November 20, 2009

शाम की सैर बाघ के साथ


हम पालतू पशु में कुत्ते को घरों में पलते हुए देखते हैं लेकिन बाघों को घर के अंदर के अंदर देखने की कल्पना करना भी भयावह लगता है। पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यूएसए में लोग बाघों को पालतू पशु की तरह अपने घरों में रखते हैं। कितना रोमांचक यह देखना कि चेन में बंधे हुए बाघ के साथ आप शाम की सैरको निकले हो। लेकिन हमारे देश में जब यह पूछा जाता है किसबसे अधिक बाघ (टाइगर) कहां पाये जाते हैं? तो स्वाभाविक उत्तर होता है भारत में। परंतु यह उत्तर गलत है। वास्तव में इस समय संसार में सबसे बड़ी संख्या में बाघ संयुक्त राज्य अमरीका (यूएसए) में है। एक अनुमान के अनुसार अमरीका में बाघों की संख्या 12,000 के आस- पास है जबकि भारत में बाघों की संख्या 3,000 से 4,000 के बीच है। अमरीका में इतनी बड़ी संख्या में बाघों के होने का कारण है वहां की कानून व्यवस्था। वहां के अनेक राज्यों में वन्य पशु रखने पर कोई    प्रतिबंध नहीं है। अत: अमरीका में बड़ी संख्या में लोग बाघों को निजी घरों में पालतू पशु की तरह रखते हैं। वहां पर बाघ के बच्चे 500 डालर में मिल जाते हैं। यहां तक कि सफेद बाघ भी 15,000  डालर में मिल जाता है। दुर्भाग्य की बात है कि भारत में बाघों की संख्या तेजी से घट रही है। तब प्रश्न यह उठता है कि क्या बाघों को पालतू बनाकर उनका संरक्षण किया जाए? और क्या भारत में बाघों को पालतू बनाकर हम रख पाएंगें ?
संगीत के साथ चढि़ए सेहत की सीढिय़ां
आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में हम सीढ़ी पर चलने से बचते हैं, और कोशिश करते हैं कि लिफ्ट हो तो कितना अच्छा होता। लेकिन कल्पना कीजिए कि सीढ़ी पर पांव रखते ही बज उठे मधुर संगीत के सात सुर तो कैसा रहे? जी हां ये चमत्कार कर दिखाया है स्टॉकहोम के कुछ इंजीनियरों ने, स्टॉकहोम के सबवे स्टेशन पर पियानो सीढ़ी लगाकर। इन इंजीनियरों ने कम्प्यूटर से धुन तैयार कर ऐसी सीढिय़ां तैयार की हैं जिन पर चलते हुए आपको लगेगा कि आप संगीत के सुरों पर कदम रख रहे हों। है न खुशखबरी, उनके लिए जो सीढ़ी पर चलने से बचना चाहते हैं। यह तो सबको पता है कि  सेहत की दृष्टि से भी सीढिय़ों का इस्तेमाल करना लाभप्रद है। साथ में संगीत हो तो यह तो सोने में सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात हुई। क्योंकि संगीत तनाव दूर करने के लिए कारगर दवा मानी गई है। और ऐसे में जब मिले सुर मेरा तुम्हारा तो....
दरअसल आजकल लोग सीढिय़ों के बजाय एस्कलेटर यानी स्वचालित सीढिय़ों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। लेकिन सीढिय़ां चढऩा सेहत के लिए फायदेमंद है साथ ही आपके पैर और रीढ़ हरकत में रहे इसे देखते हुए तथा लोगों को सीढ़ी पर चलने के  लिए प्रेरित करने के लिए ही उक्त संगीतमय सीढिय़ां तैयार की गई हैं।
स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में  साधारण सीढिय़ों को एक विशाल पियानो में बदल दिया गया है। वहां के लोगों को ये सीढिय़ां इतना लुभा रही हैं कि कोई एस्कलेटर की तरफ झांकता भी नहीं। लोग इन सीढिय़ों पर नाचते- थिरकते हुए चढ़ते हैं और उनके होठों पर होती है मुस्कान। पियानो वाली सीढिय़ों के कारण वहां एक दिन में 66 प्रतिशत से ज़्यादा लोगों ने एस्कलेटर के बदले सीढिय़ों का  इस्तेमाल किया।
 कितनी अजीब बात है भारत में विकास के नाम पर दिन -ब- दिन सीढिय़ों के बदले लिफ्ट और एस्कलेटर की संख्या बढ़ती जा रही है जबकि दूसरी ओर तरक्की पसंद अन्य देश अपने लोगों के बेहतर सेहत के लिए संगीतमय सीढिय़ों का निर्माण कर रहे हैं। यह कहते हुए कि चढ़ते रहिए सेहत की सीढिय़ां।

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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