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Apr 21, 2020

कोरोनावायरस से उबरने का मतलब?

कोरोनावायरस से उबरने का मतलब?

दिन-ब-दिन कोरोनोवायरस संक्रमितों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अच्छी बात यह है कि कोरोनावायरस से संक्रमित अधिकांश मरीज़ इस संक्रमण से उबर जाते हैं। लेकिन संक्रमण से उबरना मात्र बेहतर महसूस करने की तुलना में थोड़ा पेचीदा मामला है।
जब कोई व्यक्ति वायरस के संपर्क में आता है तो शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाना शुरु करता है। ये एंटीबॉडी वायरस को नियंत्रित करती हैं और उसे अपनी प्रतिलिपियाँ बनाने से रोकती हैं। जब एंटीबॉडी वायरस को रोकने में सफल हो जाती हैं, तो मरीज़ में रोग के लक्षण दिखना कम होने लगते हैं और व्यक्ति बेहतर महसूस करने लगता है। यदि सब ठीक-ठाक चले तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली सारे वायरसों को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति स्वास्थ्य पर बगैर किसी दूरगामी प्रभाव या अक्षमता के ठीक हो जाता है तो कहते हैं कि वह उबर गया है।
सामान्य तौर पर एक बार जब कोई व्यक्ति वायरस के संक्रमण से उबर जाता हैं तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इस वायरस को याद रखती है। यदि यही वायरस दोबारा हमला करता है तो एंटीबॉडीज़ शुरुआत में ही इस वायरस का सफाया शुरू कर देती हैं। यानी व्यक्ति में उस वायरस के विरुद्ध प्रतिरक्षा विकसित हो जाती है; टीके इसी सिद्धांत पर काम करते हैं।
लेकिन अफसोस कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र एकदम सटीक नहीं होता। मम्स (गलसुआ) जैसे कई रोगों के वायरस के खिलाफ प्रतिरक्षा समय के साथ खत्म हो जाती है और भविष्य में फिर संक्रमण की संभावना बन जाती है। चूंकि यह कोरोनावायरस नया है इसलिए वैज्ञानिक अभी नहीं जानते कि जो लोग कोरोनावायरस के संक्रमण से उबर गए हैं उनके शरीर में प्रतिरक्षा कितने समय तक टिकी रहेगी।
लेकिन सवाल यह है कि ठीक-ठीक कब माना जाएगा कि कोई मरीज़ कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक हो चुका है। सीडीसी के अनुसार किसी व्यक्ति को कोरोनावायरस के संक्रमण से उबरा हुआ तब माना जाएगा जब वह शारीरिक रूप से और जांच, दोनों मानदंडों पर खरा उतरेगा। शारीरिक स्तर पर, बुखार कम करने वाली दवाएँ बंद करने के बाद लगातार तीन दिन तक मरीज़ को बुखार नहीं आना चाहिए, खाँसी और सांस की तकलीफ सहित अन्य लक्षणों में सुधार दिखना चाहिए, और लक्षण दिखना शुरू होने के बाद कम से कम सात दिन बीत जाने चाहिए। सीडीसी के अनुसार इसके अलावा, मरीज़ के 24 घंटे के अंतराल में दो बार किए गए परीक्षण के नतीजे नकारात्मक होना चाहिए। जब शारीरिक रूप से और परीक्षण दोनों स्थितियाँ इस बात की पुष्टि करें कि व्यक्ति कोरोनावायरस से संक्रमित नहीं हैं तभी किसी व्यक्ति को आधिकारिक तौर पर इस संक्रमण से उबरा हुआ माना जाएगा।
यहाँ एक और सवाल उठता है कि क्या इस संक्रमण से उबर चुके मरीज़ आगे मददगार साबित हो सकते हैं? जैसा कि डॉक्टर कह रहे हैं कि इस संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों में इस बात का पता लगाया जाए कि क्या उनमें इसके विरुद्ध प्रतिरक्षा विकसित हुई है? यदि उनमें कोरोनावायरस के विरुद्ध प्रतिरक्षा विकसित हुई है तो ये लोग अन्य संक्रमित व्यक्तियों की देखभाल में मदद कर सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)

कोरोना वायरस के स्रोत पर गहराता रहस्य

कोरोना वायरस के स्रोत पर गहराता रहस्य
विश्व भर में तबाही मचाने वाले कोरोना वायरस के स्रोत की पहचान करने के लिए वैज्ञानिकों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। आनुवंशिक विश्लेषण के आधार पर चीनी वैज्ञानिकों ने चींटी खाने वाले पैंगोलिन को इसका प्रमुख संदिग्ध बताया था। अन्य तीन पैंगोलिन कोरोना वायरस के जीनोम के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इसे अभी भी एक दावेदार के रूप में देखते हैं, लेकिन गुत्थी अभी पूरी तरह सुलझी नहीं है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह 2002 में सिवेट (मुश्कबिलाव) से कोरोना वायरस मनुष्यों में आया था उसी तरह इस रोगजनक ने किसी जीव से ही मनुष्यों में प्रवेश किया होगा। फिलहाल चाइनीज़ सेंटर फॉर डिसीस कंट्रोल एंड प्रिवेंशन सहित चीन की तीन प्रमुख टीमें इसकी उत्पत्ति का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं। 
पैंगोलिन पर संदेह करने के कुछ खास कारण हैं। चीन में पैंगोलिन के मांस  की काफी माँग है और शल्क का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है। हालांकि चीन में इसकी बिक्री पर प्रतिबंध है फिर भी इसकी तस्करी आम बात है। शोधकर्ताओं के अनुसार तस्करी किए गए पैंगोलिन से प्राप्त कोरोना वायरस, आनुवंशिक रूप से लोगों में मिले कोरोना वायरस के नमूनों से 99 प्रतिशत मेल खाता है। लेकिन यह परिणाम पूरे जीनोम पर आधारित नहीं है। यह जीनोम के एक विशिष्ट हिस्से से सम्बंधित है जिसे रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन (आरबीडी) कहा जाता है। पूरे जीनोम के स्तर पर मनुष्यों और पैंगोलिन से प्राप्त वायरस का डीएनए 90.3 प्रतिशत ही मेल खाता है।    
आरबीडी कोरोना वायरस का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह वायरस को कोशिका में प्रवेश करने की क्षमता देता है। अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार दो वायरसों के आरबीडी में 99 प्रतिशत समानता होने के बाद भी उन्हें एक-दूसरे से सम्बंधित नहीं माना जा सकता है। विभिन्न अध्ययनों में 85.5 प्रतिशत से 92.4 प्रतिशत समानता पाई गई है।
मैकमास्टर युनिवर्सिटी, कनाडा में अध्ययनरत अरिंजय बैनर्जी के अनुसार पूर्व में सार्स वायरस का 99.8 प्रतिशत जीनोम सिवेट बिल्ली के जीनोम से मेल खाता पाया गया था, जिसके चलते सिवेट को इसका स्रोत माना गया था।
अभी तक मनुष्यों से प्राप्त कोरोना वायरस सर्वाधिक (96 प्रतिशत) चमगादड़ों से प्राप्त कोरोना वायरस से मेल खाता है। लेकिन इन दो वायरसों में आरबीडी साइट्स का अंतर पाया गया है। इससे यह पता चलता है कि चमगादड़ों से यह कोरोना वायरस सीधा मनुष्यों में नहीं बल्कि किसी मध्यवर्ती जीव से मनुष्यों में प्रवेश किया है।
कुछ अन्य अध्ययन मामले को और अधिक रहस्यमयी बना रहे हैं। यदि यह वायरस पैंगोलिन से आया है तो फिर जिस देश से इसको तस्करी करके लाया गया है वहाँ इसके संक्रमण की कोई रिपोर्ट क्यों नहीं है? लेकिन एक चिंता यह व्यक्त की गई है कि पैंगोलिन को वायरस का स्रोत मानकर लोग इसे मारने न लगें जैसा सार्स प्रकोप के समय सिवेट के साथ हुआ था।(स्रोत फीचर्स)

चिड़ियाघर में बाघिन कोरोना संक्रमित

चिड़ियाघर में बाघिन कोरोना संक्रमित
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसायटी ने हाल ही में घोषणा की है कि न्यूयॉर्क के एक चिड़ियाघर ब्रॉन्क्स ज़ू की एक 4-वर्षीय बाघिन (नादिया) कोविड-19 पॉज़िटिव निकली है। गौरतलब है कि न्यूयॉर्क अत्यधिक संक्रमित क्षेत्र है।
यह मलायन बाघिन, बिल्ली कुल के छ: अन्य साथियों (जिनमें नादिया की एक बहन, दो अमूर बाघ और तीन अफ्रीकी शेर शामिल हैं) के साथ सूखी खांसी से पीड़ित थी। हालांकि इन अन्य प्राणियों की जांच नहीं की गई है किंतु ज़ू के अधिकारी मानकर चल रहे हैं कि ये सब SARS-CoV-2 से संक्रमित हैं जो कोविड-19 का कारण है।
दरअसल, इस बाघिन की जांच ऐहतियात के तौर पर की गई थी और अधिकारियों की कहना है कि उन्हें इस बाघिन के अध्ययन से जो भी जानकारी मिलेगी वह कोरोनावायरस से हमारी विश्वव्यापी लड़ाई में मददगार ही होगी।
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसायटी का मत है कि चिड़ियाघर का एक कर्मचारी कोविड-19 से पीड़ित था और संभवत: उसने ही इन बिल्लियों को संक्रमित किया है। इसके बाद से सभी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के उपाय लागू कर दिए गए हैं।
यह देखा गया है कि संक्रमित जानवरों की भूख कम हुई है लेकिन चिड़ियाघर के अनुसार उनकी हालत ठीक है। चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक इन बाघ-शेरों की देखभाल व उपचार में लगे हैं।
एक अच्छी बात यह है कि बिल्ली कुल के अन्य प्राणियों में फिलहाल कोविड-19 के लक्षण नहीं दिखे हैं।
यह देखा जा चुका है कि पालतू बिल्लियां संक्रमित हुई हैं। पता चला है कि उनकी श्वसन कोशिकाओं की सतह पर लगभग वैसे ही ग्राही पाए जाते हैं, जैसे मनुष्य की कोशिकाओं पर होते हैं, जो वायरस को कोशिका में प्रवेश करने में मदद करते हैं। वैसे अभी इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि बिल्लियां यह वायरस मनुष्यों में फैला सकती हैं। बहरहाल, न्यूयॉर्क के विभिन्न चिड़ियाघरों को बंद कर दिया गया है। (स्रोत फीचर्स)

Mar 8, 2020

उदंती.com, मार्च- 2020

उदंती.com  मार्च- 2020  
वर्ष- 12, अंक- 8, मार्च- 2020  

 सुबह की नींद इंसान के इरादों को कमजोर करती है, मंज़िलों को हासिल करने वाले कभी देर तक सोया नहीं करते। वो आगे बढ़ते हैं जो सूरज को जगाते हैं। वो पीछे रह जाते हैं जिनको सूरज जगाता है। -स्वामी विवेकानन्द

व्यंग्यः रचना प्रकाशन के सोलह संस्कार -बी.एल.आच्छा    
जीवन दर्शनः होली- उल्लास एवं उमंग का उत्सव -विजय जोशी



उदंती.com के आवरण पृष्ठ पर इस बार डॉ. सुनीता वर्मा का एक्रेलिक रंग से बना चित्र प्रस्तुत है। हम छत्तीसगढ़ वासियों के लिए यह गौरव की बात है कि चित्रकला के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी डॉ. सुनीता को छत्तीसगढ़ सरकार की अनुशंसा पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत ललितकला अकादमी (राष्ट्रीय कला संस्थान) का जनरल काउंसिल मेंबर मनोनीत किया गया है। भिलाई डीपीएस स्कूल में आर्ट टीचर के रूप में कार्यरत सुनीता का पता है- फ्लैट नंबर २४२, आर्किड अपार्टमेंट ११, ताल पुरी, ब्लाक – बी, भिलाई छत्तीसगढ़।  मोबाइल नंबर- ९४०६४२२२२२                                                                                                                                   

प्रेम और सद्भावना का रंग...

प्रेम और सद्भावना का रंग...
-डॉ. रत्ना वर्मा
      इन दिनों देश की आबोहवा में कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। राजधानी हिंसा की आग में जल रहा है। राष्ट्रहित,  मानवता और सर्वधर्म समभाव की भावना को सर्वोपरि रखने वाले भारत देश में हिंसा का जैसा तांडव इन दिनों देखने को मिल रहा है, जिस तरह के नारे लगाए जा रहे हैं, उसे किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं कहा जा सकता।
     कुल मिलाकर मौसम में आ रहे लगातार बदलाव और राजनैतिक, सामाजिक, और राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सरगर्मियों के बीच सारे राग-द्वेष भुलाकर भारतवासी आने वाले दिनों में रंगों का त्योहार होली मनाकर, देश में लम्बे समय से चल रहे तनाव को दूर भगाने का जतन कर ही रहे थे कि तभी कोरोना वायरस के हमले ने समूचे देशवासियों को हिलाकर रख दिया। इस वायरस ने सबको इतना अधिक भयभीत कर दिया है कि अपनों से गले मिलना तो दूर, उनका आपस में बात करना भी दूभर हो गया है। कोई पास से छींकते या खाँसते हुए निकलता है, तो मन में बस एक ही सवाल आता है, कहीं इसे कोरोना वायरस तो नहीं?
     किसी भी महामारी से भयभीत होकर इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करना ठीक नहीं है, बल्कि देश के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिकों का दायित्व है कि वे लोगों में जागरुकता लाएँ । ऐसे समय में सबसे ज्यादा सक्रिय सोशल मीडिया हो जाता है और सबसे पहले अफवाहों का दौर वहीं से शुरू होता है, जो महामारी से भी ज्यादा तेजी से फैलता है। सोशल मीडिया इतना शक्तिशाली माध्यम है कि एक ही पल में करोड़ों लोगों तक एक साथ खबर पहुँच जाती है, तो क्यों न इसका उपयोग अफवाहें फैलाने के बजाय, भय फैलाने वाली खबरों पर रोक लगाने के लिए किया जाना चाहिए। 
     जब देश और दुनिया में किसी भी महामारी का हमला होता है, तो सबसे जरूरी है कि पूरी सावधानी बरती जाए। अभी तक कोरोना वायरस को समाप्त करने के लिए किसी दवाई का पता नहीं चल पाया है; अतः जरूरी हो जाता है कि इसके बचाव के तरीकों पर शासकीय और अशासकीय स्तर पर प्रत्येक नागरिक को काम करना चाहिए। यदि लोग भूले नहीं होंगे तो 2003 में सार्स वायरस ने पूरी दुनिया में आतंक मचा रखा था, लेकिन भारत ने उस वायरस को अपने यहाँ घुसने नहीं दिया था।
     कोरोना वायरस ने भारत में दस्तक दे दी है , एक के बाद एक कई राज्यों से इसकी चपेट में आए संक्रमित लोगों की खबरें आ रही हैं; इसीलिए अब और अधिक सावधान रहने की ज़रूरत है। इससे बचाव के किन- किन चीजों से परहेज़ करें, स्वच्छता का कितना ध्यान रखें, लोगों से कैसे मिलें, भीड़ वाली जगहों से कैसे बचें, यात्रा में क्या सावधानी बरतें, जैसी वायरस से बचने के लिए जरूरी बातें प्रत्येक इंसान तक पहुँचाई जानी चाहिए।
    
सरकार अपने स्तर पर बचाव की तैयारियों में जुट गई है। अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड बनाए जा रहे हैं। विदेशों से आ रहे लोगों की हवाई अड्डों पर थर्मल जाँच की जा रही है; परंतु हमारे देश की एक गंभीर समस्या है - चाहे युद्ध हो, आपदा हो, मँहगाई हो या महामारी, व्यापारी इन्हें भी कमाई का जरिया बना ही लेते हैं- इन दिनों कोरोना भी धन कमाने का जरिया बन गया है- मास्क, सेनेटाइजर, कुछ आवश्यक दवाइयाँ  अचानक बाजार से गायब हो रहे हैं या कई गुना अधिक दाम पर बिक रहे हैं। यह कालाबाज़ारी एक तरह की अमानवीयता  और समाजद्रोह है, जिसका प्रतिकार किया जाना चाहिए।
     यह समय संयम का है, घबराने का नहीं और दुनिया को आपस में मिलकर इस जानलेवा बीमारी का इलाज खोजना आज की पहली जरूरत है। कोरोना को लेकर सावधानी बरतते हुए इस बार प्रधानमंत्री के साथ कई लोगों ने सार्वजनिक रूप से होली मिलन के कार्यक्रमों में शामिल न होने का निर्णय लिया है, तो कइयों ने दिल्ली में हुई हिंसा के चलते होली न मनाने का फैसला किया है।  भारत में मनाया जाने वाला रंगों का यह त्योहार प्रेम,  सद्भाव और मिलन का पर्व है, भले ही इस बार आप रंग मत खेलिए, गले मत मिलिए, हाथ मत मिलाइए परंतु आपसी नफ़रत  भुलाकर इस संकट की घड़ी से उबरने के लिए शांति और सहयोग बनाकर रखिए। तो आइए देश की आबोहवा में फैले अलगाव और नफ़रत के इस ज़हर को प्रेम और सद्भावना के रंग में रँगकर दूर भगाएँ।