November 20, 2009

पहली प्लास्टिक सर्जरी भारत में की गई थी


एक भारतीय खोजकर्ताओं ने दावा किया है कि दुनिया में प्लास्टिक सर्जरी सबसे पहले भारत में हुई और वो भी 600 ईसा पूर्व में। कहा जा रहा है कि तब उत्तर भारत में चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी शुरू हो गई थी। इस दावे के पुख्ता करने के लिए कई आधिकारिक दस्तावेज़ भी दिल्ली में साइंस एंड टेक्नोलॉजी हेरिटेज प्रदर्शनी में लगाए गए हैं। एक खोजकर्ता एनआर अय्यर का कहना है, 'हम अतीत में साम्राज्यवाद के अधीन रहे हैं इसी वजह से हमारे छात्रों का ध्यान पश्चिमी विज्ञान और तकनीक पर जाता है। लेकिन हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि भारत में हज़ारों साल पहले क्या क्या खोजा जा चुका था।' पेशे से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर अय्यर के दावे के मुताबिक भारत में प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत सुश्रुत ने की। ये खोज सुश्रुत ने 'फादर ऑफ मेडिसिन' कहे जाने वाले ग्रीस के हिप्पोक्रेट्स से भी पहले कर ली थी। अय्यर कहते हैं कि यही वजह है कि भारत में आज भी कई अस्पतालों का नाम सुश्रुत है। आधिकारिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए अय्यर कहते हैं कि उत्तर भारत में माथे से त्वचा निकाल कर उसे चेहरे पर दूसरी जगह इस्तेमाल किया जाता था। उस वक्त अपराधियों को सज़ा देने के लिए उसकी नाक काट दी जाती थी। सुश्रुत संहिता में 650 प्रकार की दवाओं का जि़क्र है, 42 किस्म की सर्जरी और 300 तरह से ऑपरेशन की व्याखा है। पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में ये भी कहा गया है कि सर्जरी और ऑपरेशन करने के लिए 121 प्रकार के औज़ारों का इस्तेमाल किया जाता था। इससे पहले भारतीय चिकित्सा शास्त्र के बारे में जानकारी वेदों और चरक संहिता जैसी किताबों से ही मिली थी। कहा जाता है कि इन किताबों में ये जानकारी 3000 से 1000 ईसा पूर्व दर्ज हो गई थी। मनोचिकित्सक मानस बागची का कहना है कि इसकी मदद से प्राचीन काल में खगोल शास्त्र, गणित और दूसरे विज्ञान में भारत की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की गई है। उनका दावा है कि भारत में ही सबसे पहले शून्य से लेकर नौ तक के अंकों को बनाया गया। प्रदर्शनी के आयोजकों का दावा है कि भारत में ही सबसे पहले कई तरह की खेती और खगोल शास्त्र की शुरुआत हुई। ये प्रदर्शनी अब दिल्ली में साल भर तक यानी कॉमनवेल्थ खेलों तक चलती रहेगी। आयोजकों का कहना है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी के मद्देनजऱ इस प्रदर्शनी का मक़सद दुनिया और भारत के लोगों को देश के इतिहास, खोज और विज्ञान के बारे में छिपी हुई जानकारी देना है।



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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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