November 20, 2009

हादसों की आग कब बुझेगी?


- संतोष कुमार

याद है ना, 26 दिसंबर 2004 की सुनामी के बाद आपदा प्रबंधन की कितनी बातें हुईं। बाकायदा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी बना। पर पांच साल बीत गए, क्या आपने कभी चुस्त आपदा प्रबंधन देखा?
गुलाबी शहर आग के धुंए से बदरंग हो गया पर हफ्तों तक बनी रही लाचारी। आईओसी को न आग की वजह मालूम, न बुझाने के उपाय। समूची व्यवस्था आग बुझने की बाट जोहती रही। पर जब सब खाक में मिल जाएगा। तो व्यवस्था का रहनुमा राख हाथ में उठा क्या कसमें उठाएंगे?
फिर वही राग अलापेंगे। मामले की जांच होगी। सुरक्षा के नए उपाय ढूंढे जाएंगे। पर यह सब तो सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह जाएगा। और फिर इंतजार होगा एक नए हादसे का। राजनीति और नौकरशाही की सांठगांठ ने जनमानस को हादसों का आदी बना दिया। वरना किसी राज्य की राजधानी में तेल का इतना बड़ा डिपो हो और सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं। आपदा प्रबंधन की भी पोल खुल गई। याद है ना, 26 दिसंबर 2004 की सुनामी के बाद आपदा प्रबंधन की कितनी बातें हुईं। बाकायदा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी बना। पर पांच साल बीत गए, क्या आपने कभी चुस्त आपदा प्रबंधन देखा? जब जयपुर जैसी राजधानी का ऐसा हाल। तो सोचिए, कहीं सुदूर गांव में ऐसा हादसा हो। तो क्या होगा। आखिर आग भयावह होने से पहले नियंत्रण क्यों नहीं हो सका। मंत्री से लेकर आईओसी तक लाचारी जता रहे। जैसे भारत में सरकार कुछ भी नहीं, सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा। आज डिपो की आग पर ऐसी लाचारी। कल एटमी ठिकाने पर खुदा न खास्ता कुछ हो जाए। तो क्या यही लाचारी दिखाएंगे हम?
अगर हम एटम बम रखने की क्षमता रखते हैं तो हमें सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त भी करने होंगे। अगर ऐसी ही लाचारी होगी। तो कल को लश्कर या जैश आकर एटम बम ले जाएं तो क्या होगा? राजनीति-नौकरशाही की सांठगांठ टालू नीति अपना रही। तभी तो व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही। गुरुवार की रात सीतापुरा स्थित आईओसी डिपो में आग लगी। पर पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा महाराष्ट्र की सियासी गोटी फिट करने में व्यस्त थे। सो जब डिपो की आग भयावह हो गई। तो एक समाचार पत्र के संवाददाता ने देवड़ा से अगला कदम जानना चाहा
कि जयपुर के तेल डिपो में आग लगी, अब बचाव के क्या उपाय होंगे? तो काबिना मंत्री की काबिलियत भरी टिप्पणी सुनते जाओ। पता नहीं देवड़ा का मिजाज कैसा था। पर मौके की नजाकत को नजरअंदाज कर मंत्री बोल गए- 'आग लगी है, तो मैं क्या करूं।' पर मंत्री को शायद गलती का अहसास हो गया। सो फौरन कहा- तेल बिखर जाने के बाद काबू पाना संभव नहीं। शुक्रवार को मुरली देवड़ा जयपुर पहुंचे। देवड़ा ने जयपुर में संयत शब्दों में लाचारी जता दी। पर देवड़ा से ज्यादा उम्मीद भी बेमानी। कभी जमीनी राजनीति नहीं की। सो किसी भी बयान में जमीनी टच नहीं दिखेगा। अलबत्ता देवड़ा ऐसी टिप्पणी करते। मानो मंत्री नहीं, किसी कंपनी के सीईओ हों। पर कहते हैं ना, गुस्से या हड़बड़ी में इंसान की असलियत बाहर आ जाती। सो मुरली देवड़ा की जुबानी व्यवस्था की पोल फिर खुल गई। अब आईओसी की मानें, तो सीतापुरा डिपो की आग से 300 करोड़ के नुकसान का अनुमान। यह सिर्फ आईओसी का आंकड़ा। राज्य सरकार का जो नुकसान हुआ, वह अलग। पर करोड़ों के नुकसान के साथ कई लोगों की जानें भी गईं, तो कई जूझ रहे। तो क्या अब नेता और नौकरशाह जागेंगे?
या फिर वही कागजी बंदोबस्त और करोड़ों का बजट। जो उपाय पर खर्च ने के बजाए सीधे रहनुमाओं के पेट में जाएगा। जहां से डकार भी बामुश्किल आती। अपनी व्यवस्था का यही ढर्रा। तभी तो 21 साल बीत चुके। भोपाल गैस त्रासदी के दंश से हम उबर नहीं पाए। आज भी उस इलाके की मिट्टी जहरीली। पर उसे हटाने का कोई बंदोबस्त नहीं हो सका। अपने जयपुर के इस भीषण अग्निकांड का असली असर तो बाद में ही दिखेगा। पर व्यवस्था को भगवान भरोसे कब तक छोड़ते रहेंगे हम-आप? सड़क चलते राहगीर की हादसे में मौत हो जाए। तो हम भगवान को दोष देते। मुंबई में लोकल ट्रेन पर पानी की पाइप लाइन गिर जाए, तो मरने वाले के नसीब की दुहाई देते। दिल्ली में ही भूकंप का एक बड़ा झटका आ जाए तो शायद 80 फीसदी दिल्ली तबाह हो जाएगी। पर दिखावे को सरकार नई इमारतें खड़ी कर रही है। पुराने का कोई रख-रखाव भी नहीं। मेट्रो के पिलर गिर रहे। फिर भी सुरक्षा मानक की तैयारी नहीं। कोई भी इमारत या रोड बनती, तो बाकायदा उसकी उम्र तय होती है। पर समय रहते कोई इंतजाम नहीं होता। बिहार में कोसी की बाढ़ भी व्यवस्था की भूल का ही नतीजा।
पर लोकतंत्र की आड़ में नेताओं ने राजनीति को ऐसा लबादा ओढ़ा दिया कि सड़क हादसे हो या इमारत गिर जाए, मेट्रो का पिलर ढहे या तेल डिपो में आग लग जाए। व्यवस्था ने ऐसी संस्कृति बना दी, आम लोगों में ऐसी चीजें 'आग' नहीं बनतीं। जबकि ऐसे हादसों में सोलह आने व्यवस्था दोषी होता है। तेल डिपो के आग मामले में भी इंडियन आयल की गलती साफ हो रही। पहले से रिसाव हो रहा था। पर वक्त रहते बंदोबस्त नहीं किया। सो अब सवाल, आम लोग के दिलों में आग कब लगेगी? ताकि सोई व्यवस्था को जगा सके। पर यह 'आग' लगती क्यों नहीं? कब तक हम-आप भगवान या किस्मत पर दोष मढ़ेंगे? सरकार जनता के पैसे से चलती है फिर जिम्मेदारी से बच कैसे सकती है?

1 Comment:

कडुवासच said...

... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!!

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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