March 08, 2020

मुद्दा

फाँसी का फाँस
जेन्नी शबनम

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह का बयान कि जैसे सोनिया गाँधी ने राजीव गाँधी के हत्यारे को माफ़ किया हैवैसे ही निर्भया की माँ निर्भया के बलात्कारियों को माफ़ कर दें। एक स्त्री होकर वकील साहिबा ऐसा कैसे सोच सकीराजीव गाँधी की हत्या और निर्भया के बलात्कार का अपराध एक श्रेणी में कैसे माना जा सकता हैमानवीय दृष्टि से किसी की मौत के पक्ष में होना सही नहीं है। परन्तु बलात्कार ऐसा अमानवीय अपराध है जिसमें पीड़ित स्त्री के जीवन और जीने के अधिकार का हनन हुआ हैऐसे में बलात्कारी के लिए मानवीय दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता है। इस अपराध के लिए सज़ा के तौर पर शीघ्र मृत्यु दंड से कम कुछ भी जायज नहीं है। 
  
निर्भया के मामले में डेथ वारंट जारी होने के बाद फाँसी में देरी कानूनी प्रावधानों का ही परिणाम है। किसी न किसी नियम और प्रावधान के तहत फाँसी का दिन बढ़ता जा रहा है। अभी चारो अपराधी जेल में हैंढेरों सुरक्षाकर्मी उनके निगरानी के लिए नियुक्त हैंउनकी मानसिक स्थिति ठीक रहे इसके लिए काउन्सिलिंग की जा रही हैशरीर स्वस्थ्य रहे इसके लिए डॉक्टर प्रयासरत हैंउनके घरवालों से हमेशा मिलवाया जा रहा है। आखिर यह सब क्योंजेल मैनुअल के हिसाब से दोषी का फाँसी से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना ज़रूरी है। यह कैसे संभव है कि फाँसी की सजा पाया हुआ मुजरिम बिल्कुल स्वस्थ होभले ही जघन्यतम अपराध किया हो परन्तु फाँसी की सज़ा सुनकर कोई सामान्य कैसे रह सकता हैबलात्कारी की शारीरिक अवस्था और मानसिक अवस्था कैसी भी हो फाँसी की सज़ा में कोई परवर्तन या तिथि को आगे बढ़ाना अनुचित है। निर्भया के बलात्कारियों को अविलम्ब फाँसी पर लटका देना चाहिए।    

ऐसा नहीं है कि बलात्कार की घटनाएँ पहले नहीं होती थी। परन्तु विगत कुछ वर्षों से ऐसी घटनाओं में जिस तरह से वृद्धि हुई हैबेहद अफसोसनाक और चिंताजनक स्थिति है। क़ानून बनेसामजिक विरोध बढ़े परन्तु स्थिति बदतर होती जा रही है। कुछ लोगों का विचार है कि आज की लड़कियाँ फैशनपरस्त हैंकम कपड़े पहनती हैंशाम को अन्धेरा होने पर भी घर से बाहर रहती हैंलड़कों से बराबरी करती हैं आदि-आदिइसलिए छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराध होते हैं। इन लोगों की सोच पर हैरानी नहीं होती है बल्कि इनकी मानसिक स्थिति और सोच पर आक्रोश होता है। अगर यही सब वजह है बलात्कार के तो दुधमुही बच्ची या बुज़ुर्ग स्त्री के साथ ऐसा कुकर्म क्यों होता है?   

अगर सिर्फ स्त्री को देखकर कामोत्तेजना पैदा हो जाती होती तो हर बलात्कारी को अपनी माँ बहन बेटी में रिश्ता नहीं बल्कि उनका स्त्री होना ही नज़र आता और वे उनके साथ भी कुकर्म करते। परन्तु ऐसा नहीं है। 
कोई बलात्कारी अपनी माँ बहन बेटी के साथ बलात्कार होते हुए सहन नहीं कर सकता है। हालाँकि ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जब रक्त सम्बन्ध को भी कुछ पुरुषों ने नहीं छोड़ा है। वैज्ञानिकों के लिए यह खोज का विषय है कि दुष्कर्मी में आखिर ऐसा कौन-सा रसायन उत्पन्न हो जाता है जो स्त्री को देखकर उसे वहशी बना देता है। ताकि अपराधी मनोवृति पर शुरूआत में ही अंकुश लगाया जा सके।    

हमारी न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और इसके ढेरों प्रावधान के कारण अपराधियों में न सिर्फ भय ख़त्म हुआ है बल्कि मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। यह सही है कि क़ानून हर अपराधी को अधिकार देता है कि वह अपने आप को निरपराध साबित करने के लिए अपना पक्ष रखे तथा अपनी सज़ा के खिलाफ याचिका दायर करे। समस्त कानूनी प्रक्रियाओं के बाद जब सज़ा तय हो जाएऔर सज़ा फाँसी की होतब ऐसे में दया याचिका का प्रावधान ही गलत है। दया याचिका राष्ट्रपति तक जाए ही क्योंऐसा अपराधी दया का पात्र हो ही नहीं सकता है। सरकार का समय और पैसा इन अपराधियों के पीछे बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है। सज़ा मिलते ही 10 दिन के अन्दर फाँसी देनी चाहिए। कानूनविदों को इस पर विचार-विमर्श एवं शोध करने चाहिए ताकि न्यायिक प्रक्रिया के प्रावधानों की आड़ में कोई अपराधी बच न पाए। मानवीय दृष्टिकोण से सभी वकीलों के द्वारा बलात्कारी का केस को न लेने का संकल्प लेना चाहिए। अव्यावाहारिक और लचीले कानून में बदलाव एवं संशोधन की सख्त ज़रुरत है ताकि कानून का भय बना रहेन्याय में विलम्ब न हो तथा कोई भी जघन्यतम अपराधी बच न पाए।   

1 Comment:

डॉ. जेन्नी शबनम said...

उदंती का यह अंक हमेशा की तरह खूबसूरत और आकर्षक है। आवरण पृष्ठ पर बहुत सुन्दर चित्रकारी है। सभी सामग्री बहुत उम्दा। मेरे लेख को स्थान देने के लिए रत्ना जी एवं उदंती की पूरी टीम को धन्यवाद। उदंती के उत्तरोत्तर विकास के लिए शुभकामनाएँ।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष