November 20, 2009

हैलो जी ...

- रजत आनंद
जरुरत के समय मोबाइल पर बतियाना अच्छी बात है पर समय कुसमय कहीं भी गप्प हांकना या सामने वाले के समय के महत्व को न समझते हुए किसी भी समय रिंग कर देना कहां तक सही है? वे यह भी नहीं देखते हैं कब, कहां और कैसी बातचीत करनी है।
मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया में क्रांति ला दी है। भारत जैसे देश में दो दशक पहले तक, जहां किसी घर में फोन के होने का मतलब रईसी समझी जाती थी, वहीं आज करोड़पति से लेकर एक मजदूर के हाथों में भी मोबाइल फोन नजर आने लगा है। यह तो सत्य है कि इससे लोगों को फायदा भी बहुत हुआ है, पर एक जरुरत की वस्तु का जब बेजा इस्तेमाल होने लगता है तो गुस्सा भी बहुत आता है। जरुरत के समय मोबाइल पर बतियाना अच्छी बात है लेकिन समय- कुसमय कहीं भी गप्प हांकना या सामने वाले के समय के महत्व को न समझते हुए किसी भी समय फोन कर देना कहां तक सही है? वे यह भी नहीं देखते हैं कब, कहां और कैसी बातचीत करनी है।
 गुस्सा तो तब और अधिक आता है जब तेज आवाज वाली या  अटपटे रिंगटोन्स वाली मोबाइल किसी शोक सभा या सत्संग में बैठे हुए लोगों के बीच बज उठती है। यह नहीं कि ऐसे समय अपना फोन साइलेंट मोड में रखें या बंद कर दे। वे शान से  तब भी इस तरह  बोलते चले जाते हैं मानो किसी सभा या सत्संग में नहीं मोबाइल में बात करने के लिए ही वहां आए हैं। समय की नजाकत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती।  हैलो, हैलो और फिर ना रुकने वाला वार्तालाप....।
आज स्थिति यह है कि मंदिर हो, मस्जिद हो या अस्पताल, किसी की शादी हो या बर्थडे पार्टी, पिकनिक हो या स्कूल, हर जगह मोबाइल बज रहे हैं, बजते ही चले जा रहे हैं। जहां- तहां जब- तब इसका बेजरुरत इस्तेमाल करने वाले तर्क भी देते हैं कि मोबाइल होता ही है कि कहीं से भी, कहीं पर भी कुछ भी बात कर लो। यहां तक तो फिर भी ठीक है, बर्दाश्त कर ही रहे हैं।
पर भाई मेरे गाड़ी चलाते समय तो थोड़ा सब्र कीजिए, बहुत ही जरूरी कॉल हो तो किनारे गाड़ी खड़ी कर लीजिए और बतिया लीजिए। पर नहीं उनके पास इसका भी तर्क है कि इयर फोन किस लिए बनाए गए हैं, गाड़ी चलाते हुए भी बातचीत न रुके इसीलिए ना? वाह मान गए आपको.... क्या तर्कपूर्ण जवाब दिया है। पर क्या आपने उन आंकड़ों पर भी कभी गौर किया है कि गाड़ी चलाते हुए बात करने से कितनी सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं?  
 लोग हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं लेते। तभी तो शायद ऐसे ही बिगड़े लोगों को सुधारने के लिए कनाडा की एक कम्पनी एजीस मोबिलिटी ने एक ऐसा साफ्टवेयर बनाया है जो ड्राइवर को चलती गाड़ी में मोबाइल पर बातचीत करने अथवा एस.एम.एस. करने से रोक देता है। ड्राइव असिस्ट नामक यह साफ्टवेयर -एडवांस कॉल मेनेजमेंट तकनीक- पर काम करता है, जो चलती गाड़ी में आपका वर्चुअल सचिव बन जाता है और आपके कॉल को आप तक ना पहुंचाकर रिकार्ड कर लेता है। किसी का फोन आने पर यह साफ्टवेयर अपने आप फोन उठा लेता है और संदेश देता है कि, फोन धारक गाड़ी चला रहा है, आप कृपया संदेश छोड़ दें।
वाह क्या बात है। भारत में इस तकनीक को तुरंत ही लाना चाहिए । और न सिर्फ चार पहिए वाली गाडिय़ों में बल्कि दो पहिए वाली गाड़ी के लिए भी इस साफ्टवेयर को लगाना अनिवार्य कर देना चाहिए। काश ऐसा हो पाता? और मुझे गुस्सा नहीं आता।

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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