में शरीर पर विभिन्न रंग लगाए और  फिर उन्हें छुड़ाने के लिए रगड़-रगड़कर स्नान किया। पुराने कपड़े फटे व नए वस्त्र धारण किए और समापन पर स्वच्छता की देवी की पूजा-अर्चना की। लोगों को अपने परिवेश  व व्यक्तिगत सफाई का संदेश दिया। गली-मुहल्ले के चौराहे  पर होली दहन स्थल पर बसौड़ा का चढ़ावा चढ़ाया, जिसे समाज के गरीब और ऐसे वर्ग के लोगों ने उठाकर भक्षण किया, जिनकी आर्थिक स्थिति उन्हें पौष्टिक आहार से वंचित रखती है। चूँकि भोजन ऐसा है, जो कि दो-तीन दिन खराब नहीं होना, सो वे घर में संग्रह कर भी खा सकते है और फिर यही लोग नई उमंग-उत्साह के साथ फसल की कटाई से लेकर अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने का कार्य तपती धूप में भी लगन से करेंगे। 

इस तरह होली का उद्देश्य  समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेश  की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना है, यही इसका मूल दर्शन  है।

साभार (indiaclimatechange)

3 comments:

  1. Anonymous02 March

    बहुत सारी नई जानकारियों से अवगत कराता सुंदर आलेख। बधाई। सुदर्शन रत्नाकर

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  2. Anonymous12 March

    होली के बदलते स्वरूप पर सार्थक दृष्टि

    पंकज चतुर्वेदी का लेख “पर्व-संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली” पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि हमारे पारंपरिक त्योहारों के पीछे कितनी गहरी सामाजिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक सोच निहित रही है। लेखक ने होली के मूल दर्शन को स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता से जोड़ते हुए जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, वह आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है।

    वास्तव में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन और सामंजस्य का प्रतीक भी है। वसंत ऋतु के आगमन, नई फसल की खुशी और समाज में मेल-मिलाप की भावना को एक साथ जोड़ने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति की जीवंतता को दर्शाता है। लेखक ने होलिका दहन की पारंपरिक पद्धति—गोबर के उपलों, कृषि अवशेषों और घर-आँगन की सफाई से निकले कचरे के उपयोग—का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि हमारे पूर्वजों ने त्योहारों को भी प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली से जोड़ा था। इससे यह संदेश भी मिलता है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं थे, बल्कि जीवन को व्यवस्थित और स्वच्छ रखने की सामाजिक व्यवस्था भी थे।

    यदि हम कुछ दशक पीछे जाएँ, विशेषकर 1970 के दशक की होली को याद करें, तो उसका स्वरूप कहीं अधिक सरल, सामुदायिक और प्राकृतिक था। उस समय होली में टेसू के फूलों से बने रंग, हल्दी, गुलाल या घर में तैयार किए गए प्राकृतिक रंगों का ही अधिक उपयोग होता था। मोहल्लों और गाँवों में सीमित संसाधनों के बावजूद उत्साह और आत्मीयता भरपूर होती थी। होलिका दहन के लिए पेड़ों की कटाई नहीं की जाती थी; इसके स्थान पर सूखी टहनियाँ, उपले और खेत-खलिहान से निकले अवशेष ही प्रयोग में लाए जाते थे। पानी का उपयोग भी सीमित होता था और त्योहार का मुख्य उद्देश्य मेल-मिलाप, गीत-संगीत और सामूहिक आनंद होता था।

    समय के साथ होली के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं। आधुनिक जीवनशैली, बाज़ारवाद और दिखावे की प्रवृत्ति ने इस त्योहार को भी प्रभावित किया है। आज कई स्थानों पर रासायनिक रंगों का अत्यधिक उपयोग, पानी की अनावश्यक बर्बादी, अत्यधिक शोर-शराबा, नशाखोरी और बड़े-बड़े अलाव के लिए पेड़ों की कटाई जैसी प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, बल्कि त्योहार की मूल भावना भी कहीं-न-कहीं कमजोर पड़ती दिखाई देती है। लेखक ने इन नकारात्मक पहलुओं की ओर संकेत करते हुए समाज को एक महत्वपूर्ण चेतावनी देने का प्रयास किया है।

    हालाँकि आशा की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में समाज के कई वर्गों में पर्यावरण-अनुकूल होली मनाने की जागरूकता भी बढ़ी है। कई शहरों और मोहल्लों में प्रतीकात्मक होलिका दहन, प्राकृतिक रंगों का उपयोग, पानी बचाने की पहल और सामुदायिक स्वच्छता अभियानों के साथ होली मनाने के प्रयोग भी किए जा रहे हैं। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि समाज धीरे-धीरे अपने पारंपरिक त्योहारों के मूल संदेश को समझते हुए आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप अधिक जिम्मेदारी के साथ उन्हें मनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    लेख का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हमारे त्योहार केवल मनोरंजन के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के गहरे मूल्यों को भी सिखाते हैं। यदि हम होली को उसके मूल स्वरूप—स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—के साथ मनाएँ, तो यह पर्व वास्तव में समाज को जोड़ने वाला और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला उत्सव बन सकता है।

    पंकज चतुर्वेदी का यह लेख हमें अपने त्योहारों के वास्तविक अर्थ और उनके सामाजिक-पर्यावरणीय संदेश को समझने की प्रेरणा देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाते हुए होली को उसी उल्लास के साथ मनाएँ, परंतु प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी उतनी ही गंभीरता से निभाएँ। तभी होली वास्तव में रंगों के साथ-साथ स्वच्छता, सद्भाव और प्रकृति संरक्षण का भी सच्चा उत्सव बन सके

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  3. होली के बदलते स्वरूप पर सार्थक दृष्टि

    पंकज चतुर्वेदी का लेख “पर्व-संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली” पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि हमारे पारंपरिक त्योहारों के पीछे कितनी गहरी सामाजिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक सोच निहित रही है। लेखक ने होली के मूल दर्शन को स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता से जोड़ते हुए जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, वह आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है।

    वास्तव में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन और सामंजस्य का प्रतीक भी है। वसंत ऋतु के आगमन, नई फसल की खुशी और समाज में मेल-मिलाप की भावना को एक साथ जोड़ने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति की जीवंतता को दर्शाता है। लेखक ने होलिका दहन की पारंपरिक पद्धति—गोबर के उपलों, कृषि अवशेषों और घर-आँगन की सफाई से निकले कचरे के उपयोग—का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि हमारे पूर्वजों ने त्योहारों को भी प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली से जोड़ा था। इससे यह संदेश भी मिलता है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं थे, बल्कि जीवन को व्यवस्थित और स्वच्छ रखने की सामाजिक व्यवस्था भी थे।

    यदि हम कुछ दशक पीछे जाएँ, विशेषकर 1970 और 1980 के दशक की होली को याद करें, तो उसका स्वरूप कहीं अधिक सरल, सामुदायिक और प्राकृतिक था। उस समय होली में टेसू के फूलों से बने रंग, हल्दी, गुलाल या घर में तैयार किए गए प्राकृतिक रंगों का ही अधिक उपयोग होता था। मोहल्लों और गाँवों में सीमित संसाधनों के बावजूद उत्साह और आत्मीयता भरपूर होती थी। होलिका दहन के लिए पेड़ों की कटाई नहीं की जाती थी; इसके स्थान पर सूखी टहनियाँ, उपले और खेत-खलिहान से निकले अवशेष ही प्रयोग में लाए जाते थे। पानी का उपयोग भी सीमित होता था और त्योहार का मुख्य उद्देश्य मेल-मिलाप, गीत-संगीत और सामूहिक आनंद होता था।

    समय के साथ होली के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं। आधुनिक जीवनशैली, बाज़ारवाद और दिखावे की प्रवृत्ति ने इस त्योहार को भी प्रभावित किया है। आज कई स्थानों पर रासायनिक रंगों का अत्यधिक उपयोग, पानी की अनावश्यक बर्बादी, अत्यधिक शोर-शराबा, नशाखोरी और बड़े-बड़े अलाव के लिए पेड़ों की कटाई जैसी प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, बल्कि त्योहार की मूल भावना भी कहीं-न-कहीं कमजोर पड़ती दिखाई देती है। लेखक ने इन नकारात्मक पहलुओं की ओर संकेत करते हुए समाज को एक महत्वपूर्ण चेतावनी देने का प्रयास किया है।

    हालाँकि आशा की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में समाज के कई वर्गों में पर्यावरण-अनुकूल होली मनाने की जागरूकता भी बढ़ी है। कई शहरों और मोहल्लों में प्रतीकात्मक होलिका दहन, प्राकृतिक रंगों का उपयोग, पानी बचाने की पहल और सामुदायिक स्वच्छता अभियानों के साथ होली मनाने के प्रयोग भी किए जा रहे हैं। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि समाज धीरे-धीरे अपने पारंपरिक त्योहारों के मूल संदेश को समझते हुए आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप अधिक जिम्मेदारी के साथ उन्हें मनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    लेख का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हमारे त्योहार केवल मनोरंजन के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के गहरे मूल्यों को भी सिखाते हैं। यदि हम होली को उसके मूल स्वरूप—स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—के साथ मनाएँ, तो यह पर्व वास्तव में समाज को जोड़ने वाला और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला उत्सव बन सकता है।

    पंकज चतुर्वेदी का यह लेख हमें अपने त्योहारों के वास्तविक अर्थ और उनके सामाजिक-पर्यावरणीय संदेश को समझने की प्रेरणा देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाते हुए होली को उसी उल्लास के साथ मनाएँ, परंतु प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी उतनी ही गंभीरता से निभाएँ। तभी होली वास्तव में रंगों के साथ-साथ स्वच्छता, सद्भाव और प्रकृति संरक्षण का भी सच्चा उत्सव बन सकेगी।

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