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Aug 1, 2022

जीवन दर्शनः भाव से अभिव्यक्ति

  -विजय जोशी

पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

शब्द व्याकरण आधारित गणित नहीं, अपितु अंतस में उपजे भावों की अभिव्यक्ति का साधन हैं जो शब्द विन्यास से भले ही परिपूर्ण न हों पर अंतर्मन को कागज पर उकेर पाने का सरल संसाधन है। इसीलिए तो कहा भी गया है: वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।

नारद तो विश्व विख्यात अलौकिक आलोचक हैं। एक बार जब वाल्मीकि ने स्वलिखित रामायण पूरी कर उन्हें अवलोकन हेतु प्रस्तुत की तो वे कतई प्रभावित न हुए और अपनी चिर परिचित व्यंग्य विधा में कहा- अच्छी तो है’ पर हनुमान लिखित रामायण अधिक अच्छी है।

अरे हनुमान ने भी लिखी है - वाल्मीकि अचरज से बोले तथा हनुमान की खोज में निकल पड़े। और जब कदली वन में उनसे भेंट हुई तो देखने को मिली केले के चौड़े पत्तों पर उकेरी गई उनके द्वारा लिखित रामायण। गौर से पढ़ा तो पाया कि यह तो व्याकरण, शब्दावली, मीटर तथा माधुर्य चारों कसौटी पर न केवल श्रेष्ठ वरन सर्वोत्तम है। वाल्मीकि उदास हो गए। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

हनुमान ने जब यह मार्मिक दृश्य देखा तो अपनी रामायण को यह कहते हुए नदी में प्रवाहित कर दिया- अब मेरी रामायण कोई नहीं पढ़ पायेगा।

वाल्मीकि अचंभित हो गए और पूछा- ऐसा क्यों किया।

हनुमान बोले - मुझसे अधिक तो समाज को आपकी रामायण की आवश्यकता है ताकि संसार वाल्मीकि के भक्ति मार्ग पर पुनर्जन्म के प्रसंग को समझ सके। और यह कहते हुए अपनी बात जारी रखी- आपने रामायण इसलिये लिखी ताकि संसार आपके माध्यम से राम को जान सके और मैंने इसलिये ताकि मुझे राम याद रहें।

बात स्पष्ट थी कि हनुमान की रामायण स्नेह की उपज थी और वाल्मीकि की भक्ति भाव से सराबोर। वाल्मीकि ने भी उसी पल अनुभव किया - राम से बड़ा तो राम का नाम है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।

मंतव्य यह है कि जीवन में हर कोई प्रसिद्धि चाहता है। सामाजिक मान्यता की अभिलाषा रखता है। पर फल की चाहत से रहित निष्काम कर्म का फल सकाम कर्म से कई गुना ऊपर होता है।

बात का सार कुल मिलाकर केवल यह है कि हनुमान जैसे लोग प्रसिद्धि की चाह से सर्वथा परे अपना कर्म समर्पित भाव से करते हुए उद्देश्य प्राप्ति तक निर्मल मन से संलग्न रहते हैं। देखिये हमारे अपने जीवन में भी हमारे आस पास कितने ही प्रचार कामना रहित (unsung) साथी हैं जैसे हमारा परिवार, पति, पत्नी, बच्चे, मित्र, नाते रिश्तेदार, साथी इत्यादि। हमें इन सबका आभारी होना चाहिये जिनके योगदान से हमारा जीवन संवरा है। जिस दिन यह सत्य तथा तथ्य हमारी समझ में आ जाएगा उसी पल से हमारी जीवन में सार्थक यात्रा का श्रीगणेश भी हो जाएगा।

दौर- ए- गर्दिश में भी जीने का मज़ा देते हैं,

चंद अपने हैं जो वीरानों में भी महफ़िल सजा देते हैं।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

प्रेरकः जीवन में सबसे विरोधाभासी चीज क्या है?

 - निशांत

हमारा जीवन अर्थपूर्ण इसीलि
ए है क्योंकि एक दिन इसका अंत हो जाएगा।

हमारा जन्म होते ही प्रकृति हमें गुलेल से फेंके गए पत्थर की भांति एक बहुत लंबे अनियंत्रित चाप पर उछाल देती है जिसकी परिणति हमारी मृत्यु में होती है।

मार्वल की फिल्म के एक दृश्य में डॉ. स्ट्रेंज अपने मेंटर (गुरु) के साथ खिड़की पर खड़े हो प्रचंड तूफान को आता देख रहा है।

डॉ. स्ट्रेंज के गुरु की उम्र सैंकड़ों साल है। वह डॉ. स्ट्रेंज को अंतिम चुनौती का सामना करने के लिए एक सलाह देता है।

डॉ. स्ट्रेंजः मैं अभी तैयार नहीं हूँ।

गुरुः कोई कभी तैयार नहीं होता। हमें अपना समय चुनने की आजादी नहीं मिलती।

मृत्यु ही जीवन को उसका अर्थ देती है।

यह जान लेने पर कि तुम्हें गिनती के दिन मिले हैं, तुम्हारा समय अपने आप कम हो जाता है।

फिल्म को देखने के लगभग साल भर बाद भी यह दृश्य मेरी आँखों के सामने एकदम ताज़ा है।

इसपर आप विचार करेंगे तो पाएँगे कि जीवन को बहुत सुंदर बनाने वाली जितनी भी चीज़ें हैं वे नश्वर हैं।

आपकी आइसक्रीम बहुत स्वादिष्ट इसलिए लगती है क्योंकि वह पिघलती रहती है।

अपने प्रेमी के साथ बीतने वाला वक्त अनमोल जान पड़ता है क्योंकि पूरे जीवन भर में आप उसे कुछ सौ/हजार बार ही चूम सकते हो।

दुनिया को बदलने का आपका मिशन जल्दबाजी की माँग करता है क्योंकि आप नहीं जानते कि इसे पूरा करने में आपको कितना समय लगेगा।

हर वह अनुभव जो हमारे यहाँ होने को मूल्यवान बनाता है, बहुत जल्द ही बीत जाता है। एक उम्र हो जाने के बाद सदा-सदा के लिए जीवित रहने की इच्छा खत्म हो जाती है। इसके बावजूद मृत्यु ही हमें सबसे ज्यादा डराती है।

यही जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

अगली बार जब आपकी आइसक्रीम जमीन पर गिर जाए, या आपका दिल टूट जाए, या आपको अपनी किसी ख्वाहिश को दरकिनार करना पड़ जाए तो याद रखें किः

मृत्यु ही जीवन को उसका अर्थ देती है। हमें अपना समय चुनने की आजादी नहीं मिलती।

हर बीत रहा पल ही वह पल था जिसने जीवन को कीमती बनाए रखा था। 

भले ही आपने उसे कैसे भी बिताया हो। ( हिन्दी जे़न से)

Jul 1, 2022

उदंती.com, जुलाई- 2022

वर्ष - 14, अंक - 11

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं

                          - साहिर लुधियानवी

इस अंक में

अनकहीः क्या हम भ्रष्टाचार रोक पाएँगे... -डॉ. रत्ना वर्मा

समाजः अमेरिका में बंदूक संस्कृति के दुष्परिणाम - प्रमोद भार्गव

आधुनिक बोध कथा- 7ः  तेरी बारी - सूरज  प्रकाश

रहन- सहनः वृद्धावस्था में देखभाल का संकट - जुबैर सिद्दिकी

हाइबनः सर्कस का शेर - भीकम सिंह

 विनोद साव से बातचीत  व्यंग्य हिन्दी साहित्य का एक नवोन्मेष है- राजशेखर चौबे

ग़ज़लः सोचा नहीं - धर्मेन्द्र गुप्त

यादेंः जीवन के सफर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को... - वीणा विज ‘उदित’

मालवी लोककथाः तीन प्रश्न - चंद्रशेखर दुबे

कहानीः माँ से मायका - डॉ. रंजना जायसवाल

क्षणिकाएँः मेरे कमरे की खिड़की - प्रीति अग्रवाल

व्यंग्यः पद्मश्री और मैं - यशवन्त कोठारी

कविताः परिंदा -स्वाति शर्मा 

लघुकथाः एक रिश्ता यह भी - डॉ. उमेश महादोषी

लघुकथाः नेताजी गाँव में - विजयानंद विजय

कविताः अक्सर याद आता है गाँव - लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

चोकाः मन्नत के जो धागे - रश्मि विभा त्रिपाठी

किताबेंः धन्य हैं लोकतंत्र के धकियारे! - मुकेश राठौर

प्रेरकः जितनी लम्बी चादर, उतने ही पैर पसारें - निशांत

जीवन दर्शनः क्षितिज पर ऊँटों की आहट - विजय जोशी

अनकहीः क्या हम भ्रष्टाचार रोक पाएँगे...

 डॉ. रत्ना वर्मा
भारत में कोई सरकार अपने ही मंत्री को भ्रष्टाचार या कमीशनखोरी के लिए बर्खास्त करे या गिरफ्तार करवाए, तो चौंकने वाली खबर तो बनती है। हाल ही में पंजाब सरकार ने अपने ही मंत्री को कमीशनखोरी के आरोप में जेल भेजकर एक ईमानदार पहल की है। काश ऐसी पहल सभी प्रदेश के मुख्यमंत्री करने लगें, तो देश में तरक्की के रास्ते खुल जाएँपर ऐसा सोचना तो फिलहाल स्वप्न जैसा ही है।  वैसे पंजाब सरकार ने जनता से किए वादे के अनुसार भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने के अपने वादे को पूरा किया है, विरोधी दल भले ही इसे राजनीतिक पब्लिसिटी स्टंट बता रहे होंपरंतु लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार को देखते हुए जनता के लिए यह खुशी की बात है और देश के लिए भीक्योंकि चुनाव में प्रत्येक पार्टी भ्रष्टाचार- मुक्त सरकार देने का वादा तो करती है, परंतु जैसे ही सत्ता में आती है, सब भूलकर स्वयं भी उसी व्यवस्था में लिप्त हो जाती है।

हमारे देश के लिए भ्रष्टाचार कोई नई समस्या नहीं है, आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार ने देश में अपनी जड़े जमानी शुरू कर दी थीं, यही वजह हैं कि भ्रष्टाचार को लोगों ने जीवन में ऐसे स्वीकार कर लिया है, जैसे चाय में चीनी या दाल में नमक। इतना ही नहीं इसे भ्रष्टाचार नहीं, शिष्टाचार का नाम तक दे डाला है; क्योंकि चाहे कितना भी बड़ा काम हो या कितना भी छोटा, बगैर रिश्वत दिए आपका काम होगा ही नहीं। यहाँ तक कि अपने वाजिब अधिकार के लिए भी आपको हर कदम पर रिश्वत देनी पड़ती है। जो इस व्यवस्था के खिलाफ बात करते हैं, उन्हें भी कुछ ले- देकर मामला खतम करना ही बेहतर उपाय लगता है। सच भी है, यदि आप ईमानदारी की लड़ाई लड़ने जाएँगे, तो वहाँ भी न्याय कब मिलेगा, नहीं कह सकते। जब सरकार, व्यवस्था, पुलिस और कानून सब इसमें लिप्त हैं, तो कौन भला इससे अछूता रह सकता है।

रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी चोरी, डकैती जैसे छोटे- बड़े सभी अपराधों के लिए नियम कानून बने हैं। सजा भी होती है, तो लोग बरी भी हो जाते है।  सब कुछ होने के बाद भी आखिर चोरी, हत्या, लूटमार सब कुछ तो जीवन में होता है, उन्हें जेल होती है, मुकदमा चलता है, वैसे ही भ्रष्टाचार भी अबाध गति से जारी है। हम सोचते हैं कि आज एक चपरासी भी रिश्वत के बिना अंदर नहीं जाने देता, तो अंदर बैठा बाबू और अधिकारी, तो हाथ में बगैर कुछ रखे बात भी नहीं करेगा; इसीलिए जब किसी भी सरकारी काम-काज के लिए निकलते हैं, तो पहले व्यक्ति अपनी जेब टटोलता है कि देने के लायक उनके पास पैसे हैं या नहीं।

इस तरह के विचार हमारे जीवन में इतने रच-बस गए हैं कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को गंभीर चिंतन के रूप में हम लोगों ने देखना ही बंद कर दिया है। यही सब कारण है कि लोगों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाना, तो बहुत दूर की बात है बात करना भी लोगों ने बंद कर दिया है। हम सोचते हैं कि एक बाबू और अधिकारी को रिश्वत लेते पकड़वाकर क्या हम भ्रष्टाचार को खत्म कर सकते हैं? जहाँ ऊपर तक भ्रष्टाचार की जड़ें जमी हों वहाँ भला एक अदना से बाबू को रिश्वत लेते पकड़वाने से क्या हो जाएगा। बड़े बड़े घोटालों में जैसे- आइपीएल घोटाला, 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श घोटाला आदि -आदि... अफसोस इस बात पर है कि जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो जनाक्रोश होना चाहिए, वह कहीं दिखाई नहीं देता। सरकारें आती हैं, चली जाती हैं; पर भ्रष्टाचार है कि पंख पसारे पूरी व्यवस्था को अपनी गिरफ्त में लिए चले जा रहा है।

अब देखा जाए कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए बने कानून कितने कारगर है। 2018 में सरकार ने दोनों सदनों में प्रिवेंशन ऑफ करप्शन अमेंडमेंट एक्ट पास तो करा लिया, यह कहते हुए कि यह कानून भ्रष्टाचार रोकने में कारगर साबित होगा। परंतु दिग्गज कानून विशेषज्ञ ही इस कानून में कई खामियाँ निकाल रहे हैं जैसे- नए कानून के अनुसार पहले सबूत देना होगा, फिर सरकार जाँच की अनुमति देगी।  इससे भ्रष्टाचार में निवारण तो दूर बल्कि बढ़ावा ही मिलेगा। बिना जाँच के कोई सबूत कहाँ से लाएगा। इसी तरह आय से अधिक संपत्ति को लेकर बनाए गए संशोधित कानून पर भी सवाल उठ रहे हैं. संशोधित कानून में यह साबित करना होगा कि आय से अधिक संपत्ति गलत नीयत से, गलत तरीके से बनाई गई है। इतना ही नहीं रिश्वत देने वाले पर रिश्वत लेने वालों के बराबर मुकदमा चलाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पहले तो लोग सरकारी गवाह के तौर पर सरकारी एजेंसियों की जाँच में सहायक होते थे।; लेकिन नए कानून में 7 दिन के बाद दोनों समान रूप से जिम्मेदार माने जाएँगे। ऐसे में रिश्वत लेने और देने वाले कभी भी एक दूसरे का भंडाफोड़ करने से हिचकिचाएँगे,

क्योंकि कानून की नजर में दोनों समान रूप से दोषी करार दिए जाएँगे। सजा का जो प्रावधान है, उसे भी सही नहीं माना जा रहा है। भ्रष्टाचार चाहे छोटा हो या बड़ा, दोनों समान रूप से सजा के भागीदार होंगे। तो बड़ा भ्रष्टाचार करो और गलत तरीके से कमाए पैसे देकर थोड़ी- सी सजा पाकर छूट जाओ।, तो सबसे पहले कानून को सख्त करना होगा।

 साथ ही सबसे ज्यादा जरूरी है शीर्ष पर बैठे राजनेता ईमानदार हों। यदि सरकारें आरंभ में ही इसपर लगाम लगाने को दृढ़संकल्पित होतीं, तो आज देश इस दलदल में नहीं फँसा होता। इसकी शुरूआत तो ऊपर से नीचे की ओर करनी होगी। जिस दिन शीर्ष स्तर का नेतृत्व भ्रष्टाचार से मुक्त होगा, तभी वह अपने से नीचे की व्यवस्था और नौकरशाही पर लगाम लगा सकेगा। अब यदि इसकी शुरूआत पंजाब से हो चुकी है, तो इसे एक दिन की खबर बनाकर समाप्त नहीं करना चाहिए। मीडिया के भी अपने फायदे- नुकसान हैं। वह भी उन्हीं खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करता हैं, जिनसे उन्हें फायदा होता है । यहाँ तक कि बड़े- बड़े घोटाला करने वाले राजनेता और व्यापारी, जो आज जेल की हवा खा रहे हैं, उनकी सजा की खबर को भी एक छोटे से कॉलम में छापकर अपनी जिम्मेदारी से बरी हो जाते हैं। जैसे अभी हाल ही में यह खबर समाचार- पत्र के भीतर के पेज में एक कोने में सिंगल कॉलम में छपी थी– ‘सीबीआई की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति जमा के लिए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने 50 लाख का जुर्माना लगाया और पूर्व सीएम की चार संपत्तियों को भी जब्त कर लिया।’ कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए देश के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक और समूचे समाज को आगे आ कर आवाज उठानी होगी। चुप बैठे रहने से तो जैसे आजादी के 75 साल गुजर गए ; आगे कई 75 साल और गुजर जाएँगे। भ्रष्ट नौकरशाहों और भ्रष्ट राजनेताओं के बीच घिरी जनता बस तमाशबीन बनकर रह जाएगी। जनता चाहे तो अपनी ताकत दिखा सकती है, वह उसे ही अपने प्रदेश का मुखिया चुने, जो अपनी जनता को भ्रष्टाचार मुक्त राज्य देने का वादा करे।

समाजः अमेरिका में बंदूक संस्कृति के दुष्परिणाम

- प्रमोद भार्गव

यह सच्चाई कल्पना से परे लगती है कि विद्या के मंदिर में पढ़ाई जा रही किताबें हिंसा की रक्त रंजित इबारत लिखेंगी ? लेकिन हैरत में डालने वाली बात है कि इन हृदयविदारक घटनाओं का एक लंबे समय से सिलसिला हकीकत बना हुआ है। देश के महानगर और शैक्षिक गुणवत्ता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले देश अमेरिका के रॉब एलीमेंट्री प्राथमिक विद्यालय में एक 18 वर्षीय छात्र साल्वाडोर रैमोस ने अँधाधुँध गोलीबारी करके 19 छात्रों समेत 21 लोगों की हत्या कर दी। इनमें उसकी दादी भी शामिल है। घर पर दादी की हत्या के बाद ही उसने स्कूल में पहुँचकर यह तांडव रचा था। इस घटना के बाद अमेरिका ने चार दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा तो कर दी, लेकिन हथियार बेचने वाली बंदूक लॉबी पर अंकुश लगाए जाने के कोई ठोस उपाय अमेरिका जैसा ‘शक्तिशाली देश नहीं कर पा रहा है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने राष्ट्र के नाम दिए संबोधन में कहा है कि ‘स्कूल में बच्चों ने अपने मित्रों को ऐसे मरते देखा, जैसे वे किसी युद्ध के मैदान में हों। एक बच्चे को खोना ऐसा है, जैसे की आपकी आत्मा का एक हिस्सा चीर दिया गया हो। बावजूद इसके क्या हमें नहीं सोचना चाहिए कि आखिर हम बंदूक संस्कृति के विरुद्ध कब खड़े होंगे? और कुछ ऐसा करेंगे, जो हमें करना चाहिए।’ साफ है, बाइडेन का इशारा संसद की तरफ था, जिससे वह संविधान में संशोधन कर ऐसा कानून बनाए, जिससे बंदूक रखने पर अंकुश लगे।

अमेरिका में कोरोना कालखंड में भी ऐसी ही घटना देखने में आई थीं, जब दसवीं कक्षा के एक 14 वर्षीय नाबालिग छात्र ने  तीन छात्रों की शाला परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। हत्यारे आरोपी छात्र ने अपने पिता की सेटमी स्वचालित बंदूक से करीब 20 गोलियाँ दागी थीं। अचरज में डालने वाली बात है कि कोरोना के भयावह संकटकाल में भी अमेरिका में बंदूकों की माँग सात गुना बढ़ गई थी। इनमें से 62 प्रतिशत बंदूकें गैर श्वेतों के पास हैं। इस बीच महिलाओं में भी बंदूकें खरीदने की दिलचस्पी बढ़ी है। महिलाएँ पिंक पिस्टल खरीद रही हैं। बंदूकों की इस बढ़ी बिक्री का ही परिणाम है कि 2021 में ही फायरिंग की 650 घटनाएँ घट चुकी हैं और दस छात्रों की मौत इस एक साल में हो चुकी थी। इस साल इसी प्रकृति की अमेरिका में 200 से ज्यादा घटनाएँ घट चुकी हैं। साफ है, आधुनिक और उच्च शिक्षित माने जाने वाले इस देश में हिंसा की इबारत लिखने का खुला कारोबार चल रहा है। जाहिर है, यहाँ के शिक्षा संस्थानों में किताबों से संस्कार ग्रहण करने वाली शिक्षा शायद हिंसा की इबारत कैसे लिखी जाए, यह पाठ पढ़ा रही है ?

अमेरिका ‘गन कल्चर’ से उबर नहीं पा रहा है। सार्वजनिक स्थानों, विद्यालयों, संगीत समारोहों आदि में आए दिन बंदूक की आवाज सुनाई दे जाती है। नतीजतन युनाइटेड स्टेट का यह गन कल्चर उसके लिए आत्मघाती दस्ता साबित हो रहा है;  इसलिए अमेरिका में रोजाना 53 लोगों की गोली मारकर हत्या होती है। अमेरिका में होने वाली हत्याओं में से 79 प्रतिशत लोग बंदूक से मारे जाते हैं। अमेरिका की कुल आबादी लगभग 33 करोड़ है, जबकि यहाँ व्यक्तिगत हथियारों की संख्या 39 करोड़ हैं। अमेरिका में हर सौ नागरिकों पर 120.5 हथियार हैं। अमेरिका में बंदूक रखने का कानूनी अधिकार संविधान में दिया हुआ है। ‘द गन कन्ट्रोल एक्ट’1968 के मुताबिक, रायफल या कोई भी छोटा हथियार खरीदने के लिए व्यक्ति की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। 21 वर्ष या उससे अधिक उम्र है तो व्यक्ति हैंडगन या बड़े हथियार भी खरीद सकते हैं। इसके लिए भारत की तरह किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है। इसी का परिणाम है कि जब कोरोना से अमेरिका जूझ रहा था, तब 2019 से लेकर अप्रैल 2021 के बीच 70 लाख से ज्यादा नागरिकों ने बंदूकें खरीदी हैं। यहाँ घटने वाली इस प्रकृति की घटनाओं को सामाजिक विसंगतियों का भी नतीजा माना जाता है। अमेरिकी समाज में नस्लभेद तो पहले से ही मौजूद है, अब बढ़ती धन-संपदा ने ऊँच-नीच और अमीरी-गरीबी की खाई को भी खतरनाक ढंग से चौड़ा कर दिया है। टेक्सास के प्राथमिक विद्यालय का हमलावर यह छात्र भी अत्यंत गरीब परिवार से था। इसके सहपाठियों ने बताया है कि उसके सस्ते कपड़ों के कारण अन्य छात्र उसकी खिल्ली उड़ाया करते थे। गरीबी को इंगित करने वाला यह मजाक 21 लोगों की जान पर भारी पड़ गया।

दरअसल अमेरिका ही नहीं, दुनिया के उच्च शिक्षित और सभ्य समाजों में परिवार या कुटुंब की अवधारणा समाप्त होती चली जा रही है। परिवार निरंतर विखंडित हो रहे हैं। यहाँ पति और पत्नी दोनों को अपने विवाहेतर संबंधों की मर्यादा का कोई ख्याल नहीं है। नतीजतन तलाक की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में उपेक्षित और हीन भावना से ग्रस्त युवा आक्रोश, असहिष्णुता एवं हिंसक प्रवृत्ति की गिरफ्त में आकर मानसिक रूप से विक्षिप्त हो रहा है। इन मानसिक बीमारियों को बढ़ाने में बेरोजगारी भी बड़ा कारण बन रही है। अवसाद की स्थिति में जब युवकों को आसानी से बंदूक हाथ लग जाती है, तो वे अपने भीतरी आक्रोश को हिंसा की इबारत लिखकर तात्कालिक उपाय कर लेते हैं;  किंतु उनका और उनके परिजनों का दीर्घकालिक जीवन कानूनी दुविधाओं के चलते लगभग नष्ट हो जाता है। गन कल्चर नाम से कुख्यात इस प्रवृत्ति पर अंकुश के लिए अमेरिका में पचास साल से चर्चाएँ तो हो रही हैं,

लेकिन संविधान में बदलाव दूर की कौड़ी बना हुआ है। अमेरिकी नागरिक को बंदूक रखने पर गर्व की अनुभूति होती है और वह इस अधिकार को बने रहना चाहता है। बंदूक लॉबी विज्ञापनों के जरिए इस माहौल को गर्वयुक्त बनाए रखने की पृष्ठभूमि रचती रहती है।     

 विद्यालयों में छात्र- हिंसा से जुड़ी ऐसी घटनाएँ पहले अमेरिका जैसे विकसित देशों में ही देखने में आती थीं, लेकिन अब भारत जैसे विकासशील देशों में भी क्रूरता का यह सिलसिला चल निकला है। हालाँकि भारत का समाज अमेरिकी समाज की तरह आधुनिक नहीं है कि जहाँ पिस्तौल अथवा चाकू जैसे हथियार रखने की छूट छात्रों को हो। अमेरिका में तो ऐसी विकृत संस्कृति पनप चुकी है, जहाँ अकेलेपन के शिकार एवं माँ-बाप के लाड-प्यार से उपेक्षित बच्चें घर, मोहल्ले और संस्थाओं में जब-तब पिस्तौल चला दिया करते हैं। आज अभिभावकों की अतिरिक्त व्यस्तता और एकांगिकता जहाँ बच्चों के मनोवेगों की पड़ताल करने के लिए दोषी है, वहीं विद्यालय नैतिक और संवेदनशील मूल्य बच्चों में रोपने में सर्वथा चूक रहे हैं। छात्रों पर विज्ञान, गणित और वाणिज्य विषयों की शिक्षा का बेवजह दबाव भी बर्बर मानसिकता विकसित करने के लिए दोषी हैं। आज साहित्य, समाजशास्त्र व मनोविज्ञान की पढ़ाई पाठ्यक्रमों में कम से कमतर होती जा रही है,

जबकि साहित्य और समाजशास्त्र ऐेसे विषय हैं जो समाज से जुड़े सभी विषयों और पहलुओं का वास्तविक यथार्थ प्रकट कर बाल-मनों में संवेदनशीलता का स्वाभाविक सृजन करने के साथ सामाजिक विसंगतियों से परिचत कराते हैं। इससे हृदय की जटिलता टूटती है और सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के कोमल भाव भी बालमनों में अंकुरित होते हैं। महान और अपने-अपने क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों की जीवन-गाथाएँ (जीवनियाँ) भी व्यक्ति में संघर्ष के लिए जीवटता प्रदान करती हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसा कोई पाठ्यक्रम पाठशालाओं में नहीं है, जिसमें कामयाब व्यक्ति की जीवनी पढ़ाई जाती हो ? जीवन-गाथाओं में जटिल परिस्थितियों से जूझने एवं उलझनों से मुक्त होने के सरल, कारगर और मनोवैज्ञानिक उपाय भी होते हैं।

वैसे मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आमतौर से बच्चे आक्रामकता और हिंसा से दूर रहने की कोशिश करते हैं। लेकिन घरों में छोटे पर्दे और मुट्ठी में बंद मोबाइल पर परोसी जा रही हिंसा और सनसनी फैलाने वाले कार्यक्रम इतने असरदार साबित हो रहे हैं कि हिंसा का उत्तेजक वातावरण घर-आँगन में विकृत रूप लेने लगा है, जो बालमनों में संवेदनहीनता का बीजारोपण कर रहा है। मासूम और बौने से लगने वाले कार्टून चरित्र भी पर्दे पर बंदूक थामे दिखाई देते हैं, जो बच्चों में आक्रोश पैदा करने का काम करते हैं। कुछ समय पहले दो किशोर मित्रों ने अपने तीसरे मित्र की हत्या केवल इसलिए कर दी थी कि वह उन्हें वीडियो गेम खेलने के लिए तीन सौ रुपये नहीं दे रहा था। लिहाजा छोटे पर्दे पर लगातार दिखाई जा रही हिंसक वारदातों के महिमामंडन पर अंकुश लगाया जाना जरूरी है। यदि बच्चों के खिलौनों का समाजशास्त्र एवं मनोवैज्ञानिक ढंग से अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाए तो हम पाएँगे की हथियार और हिंसा का बचपन में अनाधिकृत प्रवेश हो चुका है।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224