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Jul 18, 2013

चार लघुकथाएँ


जिंदगी
- सुकेश साहनी


पेट में जैसे कोई आरी चला रहा हैं... दर्द से बिलबिला रहा हूँ....। पत्नी के ठंडे, काँपते हाथ सिर को सहला रहे हैं। उसकी आँखों से टपकते आँसुओं की गरमाहट अपने गालों पर महसूस करता हूँ। उसने दो दिन का निर्जल उपवास रखा है। माँग रही है कैंसर ग्रस्त पति का जीवन ईश्वर से। ...ईश्वर? ....आँखों पर जोर डालकर देखता हूँ, धुँध के उस पार वह कहीं दिखाई नहीं देता...।
घर में जागरण है। फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजनों का धूम-धड़ाका है। हाल पूछने वालों ने बेहाल कर रखा है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कोई न कोई आकर तसल्ली दे रहा है, ''सब ठीक हो जाएगा, ईश्वर का नाम लो।....ईश्वर?....फिल्मी धुनों पर आँखों के आगे थिरकते हीरो-हीराइनों के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता....
नीम बेहोशी के पार से घंटियों की हल्की आवाज सुनाई देती है। ऊपरी बलाओं से मुझे मुक्ति दिलाने के कोई सिद्ध पुरूष आया हुआ है...। नशे की झील में डूबते हुए पत्नी की प्रार्थना को जैसे पूरे शरीर से सुन रहा हूँ, ''इनकी रक्षा करो, ईश्वर!’....ईश्वर?....मंत्रोच्चारण एवं झाड़-फूँक से उठते हुए धुँए के बीच वह कहीं दिखाई नहीं देता...
श्मशान से मेरी अस्थियाँ चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों के आँसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसे, वह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजा पाठ (ईश्वर) के लिए अब उस समय नहीं मिलता। ....ईश्वर?...वह उसकी आँखों से झाँक रहा है!


बेटी का खत
बेटी का खत पढ़ते ही बूढ़े बाप के चेहरे पर हवाइयाँ उडऩे लगीं।
'खैरियत तो है न?’ पत्नी ने पूछा, 'क्या लिखा है?’
'सब कुशल-मंगल है,’ आवाज में कंपन था।
'फिर पढ़ते ही घबरा क्यों गए?’  पत्नी बोली, फिर उसके हाथ से चिट्ठी लेकर खुद पढऩे लगी।
खत खैरियत वाला ही था। बेटी ने माँ-बाप की कुशलता की कामना करते हुए अपनी राजी-खुशी लिखी थी, अंत में लिखा था-राजू भइया की बहुत याद आती है। पत्र पढ़ने के बाद पत्नी निश्चिंत होकर रसोई में चली गई।
            जब लौटी तो देखा पति अभी भी उस खत को एकटक घूरे जा रहा है, चेहरा ऐसा मानो किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो।
पत्नी को देखते ही उसने सकपकाकर खत एक ओर रख दिया। सहज होने का असफल प्रयास करते हुए बोला, 'सोचता हूँ, कल रजनी बेटी के पास हो ही आऊँ।
पत्नी ने उसके पीले उदास चेहरे की ओर ध्यान से देखा, फिर रुँधे गले से बोली, 'आखिर हुआ क्या है? अभी कल ही तो दशहरे पर बेटी के यहाँ जाने की बात कर रहे थे, फिर अचानक ऐसा क्या जो... तुम्हें मेरी सौं जो कुछ भी छिपाओ!
इस बार वह पत्नी से आँख नहीं चुरा सका, भर्राई आवाज में बोला, 'पिछली दफा रजनी ने मुझे बताया था कि ससुराल वाले उसकी लिखी कोई चिट्ठी बिना पढ़े पोस्ट नहीं होने देते, तब मैंने उससे कहा था कि भविष्य में अगर वे लोग उसे तंग करें और वह हमें बुलाना चाहे तो खत में लिख दे- राजू भइया की बहुत याद आती है। इस बार उसने खत में यही तो लिखा है’- कहते हुए बूढ़े बाप की आँखें छलछला आर्इं।

जागरूक
लड़की अपनी धुन में मस्त चली जा रही थी। रात के सन्नाटे में उस आधुनिका के सैंडिलों से उठती खट्-खट् की आवाज काफी दूर तक सुनाई दे रही थी। जैसे ही वह उस पॉश कालोनी के बीचों बीच बने पार्क के नजदीक पहुँची, वहाँ पहले से छिपे बैठे दो बदमाश उससे छेड़छाड़ करने लगे।
लड़की ने कान्वेंटी अन्दाज में  'शट अप! यू.....बास्टर्ड! वगैरह-वगैरह कहकर अपना बचाव करना चाहा, पर जब वे अश्लील हरकतें करते हुए उसके कपड़े नोचने लगे तो वह  'बचाओ...बचाओ....कहकर चिल्लाने लगी। उसकी चीख पुकार पार्क के चारों ओर कतार से बनी कोठियों से टकराकर लौट आई। कोई बाहर नहीं निकला।
वे लड़की को पार्क में झुरमुट की ओर खींच रहे थे। उनके चंगुल से मुक्त होने के लिए वह बुरी तरह छटपटा रही थी।
तभी वहाँ से गुजर रहे एक लावारिस कुत्ते की नजर उन पर पड़ी। वह जोर-जोर से भौंकने लगा। जब उसके भौंकने का बदमाशों पर कोई असर नहीं हुआ तो वह बौखलाकर इधर-उधर दौडऩे लगा। कभी घटनास्थल की ओर आता तो कभी किसी कोठी के गेट के पास जाकर भौंकने लगता मानो वहाँ रहने वालों को इस घटना के बारे में सूचित करना चाहता हो। उसके इस प्रयास पर लोहे के बड़े-बड़े गेटों के उस पार तैनात विदेशी नस्ल के पालतू कुत्ते उसे हिकारत से देखने लगे।
संघर्षरत लड़की के कपड़े तार-तार हो गए थे, हाथ-पैर शिथिल पड़ते जा रहे थे। बदमाशों को अपने मकसद में कामयाबी मिलती नजर आ रही थी।
यह देखकर गली का कुत्ता मुँह उठाकर जोर-जोर से रोने लगा। कुत्ते के रोने की आवाज इस बार कोठियों से टकराकर वापस नहीं लौटी ; क्योंकि वहाँ रहने वालों को अच्छी तरह मालूम था कि कुत्ते के रोने से घर में अशुभ होता है। देखते ही देखते तमाम कोठियों में चहल-पहल दिखाई देने लगी। छतों पर बालकनियों पर बहुत से लोग दिखाई देने लगे।
उनके आदेश पर बहुत से वाचमैन लाठियाँ-डंडें लेकर कोठियों से बाहर निकले और उस कुत्ते पर पिल पड़े।


ओएसिस
मिक्की की आँखों में नींद नहीं थी। वह पिल्ले को अपने पास नहीं रख पाएगा, सोच कर उसका मन बहुत उदास था। पिल्ले को लेकर ढेरों सपने बुने थे पर घर आते ही सब कुछ खत्म हो गया था। माँ ने पिल्ले को देखते ही चिल्लाकर कहा था, 'अरे, यह क्या उठा लाया तू? तेरे पिता जी ने देख लिया तो किसी की भी खैर नहीं। उन्हें नफरत है इनसे। जा, इसे वापस छोड़ आ।दादी माँ ने बुरा सा मुँह बनाया था, 'राम-राम! कुत्ता सोई जो कुत्ता पाले। बाहर फेंक इसे।यह सब सुनकर उसे रोना आ गया था। कितनी खुशामद करने पर दोस्त पिल्ला देने को राजी हुआ था। चूँकि दोस्त का घर दूर था इसलिए एक रात के लिए उसे पिल्ले को घर में रखने की इजाजत मिली थी। पिता जी के आने से पहले ही उसने बरामदे के कोने में टाट बिछाकर उसे सुला दिया था।
कूँ...कूँ की आवाज से वह चौंक पड़ा। बरामदे में स्ट्रीट लाइट की वजह से हल्की रोशनी थी। पिल्ले को ठंड लग रही थी और वह बरामदे में सो रही दादी की चारपाई पर चढऩे का प्रयास कर रहा था। वह घबरा गया...सोना तो दूर दादी अपना बिस्तर किसी को छूने भी नहीं देतीं...उनकी नींद खुल गई तो वे बहुत शोर करेंगी...पिता जी जाग गए तो पिल्ले को तिमंजिले से उठाकर नीचे फेंक देंगे... वह रजाई में पसीने-पसीने हो गया। सोते हुए माँ ने एक हाथ उस पर रखा हुआ था, वह चाहकर भी उठ नहीं सकता था। पिल्ले की कूँ-कूँ और पंजों से चारपाई को खरोंचने की आवाज रात के सन्नाटे में बहुत तेज मालूम दे रही थी।
दादी की नींद उचट गई थी, वह करवटें बदल रही थीं। आखिर वह उठ कर बैठ गर्इ।
आने वाली भयावह स्थिति की कल्पना से ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा दादी पिल्ले को घूरे जा रही हैं।
दादी ने दाएँ-बाएँ देखा...पिल्ले को उठाया और पायताने लिटा कर रजाई ओढ़ा दी।
संपर्क: 193121, सिविल लाइंस, बरेली -243001, Email- sahnisukesh@gmail.com

धरा पर रंग


धरा पर रंग
- अनुपमा त्रिपाठी
1
 उर-पटल

हैं स्मृति की  रेखाएँ
मिट न पाएँ।
2
पलकों में है 
मोती-से अनमोल
छुपे रतन।
3
सजल नैन
भरी जीवन-पीर,
डबडबाएँ।
4
मन-सागर
है वेदना असीम
सूखे नयन।
5
सूरज डूबे
ढेरों रश्मियाँ लिये
डूबती आशा।
6
बर्फ-सी ठंडी
संवेदनाएँ हुई
शिथिल  मन।
7
अथाह पीड़ा
बस मौन ही रहूँ
किससे  कहूँ ....?
8
ज्यों टूटकर
गिरते पीले पात 
बीते हैं लम्हें ।
9
कुछ तो कहो
ऐसे चुप न रहो
नदी-से बहो।
10
ठिठक गई
मूक-सी हुई जब
संवेदनाएँ।
11
मानवता ही
परम दया धर्म
एक मुस्कान।
12
सृजन खिला
संवेदनशील हो
तरंग बना।
13
रंग-बिरंगे 
हैं धरा पर रंग
पुष्प बिखरे।
14
बीन-बटोर
शब्द-शब्द सुमन
गूँथी है माला ।
15
अर्पण करूँ
प्रभु तुमरे द्वार
शब्द-संसार।
16
शब्दों से तुम
सजाते मेरा मन
कविता खिले।
17
शब्द की कथा
कहे मन की व्यथा
भावना बहे।
18
कैसे रचाऊँ ?
नित नया सृजन
ये शब्द पूछें ...!
19
पंख पसार
उड़ जा उस पार
संदेसा ले जा।
20
उड़े बयार
शब्द उड़ा ले जाएँ 
कुछ न सूझे।
21
हुए हैं एक
मिल धरा-गगन
सृष्टि मगन।
22
पसरा मौन
बिखरे हैं सुमन
आया है कौन ...?
23
खिली लालिमा
देती अब सन्देश
मिटी कालिमा।
24
छूकर तुम्हें
आई है मेरे द्वार
चंचल हवा।          
लेखिका के  बारे में: जन्म- 13-05-63  शिक्षा- एम.ए(अर्थशास्त्र)1984 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय(जबलपुर)। संगीत विशारद (संगीत)  2006 में प्रथम श्रेणी में। वर्तमान में संगीत अलंकार कर रहीं हैं। व्यावसायिक अनुभव अर्थशास्त्र की व्याख्याता 1984-85 जबलपुर में। 2010 में क्वालालंपुर मलेशिया में TEMPLE OF FINE ARTS में हिन्दुस्तानी  शास्त्रीय संगीत पढ़ाया। संगीत के कई कार्यक्रमों में गाया और 'यादेंनामक सी.डी में भी गाकर अपना योगदान दिया। ब्लॉग http://anupamassukrity.blogspot.com/ पर कविताएँ और लेख। http://swarojsurmandir.blogspot.com/ पर संगीत के विषय में जानकारी। Email- tripathi_anupama@yahoo.com

ब से...

ब से...
- सुमित प्रताप सिंह
आज ए बी सी डी की कैद से निकलकर ओलम पढऩे का मन कर रहा है। आप भी मेरे साथ इस कैद से बाहर आइए न। देखिए अपनी चीज में जो अपनापन होता है, वह भला विदेशी चीज में कहाँ। अच्छा यह बताइए कि आपको ओलम में कौन सा अक्षर सबसे अधिक भाता है। ओहो फिर वही जिद, कि शुरुआत मुझसे हो। कभी तो मौका दिया करें, कि शुरुआत आपसे भी हो। खैर आपकी जिद टालने का न तो कभी मन होता है और न कभी साहस। देखिए वैसे तो मुझे पूरी ओलम ही प्रिय है, लेकिन न जाने क्यों ब अक्षर मुझे बहुत आकर्षित करता है। पारंपरिक ओलम में ब से बकरा होता है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ जीवन के अर्थ बदलते जा रहे हैं। जब संसार अपने आपको समय के अनुसार ढाल रहा है, तो हमें भी अक्षरों के साथ कुछ नया प्रयोग करने का साहस तो करना ही चाहिए। अब देखिये ब एक शब्द होता है बड़ा। जो बड़ा होता है वो असल में बड़ा होता है या फिर नहीं यह एक शोध का विषय है, क्योंकि जो बड़े होते हैं, वे स्वयं को बड़ा नहीं मानते और जो बड़े नहीं होते वे स्वयंभू बड़े बन जाते हैं। साहित्यिक जगत में ऐसे बड़े लोग थोक के भाव में मिलते हैं। हालाँकि आने वाला समय अपने आप बता देता है, कि वे वास्तव में बड़े थे अथवा स्वयं ही बड़े बनकर अभिमान से तनकर खड़े थे। ब से बरगद भी होता है। बरगद की विशेषता होती है, कि वह अपने विकास को ही महत्त्व देता है। उसकी छाया में रहने वाले पौधे बेचारे पौधे से वृक्ष बनने की चाहत में समाप्त हो जाते हैं। साहित्यिक बरगदों ने अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितने पौधों को विकसित होने से पहले ही अपनी शोषक छाया से बर्बाद कर दिया होगा। ऐसे बरगद जब तक रहते हैं, छोटे पौधे अपने आपको किसी प्रकार से अस्तित्व में बचाए रखने के लिए संघर्ष करते रहते हैं और सत्यनारायण की कथा अथवा कलमा पढ़कर ऊपर वाले से कामना करते रहते हैं , कि कोई ऐसी शुभ घड़ी आए और ये बरगद धड़ाम से टूटकर नीचे गिरें, ताकि वे बेचारे पौधे अपने पौधेपन से मुक्ति पाकर वृक्षपन का आनंद उठा सकें। ब से बंज़र शब्द भी होता है। अं की मात्रा की चिंता किए बिना ध्यान से इस शब्द पर विचार करें तो यह ब से बहुत ही उपयुक्त शब्द है। इस शब्द का प्रयोग लोग अपने-अपने हिसाब से करते हैं। किसान के लिए बंजर शब्द ज़मीन से होता है। कुछ दुष्ट बिन संतान के दम्पति को इस शब्द के प्रयोग से आहत करते हैं, किंतु बंजर नामक इस विशेष शब्द को हम उन महान लेखकों से करेंगे, जो मस्तिष्क से अनुपजाऊ अर्थात बंजर हो चुके हैं। कहते हैं कि वे पहले उपजाऊ थे और लेखन की फसल नियमित तौर पर काटते रहते थे। उन्होंने अपने लेखन की इतनी पैदावार की, कि बेचारे मस्तिष्क से बंजर हो गए और अब दूसरे लेखकों की रचनाओं से माल उड़ाकर अपना गुज़ारा करने लगे। ऐसा भी हो सकता है, कि वे लेखन जगत में प्रवेश करने से पहले ही बंजर हों और इधर-उधर से चोरी-चकारी करके रचनारूपी अनाज का भंडारण करते रहे हों। ऐसे बंजर लेखक युवा लेखकों की रचनाओं पर पैनी नज़र रखते हैं और उनकी रचनाओं के अंजर-पंजर ढीले करके एक नई रचना लिख डालते हैं और झूठी वाहवाही के मंज़र देखते हैं। फिल्म जगत में तो ऐसे बंजर लेखकों की भरमार है और वहाँ नए लेखक अपना गुज़ारा चलाने के लिए अपनी उगी-उगाई फसल इन बंजरों को सौंप देते हैं। नए लेखकों को संघर्ष करने के लिए कुछ धन मिल जाता है और बंजर लेखकों को बंजर न दिखने के लिए रचनारुपी संतान। इन्हीं विचारों को मस्तिष्क की भट्टी में उबालते हुए एक मकान के बगल से निकल रहा था, कि एक पिता को अपने बच्चे को ओलम सिखाते हुए देखा। वह ब शब्द पर आया और बोला ब से बकरा, तो यह सुनकर मन हुआ कि उसके पास जाऊँ और उसके कानों में जोर से चीखकर उससे बोलूँ, कि ब से बकरा नहीं ब से होता है बंजर।                                     
संपर्क:  ई- 1/4, डिफेन्स कालोनी पुलिस फ्लैट्स,     नई दिल्ली 110049 मो. 09818255872, Email- www.sumitpratapsingh.com

आपके पत्र



एक पाती... 
उदंती के जून,  2013  अंक में आपका संपादकीय निदान खोजना ही होगा…’ के लिए साधुवाद! आपने फैलती नक्सली हिंसा की भर्त्सना करते हुए जिस गहराई से इस समस्या के मूल कारणों की तरफ देश, शासन और प्रशासन का ध्यान खींचा है, वह काबिले गौर है और स्पष्ट रूप से यह सुझाव देता है कि नक्सल प्रभाव को रोकने के लिए हमें तत्काल ऐसे सभी उपाय करने होंगे ;जिनसे आदिवासियों को शोषण से निजात मिल सके।  इस सन्दर्भ में मैं यहाँ आपके इस अंक में छपी डॉ. श्याम सखा  श्याम  की इन पँक्तियों को दोहराना चाहता हूँ कि- ‘आज नहीं तो कल होगा, हर मुश्किल का हल होगा’  यूँ सदैव की भाँति उदंती के जून अंक में प्रकाशित सभी रचनाएँ सामायिक और प्रभावी हैं। सभी लेखकों को बधाई! आपकी इस  अनकही से प्रभावित होकर मैंने  नक्सलवादियों के नाम एक पत्र लिखा  हैं जो इस प्रकार से है-
जरूरी नहीं है कि हम सही हों, जरूरी नहीं कि तुम सही हो,
या फिर मेरी या फिर तुम्हारी हाँ में हाँ  मिलानी वाली भीड़;
तो फिर क्या करें ?
क्या इस असहमति के चलते, बन्दूक और बमों का सहारा लें?
निर्दोष लोगों का खून बहायें, आतंकवाद को अपनाएँ;
लोगों को अपनी बात मनवाने के लिए, उनके खून से नहाएँ,
और फिर किसी एक दिन सरकारी गोली के निशाने पर आएँ, ;
अथवा पकड़े जाने पर  कहीं फाँसी के फंदे पर झूल जाएँ ?
जरा सोचो, क्या यह जरूरी है? जान खुदा की अमानत है।
न दूसरों की जान लें, न अपनी जान दें, और वो भी सिर्फ इसलिए,
किसी ने तुम्हें बरगलाया है, अपने जाल में फँसाया है;
अपने स्वार्थ साधने के लिए कठपुतली बनाया है!
मुद्दा इतना बड़ा नहीं कि यूँ कीमती जान को गँवाया जाए,
आओ, संवाद के रास्ते इस गुत्थी को सुलझाया जाए!
                                     -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली          
                              subhash.surendra@gmail.com
जुझारूपन का भाव
आपका जून अंक विश्व पर्यावरण दिवस पर केंद्रित हैं। हमने वरुण देवता का सम्मान करना छोड़ दिया, वरुण देवता रुष्ट हैं, कुपित तो होंगे ही। हमें पुन: प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करना सीखना होगा। 
 चिंतन में विनोद साव के लेख पर मेरी राय है- भारत में नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। चीनी माओवाद ने उसकी हत्या कर दी है। बस्तर की भौगोलिक दुर्गमता और छत्तीसगढ़ के लोगों में जुझारूपन के अभाव ने आन्ध्र के उग्रवादियों को आमंत्रित किया है। हमारी राज्य सरकारें चीनी आतंकवाद को रोक पाने में असफल रही हैं। चीन छत्तीसगढ़ में है .... चीन भारत की सीमाओं पर है और और उसका सशक्त प्रतिरोध करने वाला कहीं कोई नहीं है। किंतु हम केवल सरकारों को ही पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। समाज की निष्क्रियता भी इसके लिए,  कम जि़म्मेदार नहीं है।
                                                                   -कौशलेन्द्र
                                                    kaushalblog@gmail.com

साहित्य और समाज का व्यापक फलक
पिछले अंक में प्रकाशित ग़ज़ल जंगल का न होना, फिर बादल का न होना, बादल न होने पर जल का न होना, परस्पर नाखून और मांस कि तरह जुड़ा है, जिसे श्याम जी ने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। घर की कलह रिश्तों को दलदल बना देती है, यह आज के पारिवारिक विघटन का कटु सत्य है। कम से कम शब्दों में जीवन और जगत का सत्य पेश कर दिया है। विनोद साव जी का नक्सली अन्दोलन पर प्रस्तुत विश्लेषण तार्किक है। भैरव प्रसाद की कहानी ' एक पाँव का जूता '  बहुत मार्मिक है। पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहती। क्या इस तरह की कालजयी रचना से हमारे राजनेता कुछ सीखेंगे? अँधियारे रास्ते और उजला सवेरा- भावना सक्सैना जी का आलेख शोषण के इतिहास को परत-दर-परत खोलने में सक्षम है। अपने साढ़े तीन साल के प्रवास में उन्होंने भारतीयों की 140 साल पहली पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा। अनुपम मिश्र का आलेख और डॉ रत्ना जी का सम्पादकीय हमें वर्तमान की अपरिहार्य चिन्ता से रूबरू कराते हैं। छोटी-पत्रिका में साहित्य और समाज के व्यापक फलक को प्रस्तुत किया गया है। अनिता ललित के हाइकु गागर में सागर की तरह हैं साथ ही अभिव्यक्ति की ताज़गी को भी सँजोए हैं।
                                                         -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
                                                        rdkamboj@gmail.com

अर्थपूर्ण हाइकु
इस अंक में प्रकाशित अनिता ललित की हाइकु लगाओं पौधे बहुत सुंदर, बहुत खूबसूरत, बहुत अर्थपूर्ण, बहुत सार्थक और बहुत मार्मिक है। बधाई।
                                                                  -अशोक सालुजा