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Apr 10, 2011

अकेला उड़ चला

- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'










1
नदी का तीर
हुआ निर्मल नीर
हर ली पीर।
2
तुम जो बोलीं-
बातों के दरिया में
मिसरी घोली।
3
समेटा गया-
न सुधियों का जाल
सिहरा ताल।
4
छोटी- सी चूक
अधूरा- सा जीवन
बाकी थी हूक।
5
दूर है गाँव
बची केवल धूप
कहीं न छाँव।
6
वही है मीत
रोम- रोम में बसी
जिसके प्रीत।
7
परदेस में
उठी तुमको पीर
मैं था अधीर।
8
माँगी तुमने
जब रब से दुआ,
मन था चुआ।
9
माथा जो छुआ
हृदय- सागर में
जाने क्या हुआ !
10
जागी उमंग
बज उठी हो जैसे
जलतरंग।
11
समय गया
कुछ पल ठहर
उठी लहर।
12
जी भर जियो
मिला जो प्रेमरस
बाँट दो, पियो।
13
नयन-जल
पिघला गई कोई
पीर अतल।
14
पोंछो ये पलकें
मोतियों भरे हैं ये
सागर छलके।
15
मिली न पाती
संदेसा दे गया था
तेरा ये मन।
16
मृग बावरा
है नाभि में कस्तूरी
कभी न जाने।
17
इन नैनों से
आज अमृत चुआ
ये कैसे छुआ ?
18
जीवन- घट
जब जितना ढरे
उतना भरे।
19
काँटे जो मिले
जीवन के गुलाब
उन्हीं में खिले।
20
मन में छल
तो छलकेगा कैसे
सुधा का घट।
21
वीणा के तार
कसोगे सही तभी
गूँजेगा राग।
22
निर्मोही जग
सदा पीर ही बाँटे
सबको काटे।
23
प्राणों का पंछी
अकेला उड़ चला
साँझ हो गई।
24
क्रौंच- सा मन
व्यथा-बाण-आहत
करो जतन।
संपर्क:
मो. 09313727493,
Email- rdkamboj@gmail.com

पिछले दिनों

फ्रांस में बुर्का पहनना अपराध
फ्रांस में 11 अप्रैल 2011 से एक नया कानून बन गया है। जिसके अनुसार किसी भी महिला द्वारा बुर्का पहनना एक दंडनीय अपराध होगा। सार्वजनिक स्थल पर बुर्का पहनने पर 150 यूरो यानी 9,000 रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा। इस कानून के साथ ही फ्रांस, यूरोप का पहला ऐसा देश बन गया है जहां बुर्के पर रोक लगी है। ज्ञात हो कि यूरोप में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी फ्रांस में है।

महिलाओं ने तोड़ी परम्परा
महाराष्ट्र के कोल्हापुर के प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर में 2000 वर्षो की पुरानी परम्परा को तोड़ते हुए महिलाओं ने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया और देवी की पूजा की।
भारतीय जनता पार्टी की महिला मोर्चा की अध्यक्ष नीता केलकर के नेतृत्व में महिलाओं ने मंदिर में दाखिल होकर देवी अम्बाबाई की पूजा अर्चना की। अब तक महिलाओं को पूजा के लिए मंदिर के एक निर्धारित स्थान तक जाने की अनुमति थी। यह पाबंदी केवल आम घरों की महिलाओं पर लागू थी जबकि शाही परिवारों और लोकप्रिय महिला हस्तियों और पुजारी की पत्नियों के ऊपर यह प्रतिबंध लागू नहीं था!

यूं ली जम्हाई कि खुला ही रह गया मुंह!
ब्रिटेन में 17 साल की एक छात्रा होली थॉम्पसन ने जम्हाई लेते समय अपना मुंह इतना ज्यादा खोल लिया कि फिर वह बंद नहीं हो सका। होली कक्षा में पढ़ते समय इतनी ऊब गई कि उसने बहुत ताकत लगाकर जम्हाई ली, इससे उसका मुंह खुला का खुला रह गया। जम्हाई लेने से उसके जबड़े अपने स्थान पर हट गए। और उसे डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाना पड़ा।

आपके पत्र मेल बॉक्स


पर्यावरण पर अच्छा चिंतन
उदंती का होली और महिला दिवस पर केन्द्रित अंक पढ़ा, आलेखों का बहुत अच्छा संयोजन है। अनकही में जहाँ यथार्थ का परिचय कराया है वहीं पर्यावरण पर अच्छा चिंतन है। कुल मिलकर पठनीय सामाग्री और अच्छे कलेवर के लिए आपको साधुवाद ...
-प्रोफेसर अश्विनी केशरवानी
ashwinikesharwani@gmail.com
समाज को कचोटती रचना
हाऊस वाईफ के अस्तित्व पर उठते सवाल? बहुत ही प्रेरणादयी और आज के समाज को कचोटती...अच्छी रचना है। वंदना जी ने नारी शक्ति का बोध कराया है।
- सत्यम शिवम
satyamshivam95@gmail.com
चर्चा की मांग करता लेख
वन्दना जी आपका लेख वाकई एक ज्वलंत प्रश्न पर चर्चा की मांग कर रहा है, घर में रहकर बच्चों को संस्कार देना तथा समाज में परिवार को एक सम्मानजनक स्थान दिलाना एक गृहणी का ही काम है और अन्तत: देश के प्रति योगदान !
- अनिता निहालानी, असम
गंभीर प्रश्न
वंदना जी कविता के साथ- साथ आलेख में भी बहुत गंभीर प्रश्न उठाती हंै। हाऊस वाईफ के अस्तित्व पर उठते सवाल? आलेख में भी उन्होंने एक ऐसे ही गंभीर प्रश्न को उठाया है। भाषा पर उनकी पकड़ अच्छी है। इस लेख के माध्यम से वे नई दृष्टि दे रही हैं।
- अरुण चन्द्र रॉय,
arunroy1974@gmail.com
बहुत खूब वंदना जी
मैं एक कामकाजी लड़की हूं और हाऊस वाईफ्स का आदर करती हूं। क्योंकि मैं हाऊस वाईफ के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकती।
- बाबुषा, जबलपुर
astu_1979@hotmail.com
उनकी महत्ता पैसे कमाने वाली से ज्यादा है
मैं नौकरी करती हूँ। मुझे फिर भी कभी ये नहीं लगा कि मैं बहुत बड़ा कोई महान काम कर रही हूँ। घर की थोड़ी बहुत जिम्मेदारियां भी निभाने की कोशिश करती हूँ। पर मेरी मां हर काम को बड़ी आसानी से निपटा लेती है वह बात मुझमें नहीं आ पाती। जो लोग ऐसा समझते है कि गृहिणी मतलब सिर्फ घर का कामकाज करने वाली तो उनकी सोच पर मुझे हँसी आती है क्योंकि मुझे पता हैं कि अगर मेरी मां दो दिन घर के काम से छुट्टी ले ले या आराम कर ले तो मेरी क्या हालत होती है। उनकी महत्ता पैसे कमाकर लाने वाली महिला से कहीं ज्यादा है। घर के सारे आर्थिक निर्णय भी उन्हीं के होते हैं और सही भी। ऐसे में उनकी महत्ता को नहीं समझना ही सबसे बड़ी बेवकूफी है।
- पिंकी
सार्थक और सटीक बात
पत्रिका का मार्च अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका का कलेवर अत्यंत आकर्षक, रंगीन एवं साज-सज्जा पूर्ण है। सम्पादकीय यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ....? एवं क्रोधित प्रकृति दोनों ही कटु यथार्थ की ओर इंगित करते हैं परन्तु मानव समझे तब न! सार्थक और सटीक बात कहने के लिए साधुवाद। बेटियां लाएंगी उजियारा लेख जानकारी देने के साथ- साथ प्रेरणास्पद भी है। हाउस वाइफ के अस्तित्व पर उठते सवाल? में अनेक सवाल उठाए गए है जो आज के तथाकथित समाज पर कई प्रश्न चिह्न लगाते हैं। सांस्कृतिक पर्व होली पर लेख एवं होली पर हाइकू पर्व के अनुकूल है अन्य सभी सामग्री स्तरीय, पठनीय व संग्रहनीय है।
- डॉ. रमा द्विवेदी
ramadwivedi53@gmail.com
एक कलाकृति
उदंती अपने मनोरम रूप एवं सारगर्भित सामग्री के 'मणिकांचन' योग से यह एक 'कलाकृति' बन गई है (मात्र पत्रिका नहीं)। संपादकीय ने मन मोह लिया। बेटियां लाएंगी ..., हाउस वाइफ, बेटी की कमाई... तीनों आलेख अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रासंगिक और विचारोत्तेजक हैं। अन्य सभी सामग्री भी बहुत ज्ञानवर्धक, मनोरंजक है। हाइकु की प्रस्तुति की प्रशंसा में क्या कहूं? मन किया कि इस पृष्ठ को फ्रेम कराकर अपनी अध्ययन मेज पर सजा लूं।
- डॉ. सुधा गुप्ता
काकली, साकेत, मेरठ (उ.प्र.)

रंग- बिरंगी दुनिया

कुत्तों की सबसे मंहगी शादी
लंदन की एक महिला ने अपनी प्रिय पालतू कुतिया लोला का अकेलापन दूर करने के लिए उसका स्वयंवर रचाया। इसके लिए उन्होंने ऑनलाइन प्रतियोगिता रखी। उसमें उन्हें सौ आवेदन मिले इनमें से उन्होंने 6 कुत्तों को चयनित किया। स्वयंवर के लिए आए इन कुत्तों में से चीनी प्रजाति के मगली से उसकी शादी तय की गई। खास बात यह है कि मगली को 2005 में ब्रिटेन का सबसे बदसूरत कुत्ता चुना गया था।
लोला की शादी में 20 हजार पौंड (करीब 14 लाख रुपये) खर्च किए। यह ब्रिटेन में हुई कुत्तों की अब तक की सबसे महंगी शादी मानी जा रही है। लोला ने इस अवसर पर एक हजार पौंड (करीब 72 हजार रुपये) की डिजायनर पोशाक के साथ हीरे- मोतियों के आभूषण पहने थे। दूल्हे मगली की पोशाक ई-बे वेबसाइट से खरीदी गई थी। इस अनोखी शादी में 80 मेहमान शामिल हुए। समारोह स्थल को चार हजार पौंड (करीब तीन लाख रुपये) के फूल- गुलदस्तों और गुब्बारों से सजाया गया था। लोला मगली को पाकर बहुत खुश दिखाई दे रही थी।
लोला की मालकिन 32 वर्षीया लुईस हैरिस कुत्तों और उनसे संबंधित सामान का व्यवसाय करने के साथ उनके लिए पार्लर भी चलाती हैं। हैरिस पहले भी अपने छह साल के पालतू कुत्ते के जन्मदिन पर, उसके डिजाइनर कपड़ों, उसके जेवरों आदि पर लाखों खर्च करने के लिए प्रसिद्ध रही है। हैरिस ने बताया कि लोला के भाई- बहन लूलू और लैरी लोला के साथ नहीं खेलते थे इस कारण वह अकेलापन महसूस करती थी। अब उसे साथी मिल गया है।

दुनिया का सबसे विशालकाय बदबूदार फूल
फूल सुगंध और सौंदर्य का प्रतीक होता है लेकिन यदि फूल से खुशबू की जगह बदबू आए तो आश्चर्य तो होगा ना। जी हां पिछले दिनों उत्तरी स्विट्जरलैंड के शहर बासेल वनस्पति उद्यान में एमॉर्फॉफैलस टाइटैनम नामक एक ऐसा विशालकाय फूल खिला जिससे बदबू आती है और वह भी जले हुए शक्कर या सड़े हुए मांस की। इस फूल को मुर्दा फूल के नाम से भी जाना जाता है। इस फूल के बीचों बीच एक लंबा तना होता है जिसके चारों ओर सैकड़ों नर व मादा फूल लाल रंग के ब्रैकेट से घिरे होते हैं। इस गंध की वजह परागण के लिए कीड़े-मकोड़ों को आकर्षित करना होता है।
स्विट्जरलैंड में यह 75 सालों में पहली बार खिला और बासेल में इसे खिलने में 17 वर्षों का समय लगा। दुनिया में सिर्फ दो मीटर यानी 6।6 फुट ऊँचा यह फूल तीन दिन ही जीवित रहता है इसके बाद यह फूल मुरझाने लगता है। इस फूल के मुरझाने से पहले इसे करीब हजारों लोगों ने देखा। 1878 में इटली के वैज्ञानिक बेक्कारी द्वारा इसकी खोज किए जाने के बाद अब तक दुनिया-भर में 134 बार इस फूल को प्रयास पूर्वक उगाया जा सका है। वैसे ये फूल मूल रूप से इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के ऊष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में पाया जाता है और इसे आर्द्र मौसम की जरुरत होती है। ये जंगलों में भी यदाकदा ही खिलता है।

छत्तीसगढ़ की परंपराओं और विशेषताओं का आवा ...

परदेशीराम वर्मा लिखित छत्तीसगढ़ी उपन्यास आवा का यह द्वितीय संस्करण है। परदेशीराम वर्मा ने हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी में समान अधिकार के साथ लिखकर ख्याति अर्जित की है। छत्तीसगढ़ी भाषा में उपन्यास कम हैं ऐसे में उनका यह उपन्यास और भी महत्वपूर्ण बन जाता है। इस उपन्यास में स्वतंत्रता के लिए छत्तीसगढ़ का संघर्ष एवं स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान विशेषकर जातीय सौमनस्य और गांधीवादी आचरण को रेखांकित किया गया है। इसमें छत्तीसगढ़ की परंपरा एवं विशेषताएं कथा के माध्यम से उभर कर सामने आर्इं हैं। भिलाई इस्पात संयंत्र की आधारशिला रखी जाने तक की कहानी के साथ- साथ छत्तीसगढ़ में मंचीय कलाकारों ने आजादी की लड़ाई में जो योगदान दिया है उस पर इस उपन्यास में बेहद रोचक वर्णन है। इस उपन्यास को एम.ए. पूर्व के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। आजादी के बाद का एक दशक इस उपन्यास में चित्रित है।
प्रकाशक- अगासदिया प्रकाशन दुर्ग, मूल्य- 150/-