October 02, 2018

कद्दूओं का त्योहारः हैलोवीन

कद्दूओं का त्योहारः
हैलोवीन
-वीणा विज
31 अक्टूबर आते- आते हर तरफ सिर्फ़  छोटे- बड़े कद्दू ही दिखाई देने लगते हैं, ख़ासकर अमेरिका,इंगलैंड व योरपियन देशों में। आयरलैड और स्काटलैंड से जन्मी हैलोवीन मनाने की यह प्रथा 19वीं सदी में उनके साथ उत्तर अमेरिका आ गई। 20वीं सदी तक आते- आते पूरे पाश्चात्य जगत के त्यौहारों में रच बस गई और इतनी कि अब उनकी अपनी धरोहर बन गई है। योरप में सैल्टिक जाति के लोग ऐसा मानते थे (अभी भी मानते हैं) कि इस समय मृत लोगों की आत्माएँ आकर संसारिक प्राणियों से साक्षात्कार करती हैं।इस को सैमहैनभी कहते हैं ।यह वह दिन होता है, जब ये सोचते थे कि उनके मरे हुए पुरखों की आत्मा धरती पर आएगी,जिससे उनका फसल काटना आसान हो जाएगा।इसीलिए वे चुड़ेलें बनते और जानवरों के मुखौटे, उनकी चमड़ी, उनके सिर पहनकर अलाव के आसपास नाचते -गाते थे।वे मानते थे कि कोई विशिष्ट सर्वोच्च प्राकृतिक शक्ति है।इसे ‘All Saints-Day’-All Hallows (holy)  याHallows Eve मानते थे, जो धीरे- धीरे Halloween बन गया।इस दिन खाने-पीने के उपहार भी देते-लेते थे।यू. के में इन भटकती आत्माओं के लिए केक भी बनाते थे।इन दिनों सेव के मौसम के कारण मीठे सीरे में सेव बनाकर खाते हैं।
अमेरिका मे तो इसे harvest -time के साथ भी जोड़ा जाता है।यहाँ कद्दू बहुतायत में व बड़े- बड़े मिलते हैं, जिन्हें आसानी से काटा भी जा सकता है।सामने की तरफ इस पर डरावने व बेढंगे से मुँह काटकर, बीच में जलती हुई मोमबत्ती रख देते हैं।जिन्हें पुरानी सदी की याद में रात को अँधेरे में घर की चौखट पर रखते हैं।इसे Jack-O-lanterns कहते हैं।इस दिन कद्दू के बीज भूनकर खाए जाते हैं।इसके अलावा कद्दू की ब्रेड, कद्दू की खीर भी बनाई जाती है।लोग कद्दू के पोस्टर भी घरों के बाहर लगाते हैं।कद्दू के रंग के कपड़े भी पहनते हैं।जापान और जर्मनी में भी यह अमेरिकन पॉप कल्चर की नकल के फलस्वरूप लोकप्रिय हो गया है।
हैलोवीन कब से मनाया जाता- इस विषय में कहा जाता है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व आयरलैंड में इस त्यौहार की शुरूआत हुई थी। पहले योरप के देशों में इसे पहली नवम्बर को मनाया जाता था। 31 अक्टूबरको Halloweve कहते थे। फिर धीरे-धीरे यह 31 अक्टूबरको ही पक्का कर दिया गया। इस दिन को फसल के मौसम का आखरी दिन एवम् सर्दियों की शुरूआत का पहला दिन मानते हैं । अब इसे भी Christian Festival  मानते हैं, जिससे यह अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया,न्यूज़ीलैंड आदि देशों में भी प्रचलित है।
अक्टूबर माह के आरंभ होते ही हर शहर के बड़े-बड़े स्टोर्स में ' हैलोवीन' से संबंधित सामान दिखाई देने लगता है। कुछ लोग  Haunted House का सामान खरीद कर हमेशा के लिए रख लेते हैं। अधिकतर लोग  भूत , पिशाच , अस्थि-पंजरएवं समुद्री डाकू और परियों,जिप्सी डांसर,फूलों आदि  की पोशाकें किराए पर ही लेते हैं। इनका किराया भी काफी होता है।पर कहते हैं न कि शौक़ की कोई कीमत नहीं होती।सो, बच्चों के शौक की ख़ातिर सब चलता है। फिर स्कूल में  ' हैलोवीन परेड' में बच्चा हिस्सा ले रहा है, तो उसे हर बार नए पात्र कीपोशाकचाहिए। आखिर इस परेड को देखने बच्चों के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी सभी तो आते हैं।
फिर तरह- तरह की पोशाकें पहनकर विभिन्न रूप बनाए जाते हैं।जैसे-भूत-पिशाच, चुड़ैल, शैतान, अस्थि पंजर आदि।अच्छे रूप भी होते हैं जैसे-राजकुमारियाँ समुद्री -डाकू, स्पाईडरमैन, सुपरमैन, विदूषक, ख़ानाबदोश, विभिन कहानियों के पात्र आदि।स्कूलों में बच्चे इन पोशाकों में परेड करके दिखाते हैं।विभिन्न मेले सजते हैं।पोशाक- पार्टियाँ होती हैं।निषेध-घरों को भूतों के डेरे सा सजाकर- उनमें प्रवेश निषेध होता है।डर जगाया जाता हैं।
दोपहर होते ही  कद्दूनुमा  टोकरी हाथ में पकड़े विभिन्न ड्रेसेस में बच्चे व बड़े सभी सजे हुए आपके द्वार पर आ कर बोलते हैं 'Trick or Treat ' ।यदि आप  Trick बोलते हैं तो वे डरकर भागते हैं और खूब चीखेंछोड़ते हैं व हँसते हैं। वहीं  Treat बोलने पर टोकरी आपके सामने आ जाती है। अब आप को उस में कैंडीस व चॉकलेट्स डालनी होती हैं। सरकार व कुछ संस्थाओं की ओर से मेले भी लगते हैं। उनमें  Haunted House बनाए होते हैं। जिनके पास जाते ही नकली चुड़ैलें अचानक बाहर निकलकर डराती हैं।  लटकता अस्थिपंजर  अचानक बाहों से पकड़ लेता है। वहाँ काला जाल बिछाकर डरावना माहौल बनाया गया होता है। खूब चीखना- चिल्लाना होता है जिस से बहुत मनोरंजन होता है। 
घर के बड़े-बूढ़े भी कोई सिर पर सींग वाला बैंड, कोई जोकर के कपड़े तो कोई खानाबदोश बना होता है।  हर घर के बाहर कुछ कद्दू नैन-नक्श काटकर उस कद्दू में मोमबत्ती जलाकर लालटैन बनाकर रखे जाते हैं।यह  सारे कद्दू कुछ दिनों पूर्व कद्दुओं की मंडी से खरीदे जाते हैं। क्योंकि इस समय कद्दू की फसल बहुतायत में होती है।ऐसे कद्दुओं  को ही Jack - o- Lanterns कहते हैं। इस नाम की भी कहानियाँ हैं।लेकिन मान्यता यही है कि मरे हुए पूर्वज मौसम की बदलाहट के समय आशीर्वाद देने धरती पर आते हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाया जाता है!


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