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Jun 11, 2013

तीन लघुकथाएँ

- श्याम सुन्दर अग्रवाल
1.कर्ज़
आशुतोष और मैं दोनों सहकर्मी थे। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र के दफ्तर में नियुक्ति थी। छोटा-सा नगर था। सुविधाएँ बहुत कम थीं। इतनी दूर कि नियुक्ति को विभाग में सजा के तौर पर ही देखा जाता था।
खाना हम दोनों में से किसी को भी पकाना नहीं आता था। इसलिए हमने दफ्तर के पास ही एक चाय वाले को हमारे लिए खाना बनाने के लिए मना लिया था। सुबह नाश्ता हम अपने कमरे में ही कर लेते; लेकिन दोपहर और रात्रि के खाने के लिए चाय वाले के पास ही जाना पड़ता।
चाय वाले ने पी.सी.ओ. भी लगा रखा था। आसपास के लोग उसके पी.सी.ओ पर आकर फोन कर लेते थे। रात को जब भोजन करने जाते तो मैं भी वहीं से कभी-कभार घर फोन कर लेता। लेकिन आशुतोष हर रात घर पर फोन करता। मैंने कई बार उससे पूछा भी कि वह रोज घर पर ऐसी क्या बात करता है? लेकिन वह बात टाल जाता। वह खाना खाने से पहले फोन जरूर करता।
मैं एक बात बराबर नोट कर रहा था कि आशुतोष नाश्ते व दोपहर के खाने के वक्त सुस्त- सा दिखता लेकिन रात का खाना वह खुलकर खाता।
एक रात पी.सी.ओ का फोन खराब था। फोन खराब देख आशुतोष बेचैन हो गया। उसने भोजन भी अनमने होकर ही किया। कमरे में वापस जाते वक्त मैंने कहा, 'आशु यार, कुछ तो है जो तुम मुझसे छिपा रहे हो? क्या तुम मुझे अपना मित्र नहीं मानते?’
'नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं। बात तो बहुत छोटी-सी है, छुपाने लायक भी कुछ नहीं है।
'फिर तुम बताते क्यों नहीं कि तुम रोज घर पर क्या बात करते हो?’
'बात तो कुछ नहीं यार! बस एक कर्ज़ है; जिसे उतारने का प्रयास करता रहता हूँ।‘
'कैसा कर्ज़?’
'माँ का कर्ज़ है?’
'माँ का कर्ज़! यार माँ का भी कोई कर्ज़ होता है?’
'हाँ, मुझ पर तो माँ का ही कर्ज़ है बचपन से माँ जब तक मुझे खाना नहीं खिला देती थी, खुद खाना नहीं खाती थी। जब से मैं कमाने लगा हूँ, मैंने भी नियम बना लिया कि पहले माँ भोजन करेगी ,फिर मैं । बस इसलिए ही फोन कर माँ से पूछ लेता हूँ कि उसने भोजन कर लिया या नहीं। वह 'हाँ’  कह देती है तो खाना स्वाद लगता है।‘
मैंने देखा आशुतोष की आँखें नम हो गई थीं।

2.असली मुज़रिम

देश के सभी समाचार-पत्रों में पुलिस वालों द्वारा निरीह लड़की की बेरहमी से की गई पिटाई की तस्वीरों समेत विस्तृत समाचार छपा था। पुलिस अधिकारियों ने पहले तो ऐसी घटना से इंकार ही कर दिया, लेकिन जब सभी राष्ट्रीय टी.वी चैनलों पर विडियो-क्लिप के साथ समाचार प्रस्तुत हुआ व बार-बार दोहराया गया तो जवाब देना कठिन हो गया।
बात बड़े अधिकारियों तक पहुँची। आनन-फानन में कुछ पुलिस वालों को सस्पैंड कर दिया गया। मंत्री को प्रेस के सामने आकर घटना पर दु:ख व्यक्त करना पड़ा। उच्चस्तरीय जाँच की बात भी कहनी पड़ी।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने ऊपर से मिली लानत को थानेदार तक पहुँचा दिया।
'तुमसे कितनी बार कहा कि ऐसी शर्मनाक स्थिति पैदा न होने दिया करो। मंत्री जी ने आज मुझे क्या-क्या नहीं कहा। सरकार और पुलिस की कितनी बदनामी हुई है।‘
'सॉरी सर! समझाता तो बहुत हूँ, पर गुस्से में या फिर किसी खास आदमी के कहने पर कर बैठते हैं सिपाही कुछ गलत।‘
'मुझे पता है खास हालात में ऐसा हो जाता है। पर कितनी बार कहा है कि कुशल अपराधियों की तरह अपराध का कोई सबूत न छोड़ो। अब ये वीडियो सामने न आया होता तो मुकरना कितना आसान हो जाता। पहले तो मैंने घटना से साफ इंकार कर ही दिया था।‘
'ऐसी स्थिति के लिए ये वीडियो वाले ही जिम्मेदार हैं सर, नहीं तो’
'हाँ, इस असली मुजरिम को ढूँढ़ो और ऐसी सज़ा दो कि आगे से कोई ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे।‘  अधिकारी ने दृढ़ता से कहा।

3.टूटी ट्रे

कमरे के दरवाजा थोड़ा-सा खुला तो किशोर चंद जी भीतर तक काँप गए। उन्होंने अपनी ओर से बहुत सावधानी बरती थी। सुबह आम दिनों से घंटा भर पहले ही उठ गए थे। टूथब्रश बहुत धीरे-धीरे किया ताकि थोड़ी-सी भी आवाज़ न हो। रसोईघर में चाय बनाते समय भी कोई खड़का न हो, इस बात का विशेष ध्यान रखा। फिर भी।
सत्तर वर्ष की उम्र में अब इतनी फुर्ती तो थी नहीं कि बहू के देखने से पहले, किसी तरह ट्रे और चाय के कपों को छिपा लेते।
बहू उनके सामने आ खड़ी हुई थी, 'बाबू जी, क्या बात आज दो कप चाय?’
'नहीं बेटी, चाय तो एक ही कप बनाई थी, उसे ही दो कपों में डाल लिया।‘  गले से डरी हुई- सी आवाज़ निकली।
'और बाबू जी, यह टूटी हुई ट्रे! आप इसे बार-बार प्रयोग न करें, इसलिए यह तो मैंने डस्ट-बिन में डाल दी थी, वहाँ से भी निकाल ली आपने।‘
'वो क्या है कि बेटी’  उनसे कुछ कहते नहीं बना। फिर थोड़ा रुक कर बोले, 'मैंने इसे साबुन लगा कर धो लिया था।‘  
अचानक पता नहीं क्या हुआ कि बहू का स्वर कुछ नर्म हो गया, 'बाबू जी, इस टूटी हुई ट्रे में क्या खास है, मुझे भी तो पता चले’ ।
सिर झुकाए बैठे ही किशोर चंद जी बोले, 'बेटी, यह ट्रे तुम्हारी सास को बहुत पसंद थी; इसलिए हम सदा इसी ट्रे का प्रयोग करते थे। दोनों शूगर के मरीज थे। पर लाजवंती को फीकी चाय स्वाद नहीं लगती थी। उसकी चाय थोड़ी चीनी वाली होती। इस ट्रे के दोनो तरफ फूल बने हैं, एक तरफ बड़ा, दूसरी ओर छोटा। हममें से चाय कोई भी बनाता, लाजवंती का कप बड़े फूल की ओर रखा जाता ,ताकि पहचान रहे’
'मगर आज ये दो कप?’
'आज हमारी शादी की सालगिरह है बेटी। इस बड़े फूल की ओर रखे आधा कप चाय में चीनी डाल कर लाया हूँ , लग रहा था जैसे वह सामने बैठी पूछ रही है 'चाय में चीनी डाल कर लाये हो न?’  कहते हुए किशोर चंद जी का गला भर आया।
थोड़ी देर कमरे में खामोशी छाई  रही। फिर किशोर चंद जी ने चाय के कपों को ट्रे में से उठा कर मेज पर रख दिया। फिर ट्रे उठाकर बहू की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'ले, बेटी, इसे डस्ट-बिन में डाल दे, टूटी हुई ट्रे घर में अच्छी नहीं लगती।‘
बहू से ट्रे पकड़ी नहीं गई। उसने ससुर की ओर देखा। वृद्ध आँखों से अश्रु बह रहे थे।                        

संपर्क: 575, गली नं-5, प्रतापसिंह नगर, कोटकपूरा-151204 (पंजाब) फोन नं. 01635-222517


स्वामी विवेकानंद

राष्ट्र की जीवनधारा नष्ट नहीं हुई है


  भारतीय जनता के बारे में अपनी अंतरंग जानकारी के आधार पर स्वामी विवेकानंद पूर्णत: आश्वस्त हो गए थे कि राष्ट्र की जीवनधारा नष्ट नहीं हुई है, वरन् अज्ञान एवं निर्धनता के बोझ से दबी हुई है। भारत अब भी ऐसे संतों का सृजन करता रहा है, जिनके आत्मा का संदेश स्वीकार करने को पाश्चात्य जगत् ने एक स्वस्थ समाज रूपी रत्नपेटिका का निर्माण तो किया है, परंतु उनके पास रत्न का अभाव है। फिर उन्हें यह समझते भी देर न लगी कि भौतिकवादी सभ्यता के भीतर ही उसके विनाश के बीज भी छिपे रहते हैं। उन्होंने पश्चिमी देशों को बार-बार इस आसन्न आपदा से आगाह किया।
पाश्चात्य क्षितिज का यह चमकीला आलोक एक अभिनव प्रभात का सूचक न होकर, एक बड़ी चिता की लपटों का भी सूचक हो सकता है। पाश्चात्य राष्ट्र अपनी निरंतर क्रियाशीलता की झोंक में निरुद्देश्य और अंतहीन क्रिया के जाल में फँस गए हैं। एक आध्यात्मिक लक्ष्य तथा विश्वव्यापी सहानुभूति के अभाव में, पाश्चात्य राष्ट्रों की भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए अदम्य पिपासा, उनके बीच ईर्ष्या तथा घृणा में अभिवृद्धि करके, अंत में उनके सर्वनाश का साधन हो सकती है।
स्वामी विवेकानंद मानवता के प्रेमी थे। वे मानव को ही ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानते थे और वही ईश्वर विश्व में सर्वत्र सताए जा रहे थे। इस प्रकार अमेरिका में उनका दोहरा मिशन था। भारतीय जनता के पुनरुत्थान हेतु वे अमेरिकी धन, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की सहायता लेना चाहते थे और बदले में अमेरिकी भौतिक प्रगति को सार्थक बनाने के लिए उन्हें आत्मा का अनंत ज्ञान देना चाहते थे। स्वामीजी में कोई ऐसा मिथ्याभिमान न था कि वे अमेरिका से सामाजिक उत्कृष्टता के गुर सीखने में संकुचित होते, फिर उन्होंने अमेरिका वासियों का भी आह्वान किया कि वे भारत के आध्यात्मिक उपहार को स्वीकार करने में अपने जातिगत दर्प को आड़े न आने दें। स्वीकृति तथा परस्पर श्रद्धा की अपनी इस नीति पर आधारित, उन्होंने एक ऐसे स्वस्थ मानव समाज का स्वप्न देखा था, जो मानव की देह एवं आत्मा का चरम कल्याण साधने में समर्थ होगा।
धर्म महासभा के बाद का वर्ष स्वामी जी ने मिसिसिपी से अटलांटिक तक के विस्तृत भूभाग में व्याख्यान देते हुए बिताया। डिट्राएट में वे छह महीने रहे, जहाँ पहले तो वे मिशीगन के भूतपूर्व गवर्नर की विधवा श्रीमती जॉन बेगले के घर मेहमान रहे और बाद में विश्व मेला आयोग के अध्यक्ष टॉमस डब्ल्यू पामर-का आतिथ्य स्वीकार किया।
श्री पामर अमेरिकी संसद के सदस्य तथा स्पेन में अमेरिका के सचिव रह चुके थे। श्रीमती बेगले के मकान पर स्वामी जी के निवास को निरंतर आशीर्वाद कहकर वर्णन किया गया है। कुमारी ग्रीनस्टिडेल ने उनका पहला व्याख्यान डिट्राएट में ही सुना था। परवर्ती काल में वे भगिनी क्रिस्टीनी के रूप में स्वामी जी के सर्वाधिक निष्ठावान् शिष्यों में अन्यतम हुई और उन्होंने भगिनी निवेदिता द्वारा भारतीय नारी के शैक्षिक उन्नयन हेतु कलकत्ता में प्रारंभ किए हुए कार्य में हाथ बटाया।
डिट्राएट हो जाने के पश्चात स्वामी जी ने अपना बाकी समय शिकागो, न्यूयॉर्क तथा बॉस्टन के बीच विभाजित कर दिया। 1894 ई के ग्रीष्मकाल में मेसाचुसेट्स के ग्रीनेकर में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक सम्मेलन से आमंत्रण पाकर, वहाँ उन्होंने कई व्याख्यान दिए। इस सम्मेलन में ईसाई-विज्ञानवादी, प्रेतात्मवादी, आस्था-चिकित्सक तथा इसी प्रकार के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य संप्रदाय भी भाग ले रहे थे।
शिकागो की हेल बहनों के नाम 31 जुलाई 1894 ई को लिखे अपने एक पत्र में स्वामीजी ने अपनी स्वाभाविक विनोदपूर्ण शैली में इस सम्मेलन में भाग लेने वालों का इस प्रकार
वर्णन किया है -
उनका समय बहुत आनंदपूर्वक बीत रहा है तथा कभी-कभी वे सभी दिनभर, तुम जिसे वैज्ञानिक पोशाक कहती हो, पहने रहते हैं। भाषण प्राय: प्रतिदिन होते हैं। बॉस्टन से श्री कालविल नामक एक सज्जन आए हुए हैं। लोगों का कहना है ? कि प्रेतात्मा से आविष्ट होकर वे प्रतिदिन भाषण देते हैं। यूनिवर्सल ट्रुथ की संपादिका जो जिमी मिल्स नामक भवन की ऊपरी मंजिल पर रहती थीं, यहाँ आकर बस गई हैं।
वे धार्मिक उपासना की परिचालन कर रही हैं तथा मानसिक शक्ति के द्वारा सब प्रकार की बीमारियों को दूर करने की शिक्षा भी दे रही हैं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही ये लोग अंधो को नेत्रदान तथा इसी प्रकार के अन्य कार्य भी करने लगेंगे। तथ्य यह है कि यह सम्मेलन एक अजीब ढंग का है। सामाजिक विधि-निषेधों की इन्हें कोई विशेष परवाह नहीं, ये लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ आनंदपूर्वक हैं।
बॉस्टन के श्री उड भी यहीं हैं, जो तुम्हारे संप्रदाय के एक प्रधान मुखिया हैं। किंतु श्रीमती व्हर्लपूल के संप्रदाय में सम्मिलित होने में उन्हें घोर आपत्ति है। इसलिए वे अपने को दार्शनिक रासायनिक भौतिक आध्यात्मिक आदि और भी न जाने कितनी व्याधियों के मानसिक चिकित्सक के रूप में परिचित कराना चाहते हैं।
कल यहाँ एक भीषण आँधी उठी थी, जिसके फलस्वरूप तम्बुओं की अच्छी चिकित्सा हुई है। जिस बड़े तम्बू के नीचे उन लोगों के भाषण हो रहे थे, उस चिकित्सा के फलस्वरूप उसकी आध्यात्मिकता इतनी बढ़ गई कि वह मर्त्य आँखों से एकदम अंतर्हित हो गया और उस आध्यात्मिकता से विभोर होकर प्राय: दो सौ कुर्सियाँ जमीन पर नृत्य करने लगीं! मिल्स कंपनी की श्रीमती फिग्स प्रतिदिन सुबह नियमित रूप से प्रवचन करती हैं, और श्रीमती मिल्स अत्यंत व्यस्तता के साथ सब जगह उछल-कूद रही हैं -ये सभी लोग अत्यंत आनंद में मस्त हैं।
मैं विशेषकर 'कोरा’  को देखकर अत्यंत आनंदित हूँ, क्योंकि पिछले जाड़े में उन लोगों को विशेष कष्ट उठाना पड़ा था और थोड़ा आनंद उसके लिए लाभकर ही होगा। यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा कि वे लोग तंबू में किस प्रकार पूर्ण स्वतंत्रता के साथ रह रहे हैं, किंतु ये लोग सभी बड़े सज्जन तथा शुद्धात्मा हैं -कुछ मनचले अवश्य हैं, लेकिन बस, इतना ही। 

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सदाबहार कलात्मकता
उदंती के मई अंक में प्रकाशित धरोहर में छतीसगढ़ के गहनों  पर सचित्र फीचर सामयिक है। आपने ठीक ही लिखा है- आज से तीस वर्ष पहले मैंने छत्तीसगढ़ यात्रा में देखा था, तब आदिवासी समाज समृद्ध संतुष्ट और गहनों से सज्जित नज़र आता था। बदलते दौर में गहने और परंपरागत वस्त्र और रहन-सहन के तरीके सभी बदल रहे हैं। गोदना भले ही आदिवासी मनोवृत्ति का आभूषण समझा जाता रहा है , पर अमेरिका और उसकी देखा-देखी भारत के युवक गोदना के शौकीन होते जा रहे हैं ; इसे क्या कहा जाए?
अमृत राय की कहानी व्यथा का सरगम, जहीर कुरेशी की दोनों ग़ज़लें व अरोड़ा जी की कविता बरगद की छाँव  भी मन को आंदोलित करती हैं। यद्यपि इनमें से प्रत्येक का रूप विधान और शिल्प अलग अलग तरीके का है। उदंती की कलात्मकता तो सदाबहार है ही।
 - ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव ग्वालियर, brijshrivastava@rediffmail.com

 हवा बदलेगी... लाजवाब
अनकही हवा बदलेगी... विज्ञापन तो बेहतरीन है ही... मगर आपने उस दृष्टिकोण को अपने विचारों का पंख लगाकर जो उड़ान भरी है, वाकई लाजवाब है! मैंने प्रिंट पत्रिका तो नहीं देखी मगर ई- पत्रिका, रचनाओं का चयन और पत्रिका का ले- आउट देखते ही बनता है।
परम आदरणीय सरस्वती प्रसाद जी के दर्शन करने का सौभाग्य मुझे मिला है । संस्मरण कैसे लिखा जाएँ यह (मई अंक में उनका संस्मरण- सीधी माँग) एक मिसाल है!मेरा उन्हें नमन।
         -पंकज त्रिवेदी, editornawya@gmail.com

मीठी यादें
संस्मरण सीधी माँग के हर शब्द से झाँकती एक मीठी याद जो मुस्कान बन सजीव सी हो उठी... अच्छा लगा पढ़कर।आभार आपका इस प्रस्तुति के लिए।    -सदा

सुंदर प्रस्तुति
मई अंक में बहुत ही अच्छे आलेख और रचनाएँ हैं। प्रस्तुति भी सुंदर है।  डॉ. दीक्षित द्वारा रचित हाइकु माँ की ममता तथा जहीर कुरेशी जी की दोनों ही ग़ज़लें अनुपम भाव प्रदर्शित कर रही हैं !               - अनुराग त्रिवेदी एहसास, ehsaascreation@gmail.com

 
सराहनीय प्रयास
वर्तमान में मैं अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी सियांग जिले  में कार्यरत हूँ, परंतु मेरा मूल निवास छतीसगढ़ का बैकुंठपुर नगर है , जो कोरिया जिले का मुख्यालय है। इंटरनेट के माध्यम से उदंती पढऩे का अवसर मिला। इसका कलेवर व सामग्री बहुत अच्छे लगे। अरुणाचल में स्तरीय हिन्दी पत्रिकाओं का नितांत अभाव है; अत: इंटरनेट के माध्यम से ही पत्रिकाएँ उपलब्ध हो पाती हैं। उदंती को इंटरनेट पर उपलब्ध करने का आपका प्रयास सराहनीय है।
  -पद्मनाभ गौतम, अरुणाचल प्रदेश, pmishra_geo@yahoo.co.in

उत्कृष्ट सामग्री
उदंती का अंक मैंने पहले भी देखा है... मई अंक की सभी सामग्री बहुत ही उत्कृष्ट हैं ...डॉ. मिथिलेश जी के हाइकु, विजय अरोड़ा जी की कविताएँ, ज़हीर कुरेशी जी की गज़लें सभी अच्छे लगे। बधाई...!
        -हरकीरत 'हीर’,  harkirathaqeer@gmail.com

तो बात बन जाए...
उदंती लगातार अपने स्तर में सुधार करते हुए आगे बढ़ रही है। साहित्य को समाहित करके आपने इसे एक सम्पूर्ण पत्रिका का रूप देने का प्रयास किया है। यदि इसमें खेल, फिल्म और बच्चों के लिए भी कुछ रचनाएँ शामिल हो जाएँ तो बात बन जाए...
            - सुरभि रॉय

May 22, 2013

उदंती .com,मई 2013

उदंतीः मई 2013

हर कोई इस संसार को बदल डालने के विषय में सोचता है; किन्तु स्वयं को बदल डालने के विषय में कोई भी नहीं सोचता।   
             - लियो टॉल्स्टाय





प्रेरकः एक बेमेल इंसान                        

क्या हवा बदलेगी...

क्या हवा बदलेगी...
मानव समाज में परिवार एक महत्वपूर्ण बुनियादी इकाई है। जिसके बगैर समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य को अपने विकास के लिए समाज की आवश्यकता हुयी, इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए समाज की प्रथम इकाई के रूप में परिवार का उदय हुआ। परंतु वर्तमान आधुनिक समाज में परिवार नाम की यह इकाई बिखरती चली जा रही है। संयुक्त परिवार जो भारतीय समाज की रीढ़ हुआ करती थी अब एकल परिवारों में तब्दील होते जा रहे हैं। इस बिखराव को ही देखते हुए ही संभवत: संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने 1994 को अंतर्राष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था। समूचे संसार में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाने लगा है। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस परिवारों से जुड़े मसलों के प्रति लोगों को जागरूक करने और परिवारों को प्रभावित करने वाले आर्थिक, सामाजिक दृष्टिकोणों के प्रति ध्यान आकर्षित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। इस तरह1995 से यह सिलसिला जारी है। प्रति वर्ष इस दिन को मनाने के लिए अलग-अलग विषय भी निर्धारित किया जाता है। 2013 के वर्ष को 'सामाजिक एकता और अंत: पीढ़ीगत एकजुटता’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है।
 इस मौके पर आज हम भारत में बुजुर्गों के साये से दूर होते एकल परिवार के बारे में बात करेंगे।  संयुक्त परिवार के विघटन ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित तो किया ही है परंतु इसका सबसे अधिक दुश्प्रभाव बच्चों पर पड़ा है। वर्तमान समय में जबकि माता-पिता दोनों ही कामकाजी हो गए हैं, घर में बुजुर्गों की और अधिक आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। परंतु अफसोस की बात है कि आधुनिक पीढ़ी; उनकी चाहे दूसरे शहर में नौकरी की मजबूरी हो या अपनी निजी स्वतंत्रता को बनाए रखने की मजबूरी, वे अपने माता-पिता से अलग परिवार बसा कर रहने लगे हैं। यह आने वाली पीढ़ी और हमारे परिवार के लिए सबसे खतरनाक है। ऐसे परिवारों में तीन-तीन पीढिय़ों का हस होता है- बच्चे तो उपेक्षित होते ही हैं, काम के बोझ और आधुनिक जीवन शैली की आपाधापी में नौकरीपेशा माता-पिता न अपने लिए सुकून के दो पल निकाल पाते न बच्चों की परवरिश ठीक से कर पाते और उनके बुजुर्ग माता-पिता एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हो जाते हैं। यह स्थिति परिवार के विघटन का कारक तो बनती है इसके कारण समाज का विकास भी प्रभावित होता है।
संयुक्त परिवारों के बिखरते चले जाने का प्रमुखकारण है देश में बढ़ती आबादी तथा घटते रोजगार, जिसके कारण परिवार के सदस्य अपनी आजीविका की तलाश में अपने गाँव से शहर या छोटे शहर से बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं। शिक्षा के प्रचार प्रसार के कारण शिक्षित कहलाने वाले युवा अब अपने परंपरागत व्यवसाय या खेती बाड़ी को हेय नजरों से देखता है। बढ़ते उपभोक्तावाद के चलते बहुत से पढ़े-लिखे अतिमहत्वाकांक्षी युवा अपने परिवार और माता-पिता को छोड़ विदेश की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। और वहीं अपना परिवार बसा लेते हैं। इस तरह परिवार या परिजनों से दूर होते जाने के कारण वे भावनात्मक रूप से असहाय होते जा रहे हैं। जबकि एक समय था जब अपने काम से छुट्टी मिलते ही वह सबसे पहले भाग कर अपने परिवार के बीच पहुँचता था क्योंकि असली खुशी उन्हें अपने परिवार के बीच ही मिलती थी।
लेकिन आज की आधुनिक जीवन शैली या अपने व्यक्तिगत सुख और स्वार्थ के कारण जो लोग अपने बूढ़े माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं वे भला अपने बच्चों को कैसा संस्कार दे पाएंगे? एक स्वस्थ समाज की संरचना तभी संभव है जब भावी पीढ़ी को परिवार में सुरक्षित वातावरण मिले। स्वास्थ्य पालन-पोषण से मानव का भविष्य सुरक्षित होता है उसके विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। पालन- पोषण और संस्कार के अलावा वर्तमान में बुजुर्गों का साथ रहना इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि अब बच्चों को घर में अकेले छोडऩा सुरक्षित नहीं रह गया है। दिन प्रतिदिन बढ़ते अपराध ने भय का वातावरण निर्मित कर दिया है। ऐसे में यदि घर में बुजुर्ग उपस्थित होंगे तो बच्चों को सुरक्षा तो मिलेगी ही साथ ही उनसे जो संस्कार उन्हें मिलेंगे वे माता-पिता के लिए भी सकारात्मक ऊर्जा का काम करेंगे।
अंत में-
'हवा बदलेगी’ स्लोगन के माध्यम से एक पंखे का विज्ञापन इन दिनों अपना ध्यान खींच रहा है- जिसमें दिखाया जाता है कि वृद्धाश्रम में एक युवा दम्पत्ति पंहुचता है, उनके संकोच को देखकर आश्रम की महिला कहती है कि आप निश्चिंत हो कर अपने माता-पिता को हमारे पास छोड़ दीजिए हम उनकी अच्छे से देखभाल करेंगे। यह सुनकर युवती आश्रम में दूर बैठे एक बुजुर्ग जोड़े की ओर देखती है और कहती है आप गलत समझ रही हैं मेम क्या हम यहाँ से अपने लिए मॉम-डैड घर ले जा सकते हैं... यह सुनकर आश्रम वाली महिला आश्चर्य और खुशी से मुस्कुरा उठती है। ... है तो यह एक पंखे को प्रचारित करने वाला विज्ञापन पर वह एक सामाजिक संदेश भी दे रहा है। काश सचमुच हवा बदल जाए....
                                          - डॉ. रत्ना वर्मा