January 15, 2020

कविता

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की क्षणिकाएँ
(अंग्रेजी से हिन्दी में काव्य-रूपान्तर: डॉ. कुँवर दिनेश सिंह)
1
तुम्हारी कौन सी भाषा है, ओ सागर?’
सतत प्रश्न की भाषा।’
तुम्हारे उत्तर की कौन सी भाषा है, ओ गगन?’
सतत मौन की भाषा।’
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हम सरसराते पत्तों की आवाज
तूफानों को जवाब देती है,
पर तुम कौन हो - इतने खामोश?’
मैं तो सिर्फ एक फूल हूँ।’
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जल में मछली खामोश है,
धरा पर जानवरों का शोर है,
हवा में पंछी गा रहा है।
लेकिन मानव के अन्तर में
समुद्र की खामोशी है,
धरा का शोर है, और
हवा का संगीत है।
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मेरा दिन बीत गया है,
और मैं हूँ किनारे पर पहुँची हुई
किश्ती की तरह,
सन्ध्या-समय सुन रहा हूँ
लहरों के नर्तन-संगीत को।
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कवि-पवन निकल पड़ा है
समुद्र में
और वन में
अपने निजी स्वर की तलाश में।
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मृत्यु में अनेक हो जाते हैं एक,
जीवन में एक बन जाता है अनेक।
उस दिन धर्म एक हो जाएगा -
जिस दिन ईश्वर मृत हो जाएगा।
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ए फल, तुम मुझसे कितना दूर हो?’
ए फूल, मैं तो छिपा हूँ तुम्हारे ही हृदय में।’
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चाँद में तुम भेजते हो प्रेम-पत्र मुझे,’
कहा रात ने सूर्य से।
मैं घास पर आँसुओं में
भेजती हूँ जवाब अपने।’
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सम्भव ने असम्भव से पूछा,
तुम्हारा घर कहाँ है?’
जवाब मिला
नपुंसक के स्वप्नों में।’
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बारिश की बूँद ने
चमेली के कान में कहा,
मुझे हमेशा अपने दिल में रखना।’
चमेली बोली ‘आह’, और
गिर पड़ी ज़मीन पर।
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डॉ. कुँवर दिनेश सिंह की कुछ मौलिक क्षणिकाएँ
छाया-युद्ध
चाहता तो हूँ
अन्धकार को जीतना
मैं प्रयास करता हूँ
प्रकाश से
आगे बढ़ने का
किन्तु मैं यह जाता हूँ
बनकर
सिर्फ एक छाया ----
-0--

बरसाती नाला
मत सोचो सैलाब लाऊँगा
मैं तो हूँ
एक बरसाती नाला
उतर आया हूँ
सड़क पर,
मैं चला जाऊँगा
बारिश थम जाने पर ----
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नज़रबट्टू
गुलाबों के साथ काँटे
और चंदन के साथ भुजंग
नहीं करते भंग
उनकी मर्यादा को, शान को,
मगर बचाते हैं
बुरी नज़र से उनको ....
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नदी की मजबूरी
मैंने माँगी शरण
नदी से,
किंतु वह बहती रही
बेपरवाह, बेरुख सी,
मैं नहीं जानता था
नदी स्वयं
ढूँढ रही थी कोई
शरण ...
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भँवर का रास्ता
शुरू होता है
मेरे हृदय से
और जाता है
उसके हृदय तक
और बचने का कोई रास्ता
मुझे सूझता ही नहीं
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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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