November 20, 2009

बेहतर सामग्री-आपके पत्र


उदंती का नया अंक मिला। बहुत बेहतर सामग्री का आपने संयोजन किया है। पत्रिका की प्रस्तुति तो वैसे ही मनोहारी है। संजीव खुदशाह का लेख हमारे समय की एक बड़ी बीमारी की ओर इशारा करता है। प्रेम जनमेजय का व्यंग्य भी पसंद आया। बच्चों पर लिखा गया रामेश्वर काम्बोज का लेख भी बेहतर है। इतनी बेहतर सामग्री वाली एक खूबसूरत पत्रिका उदंती ही हो सकती है। आपकी टीम को मेरी बहुत शुभकामनाएं।
-संजय द्विवेदी, भोपाल म. प्र., 123dwivedi@gmail.com
व्याकरण की समस्या
उदंती का अंक अच्छा लगा। इसकी सामग्री काफी स्तरीय है। पिछले अंक भी मंैने देखे हैं-अच्छे लगे। वेब पेज में यूनीकोड का इस्तेमाल करने में कुछ कठिनाइयां होती हैं जिससे कभी-कभी व्याकरण की समस्या खड़ी हो जाती है। हमारे यहां भी ऐसा होता रहता है। आपके प्रयास सफल हों इन शुभकामनाओं के साथ।
- दिनेश शर्मा, संपादक, स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम,  info@swatantraawaz.com
चहकना क्यों भूल गए बच्चे
उदंती में प्रकाशित लेख 'चहकना क्यों भूल गए बच्चे' बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है ... वास्तव में इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इस लेख में कुछ सुझाव दिए हैं जिनपर अमल होना चाहिए।
- डॉ. भावना, सिडनी (आस्ट्रेलिया), bhawnak2002@gmail.com
बढिय़ा व्यंग्य
प्रेम जनमजेय का व्यंग्य 'तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मीÓ पढ़कर एक ही बात मन में उभरी लक्ष्मी अनंत, लक्ष्मी कथा अनंता...
प्रेम जी, बहुत बढिय़ा व्यंग्य।
- शेफाली पांडे, हल्दवानी, pande.shefali@gmail.com
धारदार व्यंग्य
लक्ष्मी लक्ष्मीकांत
शेयर और नेकांत
शेयर के रेट भले ही गिर गए
पर इस व्यंग्य से उदंती के पाठक बढ़ गए
मन आनंद समाया
इसलिए नहीं कि शेयर के रेट गिर गए
बल्कि इसलिए कि व्यंग्य इतना धारदार रहा
कि एक- एक पंक्ति पर
शब्दों के रोम- रोम खिल गए।
शब्दों से इतना असीम प्रेम
- अविनाश वाचस्पति, मुम्बई, avinashvachaspati@gmail.com
दिए की लौ बढ़ाओ
उदंती का अक्टूबर अंक भी अपनी विविधतापूर्ण और स्तरीय सामाग्री के कारण हमेशा की तरह अच्छा लगा। इस साल दीपावली पर जो भी कविताएं पढ़ीं उनमें डॉ. रत्ना वर्मा की कविता 'दिए की लौ बढ़ाओ' सबसे अच्छी, सच्ची और  सार्थक लगी। यह सवाल हमें ख़ुद से भी पूछना चाहिए- 'दूसरों के लिए रोशनी बन जाने में कितनी उमर बिताओगे / अपनी अंधेरी दहलीज़ के लिए दिए कब बनाओगे?'
- देवमणि पाण्डेय, मुम्बई,  devmanipandey@gmail.com
कुशल संपादन
'उदंती' के सितंबर अंक के माध्यम से चेखक की छोटी कहानी 'गिरगिट' पढऩे को मिल गई। पत्रिका में सामग्री के चयन को लेकर पर्याप्त सतर्कता भी नजर आती है। सुजाता साहा का लेख 'बेटी पुकारने में झिझक क्यों' आवश्यकता से अधिक छोटा है। विषय पर और गंभीरता से भी लिखा जा सकता था। बहरहाल कुशल संपादित अंक के लिए मेरी बधाई।
-प्रदीप जिलवाने, खरगोन म.प्र.
***
जरा सोचे
दूसरों के तनाव की वजह न बनें
बात-बात पर बैंच पर हाथ मारना, कोल्ड ड्रिंक या चाय पीते समय आवाज करना, गहरी सांस लेना या बेवजह बात करते रहना। ये ऐसी चीजें हैं जिनसे लोग बुरी तरह से खीझते हैं। आपको लगता है कि ऐसा करके शायद आप अपनी परेशानी खत्म कर देंगे लेकिन यह नहीं जानते कि दूसरों के तनाव की वजह बन जाएंगे। इसलिए अपने नहीं तो कम से कम दूसरों के लिए शांति जरूर बनाएं।

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