मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Dec 2, 2009

इस अंक के लेखक

अभिषेक ओझा
बलिया (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुआ और रांची (झारखण्ड) में पला बढ़ा। किस्मत अब तक जहां भी ले गई... लगता है उसी के लिए बना था। फिलहाल एक इनवेस्टमेंट बैंक में कार्यरत।
पढऩे की बीमारी जो बचपन में लगी वह अब तक जारी है। काम के बाद घूमने-फिरने, फिल्मों और पुस्तकों से जो समय बच जाता है वो हिन्दी प्रेम में व्यतीत होता है... उसी प्रेम की कुछ झलकियां मेरे ब्लाग ojha-uwaach.blogspot.com में भी नजर आ जाती हैं।
संपर्क - Credit Suisse , Wipro Complex Phase II,
Rajiv Gandhi IT Park, Hinjewadi Pune - 411057
Mob. 9923369575
Email- abhishek.ojha@gmail.com
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आशीष दशोत्तर
5 अक्टूबर 1977 को रतलाम में जन्मे आशीष दशोत्तर ने एमएससी (भौतिकी) एमए (हिन्दी) एलएलबी तक की शिक्षा प्राप्त की है। उनके प्रकाशित काव्य संग्रह हैं नन्हीं बूंदों का समंदर तथा खुशियां कैद नहीं होती, इसके साथ ही एक गजल संग्रह प्रकाशनाधीन है।
संपर्क : 39, नागर वास
रतलाम 457001 (मप्र)
मो. 098270 84966
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दीपाली शुक्ला
इटारसी में जन्मी 31 वर्षीय दीपाली शुक्ला ने एल.एल.एम. की शिक्षा के बाद पत्रकारिता में कैरियर की शुरूआत नवभारत में बतौर उपसंपादक के रूप में की। वर्तमान में एकलव्य के साथ जुड़ी हैं। विभिन्न विषयों पर लेख और कहानियां अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
संपर्क- फ्लैट नं. टी-1
अमरज्योति अपार्टमेंट,
बी-218, शाहपुरा,
भोपाल म.प्र.-462039
मोबाइल- 9977277425
Email- deepalishukla99@yahoo.com

चलता रहेगा आत्महत्याओं का दौर

निर्माण की निरंतर बहती एक नदी में स्वराज्यजी ने आंकड़ों के साथ अपनी बात रखने का प्रयास किया है। आंकड़ों पर बहस हो सकती है लेकिन बदलाव की बयार की बात एकदम सही है। इस बदलाव की क्रांति को अब धूर- नक्सली क्षेत्रों तक ले जाने की चुनौती सरकार के सामने है। देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह इसमें कितना सफल होते हैं। कर्ज माफी के फरेब में किसानों को छत्तीसगढ़ सरकार ने नहीं उलझाया वरन उनके लिए सिंचाई, कम ब्याजदर में कर्ज की उपलब्धता आदि उपाय किेए। परिणाम सामने है। पड़ोसी राज्य के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज माफी से उपजी अंतरिम राहत अब दम तोड़ चुकी है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव में किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है। अब तो कोई चुनाव भी सामने नहीं है, इसलिए कहा जा सकता है कि कम से कम अगले तीन साल और इस क्षेत्र में आत्महत्याओं का दौर चलता रहेगा।
- अंजीव पांडेय, डिप्टी सिटी एडीटर दैनिक 1857,नागपुर, panjeev@gmail.com
बाबू मानसिकता
सरकार की सारी योजनाओं को पलीता लगाने में एक वर्ग पूरी तरह कमर कसकर जुटा है- वह वर्ग है बाबू मानसिकता वाली टीम। दोनों में सांठ-गांठ हो जाए तो इन्हें ब्रह्मा भी नहीं तोड़ सकता है। इनका बस चले तो ये सब कुछ बेच डालें।
अनकही: भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन पर प्रतिक्रिया
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com
भावभीनी विदाई
मुन्ना पाण्डेय जी के लेख बहादुर कलारिन एक जीवंत दस्तावेज के द्वारा हबीब साहब को एक भावभीनी विदाई दी गई है, कहा जा सकता है। हालांकि रंगमंच, हिंदी साहित्य, और लेखन से मेरा कोई गहरा जुड़ाव नहीं है और ना ही इन सबका कोई अनुभव है लेकिन हबीब साहब जैसे रंगधुनी से वाकिफ होना और प्रभावित होना कोई अचरज की बात नहीं। बहादुर कलारिन नाटक और रचनात्मकता को बहुत सलीके से दर्शाया गया है। इस लेख को पढ़ कर मुझे अपने भीतर एक नयी उर्जा, नयी सोच और नयी दिशा का अहसास हुआ इसके लिए मैं मुन्नाजी और उदंती.कॉम का आभारी हूं।
- मनोज मीना, a-vella-label-Ø blog
साफ-सुथरी पत्रिका
उदंती का नवम्बर अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका मैंने पहली बार देखी और यह देखकर प्रसन्नता हुई कि आपने किसी भी अखिल भारतीय स्तर की पत्रिका के अनुरूप यह पत्रिका प्रकाशित की है। पत्रिका का कागज, छपाई और सामग्री सभी कुछ स्तरीय और पठनीय है। अनकही के अंतर्गत आपके विचार देश की ज्वलन्त समस्या पर प्रकाश डालते है। पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, रंगमंच, पुरातन, वन्य जीवन, लघु कथाएं ये सभी स्तंभ पत्रिका के स्तर को ऊंचा उठाते है। इस अंक में मुझे विशेष रूप से खलील जिब्रान की कहानी महत्वाकांक्षी फूल और लियो तोल्स्तोय के संस्मरण बहुत पसंद आये। इसके साथ ही रंग बिरंगी दुनियां के अंतर्गत दोनों रंगबिरंगे समाचार अच्छे लगे। अभियान के अंतर्गत हैली जी लेख पसन्द आया। एक साफ-सुथरी पत्रिका के प्रकाशन के लिए बधाई।
- संतोष खरे, राजेन्द्र नगर, सतना (मप्र)
सुंदर समायोजन
उदंती डॉट काम पर इतनी दमदार सामग्री का इतने सुन्दर ढ़ंग से आपका समायोजन निश्चित ही पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है। रचनाओं का चयन पत्रिका के स्तर के अनुरूप होता है, यह एक बड़ी बात है। आपकी लगन और आपका श्रम निरर्थक नहीं जाएगा, मुझे पूरा विश्वास है।
-सुभाष नीरव, subhneerav@gmail.com
आग को जलाए रखना
आग के ऐसे न जाने कितने दावानल हैं जो हमारे देश के हर इंसान के हृदय में धधक रहा है, लेकिन यह दुखद है कि हम अफसोस मनाते रह जाते हैं। जैसे ही आग बुझती है, यह दावानल भी कहीं दफऩ हो जाता है। लेकिन आप जैसे लिखने वालों की लेखनी में यह दावानल धधकते रहना चाहिए। संतोष कुमार जैसे पत्रकार ही इस आग को जलाए रख सकते हैं। आपके इस आग के लिए आपको बधाई।
- एसएन राणा, रायपुर
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ग्लू ने बचा ली एलाग्रेस की जिंदगी


यह बात आपको अटपटी लग सकती है कि दिमाग के अंदर स्थित रक्त के रिसाव को रोकने के लिए एक खास किस्म के गोंद (ग्लू) का सफलता पूर्वक प्रयोग किया जाए। जी हां, बीते दिनों अमेरिकन सर्जनों ने मात्र 11 महीने की बच्ची की जान बचाने के लिए उसके मस्तिष्क के अंदर स्थित सूक्ष्म रक्तवाहिनियों से होने वाले रक्त के रिसाव को रोकने के लिए एक खास किस्म के गोंद का प्रयोग किया। यह प्रयोग सफल रहा। ब्रिटिश मूल की इस लड़की का नाम है- एलाग्रेस हनीमन। बच्ची के पैदा होने के बाद डॉक्टरी परीक्षणों से यह पता चला कि इसके दिमाग की रक्त वाहिकाओं में छोटे-छोटे छेद हैं। इस बच्ची को जो तकलीफ थी उस तरह के मामलों की संख्या दुनियाभर में प्रतिवर्ष चंद सैकड़ा से ज्यादा नहीं है। डॉक्टरों की राय में एला ग्रेस सिर्फ कुछ महीने ही जिंदा रह सकती थी। कारण, रक्त वाहिनियों से रक्त बाहर रिसकर कपाल या खोपड़ी की सूक्ष्म कैविटी में प्रवेश करने लगा था, इस कारण बच्ची के दिमाग की धमनी असाधारण रूप से फूल गयी थी। इस स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में एन्यूरिज्म कहते है। यह स्थिति बच्ची की जिंदगी को संकट में डाल रही थी। इसलिए इस नाजुक हालत में डॉक्टरों ने जोखिम लेकर एला का ऑपरेशन करने का फैसला किया और इस खास किस्म के ग्लू ने उसे बचा लिया।
बिना तेल से जब उड़ेंगे विमान
दुनिया में बढ़ते वाहन प्रदूषणों से बचने के लिए अब ईधन के विकल्प के बारे में सोचे जाना लगा है। सड़कों पर चलने वाली कई गाडिय़ां अब सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने लगी हैं, इसी तरह विमान को उड़ाने के लिए ईधन का विकल्प ढूंढा गया है।
जरा सोचिए, अगर बिना तेल की टंकी भरे कोई विमान आसमान में उड़ता नजऱ आए तो कैसा लगेगा। जी हां, अब एक ऐसे विमान को उड़ाने की तैयारी की जा रही है। ईधन की ज़रूरत को पूरा करने के विकल्प के तौर पर इस विमान में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा।
सौर ऊर्जा से चलने वाले विमान का मॉडल पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए उड़ चुका है। इस विमान की वास्तविक उड़ान फरवरी में प्रस्तावित है और इसका अंतिम स्वरूप 2012 में अटलांटिक महासागर को पार करने की कोशिश करेगा।
विमान की चौड़ाई हालांकि जंबो जेट विमान जितनी है लेकिन इसका वजन मात्र 1,500 किलोग्राम है और इसके चालक हैं स्वीडन के पायलट बर्टेंड पिकार्ड। सोलर इंपल्स के मुख्य अधिशाषी एंड्रे बोर्शबर्ग का कहना है, 'ये बहुत ही रोमांचक है, हम अब काफी ठोस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। आपको इस विमान की खूबियों को महसूस करना चाहिए और अब इसे ज़्यादा देर तक ज़मीन पर खड़ा नहीं रखा जा सकता।' बोर्शबर्ग ने कहा कि अगर सब कुछ संतोषजनक रहता है तो हम इसे फरवरी में कऱीब दो घंटे की उड़ान के लिए इजाज़त देंगे। लेकिन हरेक स्तर पर काफी सावधानी बरती जाएगी।

Nov 20, 2009

उदंती.com-नवम्बर 2009


वर्ष 2, अंक 4, नवम्बर 2009
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मेरा विश्वास है कि वास्तव में महान व्यक्ति का पहला लक्षण नम्रता है और कुछ नहीं।
-जॉन रस्किन
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अनकही: भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन
पर्यावरण:सब कुछ पाने की लालसा - बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण
आपदा प्रबंधन: हादसों की आग कब बुझेगी? - संतोष कुमार
रंगमंच:बहादुर कलारिन: एक जीवंत दस्तावेज - मुन्ना कुमार पांडे
यादें :धरोहर बन गई हीरामन की बैलगाड़ी - उदंती फीचर्स
पुरातन:सिंघनपुर के शैलचित्र - उदंती फीचर्स
राज्योत्सव: छत्तीसगढ़ निर्माण की निरंतर बहती एक नदी - स्वराज्य कुमार
वन जीवन:हम नहीं देख पाएंगे, चीते की निराली चाल - प्रमोद भार्गव
संस्मरण: जंगल में मिलती थी उन्हें लिखने की प्रेरणा - रूपसिंह चन्देल
खोज: पहली प्लास्टिक सर्जरी भारत में की गई थी
शाकाहार : खान-पान की आदत बदल कर बचाएं पर्यावरण -एस. अनंतनारायणन
लघुकथाएं: गरीबों का मसीहा, सुख की परिभाषा - आशा तनेजा
21 वीं सदी के व्यंग्यकार: संस्कृति की सुनामी लहर - संतोष खरे
कहानी: महत्त्वाकांक्षी फूल- खलील जिब्रान
कविता: मुझे है अनुभव - जीवन यदु
अभियान: हैलो जी ...- रजत आनंद
इस अंक के लेखक - वाह भई वाह
आपके पत्र/ इन बाक्स - जरा सोचें
रंग बिरंगी दुनिया
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भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन


छ: सात तरूण तरुणियां। औसत आयु बीस-बाइस वर्ष। सभी मेधावी। एमबीए के विद्यार्थी। बहस चल रही थी। बहस का विषय, हमारी राष्ट्रीय पहचान। खानपान, वेशभूषा, रीति- रिवाज, भाषा इन सबके मामले में तो हमारे देश में इतनी विविधता है कि एक ही प्रांत में ये सब अनेक हो सकते हैं। तो फिर क्या है जो भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और मुम्बई से मेघालय तक हमारे समाज में समान रूप से व्याप्त है। इन मेधावी छात्र-छात्राओं की बहस का निष्कर्ष था कि गरीबी और भ्रष्टाचार ही सिर्फ दो ऐसी चीजें हैं जो हमारे देश के चप्पे-चप्पे में समान रूप से व्याप्त हैं। अतएव गरीबी और भ्रष्टाचार ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है।
यह हमारा राष्ट्रीय दुर्भाग्य है कि उपरोक्त निष्कर्ष एक कड़वा सच है।
हमारा समाज दो भागों में बटा है। एक वह जो शक्तिशाली वर्ग है- नेता और प्रशासन के सदस्य वे जो भ्रष्टाचार के लाभार्थी हैं। दूसरा समाज का बहुसंख्यक निर्बल वर्ग जिसे आम आदमी भी कहने का चलन है। यद्यपि कि बिना लेनदेन के कुछ भी न करने की हमारे यहां पुरानी परंपरा रही है। राजा, महाराजा, बादशाह और नवाब से तो बिना नजर भेंट किए मिला भी नहीं जा सकता था। इसी चलन के फलस्वरूप राज्य के निचले तबके के पदाधिकारी जैसे सूबेदार, तालुकेदार, जमींदार भी लड़की के ब्याह के बहाने या हाथी खरीदने या कार खरीदने के बहाने रियाया से धन उगाहा ही करते थे। इसी परिपाटी के चलते 1947 में आजादी मिलने के समय भी पुलिस, तहसील और जिला स्तर पर न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार व्याप्त था। इनके अतिरिक्त सरकार के अन्य विभाग तथा उच्च न्यायालय इत्यादि पर भ्रष्टाचार की काली छाया तब तक नहीं पड़ी थी।
आजादी के बाद से भ्रष्टाचार बेहद तेजी से बढ़ा है और आज यह हालत है कि आज ऐसा सरकारी विभाग जिसमें भ्रष्टाचार कार्यप्रणाली का अनिवार्य अंग न हो ढूंढने पर भी न मिलेगा। बच्चे का स्कूल में दाखिला कराना हो, मरीज का अस्पताल में इलाज कराना हो, पासपोर्ट लेना हो, ड्राइविंग लाईसेंस लेना हो, जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र लेना हो, बिजली या पानी का कनेक्शन लेना हो- कुछ भी ऐसा हो जिसमें सरकार से कोई कागज प्राप्त करना हो तो वह काम बिना रिश्वत दिये हो नहीं पाता है। कोई भी ट्रक राजमार्ग पर ट्रैफिक पुलिस को नजराना चढ़ाये बगैर एक इंच भी चल नहीं सकता है।
सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि इस भ्रष्टाचार की आग में आम आदमी की गरीबी हटाने के नाम पर चलाई गई सरकारी योजनाओं ने घी का काम किया है। 1969 से गरीबी हटाओं के नाम पर जनता के पैसे (सरकारी खजाना) की जो लूट शुरु हुई उससे गरीबी तो नहीं हटी पर नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की अमीरी दिन दूनी रात चौगुनी बढऩे लगी। अब तो हालत यह है कि सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा हो, सेनाओं के लिए हथियारों की खरीद हो, गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों के लिए सस्ते मूल्य के खाद्यान्न हो, सूखे के कारण भूख से मरते पशुओं का चारा हो, न्याय प्रणाली के उच्च स्तर हो, सभी जगह भ्रष्टाचार का नंगा नाच अबाध रूप से चल रहा है। सांसद भी प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेते देखे गए हैं।
भ्रष्टाचार को राजनीतिक सत्ता का एकमात्र उद्देश्य बनाने की अंधी दौड़ में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा ने सबको पछाड़ दिया है। झारखंड देश का प्राकृतिक संसाधनों में सबसे संपन्न राज्य होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे गरीब और पिछड़ा है। मधु कोडा पहले खाद्य मंत्री बने और फिर से दो वर्ष से भी कम समय तक मुख्यमंत्री रहे। आयकर विभाग के अनुसार इन चार वर्षों में 4000 हजार करोड़ रुपए ( जो झारखंड के सलाना बजट की बीस प्रतिशत राशि है) कि रकम हड़प ली और देश में दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता इत्यादि के साथ-साथ विदेश में लीबिया, दुबई, थाईलैंड इत्यादि में व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित किए। त्रासदी यह है कि राज्य सरकारों और केंद्र में राजनीति के ऐसे काले चेहरों की भरमार है।
एक पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि सरकारी योजनाओं में खर्चा होने वाली रकम का सिर्फ10 प्रतिशत ही वास्तविक कार्यों पर खर्च होता है। अभी कुछ ही हफ्ते पहले केंद्रीय सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना का दो जिलों में सर्वेक्षण कराया तो ज्ञात हुआ कि इस पर खर्च होने वाली हजारों करोड़ की राशि का कम से कम 40 प्रतिशत भ्रष्टाचारियों द्वारा हड़प लिया जाता है। हम यह भी जानते हैं कि सरकार भ्रष्टाचार स्वीकारोक्ति में काफी कंजूसी दिखाती है अत: वास्तव में यह रकम 40 प्रतिशत से कहीं अधिक होगी।
हमारे देश में भ्रष्टाचार के इतने व्यापक रूप से पनपने के प्रमुख कारणों में से एक हमारे देश की जर्जर और लचर न्याय प्रणाली भी है। जिसके कारण भ्रष्टाचार के लिए दंडित होने की संभावना गधे के सिर पर सींग होने से भी कम है। कड़वा सच तो यह है कि न्याय प्रणाली भ्रष्टाचारियों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती प्रतीत होती है। यथार्थ तो यह है कि गरीबी और भ्रष्टाचार का चोली दामन का साथ है। यह तो कहना मुश्किल है कि इन दोनों में से कौन कारण है और कौन परिणाम परंतु दोनों का एक दूसरे पर आश्रित होना तो बिल्कुल स्पष्ट है। गरीबी और भ्रष्टाचार का यह घातक गठजोड़ अब कैंसर बनकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था की जड़े ही खोदने में जुटा है। दावानल की तरह फैलते नक्सलवाद के लिए भी यही काफी कुछ जिम्मेदार है।
विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार के अथाह दलदल में महात्मा गांधी के नाम को भी घसीटा जा रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में व्यापक रूप से भ्रष्टाचार होने का तथ्य उजागर होते ही इस योजना का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया गया है। वर्तमान माहौल में तो भ्रष्टाचार का गहरा अंधेरा मिटता नहीं दिखता। हां, यह विश्वास अवश्य है कि भ्रष्टाचार और गरीबी की अमावस्या से मुक्ति दिलाने के लिए भारत माता महात्मा गांधी जैसी महान आत्मा को फिर से जन्म देगी जो हमारे देश में सार्वजनिक सुख और समृद्धि की परिस्थितियां संभव करेगी।

- डॉ. रत्ना वर्मा