March 08, 2020

प्रेम और सद्भावना का रंग...

प्रेम और सद्भावना का रंग...
-डॉ. रत्ना वर्मा
      इन दिनों देश की आबोहवा में कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। राजधानी हिंसा की आग में जल रहा है। राष्ट्रहित,  मानवता और सर्वधर्म समभाव की भावना को सर्वोपरि रखने वाले भारत देश में हिंसा का जैसा तांडव इन दिनों देखने को मिल रहा है, जिस तरह के नारे लगाए जा रहे हैं, उसे किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं कहा जा सकता।
     कुल मिलाकर मौसम में आ रहे लगातार बदलाव और राजनैतिक, सामाजिक, और राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सरगर्मियों के बीच सारे राग-द्वे भुलाकर भारतवासी आने वाले दिनों में रंगों का त्योहार होली मनाकर, देश में लम्बे समय से चल रहे तनाव को दूर भगाने का जतन कर ही रहे थे कि तभी कोरोना वायरस के हमले ने समूचे देशवासियों को हिलाकर रख दिया। इस वायरस ने सबको इतना अधिक भयभीत कर दिया है कि अपनों से गले मिलना तो दूर, उनका आपस में बात करना भी दूभर हो गया है। कोई पास से छींकते या खाँसते हुए निकलता है, तो मन में बस एक ही सवाल आता है, कहीं इसे कोरोना वायरस तो नहीं?
     किसी भी महामारी से भयभीत होकर इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करना ठीक नहीं है, बल्कि देश के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिकों का दायित्व है कि वे लोगों में जागरुकता लाएँ । ऐसे समय में सबसे ज्यादा सक्रिय सोशल मीडिया हो जाता है और सबसे पहले अफवाहों का दौर वहीं से शुरू होता है, जो महामारी से भी ज्यादा तेजी से फैलता है। सोशल मीडिया इतना शक्तिशाली माध्यम है कि एक ही पल में करोड़ों लोगों तक एक साथ खबर पहुँच जाती है, तो क्यों न इसका उपयोग अफवाहें फैलाने के बजाय, भय फैलाने वाली खबरों पर रोक लगाने के लिए किया जाना चाहिए। 
     जब देश और दुनिया में किसी भी महामारी का हमला होता है, तो सबसे जरूरी है कि पूरी सावधानी बरती जाए। अभी तक कोरोना वायरस को समाप्त करने के लिए किसी दवाई का पता नहीं चल पाया है; अतः जरूरी हो जाता है कि इसके बचाव के तरीकों पर शासकीय और अशासकीय स्तर पर प्रत्येक नागरिक को काम करना चाहिए। यदि लोग भूले नहीं होंगे तो 2003 में सार्स वायरस ने पूरी दुनिया में आतंक मचा रखा था, लेकिन भारत ने उस वायरस को अपने यहाँ घुसने नहीं दिया था।
     कोरोना वायरस ने भारत में दस्तक दे दी है , एक के बाद एक कई राज्यों से इसकी चपेट में आए संक्रमित लोगों की खबरें आ रही हैं; इसीलिए अब और अधिक सावधान रहने की ज़रूरत है। इससे बचाव के किन- किन चीजों से परहेज़ करें, स्वच्छता का कितना ध्यान रखें, लोगों से कैसे मिलें, भीड़ वाली जगहों से कैसे बचें, यात्रा में क्या सावधानी बरतें, जैसी वायरस से बचने के लिए जरूरी बातें प्रत्येक इंसान तक पहुँचाई जानी चाहिए।
    
सरकार अपने स्तर पर बचाव की तैयारियों में जुट गई है। अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड बनाए जा रहे हैं। विदेशों से आ रहे लोगों की हवाई अड्डों पर थर्मल जाँच की जा रही है; परंतु हमारे देश की एक गंभीर समस्या है - चाहे युद्ध हो, आपदा हो, मँहगाई हो या महामारी, व्यापारी इन्हें भी कमाई का जरिया बना ही लेते हैं- इन दिनों कोरोना भी धन कमाने का जरिया बन गया है- मास्क, सेनेटाइजर, कुछ आवश्यक दवायाँ  अचानक बाजार से गायब हो रहे हैं या कई गुना अधिक दाम पर बिक रहे हैं। यह कालाबाज़ारी एक तरह की अमानवीयता  और समाजद्रोह है, जिसका प्रतिकार किया जाना चाहिए।
     यह समय संयम का है, घबराने का नहीं और दुनिया को आपस में मिलकर इस जानलेवा बीमारी का इलाज खोजना आज की पहली जरूरत है। कोरोना को लेकर सावधानी बरतते हुए इस बार प्रधानमंत्री के साथ कई लोगों ने सार्वजनिक रूप से होली मिलन के कार्यक्रमों में शामिल न होने का निर्णय लिया है, तो कयों ने दिल्ली में हुई हिंसा के चलते होली न मनाने का फैसला किया है।  भारत में मनाया जाने वाला रंगों का यह त्योहार प्रेम,  सद्भाव और मिलन का पर्व है, भले ही इस बार आप रंग मत खेलिए, गले मत मिलिए, हाथ मत मिलाइए परंतु आपसी नरत  भुलाकर इस संकट की घड़ी से उबरने के लिए शांति और सहयोग बनाकर रखिए। तो आइए देश की आबोहवा में फैले अलगाव और नफ़रत के इस ज़हर को प्रेम और सद्भावना के रंग में रँगकर दूर भगाएँ।  

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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