November 20, 2009

लियो तोल्स्तोय जंगल में मिलती थी उन्हें लिखने की प्रेरणा


अनुवाद- रूपसिंह चन्देल
मूल लेखक- निकोलई निकोलायेविच गुसेव (जन्म 1882) वे 1907 से 1909 तक तोल्स्तोय के निजी सचिव)
 प्रत्येक सुबह, कभी टहल कर आने के बाद, और कभी उससे पहले, लेव निकोलायेविच 'ए साइकिल ऑफ रीडिंगं' और 'रीडिगं फॉर एवरी डे' पुस्तक से उस दिन के लिए दिया गया उद्धरण पढ़ते, जिन्हें उन्होंने स्वयं तैयार किया था और जिनमें जीवन की अत्यावश्यक समस्याओं पर सभी समयों और सभी देशों के मनीषियों के विचारों को समाहित किया गया था।
1907 से 1909 तक मैं यास्नाया पोल्याना में रहा था। लेव निकोलायेविच प्राय: सुबह आठ बजे उठ जाते और, दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर टहलने जाते थे। यह प्रात: भ्रमण लंबा नहीं... आधे घण्टा या एक घण्टा में समाप्त हो जाता था। प्राय: वह  अकेले ही टहलने जाते थे और प्रकृति के साथ अपने उस संक्षिप्त एकाकीपन के समय वह अपनी समस्त क्षमताओं को संकेन्द्रित करते हुए दिन के आगामी समय के लिए अपने को तैयार करते जिससे वह अपने गहन रचनात्मक कार्य के दौरान अपने संपर्क में आने वाले उन सभी लोगों, चाहे वे उनके रिश्तेदार थे अथवा अपरिचित, के साथ आत्मिक संबंध बनाये रख सकें।
टहलकर लौटने के बाद और कभी- कभी घर से निकलकर टहलने जाते समय लेव निकोलायेविच गांव के गरीबों, राहगीरों, देश निकाला की सजा पाये लोगों (निर्वासित स्थान की ओर पैदल जाने वालों अथवा निर्वासन में सजा काटकर लौटने वालों) अथवा यास्नाया पोल्याना या तुला के पेशेवर भिखारियों से मिलते थे और सदैव वह उन्हें पैसे दिया करते थे। कभी- कभी निर्वासन की सजा पाये लोग उन्हें अपने जीवन की दुखद कहानी सुनाते थे और इससे वह सदैव अवसादग्रस्त हो जाते थे। 
 डायनिंग रूम में जाते हुए लेव निकोलायेविच डाक उठा लेते, जिसे मैं पहले ही उनके लिए छांटकर अलग रख देता था। उसमें पत्र, पुस्तकें, पाण्डुलिपियां और समाचार पत्र होते थे। एक समय में वह केवल एक ही चीज पढऩा पसंद करते थे। यास्नाया पोल्याना में मेरे ठहरने के पहले भाग के दौरान वह नोवोये व्रेम्या पढ़ते थे। बाद में उसके स्थान पर 'रस' पढऩे लगे थे, जिसमें उन्हें कुछ विशेषताएं दिखी थीं, उसके पहले पृष्ठ पर सबसे ऊपर उस दिन मृत्यु दण्ड पाने वालों और फांसी दिये गये लोगों की संख्या और उस दिन की उल्लेखनीय घटनाओं की सूची प्रकाशित होती थी। 1908 की गर्मियों में लेव निकोलायेविच ने स्लोवो  तथा अन्य अखबार पढऩा प्रारंभ कर दिया था।
 अपनी स्टडी में प्रवेश करने के बाद वह कॉफी लेते और अपनी 'मेल' पढऩा प्रारंभ करते। प्राय: कोई पत्र पढ़ते समय, जो विशेष रूप से उन्हें दिलचस्प प्रतीत होता या उन्हें उत्तेजित करता, वह मुझे बुलाते और उसका उत्तर डिक्टेट करते, जिसे मैं शार्ट हैंड में लिखता था। अन्य पत्रों  के उत्तर बाद देने के लिए उन्हें एक ओर रख देते थे। कुछ के ऊपर वह लिखते, 'एन.एन. के लिए', जिसका अर्थ था कि उनके उत्तर देने थे, और दूसरों पर लिखते, 'एन.ए.' अर्थात 'कोई उत्तर नहीं।'
 प्रत्येक सुबह, कभी टहल कर आने के बाद, और कभी उससे पहले, लेव निकोलायेविच 'ए साइकिल ऑफ रीडिंगं' और 'रीडिगं फॉर एवरी डे' पुस्तक से उस दिन के लिए दिया गया उद्धरण पढ़ते, जिन्हें उन्होंने स्वयं तैयार किया था और जिनमें जीवन की अत्यावश्यक समस्याओं पर सभी समयों और सभी देशों के मनीषियों के विचारों को समाहित किया गया था। ये सारे काम समाप्त कर लेने के बाद लेव निकोलायेविच लिखना प्रारंभ करते। लेखन के दौरान वह पूरी तरह से शांति चाहते। वह उन दोनों दरवाजों को बंद कर देते जिनसे उनकी स्टडी से होकर डायनिंग रूम में जाया जाता और विरले ही किसी आवश्यक कार्य से वह स्टडी से बाहर जाते थे। यास्नाया पोल्याना में अपने ठहरने के दो वर्षों के दौरान मुझे एक भी दृष्टांत याद नहीं जब वह बाहर गये थे। इस दौरान सोफिया अंद्रेयेव्ना के अतिरिक्त कभी कोई दूसरा वहां नहीं गया, जो देर से सोती थीं और बारह बजे के आसपास जागती थीं, और अपनी स्कर्ट सरसराती हुई कॉफी के लिए डायनिगं रूम की ओर जाती हुई तोल्स्तोय को 'गुड मॉर्निगं' कहती थीं।
 डेढ़ बजे अथवा ढाई बजे काम समाप्त कर लेव निकोलायेविच लंच करने के लिए डायनिंग रूम में जाते थे। प्राय: मैं उनके चेहरे की मुद्रा देखकर अनुमान लगा लिया करता  कि उनकी रचनात्मक गतिविधि तब तक समाप्त नहीं हुई थी। जिस समय वह खा रहे होते, भोजन को तेजी से चबाते हुए उनकी आंखें एक स्थान पर गड़ी होतीं मानो विचारणीय विषय उन्हें  दृष्टिगोचर हो रहा था।
 हड़बड़ाहट में लंच करके और उपस्थित किसी मुलाकाती से संक्षिप्त बातचीत करके लेव निकोलायेविच टहलने के लिए अथवा घुड़सवारी के लिए प्रस्थान करते थे। उनके स्वास्थ को लेकर चिन्तित सोफिया अन्द्रेयेव्ना प्राय: उनसे पूछतीं कि वह कहां जा रहे हैं। पहले वह पूछे जाने का विरोध करते क्योंकि वह स्वयं नहीं जानते थे कि वह कहां जायेंगे। यह सब मौसम, हवा, और अभिरुचि पर निर्भर था। बाद में, उन्होंने अपने भावों पर विजय प्राप्त कर लिया था, और दूसरों को प्रसन्न रखने की अपनी इच्छा द्वारा संचालित वह पहले ही घोषित कर देते कि वह कहां जा रहे थे। बाद में एक नौकर उनके बाहर जाते समय कुछ दूरी बनाकर उनके पीछे जाने लगा था। कोचवान रखना उन्हें नापसंद था, क्योंकि उन्हें किसी भी नौकर की सेवाएं स्वीकार करना पसंद नहीं था। वह यह जानकर बहुत प्रसन्न थे कि इस कार्य के लिए मैं तैयार था और मुझे ऐसा करने में कोई आपत्ति न थी। मैं उनसे चालीस या पचास कदम  पीछे चलता और कभी बात नहीं करता था, क्योंकि मैं यह पूर्ण रूप से समझता था कि एकांत के वे क्षण उनके लिए कितने मूल्यवान थे। उस दौरान वह अपने लेखन के विषय में चिन्तन रहते और वह भी विरले ही मुझसे बात करते थे। वह जानते थे कि चुपचाप चलना मुझे बुरा नहीं लगता था। प्राय: वह निकट के जंगल में जाया करते। उनके रचनात्मक कार्य में उसने (जंगल) महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तोल्स्तोय के जीवन का बड़ा भाग यास्नाया पोल्याना में व्यतीत हुआ था। (जब वह बच्चे थे, उनकी एक गर्मी मास्को में बीती थी। गर्मी का केवल वही एक मात्र मौसम था जो उनका गांव में व्यतीत नहीं हुआ था)।
अपने प्रारंभिक दिनों में हाथ में बंदूक और साथ में एक कुत्ता लिए वह सारा दिन जंगल में घूमते रहते थे, और ऐसे समय उनका मस्तिष्क साहित्यिक योजनाओं और कल्पनाओं से पूर्णरूप से भरा होता था।
 बाद में उन्होंने बंदूक और कुत्तों को छोड़ दिया था लेकिन तब भी पैदल अथवा अपने प्यारे देलिर (घोड़े) पर जंगल की सभी सड़कों और मार्गों पर घूमते रहते और प्रकृति के सान्निध्य में अपने नये उपन्यासों, कहानियों, आलेखों और पत्रों की प्रेरणा प्राप्त करते। जब वह घोड़े पर सवार होते, कभी- कभी उसे रोके बिना ही अपनी जेब से नोटबुक निकालते और मस्तिष्क में उभरे विचारों को लिख लिया करते थे।
 लगभग पांच बजे घर लौटने पर (उनकी सैर प्राय: तीन घण्टे में समाप्त होती थी ) लेव निकोलायेविच बहुत थके होते और अपने कमरे में झपकी लेने के लिए चले जाया करते। छ: बजे या उसके कुछ बाद डिनर सर्व किया जाता। लेव निकोलायेविच डिनर के लिए प्राय: विलंब से तब पहुंचते जब डिनर का पहला दौर लगभग समाप्त हो रहा होता। मुझे इस बात की जानकारी नहीं कि उनका कोई मनपसंद पकवान था, और न ही कभी मैंने उन्हें भोजन के विषय में बात करते सुना। और न ही कभी मैंने उन्हें शाकाहारी आहार का तिरस्कार करते देखा। वह इस बात से विरक्त रहते कि उनके सामने क्या परोसा गया था और उनकी क्या खाने की इच्छा थी। डिनर के दौरान बातचीत और विचार-विमर्श होता रहता। प्राय: यास्नाया पोल्याना आने वाले अतिथि मास्को और सेण्ट पीटर्सबर्ग के समाचार सुनाया करते थे।
 लेव निकोलायेविच उस उत्कटता से शाम के कार्य नहीं कर पाते थे जितना कि दिन में करते थे। या तो वह अपनी स्टडी में बैठे कुछ पढ़ रहे होते या पत्रों के उत्तर लिख रहे होते, अथवा, यदि उनसे मिलने कोई आया होता तब उसके साथ डायनिंग रूम में बैठकर सामान्य बातचीत करते।  वह सदैव संसार में कहीं भी, यहां  तक कि सुदूरवर्ती स्थानों में, घटित होने वाली बातों में गहन रुचि प्रकट करते थे। लेकिन जो कुछ वह सुनते उस पर सहसा विश्वास नहीं कर पाते थे। मुझे यह जानकर आश्चर्य होता जब पूर्वसंध्या में अभिव्यक्त विचारों को लेव निकोलायेविच अपने नये आलेख में प्रयोग कर लेते। बातचीत सदैव सहज और अनौपचारिक होती। लेव निकोलायेविच को लोगों द्वारा स्वयं को मताग्रही और कोरा सिद्धांतवादी घोषित करते हुए सुनना बर्दाश्त नहीं था। वह स्वयं कभी  परामर्शदाता और कठोर नीतिवादी की भूमिका की कल्पना नहीं करते थे। वह सदैव अपने विचार सहजतापूर्वक और निश्चयात्मकरूप से व्यक्त करते थे और यदि वह अपने संभाषी के विचारों को अधिक ही असंगत या निरर्थक पाते तो अपनी असहमति व्यक्त करने में किचिंत भी संकोच नहीं करते थे।  यास्नाया पोल्याना में भिन्न विचारधारा के लोग... क्रान्तिकारी विचारों वाले कामगार आते तो घोर दक्षिणपंथी रूढि़वादी भी आते थे। तोल्स्तोय सभी के साथ समान व्यवहार करते। किसी के प्रति भी वह अपने बोलने के ढंग और अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाते थे। शब्दों और कार्यों से अनुग्रहीत करने का प्रयत्न करते, लेकिन जिस बात को वह उचित समझते उसे अपनी दृढ़ धारणा और उत्साह के  साथ उसका समर्थन करते और वह इस बात की परवाह नहीं करते थे कि जिससे वह बात कर रहे थे उसके साथ संबन्ध विच्छेद का खतरा भी  था।
 यह सोचना बिलकुल गलत है कि लेव निकोलायेविच सदैव 'बौद्धिक' वार्तालाप में ही संतुष्टि पाते थे। उनके अधिकांश पोट्र्रेट्स और चित्रों में सादा, यहां तक कि उदासीन भाव दिखायी देता है। लेकिन सदा वह वैसे नहीं थे। वह मनोरंजन और आमोद- प्रमोद पसंद करते थे। उत्सुकता- पूर्वक चुपचाप मनोरंजक कहानियां सुनते और मुग्धकारी हंसी हंसते।
 शाम के समय वह चेस खेलना पसंद करते। यह उन्हें मस्तिष्क के गहन कार्य के बाद कुछ राहत प्रदान करता। लगभग साढ़े नौ बजे रात की चाय सर्व की जाती, और चाय पीने के लिए लेव निकोलायेविच सदैव डायनिंग रूम में जाते थे। सभी लगभग ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद सोने चले जाते। लेव निकोलायेविच सभी को शुभ-रात्रि कहते, और आने वाले प्रत्येक मेहमान से हाथ मिलाते। उनका हाथ मिलाना कुछ विशिष्ट होता था। वह किसी व्यक्ति का हाथ देर तक पकड़े रहते और बहुत ही स्नेहिल भाव से उसकी आंखों में देखते। यह स्पष्ट था कि जिन्दगी ने जिनके संपर्क में उन्हें ला दिया था, वास्तव में उन सभी के लिए निष्कपट मित्रभाव के विचार को परिष्कृत करने के लिए  वह अभिलषित थे।
(संवाद प्रकाशन मुम्बई/ मेरठ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार' से।)

1 Comment:

sumita said...

लेव निकोलायेविच के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। ऐसे ही महान लेखकों की दिनचर्या उर्जा और प्रेरणा देती है..सुंदर लेख अभार!

लेखकों से अनुरोध...

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