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Feb 11, 2020

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी
वर्ष 1953 में, एक पर्वतारोही ने माउंट एवरेस्ट के शिखर पर सिर पर पट्टों वाले हंस (करेयी हंस, एंसर इंडिकस) को उड़ान भरते देखा था। लगभग 9 किलोमीटर की ऊंचाई पर किसी पक्षी का उड़ना शारीरिक क्रियाओं की दृष्टि से असंभव प्रतीत होता है। यह किसी भी पक्षी के उड़ने की अधिकतम ज्ञात ऊंचाई से भी 2 कि.मी. अधिक था। इसको समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 19 हंसों को पाला ताकि इतनी ऊँचाई पर उनकी उड़ान के रहस्य का पता लगाया जा सके।
शोधकर्ताओं की टीम ने एक बड़ी हवाई सुरंग बनाई और युवा करेयी हंसों को बैकपैक और मास्क के साथ उसमें उड़ने के लिए प्रशिक्षित किया। विभिन्न प्रकार के सेंसर की मदद से उन्होंने हंसों की  हृदय गति, रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, तापमान और चयापचय दर को दर्ज करके प्रति घंटे उनकी कैलोरी खपत का पता लगाया। शोधकर्ताओं ने मास्क में ऑक्सीजन की सांद्रता में बदलाव करके निम्न, मध्यम और अधिक ऊंचाई जैसी स्थितियाँ  निर्मित कीं।
यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों की तुलना में पक्षियों के पास पहले से ही निरंतर शारीरिक गतिविधि के लिए बेहतर हृदय और फेफड़े हैं। गौरतलब है कि करेयी हंस में तो फेफड़े और भी बड़े व पतले होते हैं जो उन्हें अन्य पक्षियों की तुलना में अधिक गहरी सांस लेने में मदद करते हैं और उनके हृदय भी अपेक्षाकृत बड़े होते हैं जिसकी मदद से वे मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन पहुंचा पाते हैं।
हवाई सुरंग में किए गए प्रयोग से पता चला कि जब ऑक्सीजन की सांद्रता माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर 7 प्रतिशत के बराबर थी (जो समुद्र सतह पर 21 प्रतिशत होती है), तब हंस की चयापचय दर में गिरावट तो हुई; लेकिन उसके बावजूद हृदय की धड़कन और पंखों के फड़फड़ाने की आवृत्ति में कोई कमी नहीं आई। शोधकर्ताओं ने ई-लाइफ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि किसी तरह यह पक्षी अपने खून को ठंडा करने में कामयाब रहे, ताकि वे अधिक ऑक्सीजन ले सकें। गौरतलब है कि गैसों की घुलनशीलता तापमान कम होने पर बढ़ती है। खून की यह ठंडक बहुत विरल हवा की भरपाई करने में मदद करती है।
हालाँकि पक्षी अच्छी तरह से प्रशिक्षित थे, लेकिन बैकपैक्स का बोझा लादे कृत्रिम अधिक ऊँचाई की परिस्थितियों में कुछ ही मिनटों के लिए हवा में बने रहे। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि क्या उपर्युक्त अनुकूलन की बदौलत ही वे 8 घंटे की उड़ान भरकर माउंट एवरेस्ट पर पहुँचने में सफल हो जाते हैं। या क्या यही अनुकूलन उन्हें मध्य और दक्षिण एशिया के बीच 4000 किलोमीटर के प्रवास को पूरा करने की क्षमता देते हैं। और ये करतब वे बिना किसी प्रशिक्षण के कर लेते हैं। लेकिन प्रयोग में बिताए गए कुछ मिनटों से इतना तो पता चलता ही है कि ये हंस वास्तव में माउंट एवरेस्ट की चोटी के ऊपर से उड़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

प्रेरक



41 साल-10 सबक
-निशांत

मैं आज ही 41 साल का हो गया हूँ, आज मेरा जन्म दिन है। अपने ब्लॉग पर मैंने कुछ साल पहले अपने जन्मदिन के दिन एक पोस्ट लिखी थी, और यह संकल्प लिया था कि हर साल वैसी ही पोस्ट लिखा करूँगा, लेकिन मनुष्य अपने लिए संकल्पों के दस प्रतिशत पर ही क्रियान्वयन कर ले, तो बहुत बड़ी बात होगी... खैर...
मुझे वह दिन याद है, जब मैं 30 साल का हुआ था; तब मेरी पक्की नौकरी लगे ज्यादा अरसा नहीं हुआ था और शादी भी कुछ महीने पहले हुई थी। 30 साल का होने को लेकर मेरे विचार बहुत रोमानी थे। जि़ंदगी में सब बहुत बढिया चल रहा था। प्रचलित मुहावरे में मैं सेटल हो गया था। फ़ैमिली बड़ी हो रही थी। अब 11 साल बाद ये बातें इतनी नई-सी लगती हैं; जैसे कल ही की बात हो।
40 पार कर जाना मध्यकाल की शुरुआत माना जाता है। यह जीवन का वो दौर है, जब आप चीज़ों को अपने अनुभव के दम पर आँकने के योग्य हो जाते हैं। 40 पार कर चुके लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे खिलंदड़पन न करें। मैं अपने ही अनुभव से यह जानता हूँ कि मुझमें थिरता आ गई है और उम्र के बढ़ते हुए साल मुझे ईश्वर के उपहार की तरह प्रतीत होने लगे हैं। मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे बढ़ती उम्र के दुष्परिणामों का सामना नहीं करना पड़ रहा है। मैं स्वस्थ हूँ, सानंद हूँ। मैं अपने हर दिन को समग्रता से जीता हूँ।
आज मेरे मन में कुछ बेतरतीब से खय़ाल आ रहे हैं। अपनी बीती हुई जि़ंदगी को जब मैं पलटकर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि मैंने जीवन से बहुत कुछ सीखा है। अपने उन्हीं विचारों को मैं आपसे शेयर करना चाहता हूँ। ये विचार बहुत रैंडम हैं, बेतरतीबी मेरे स्वभाव में है, इसलिए हो सकता है मैं किसी ज़्यादा गहरी बात को पीछे धकेल दूँ। ये हैं मेरे  जि़ंदगी के सिखाए दस सबक:
1. जो मिला है उसके लिए शुक्रगुज़ार रहिए -
मैं बचपन और किशोरावस्था में बहुत बिगड़ैल था। मुझे या तो सब कुछ चाहिए होता था कुछ भी नहीं। मुझमें सही-ग़लत की समझ नहीं थी। कॉलेज की शिक्षा समाप्त होने के बाद जब मेरे सामने 'क्या करें’ का सवाल आकर खड़ा हो गया, तब मेरी जि़ंदगी में एक नया मोड़ आया। युवावस्था में मुझमें यह देखने की समझ विकसित हुई कि मेरे पास बहुत कुछ था जिससे मेरे साथ के बहुत लोग वंचित थे। मेरे परिजनों, मित्रों, शिक्षकों और मेरी जि़ंदगी ने मुझे इतना कुछ दिया जिसके लिए मुझे कोटि-कोटि आभारी होना चाहिए, बहुत पहले ही होना चाहिए था; लेकिन मैंने देर कर दी थी।
 तुम्हें भी चाहिए कि तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी अच्छा है, जो कुछ भी बेहतर है उसकी पहचान करें और उसके लिए आभारी रहें। जो आपके पास नहीं है उसे पाने का प्रयास करें लेकिन जो है उसे सँजोकर रखें।
2. हर दिन एक बेहतर शख्स बनने की कोशिश करते रहिए -
बाबा रामदेव की लोग कई मामलों में आलोचना करते हैं लेकिन एक बात है जिसे रामदेव बार-बार कहते हैं और बिल्कुल सही कहते हैं, और वह यह है कि... करने से होता है- मैं अपनी बात करता हूँ - वर्ष 2000 में जिसे एक ई-मेल भेजना बहुत कठिन काम लगता था वह आज बिना किसी कोडिंग की जानकारी के कई ब्लॉग्स सफलतापूर्वक चला रहा है और रोज़मर्रा में आनेवाली मुश्किलों का हल बिना किसी परेशानी के निकाल लेता है।
हर नया दिन आपके सामने कुछ नया सीखने, करने और बनने के असंख्य मौके लेकर आता है। हर नए दिन में आप अपनी पिछली गलतियों के लिए शर्मिंदा हो सकते हो और उनसे सबक लेकर आगे बढ़ सकते हो। आप कर सकते हो क्योंकि... करने से होता है। यह बात हमेशा याद रखिए कि प्रयास करने पर हो सकता है कि आप असफल हो जाएँ लेकिन यदि कोशिशें नहीं करेंगे तो 100 प्रतिशत असफल हो रहेंगे।
3. अपने अहंकार से छुटकारा पाइए -
हम सभी अपने अहंकार का शिकार बनकर बहुत से मामलों में पीछे रह जाते हैं। हमें कुछ सीखना होता है; लेकिन हमारी आत्म-गुरुता उसके आड़े आ जाती है। अपनी उपलब्धियों पर गर्व होना और आत्मविश्वास होना सकारात्मक चीज़ है लेकिन अहंकार हमारी प्रगति में बाधक है। अहंकार वास्तव में हमारे आत्म रक्षा का तरीका है। यह हमें ठुकराए जाने और असफल होने से तो बचाता है; लेकिन हमारी जि़ंदगी में कुछ जोड़ता नहीं है। मनुष्य दूसरों से तभी प्रेरित हो सकता है जब उसमें विनम्रता हो। किसी को कुछ सिखाने के संबंध में भी यह सही है। जिस व्यक्ति में अहंकार नहीं है, वह खुद से ही आगे बढ़कर दूसरों की सहायता कर सकता है।
जिस व्यक्ति का अहंकार प्रबल न हो, वह आलोचना को सकारात्मकता से लेता है। सच कहूँ तो मैं भी हर कटाक्ष व आलोचना को सकारात्मकता से नहीं ले पाता; लेकिन मैं यह सीख रहा हूँ। आप भी सीखिए- अभी उम्र पड़ी है।
4. अपने भोजन की जाँच-परख करते रहिए -
महानगरीय जीवनशैली का शिकार होकर मैं अपने खान-पान की आदतों को बिगाड़ बैठा। इसका बड़ा ख़ामियाज़ा मुझे इसी वर्ष फरवरी में भुगतना पड़ा, जब मुझे दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक बुखार बना रहा। बुखार के कारण कुछ और रहे होंगे; लेकिन समय-असमय कैसा भी खानपान करने की बुरी आदत का प्रभाव मेरे शरीर पर दो-तीन सालों से ही दिखने लगा था। गले का बार-बार खराब होना और पेट की गड़बडिय़ाँ जैसे गैस मेरे स्वास्थ्य को बिगड़ रही थी।
हाल ही में मैंने अपने खानपान में व्यापक सुधार किया है और उन पदार्थों की पहचान कर ली है, जो मुझे नुकसान पहुँचाते हैं। मैं चाय-कॉफ़ी से परहेज़ करने लगा हूँ और सोडा, ड्रिंक्स का पूरी तरह से परहेज करता हूँ। मैं मानता हूँ कि खानपान का विषय बहुत निजी होता है और आप किसी की भी सलाह आँख मूँदकर नहीं मान सकते। यदि आप अपने स्वास्थ्य को सँजोए रखना चाहते हैं, तो अपने भोजन की परख करते रहिए और इस दिशा में अपनी जानकारी बढ़ाइए। वॉट्सएप के ज़रिए फैलाई जानेवाली हैल्थ-टिप्स को भी प्रामाणिक स्रोतों से जाँच लेने के बाद ही व्यवहार में लाइए।
5. अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखिए -
मैं लगभग 15 घंटे कुर्सी पर बैठता हूँ। छुट्टियों के दिन भी मेरा लगभग पूरा दिन कंप्यूटर टेबल पर बीत जाता है। शरीर के हर जोड़ और मांसपेशी को चलायमान रखने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि रोज़ थोड़ा व्यायाम की जाए। बैठे-बैठे शरीर कई तरह के दर्द और अकडऩ का शिकार हो जाता है। मैं बहुत ज्यादा काम करता हूँ और व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाता; क्योंकि एक थके हुए शरीर और दिमाग को पर्याप्त नींद की ज़रूरत होती है।
ऐसे में मैं अपने काम के दौरान ही छोटे-छोटे ब्रेक लेकर आसपास चहलकदमी कर लेता हूँ। रोज़ाना किसी-न-किसी काम के बहाने अपने ऑफि़स से थोड़ी दूर पैदल चलता हूँ और कभी भी लिफ़्ट का उपयोग नहीं करता। मैं जानता हूँ कि इतना करना ही पर्याप्त नहीं है। मैं अपने फि़टनेस गोल से दरअसल बहुत पीछे हूँ और कोशिश कर रहा हूँ कि अपने व्यायाम का स्कोर बढ़ा सकूँ। मेरा मानना है कि घर के पास ही कई छोटे-मोटे काम करने के लिए कार या बाइक से चल देना खराब पॉलिसी है; इसलिए मैंने साइकल खरीदने का भी निश्चय किया है। यदि आप व्यस्तता के कारण व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हों तो साइकल में निवेश करना आपके लिए भी सही रहेगा।
6. अपने लक्ष्य निर्धारित कीजिए-
मैंने अपने लक्ष्य कभी लिखकर नहीं रखे; हालाँकि मुझे ऐसा करना चाहिए था। मेरे साथ सबसे बुरी बात तो यह थी कि बहुत लंबे समय तक मेरे लक्ष्य स्पष्ट ही नहीं थे। मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था कि मुझे क्या करना है और कैसे करना है। आज मेरे सामने जो लक्ष्य हैं उन्हें यदि मैंने 20 साल पहले निर्धारित कर लिया होता, तो मैं बहुत दूर तक जा चुका होता; लेकिन ये एक काल्पनिक बात है।
मैंने अपनी ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर जो लक्ष्य कुछ समय पहले बनाए थे, उनका परिणाम मुझे अब दिखने लगा है। तय किए गए समय के भीतर अपने गोल्स को प्राप्त कर लेने से बेहतर  कुछ नहीं हो सकता। अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करना मेरे लिए एक दृश्य अभ्यास है, जो हमेशा काम करती है। मुझे इसके लिए किसी तरह के नक्शा बनाने की ज़रूरत नहीं है। मैं कुछ करने के बारे में सोचता हूँ और उसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता हूँ। कुछ बड़ा करने के बारे में सोचना, और उसे छोटे-छोटे कदमों से प्राप्त करते जाना... यही मेरे लक्ष्य निर्धारित करने के तरीका है। शायद यह उपाय आपके लिए भी काम कर जाए, अन्यथा आप अपना तरीका अपना सकते हैं।
7. दूसरों को आपकी जि़ंदगी के फ़ैसले मत लेने दीजिए -
आपको बहुत से लोग मिलेंगे जो आपको बताएँगे कि आपके लिए क्या करना सही होगा। यह ज़रुरी नहीं कि उनमें से सभी आपको गलत सलाह ही दें। कुछ लोग आपको वाकई सही राह सुझा सकते हैं; लेकिन आपको हर व्यक्ति की बात को किसी विशेषज्ञ के सुझाव की तरह नहीं लेना है। अपनी ऑनलाइन दुनिया में मुझे हर कहीं यही सुनने को मिलता है कि मैं 9 से 5 के अपनी नौकरी में खुद को नष्ट कर रहा हूँ लेकिन मैं अपनी सीमाओं और परिस्तिथियों से बेहतर वाकिफ़ हूँ। मैं अपने अनुभव से यह बेहतर जान पाया हूँ कि मेरे लिए इस समय क्या करना सही है।
आप किसी की भी जीवनशैली को आदर्श मानकर उन्हें आपकी जि़ंदगी के फैसले मत लेने दीजिए। हर व्यक्ति के लिए सफल होने के पैमाने अलग-अलग होते हैं। हर व्यक्ति अपनी मंजिल पर पहुँचने के रास्ते खुद तय करता है। सफल-असफल होना और इसमें लगनेवाला समय बहुत से तथ्यों पर निर्भर करता है। सुनिए सबकी, लेकिन कीजिए वही जो आपका दिल कहे। और हाँ, बहुस्तरीय बाजार करनेवालों के बहकावे में कभी मत आइए।
8. अपने जुनून का पीछा कीजिए -
अपनी चाह, अपनी उम्मीदों, अपनी आकांक्षाओं, अपनी इच्छाओं  को आगे बढ़ाइए। यही एक जीवन है और आपको मौके बार-बार नहीं मिलेंगे।  उस विषय पर, उस दिशा में अपने कैरियर को मोड़ दें, जिसे आप प्यार करते हैं। करोड़ों लोग किसी और शख्स का मुखौटा लगाकर रोज़ काम पर जाते हैं और बोझिल कदमों से वापस घर आते हैं। आप अपने साथ ऐसा मत होने दीजिए। आपको परफ़ॉर्मर बनना है या ग्राफि़क डिज़ाइनर,  चाहे जो बनना चाहते हों, इंटरनेट के इस दौर में कोई काम छोटा नहीं है। 25 साल पहले स्कूल से बाहर निकलते वक्त मेरी पीढ़ी के बहुत से लोगों के सामने रास्ता साफ नहीं होने का संकट होता था। आज वह दुविधा किसी के मन में नहीं होनी चाहिए; क्योंकि मिलेनियल्स (जिनका जन्म पिछले 20-25 सालों के दौरान हुआ है) के पास विकल्पों की कोई कमी नहीं। अपनी चाहतों को पूरा करना उन्हें अपनी मंजि़ल तक ले जाएगा।
9. अपने डर को पहचानिए और उसका सामना कीजिए -
ऐसा बहुत कुछ है जिससे आप भयभीत होंगे। जब जीवन में सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तो किसी अनिष्ट के होने का डर भी विकराल हो जाता है। जब मैं साइकल चलाना सीख रहा था तब गिरने की आशंका से मेरा डर इतना पुख्ता हो जाता था कि नजऱ सड़क के दूसरी ओर पड़े पत्थर पर ही टिकी रहती थी और हैंडल अपने आप ही साइकिल को उस दिशा में ले जाने लगता था। घनीभूत डर इसी तरह आपको बुरी परिस्तिथियों में धकेलता है और आपको पता भी नहीं चलता।
डर सभी को लगता है। कलेजा सभी का काँपता है। अच्छे से अच्छे धावकों की भी फ़ाइनल रेस के वक्त धुकधुकी लगी रहती है; लेकिन वे अपने डर को सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर बाजी मार ले जाते हैं। पर्याप्त सावधानी लेकर लिये गए जोखिम व्यक्ति को मंजि़ल तक पहुँचा सकते हैं। बैकअप लिये बिना ब्लॉग की क्रूशियल सैटिंग्स या सी-पैनल में छेड़छाड़ करना कितना बेवकूफ़ी- भरा होता है ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता। मैंने अपनी कई महीनों की मेहनत कई बार हमेशा के लिए खो दी है। लेकिन थोड़ा सँभलकर और सीख-सीखकर तकनीक का डर मैंने अपने दिल से निकाल ही दिया। यदि मैं यह नहीं कर पाता तो इतना लंबा सफऱ तय करना मुश्किल था।
10. बचपन अच्छा था... उसे अतीत   में ही रहने दीजिए -
बचपन हमारे जीवन का सबसे खुशनुमा समय होता है। हमारे व्यक्त्त्वि का सबसे बड़ा अंश हमारे बचपन में ही निर्धारित हो जाता है। बचपन के साथ बहुत सी खट्टी-मीठी यादें जुड़ी होती हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे स्वर्णिम बचपन जीने का मौका मिला। बचपन में ही मैंने परिष्कृत रुचियाँ विकसित कीं, जिन्हें बहुतेरे लोग हाईस्कूल पूरा करने का बाद जान पाते हैं।
बचपन में बहुत संरक्षित माहौल में पलने-बढऩे के कारण मैं जीवन के कठोर सबक समय रहते नहीं सीख पाया। लोगों के बीच जल्दी खुल नहीं पाना, बहिर्मुखता का न होना, दोस्त जल्दी नहीं बना पाना, भीड़ में बोलने से कतराना जैसे बहुत से व्यक्त्त्वि परीक्षण थे, जो मेरे बचपन से होते हुए युवावस्था में प्रवेश कर गए। इनसे उबरने में मुझे खासा वक्त और हिम्मत लगी है। आज भी में अपने बचपन और गुम हो चुकी मासूमियत को शिद्दत से याद करता हूँ; लेकिन उसकी भरपाई मैंने गंभीरता और परिपक्वता से की है।
अपने बच्चों के साथ बच्चा बनना, खूब ठठाकर हँसना और हरी घास पर सहसा लोटपोट हो जाना, इसका लक्षण है कि आपके भीतर का बच्चा कभी भी जाग्रत हो सकता है। उसे बनाए रखिए पर अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए। बच्चों के समान बनिए, बचकाना नहीं। (हिन्दी ज़ेन से)

प्यार का कोई प्रतिदान नहीं

प्यार का कोई प्रतिदान नहीं 
- विजय जोशी 
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
स्नेह जीवन का सबसे सरल सम्बल या सहारा है। बशर्ते वह निर्मल हो स्वार्थ से परे। पर कई बार यह नसीब होता से भाग्य से। जिसे मिल जाए वह परम सौभाग्यशाली और जिसे न मिल पाए, वह दुर्भाग्यशाली। प्यार अनमोल होता है। पर कई बार प्यार स्वार्थ के धरातल पर उसका मोल लगाते हुए हम असली अर्थ भूल जाते हैं।
एक किसान के पास बहुत सुंदर चार पिल्ले थे; जिन्हें बड़े नाज़ से पाला गया था। उन्हें बेचने की विवशता उसके जीवन में आ गई। उसने एक छोटी सी सूचना एक कागज पर लिखकर खेत की सीमा पर खड़े लकड़ी के खंबे पर कील से टाँगने का जतन किया। जब वह आखरी कील ठोककर हटा, तो देखा छोटे- से बच्चे को समीप ही खड़ा पाया, जिसने किसान से निवेदन किया कि वह उनमें से एक को खरीदना चाहता है।
किसान ने कहा- ठीक। लेकिन क्या तुम्हें मालूम है इनकी नस्ल। ये बड़े मँहगे हैं और इन्हें खरीदने के लिए तुम्हें काफी पैसों की जरूरत पड़ेगी।
बच्चे ने एक पल सोचा और हाथ डालते हुए सारे जमा सिक्के निकालते हुए किसान को सौप दिए- मेरे पास निन्यानवे पैसे हैं, क्या ये काफी हैं।
बिल्कुल ठीक -किसान ने ये कहते हुए एक आवाज लगाई। सबसे पहले एक सर्वाधिक सुंदर पिल्ला तेजी से दौड़कर बाहर आया। उसके बाद दूसरा और फिर तीसरा। तीनों सुंदर थे तथा अपने स्वामी के पास आकर उछल -कूद करने लगे। सबसे आखिर में जो पिल्ला निकला, उसकी चाल धीमी थी तथा वह थोड़ा  लँगड़ाकर चल रहा था। बालक ने तुरंत कह दिया- मुझे यही चाहिए। बिल्कुल यही।
 किसान ने सहानुभूतिपूर्वक बालक के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखते हुए कहा- बेटा मैं जानता हूँ , ये तुम्हें नहीं चाहिए । यह न तो दौड़ सकेगा और न ही तुम्हारे साथ खेल पाएगा। बालक थोड़ा पीछे हटा तथा अपने पैर की पतलून ऊपर उठाई। किसान ने देखा कि बालक के पैर कृत्रिम थे तथा शरीर में एक स्टील रिंग की सहायता से जुड़े हुए थे।
 उसने कहा- अंकल मैं स्वयं भी नहीं दौड़ सकता। अतः मुझे ऐसा ही साथी चाहिए, जो मुझे समझ सके। मेरा साथ दे। मुझसे भावनात्मक रूप से जुड़ सके।
किसान की आँखों से अश्रुधारा बह उठी। उसने अपने हाथ से पिल्ले को उठाया तथा पूरी सावधानी के साथ बालक को सौंप दिया और कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिए। प्रेम और प्यार अनमोल होता है। उसका मोल तो ईश्वर भी नहीं लगा सकते।
मित्रों यही है वह निर्मल, निश्चल स्नेह जिसका सम्मान हम सबको करना चाहिए। भावनाहीन इंसान का जीवन भौतिकता के धरातल पर भले ही संपन्न हो, लेकिन अंतस् के धरातल पर शून्य। संवेदना, सद्भावना, स्नेह को बढ़ाइए, सजाइए, सँवारिए।
प्रेम प्रार्थना की तरह, इक मंदिर का दीप
जिसको यह मोती मिले,  वह बड़ भागी सीप
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Jan 15, 2020

उदंती.com, जनवरी 2020

वर्ष-12, अंक- 6


 नई किरन
- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

नई भोर की
नई किरन का
स्वागत कर लो!
आँखों में सब
आशाओं का
सागर भर लो!
भूलो, बिसरी बातें
दर्द-भारी अँधियारी रातें
शुभकामना की
देहरी पर
सूरज धर लो!
बैर-भाव मिट जाए
मन से, तन से
इस जीवन से,
जगे प्रेम नित
दु:ख सारी
दुनिया का हर लो!

युवा शक्ति - दशा और दिशा...

 युवा शक्ति - दशा और दिशा...  
- डॉ. रत्ना वर्मा 
 आजकल शिक्षा प्राप्त करने वाली संस्थाओं में पढऩे वाले युवा शिक्षा और रचनात्मकता के लिए अपनी आवाज उठाने के बजाय देश के अन्य मामलों को लेकर विरोध प्रदर्शन, और आंदोलन करते हैं, जिनका उनके ज्ञान, उनके कैरियर या उनके भविष्य को लेकर कोई लेना-देना नहीं होता। इससे अधिक अफसोस की बात तो ये है कि हमारे देश की राजनैतिक पार्टियाँ उनकी ऊर्जा का इस्तेमाल अपने राजनैतिक फायदे के लिए करती हैं, फलस्वरूप अपना जो बहुमूल्य समय इन युवाओं को अपनी शिक्षा को देना चाहिए ,उसे वे विध्वंसक गतिविधियों में खर्च कर देते हैं। पढ़ाई के नाम पर आजकल के विश्वविद्यालयों में नेतागिरी अधिक होने लगी है। शिक्षा केन्द्रों में राजनैतिक दखलंदाजी किसी भी देश के लिए उचित नहीं माना जा सकता। अपनी बात कहने की आजादी सबको है ,परंतु बात कहने का जो तरीका आजकल के युवा अपना रहे हैं, या उन्हें अपनाने के लिए बाध्य किया जाता है, वह न उनके हित में है न देश हित में। आज़ादी और अराजकता दो अलग-अलग बातें है। सरकारी सम्पत्ति नष्ट करना आज़ादी नहीं, देशद्रोह है। यह वही सम्पत्ति है जिसे जनता ने  अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स के रूप में भरा है ।
जब माता- पिता अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला करवते हैं तो उन्हें यह विश्वास होता है कि वे अपने बच्चे का भविष्य बेहतर हाथों में सौंप रहे हैं और स्कूल- कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करते हुए उनका बच्चा देश का एक ऐसा नागरिक बनकर निकलेगा, जिसपर न सिर्फ उन्हें बल्कि पूरे देश को गर्व होगा। शिक्षा ज्ञान -प्राप्ति का ऐसा माध्यम है ,जिससे जरिए हम स्वयं का, परिवार का, समाज का और देश की तरक्की के साथ उसकी मजबूती के लिए एक बेहतर जीवन के बारे में सोच विकसित करते हैं। शिक्षा, संस्कार और संस्कृति के जरिए हम प्यार, शांति और सुकून के विषय में बात करते हैं ,न कि विध्वंस की। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तात्पर्य यह तो नहीं कि आप मनमानी पर उतर आएँ। स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने का अधिकार कोई भी संविधान नहीं देता। गलत राह दिखाकर, बरगलाकर यदि जनता की समझ को, उनके विचारों को मोड़ दे दिया जाए तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। 
यह तो हम सभी को पता है कि कोई भी देश अपनी पुरातन संस्कृति, इतिहास परम्परा से कटकर समाज को मज़बूत नहीं कर सकता। यह अफ़सोस का विषय है कि हमारे देश  के जिन वीरों और महापुरुषों के बलिदान और उनके द्वारा सामाजिक उत्त्थान की अनेक गाथाएँ आज़ादी से पहले घर-घर में गूँजा करती थीं ,वे आज़ादी के बाद कैसे विलुप्त हो गए? महाराणा प्रताप, शिवाजी, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस जैसे महापुरुषों की वीर गाथाएँ हमारी नई पीढ़ी के पाठ्यक्रम से कैसे विलुप्त होते चली गईं? कैसे इन सबका स्थान अलाउद्दीन खिलजी, अहमद शाह अब्दाली, औरंगजेब जैसे अत्याचारियों ने ले लिया। ये कौन इतिहासकार हैं ,जो भारतीय अस्मिता से खिलवाड़ करने में लगे हुए हैं। हमारे पाट्यक्रम में ‘हिन्दू पंच’ और ‘चाँद’ का फाँसी अंक जैसी कालजयी पुस्तकें क्यों शामिल नहीं की जातीं। आजादी के आन्दोलन के समय प्रतिबन्धित भारतीय साहित्य के वे असंख्य गीत और पुस्तकें युवाओं की पहुँच से क्यों दूर हैं?
जिस राष्ट्रीय भावना को आज़ादी के बाद अधिक सशक्त होना था, उसे शनै: शनै: कैसे खोखला किया गया, इसके कारणों पर गम्भीरता से सोचना होगा।  अनपढ़ लोगों को चालाकी से किस प्रकार गुमराह किया जाता है, यह सी ए जैसे बिल के विरोध में प्रायोजित आन्दोलन से समझ में आ जाएगा। जो कानून  भारत के नागरिकों के लिए नहीं है, उसको निहित स्वार्थों के कारण गलत ढंग से पेश करके लोगों को बहकाया जा रहा है। आश्चर्य तो तब होता है , जब राजनैतिक दल लोगों  को गुमराह करने की बाकायदा  मुहिम चलाने के लिए सभी पैंतरे  आजमाने  लगते  हैं। इन सबके लिए ठण्डे दिमाग से सोचने की ज़रूरत है।  जागरूकता की कमी किसी भी देश के लिए बहुत घातक है। सही गणतन्त्र तभी माना जाएगा, जब  लोग मिलजुलकर चलें, देश को मज़बूत बनाएँ। देश को लूटने वालों की पहचान भी ज़रूरी है। सरकारी धन का दुरुपयोग करने वालों, सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करने वालों से पाई-पाई की वसूली होनी चाहिए। ऐसे लोगों को मासूम नही, बल्कि राष्ट्र द्रोही की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।


युवाओं के साथ- साथ इस विषय पर बात सामान्य जनता की भी की जाए- उन्हें उनके कर्तव्यों की जानकारी तो कुछ- कुछ दे दी गई है; परंतु उनके अधिकारों की जानकारी क्यों नहीं दी गई?  हमारी आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को अच्छी शिक्षा से वंचित रखकर उन्हें क्रूर राजनीति और प्रशासन की कठपुतली बनाकर क्यों रखा गया? आज वह  वर्ग  केवल वोटबैंक बनकर क्यों रह गया है?  तुष्टीकरण का यह षडयंत्र देश की सद्भावना और शांति में किस प्रकार बाधक बन रहा है यह वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जम्मू कश्मीर में पिछले 60 वर्षों में एक विशेष वर्ग को क्यों उसके अधिकारों से वंचित किया गया? क्यों किसी प्रदेश में बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक कहकर  पूरे देश को अँधेरे में रखा गया। इन सबके मूल में अशिक्षा, असमानता का व्यवहार और आज़ादी के अर्थ को ठीक से न समझना ही है। जरुरत पूरे देश में एक स्वस्थ माहौल, बेहतर शिक्षा और देश के हित में की जाने वाली राजनीति की है, तभी हम शांतिपूर्ण और एक खुशहाल देश की कल्पना कर सकते हैं।
जो संविधान की बात नहीं मानते, जिनका न्यायपालिका में विश्वास नहीं, जिनका  एकमात्र उद्देश्य छल-प्रपंच से देश को लूटना है, उनके साथ छूट क्यों? राष्ट्र को खोखला करने वालों को जेल के सींखचों में होना चाहिए। जो निरीह लोगों के अमानवीय शोषण में शामिल हों, हत्या , लूट -खसोट में शामिल हों, उनके लिए  मानव अधिकारों की दलील क्यों दी जाती है? आज इन  सब  बातों पर खुले दिमाग से  सोचना होगा। यही समय की माँग है।