March 08, 2020

महिला दिवस

नारी की पूजा कहाँ होती है?
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है और आज मैं भोपाल आया हूँ। कई महिला पत्रकारों को सम्मानित करने के लिए, लेकिन आज भी पत्रकारिता तो क्या, सभी क्षेत्रों में क्या हम महिलाओं को समुचित अनुपात में देख पाते हैं? मैंने समुचितअनुपात शब्द का प्रयोग किया है, ‘उचितअनुपात का नहीं। उचित का अर्थ तो यह भी लगाया जा सकता है कि दुनिया में जितने भी काम-धंधे हैं, उन सब में 50 प्रतिशत संख्या महिलाओं की होनी चाहिए। यह ठीक नहीं है। कुछ काम ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत से भी ज्यादा रखना फायदेमंद है और कुछ में वह कम भी हो सकती है। असली बात यह है कि जिस काम को जो भी दक्षतापूर्वक कर सके, वह उसे मिलना चाहिए। उसमें स्त्री-पुरुष का भेदभाव नहीं होना चाहिए। जाति और मजहब का भी नहीं लेकिन इस 21 वीं सदी की दुनिया का हाल क्या है ? संयुक्तराष्ट्र संघ की एक ताजा रपट के मुताबिक दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत पुरुष ऐसे हैं, जो महिलाओं को अपने से कमतर समझते हैं। वे भूल जाते हैं कि भारत, श्रीलंका और इस्राइल की प्रधानमंत्री कौन थीं? इंदिरा गांधी, श्रीमावो भंडारनायक और गोल्डा मीयर के मुकाबले के कितने पुरुष प्रधानमंत्री इन तीनों देशों में हुए हैं? क्या ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गगेरेट थेचर और जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल को हम भूल गए हैं?  भारत की कई महान महारानियों के नाम मैं यहाँ नहीं ले रहा हूँ, जिन्होंने कई महाराजाओं और बादशाहों के छक्के छुड़ा दिए थे। इस समय 193 देशों में से सिर्फ 10 देशों में महिलाएँ शीर्ष राजनीतिक पदों पर हैं। दुनिया की संसदों में महिलाओं की संख्या 24 प्रतिशत भी नहीं है। डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों और वैज्ञानिकों में उनकी संख्या और भी कम है। भारत में महिलाओं से भेदभाव करनेवाले पुरुषों की संख्या 98.28 प्रतिशत है तो पाकिस्तान हमसे भी आगे है। उसमें यह संख्या 99.81 प्रतिशत है। यूरोप, अमेरिका, चीन और जापान जैसे देशों में इधर 40-50 वर्षों में काफी बदलाव आया है। उसी का नतीजा है कि ये देश महासंपन्न और महाशक्ति कहलाने लगे हैं। अपने आधे समाज के प्रति उपेक्षा और हीनता का भाव हम छोड़ सकें तो हमारे दक्षिण एशिया के सभी देश शीघ्र ही संपन्न और सुखी हो सकते है। हमारे यहाँ अभी यह सिर्फ कहावत ही रह गई है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः'। अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है।
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07.03.2020

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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