May 22, 2013

कलाकार

ओडीसी नृत्यकार नित्यानन्द से बातचीत
- रचना श्रीवास्तव
हिम्मत करे इन्सान तो हर काम है आसां
कहते हैं, जब मनुष्य पर कोई मुसीबत आती है, भगवान उसको सहने की शक्ति पहले ही दे देता है। ओडीसी नृत्यकार  नित्यानन्द इसका जीते जागते उदाहरण हैं। एक पैर कटने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस चुनौती का सामना करते हुए  एक पैर पर नृत्य करके उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि मनुष्य के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। लाखों लोगों के प्रेरणा स्रोत श्री नित्यानन्द जी से पिछले दिनों लम्बी बातचीत करने का मौका मिला। आइये जानते हैं उनकी कहानी उन्हीं के शब्दों में-
 नित्यानन्द जी अपने बारे में कुछ बताइए-
मेरा जन्म 9 मार्च 1975 को हुआ था। मेरी पढऩे में बहुत रुचि नहीं थी; परन्तु मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बहुत रुचि थी। मैं जात्रा पार्टी के कैम्प में बैठता था। मैं गाता था और अभिनय भी करता था। तब सभी ने मुझे पसंद किया और जात्रा में शामिल कर लिया।
आपने नृत्य करना कब से प्रारंभ किया?
 मैं 1991 में  बिदाईपुर से भुवनेश्वर ओडिसी नृत्य सीखने के लिए आया। मैंने गुरु बिम्बाधर दास और गुरु गंगाधर प्रधान से नृत्य सीखा। गुरु के आशीर्वाद से मैं प्रदेश की जात्रा टीम का कोरियोग्राफर बना।
आपके साथ ये हादसा कैसे हुआ?
11 जून 2000 की बात है मैं अपनी नयी मोटरसाइकिल से अपने गाँव भद्रक जा रहा था। रास्ते में तेज गति से आते ट्रक से मेरा एक्सीडेंट हो गया। मेरा दाहिना पैर बुरी तरह से कुचल गया था; अत: मेरा पैर काटना पड़ा। मैं 6 महीने अस्पताल में रहा। जब मै घर आया मेरा सब कुछ खो चुका था।
इतने बड़े हादसे के बाद जब मनुष्य अपनी हिम्मत खो देता है तो फिर आपने कैसे धीरज रखा और हिम्मत का साथ नहीं छोड़ा?
 पहले तो मैं टूट चुका था; फिर  मैंने सोचा मैं तो केवल नृत्य करने के लिए ही पैदा हुआ हूँ । मै जीवित हूँ इसका मतलब उस समय भगवान मेरे पास थे। मैं अपने गुरु जी के पास गया मैंने कहा गुरु जी क्या करूँ मुझे सहारा दो मुझें नृत्य ही करना है। मेरे गुरुजी बिम्बाधर जी ने मुझे बहुत हिम्मत दी और कहा यदि सुधा चंद्रन कर सकती है तो तुम भी कर सकते हो। तुमको एक पैर से नृत्य करके दुनिया को दिखाना है ।
जो कुछ मैने सिखाया है उसी को करो। गुरु जी से हिम्मत पाकर मैने अभ्यास किया और आज नृत्य कर पा रहा हूँ
क्या एक पैर पर नृत्य करना आसान था ?
नहीं, यह बहुत ही कठिन काम था। मैं बार-बार गिर जाता था। एक पैर पर सन्तुलन बनाना बहुत कठिन था। पैर में  उतनी ताकत भी नहीं थी। बस मन में एक विश्वास था और गुरु जी की बात- तुम एक पैर से नृत्य करोगे और लोग तुमको देखेंगे तुम्हारा नाम दुनिया भर में होगा एक पैर से नृत्य करो, यही मेरी गुरु दक्षिणा होगी। मुझे लगा कि मुझे गुरु के लिए नृत्य करना है। बस अभ्यास  करता गया और गुरु के आशीर्वाद से आज यहाँ तक पहुँचा हूँ।
इस घटना के बाद आपने लोगों के सामने अपना पहला नृत्य कब किया?
  गुरु सच्चिदानन्द दास ने एक नृत्य नाटिका बनाई 'पंगु गिरी लंघतेÓ उसको मैंने 2005 में रवीन्द्र मंडप भुनेश्वर में प्रस्तुत किया। बस वहीं से धीरे-धीरे लोग जानने लगे और मैं नृत्य करता गया। जब पैर था तो मैं इतना खुश नहीं था। आज बहुत खुश हूँ कि लोगों का इतना प्यार मिलता है। 2009 में  मैंने जी टीवी पर आशाएँ कार्यक्रम में सुधा चंद्रन जी के साथ नृत्य प्रस्तुत किया था, वह मेरे लिए बहुत आनंद का समय था; क्योंकि सुधा जी हमेशा मेरी प्रेरणा स्रोत रहीं है।
कलाश्रम आपका नृत्य विद्यालय है, इसके बारे में  कुछ बताइए।
जी हाँ भुवनेश्वर में मैंने ये एकेडमी खोली है जहाँ मैं सभी को नृत्य सिखाता हूँ। पैरों की मुद्रा मैं अपने हाथों के जरिये सिखाता हूँ। हम हर साल एक गुरु उत्सव करते हैं। ये उत्सव करते हुए 5 साल हो गए हैं। ये उत्सव मैंने अपने गुरु के लिए प्रारंभ किया था। इस उद्देश्य से कि सारे गुरुओं को याद किया जाए और उनके परिवार को गुरु दक्षिणा दी जाए।
आपने अमेरिका में बहुत- सी जगह पर कार्यक्रम किया है। आपका यह अनुभव कैसा रहा?
बहुत अच्छा अनुभव रहा है। सभी ने बहुत प्यार दिया है। उनका प्यार देख कर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं।
आपने अमेरिका में अभी तक कौन कौन सी नृत्य नाटिकाएँ  प्रस्तुत की हैं।
साख, पंघु गिरी लंघते और गुरु दक्षिणा नृत्य नाटिकाएँ  प्रस्तुत की है।
आपने बहुत से नृत्य किये हैं कौन-कौन सी नृत्य नाटिका को  लोगों ने बहुत पसंद किया है?
  गुरु दक्षिणा को लोगों ने बहुत पसन्द किया है। यह मेरे जीवन पर आधारित नृत्य है। मेरे सखा विजय भैया उस नित्यानन्द का अभिनय करते हैं जब पैर था और मंै बाद में  स्वयं अपना अभिनय नृत्य करता हूँ।
आज आप अपना प्रेरणा स्रोत किसको मानते हैं?
जब मेरा एक्सीडेंट  हुआ था तो मैं  लोगों से सहायता माँगता रहा किसी ने मेरी सहायता नहीं की। सभी  देख कर  निकल गए  तब सभी ने मुझे किनारे कर दिया था। सबसे पहले मंै अपने माता पिता, गुरु जी, भाई, भाभी इन सभी  लोगों को प्रेरणा स्रोत मानता हूँ; क्योंकि ये हर समय मेरी हिम्मत बढ़ाते रहे।
ओडिसी नृत्य का भविष्य आपको कैसा लगता है ?
भविष्य तो बहुत ही अच्छा है। देश में  और विदेशों में  सभी जगह लोग इस नृत्य  को बहुत पसंद करते हैं  बस स्वयं को ही  इस नृत्य की अहमियत को समझना होगा। अपने प्रदेश में  इसको ऊँचा उठाना होगा।
आपको सभी ने इतना प्यार दिया क्या कहना चाहेंगे ?
आप सभी ने भगवान बनके अपनी शक्ति मुझ में डाली है तभी  मै नृत्य कर पा रहा हूँ। जो भी कोई विकलांग हैं उनको हिम्मत नहीं हरनी चाहिए। मेहनत करते रहना चाहिए। जो विकलांग नहीं है और कोई काम नहीं करते या निराश हंै, उनसे कहना चाहूँगा कि जब मुझ जैसा इन्सान ऐसा कुछ कर सकता है तो आप लोगों के पास तो सब है (शारीरिक रूप से ) फिर आप तो सब कुछ कर सकते हैं।

संपर्क: डलस यू. एस. ए E-mail: rach_anvi@yahoo.com

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